9 अगस्त 1173 को Leaning Tower of Pisa की नींव रखी गई थी। जानिए 1173 में शुरू हुआ इसका निर्माण क्यों दो सदियों तक चला, मीनार क्यों झुकी और आधुनिक इंजीनियरिंग ने इसे कैसे बचाया।
पीसा, इटली: कुछ इमारतें अपनी ऊंचाई के लिए इतिहास में दर्ज होती हैं, कुछ अपनी खूबसूरती के लिए… लेकिन इटली के पीसा शहर में खड़ी एक ऐसी मीनार है, जिसकी सबसे बड़ी पहचान उसका सीधा न होना है। करीब नौ सदियां पहले जब इसकी नींव रखी गई, तब शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि जमीन की एक तकनीकी समस्या आगे चलकर इसी इमारत को दुनिया की सबसे पहचानी जाने वाली ऐतिहासिक धरोहरों में शामिल कर देगी।
9 अगस्त 1173 को पीसा के Piazza del Duomo में इस मीनार की नींव रखी गई थी। निर्माण के शुरुआती चरण में ही जमीन धंसने लगी और मीनार एक तरफ झुकने लगी। काम कई बार रुका, युद्धों और राजनीतिक संघर्षों के कारण निर्माण दशकों तक अधूरा रहा और आखिरकार इसे पूरा होने में करीब दो सदियां लग गईं।
आज यही मीनार दुनियाभर में Leaning Tower of Pisa के नाम से मशहूर है। आज, 9 अगस्त 2026 को इसकी नींव रखे जाने के 853 वर्ष पूरे हो गए हैं। इसकी कहानी सिर्फ एक झुकी हुई इमारत की नहीं, बल्कि मध्यकालीन वास्तुकला, कमजोर जमीन, इंजीनियरिंग की चुनौतियों और सदियों से चली आ रही संरक्षण की कोशिशों की कहानी है।
घंटाघर के रूप में हुआ था निर्माण
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि पीसा की झुकी मीनार कोई स्वतंत्र स्मारक बनाने के लिए नहीं बनाई गई थी। यह पीसा कैथेड्रल का स्वतंत्र घंटाघर (Campanile) है।
यह इटली के पीसा शहर में स्थित Piazza del Duomo का हिस्सा है जिसे Square of Miracles भी कहा जाता है। इस परिसर में कैथेड्रल, बैप्टिस्टरी, घंटाघर और कब्रिस्तान शामिल हैं। UNESCO ने पूरे Piazza del Duomo को 1987 में विश्व धरोहर सूची में शामिल किया था।

UNESCO के अनुसार, यहां मौजूद ये चारों स्मारक 11वीं से 14वीं शताब्दी के बीच विकसित हुए और इटली की मध्यकालीन वास्तुकला तथा स्मारकीय कला पर इनका महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा।
1173 में रखी गई थी नींव
पीसा की मीनार के निर्माण की शुरुआत 9 अगस्त 1173 को हुई थी। ऐतिहासिक दस्तावेजों में इससे पहले एक महिला दानदाता डोना बर्टा डि बर्नार्डो (Donna Berta di Bernardo) का भी उल्लेख मिलता है, जिन्होंने 5 जनवरी 1172 को 60 soldi की राशि दान की थी। यह राशि घंटाघर के निर्माण के लिए इस्तेमाल होने वाली सामग्री की खरीद में लगाई गई थी।
मीनार का शुरुआती हिस्सा सफेद संगमरमर से बनाया गया। इसके पहले तल पर स्तंभों और मेहराबों की सुंदर श्रृंखला बनाई गई, जिसने आगे बनने वाली पूरी संरचना की वास्तुशैली की नींव रखी।
मीनार के वास्तुकार को लेकर हालांकि आज भी पूरी तरह निश्चितता नहीं है। ऐतिहासिक परंपरा में बोनानो पिसानो (Bonanno Pisano) और गुग्लिएल्मो (Guglielmo) के नाम सामने आते हैं, जबकि कुछ आधुनिक अध्ययनों में डियोतिसाल्वी (Diotisalvi) को संभावित वास्तुकार माना गया है। इसलिए किसी एक व्यक्ति को निर्विवाद रूप से इसका वास्तुकार कहना उचित नहीं होगा।
निर्माण के दौरान ही शुरू हुआ इमारत का झुकाव
मीनार की कहानी में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब निर्माण अभी शुरुआती चरण में ही था।
1178 तक मीनार की लगभग दूसरी मंजिल तक काम पहुंचा था और तभी इसकी नींव के नीचे की जमीन धंसने लगी। समस्या यह थी कि मीनार की नींव अपेक्षाकृत उथली थी और उसके नीचे की मिट्टी संरचना के भारी वजन को समान रूप से संभाल नहीं पा रही थी।
यहीं से वह झुकाव शुरू हुआ जिसने सदियों बाद इस मीनार को दुनिया भर में प्रसिद्ध कर दिया। लेकिन उस समय इंजीनियरों के सामने यह किसी पर्यटन आकर्षण की समस्या नहीं थी। उनके सामने सवाल था कि क्या इतनी भारी पत्थर की संरचना को सुरक्षित तरीके से पूरा किया जा सकता है।
जब युद्ध बनी निर्माण में रुकावट
मीनार का निर्माण लगातार नहीं चल सका। इस सब के पीछे की असल वजह पीसा गणराज्य उस दौर में जेनोआ, लुक्का और फ्लोरेंस जैसी शक्तियों के साथ संघर्ष को माना जाता है। इन परिस्थितियों के कारण निर्माण लंबे समय तक रुक गया।
दिलचस्प बात यह है कि जिस रुकावट ने निर्माण को लगभग एक सदी तक रोक दिया, उसने अनजाने में मीनार को बचाने में मदद की। इस दौरान नीचे की जमीन को धीरे-धीरे बैठने और स्थिर होने का समय मिला।
अगर निर्माण बिना रुके तेजी से आगे बढ़ता, तो संभव है कि कमजोर जमीन पर लगातार बढ़ता वजन मीनार को बहुत पहले ही गिरा देता।
13वीं शताब्दी में दोबारा शुरू हुआ काम
निर्माण बाद में दोबारा शुरू हुआ और 1272 में जियोवानी डि सिमोन (Giovanni di Simone) के निर्देशन में काम आगे बढ़ा। उस समय तक मीनार का झुकाव स्पष्ट हो चुका था।
अब कारीगरों के सामने नई चुनौती ऊपरी मंजिलों का निर्माण को झुकाव से बचाने की थी।
इस वजह से ऊपरी हिस्से में निर्माण करते समय दोनों तरफ की ऊंचाई में हल्का अंतर रखा गया। नतीजा यह हुआ कि मीनार पूरी तरह सीधी होने के बजाय थोड़ी मुड़ी हुई संरचना जैसी दिखाई देने लगी।
1278 में फिर निर्माण रुक गया। आखिरकार सातवीं मंजिल 1319 में पूरी हुई और घंटाघर वाला अंतिम हिस्सा 1372 में पूरा किया गया। अंतिम घंटाघर का निर्माण टोमासो दि आंद्रेया पिसाणो (Tommaso di Andrea Pisano) से जोड़ा जाता है।

इस तरह 1173 में शुरू हुआ निर्माण लगभग 199 वर्षों की लंबी प्रक्रिया के बाद पूरा हुआ।
सफेद संगमरमर की आठ मंजिला खूबसूरती
पीसा की मीनार को सिर्फ इसलिए याद करना कि वह झुकी हुई है, उसके वास्तुशिल्प के साथ नाइंसाफी होगी।
यह मध्यकालीन रोमनस्क वास्तुकला (Romanesque Architecture) का शानदार उदाहरण है। इसमें सफेद और धूसर संगमरमर, गोल मेहराब और स्तंभों से सजे कई स्तर हैं। इसकी संरचना आठ मंजिलों वाली है और सबसे ऊपरी हिस्से में घंटाघर स्थित है।
मीनार की ऊंचाई जमीन से लगभग 55.86 मीटर है। इसकी नींव से शीर्ष तक ऊंचाई लगभग 58.36 मीटर बताई जाती है। आधार का बाहरी व्यास (Diameter) करीब 15.5 मीटर है और इसका अनुमानित वजन लगभग 14,700 मीट्रिक टन है।
इसके भीतर ऊपर तक पहुंचने के लिए लगभग 296 सीढ़ियां हैं और घंटाघर में सात घंटियां हैं।
गैलीलियो और पीसा की मीनार का मशहूर किस्सा
पीसा की मीनार से जुड़ी सबसे लोकप्रिय वैज्ञानिक कहानियों में महान वैज्ञानिक गैलीलियो गैलिली (Galileo Galilei) का नाम भी आता है।

कहा जाता है कि 16वीं शताब्दी के अंत में गैलीलियो ने मीनार के ऊपर से अलग-अलग वजन वाली गेंदें गिराकर यह प्रदर्शित करने का प्रयोग किया था कि गिरती हुई वस्तुओं की गति केवल उनके वजन पर निर्भर नहीं करती।
हालांकि यह बात ऐतिहासिक रूप से पूरी तरह प्रमाणित नहीं है। इस कहानी का प्रमुख स्रोत गैलीलियो के शिष्य विन्सेन्ज़ो विवियानी (Vincenzo Viviani) द्वारा लिखी गई जीवनी है, जो गैलीलियो की मृत्यु के काफी बाद प्रकाशित हुई थी।

मीनार को गिरने से बचाने की चुनौती
सदियों तक मीनार का झुकाव धीरे-धीरे बढ़ता रहा। 20वीं शताब्दी में यह चिंता गंभीर हो गई कि अगर झुकाव इसी तरह बढ़ता रहा तो एक समय संरचना की स्थिरता खतरे में पड़ सकती है।
1990 में मीनार को जनता के लिए बंद कर दिया गया। इसके बाद इंजीनियरों और वैज्ञानिकों ने इसे सुरक्षित करने के लिए कई विकल्पों पर विचार किया।
सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि मीनार को बचाना तो था, लेकिन उसकी ऐतिहासिक पहचान यानी झुकाव को पूरी तरह खत्म नहीं करना था।
इंजीनियरिंग ने ऐसे बचाई मीनार की ‘झुकी हुई’ पहचान
मीनार को स्थिर करने के लिए आखिरकार एक ऐसी तकनीक अपनाई गई जिसमें उसके नीचे की जमीन से नियंत्रित मात्रा में मिट्टी निकाली गई। इसे तकनीक को under-excavation कहा जाता है।
इस तकनीक का उद्देश्य मीनार को अचानक सीधा करना नहीं था, बल्कि उसके झुकाव को बेहद धीरे और नियंत्रित तरीके से कम करना था।
1990 के दशक में इसके साथ अस्थायी उपायों के तौर पर भारी counterweights और अन्य सुरक्षा व्यवस्थाओं का भी इस्तेमाल किया गया। UNESCO के तकनीकी दस्तावेजों में मीनार के झुकाव को कम करने के लिए किए गए वैज्ञानिक अध्ययनों और योजनाओं का उल्लेख मिलता है।
आखिरकार स्थिरीकरण अभियान सफल रहा। मीनार का झुकाव लगभग 45 सेंटीमीटर कम किया गया और 2001 में इसे फिर से आम लोगों के लिए खोल दिया गया।
2008 में मिली राहत भरी खबर
2008 में इंजीनियरों ने बताया कि मीनार की लगातार होती हलचल रुक गई है और वह स्थिर अवस्था में पहुंच गई है। इसके बाद भी इसकी निगरानी बंद नहीं की गई।
आज भी मीनार की गतिविधियों पर विशेषज्ञों की नजर रहती है। Opera della Primaziale Pisana के अनुसार, इसके संरक्षण और निगरानी के लिए विशेषज्ञों का एक समूह इसके छोटे-छोटे आंदोलनों पर नजर रखता है।
यानी करीब नौ सदियों पुरानी यह इमारत आज भी सिर्फ पत्थर और संगमरमर के भरोसे नहीं खड़ी है। इसके पीछे आधुनिक वैज्ञानिक निगरानी की पूरी व्यवस्था है।
द्वितीय विश्व युद्ध में बाल-बाल बची मीनार
पीसा की मीनार ने सिर्फ प्राकृतिक और इंजीनियरिंग चुनौतियां ही नहीं देखीं, बल्कि द्वितीय विश्व युद्ध का दौर भी देखा।

युद्ध के दौरान मित्र राष्ट्रों को संदेह था कि जर्मन सैनिक मीनार का इस्तेमाल निगरानी चौकी के रूप में कर रहे हैं। एक अमेरिकी सैनिक को वहां जर्मन सैनिकों की मौजूदगी की पुष्टि करने के लिए भेजा गया था। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, उसने वहां से मीनार और कैथेड्रल की खूबसूरती देखी और तोपखाने से हमला करने का आदेश नहीं दिया। इस तरह मीनार संभावित विनाश से बच गई।
1987 में UNESCO की विश्व धरोहर बनी
पीसा की मीनार की वैश्विक ऐतिहासिक अहमियत को देखते हुए Piazza del Duomo, Pisa को 1987 में UNESCO World Heritage Site घोषित किया गया।
यह सम्मान सिर्फ मीनार को अलग से नहीं मिला, बल्कि पूरे वास्तु परिसर को मिला, जिसमें कैथेड्रल, बैप्टिस्टरी, घंटाघर और कब्रिस्तान शामिल हैं।
UNESCO ने इस परिसर को मध्यकालीन वास्तुकला की उत्कृष्ट उपलब्धियों में शामिल किया है।
2023 में पूरे हुए थे 850 साल
9 अगस्त 2023 को पीसा की मीनार की नींव रखे जाने के 850 वर्ष पूरे हुए थे। इस अवसर पर विशेष कार्यक्रम आयोजित किए गए और मीनार के इतिहास तथा संरक्षण से जुड़े पहलुओं को सामने रखा गया।
अब 9 अगस्त 2026 को इसकी नींव रखे जाने के 853 साल पूरे हो रहे हैं।
आज भी क्यों है दुनिया के सबसे मशहूर स्मारकों में शामिल?
पीसा की मीनार की लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण उसका असामान्य रूप है। दुनिया में कई खूबसूरत ऐतिहासिक इमारतें हैं, लेकिन पीसा की मीनार को दूर से देखते ही पहचान लिया जाता है।
इसकी तस्वीर के साथ पर्यटकों की वह मशहूर मुद्रा भी जुड़ गई है, जिसमें लोग ऐसा दिखाते हैं जैसे वे मीनार को अपने हाथ से रोक रहे हों।

लेकिन इसके पीछे की असली कहानी इससे कहीं ज्यादा गंभीर और दिलचस्प है। यह एक ऐसी इमारत है जो गलत जमीन, अधूरे निर्माण, युद्ध, सदियों के झुकाव और आधुनिक इंजीनियरिंग जैसी तमाम चुनौतियों के बावजूद आज तक कायम है।
क्या पीसा की मीनार कभी गिरेगी?
इस सवाल का कोई स्पष्ट जवाब दे पाना मुश्किल है। वर्तमान में मीनार को स्थिर स्थिति में माना जाता है और इसकी नियमित निगरानी की जाती है।
2001 में दोबारा खोलने के समय इसे लंबे समय के लिए स्थिर माना गया था और बाद के वर्षों में भी इंजीनियरिंग निगरानी जारी रही।
इसलिए आज पीसा की मीनार को ‘गिरने वाली इमारत’ कहना सही नहीं होगा। यह एक ऐसी ऐतिहासिक संरचना है जिसे वैज्ञानिक तरीके से स्थिर किया गया है और जिसकी सुरक्षा लगातार देखी जा रही है।
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