जंतर-मंतर पर सोनम वांगचुक का आमरण अनशन 18वें दिन में पहुंच गया है। इस बीच जानिए इतिहास के 7 सबसे लंबे अनशनों के बारे में, जिन्होंने दुनिया की राजनीति और समाज को प्रभावित किया।
नई दिल्ली: बुधवार (15 जुलाई) को नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर पर्यावरणविद्, शिक्षा सुधारक और मैग्सेसे पुरस्कार विजेता सोनम वांगचुक का आमरण अनशन 18वें दिन में प्रवेश कर गया। डॉक्टरों के अनुसार लगातार उपवास के कारण उनका वजन काफी घट चुका है, रक्त शर्करा (ब्लड शुगर) का स्तर सामान्य से नीचे पहुंच गया है और शरीर में लगातार कमजोरी बढ़ रही है। इसके बावजूद उन्होंने अपना आंदोलन समाप्त करने से इनकार कर दिया है।
सोनम वांगचुक ने 28 जून 2026 को दिल्ली के जंतर-मंतर पर आमरण अनशन शुरू किया। उनका आंदोलन हालिया NEET-UG पेपर लीक विवाद को लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पर केंद्रित है।
भारत और दुनिया के इतिहास में अनशन हमेशा लोकतांत्रिक विरोध का सबसे शक्तिशाली और नैतिक हथियार मानी गई है। महात्मा गांधी से लेकर इरोम शर्मिला, भगत सिंह, बॉबी सैंड्स और पोट्टी श्रीरामुलु तक कई लोगों ने अपने शरीर को ही आंदोलन का माध्यम बनाया।
सोनम वांगचुक आखिर क्यों कर रहे हैं आमरण अनशन?
सोनम वांगचुक ने 28 जून 2026 को नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर आमरण अनशन शुरू किया। यह अनशन युवा-नेतृत्व वाली Cockroach Janta Party (CJP) के समर्थन में किया जा रहा है।
उनका कहना है कि हालिया NEET-UG परीक्षा में कथित पेपर लीक और अनियमितताओं ने देश की शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। वांगचुक ने इस मामले में जवाबदेही तय करने, शिक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार लाने और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग की है। उनका कहना है कि जब तक सरकार इन मुद्दों पर ठोस कार्रवाई और पारदर्शी जांच सुनिश्चित नहीं करती, तब तक उनका आमरण अनशन जारी रहेगा।
लगातार बिगड़ रही है सेहत
आंदोलन के आयोजकों के अनुसार 18 दिनों के उपवास के दौरान सोनम वांगचुक का वजन कई किलोग्राम कम हो चुका है। चिकित्सकों ने बताया कि
- उनका ब्लड शुगर सामान्य स्तर से नीचे पहुंच चुका है।
- लगातार कमजोरी और चक्कर आने की शिकायत बढ़ी है।
- शरीर में ऊर्जा की कमी स्पष्ट दिखाई दे रही है।
- लगातार वजन गिर रहा है।
इसके बावजूद वांगचुक ने कहा है कि जब तक सरकार औपचारिक बातचीत शुरू नहीं करती, तब तक उनका आंदोलन जारी रहेगा।
दिल्ली हाईकोर्ट भी पहुंचा मामला
सोनम वांगचुक की बिगड़ती तबीयत को देखते हुए दिल्ली हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई है। याचिका में अदालत से अनुरोध किया गया है कि सरकार को निर्देश दिया जाए कि उनकी चिकित्सीय जांच सुनिश्चित की जाए और आवश्यकता पड़ने पर उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया जाए।
दिल्ली हाईकोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस से जवाब मांगा है। फिलहाल अदालत मामले की सुनवाई कर रही है।
अब इतिहास की सात सबसे लंबी भूख हड़तालों पर एक नज़र डालते हैं।
1. इरोम शर्मिला (5,836 दिन)
यदि दुनिया में सबसे लंबे आमरण अनशन की बात की जाए तो इरोम चानू शर्मिला का नाम सबसे पहले आता है। मणिपुर की मानवाधिकार कार्यकर्ता इरोम शर्मिला ने 2 नवंबर 2000 को अपना अनिश्चितकालीन अनशन शुरू किया था।
इसकी वजह थी मालोम नरसंहार, जिसमें असम राइफल्स पर 10 नागरिकों की हत्या का आरोप लगा था। इसके बाद उन्होंने सशस्त्र बल (विशेष अधिकार) अधिनियम यानी AFSPA को हटाने की मांग करते हुए भोजन और पानी त्याग दिया।
भारतीय कानून के तहत आत्महत्या के प्रयास के आरोप में उन्हें बार-बार गिरफ्तार किया गया। अधिकांश समय वे इंफाल के एक अस्पताल में न्यायिक हिरासत में रहीं, जहां उन्हें नाक के जरिए (Nasogastric Tube) तरल आहार देकर जीवित रखा जाता था। उन्होंने स्वेच्छा से कभी भोजन स्वीकार नहीं किया।
करीब 16 वर्षों तक चला यह अनशन दुनिया के इतिहास की सबसे लंबी राजनीतिक भूख हड़ताल माना जाता है। आखिरकार 9 अगस्त 2016 को उन्होंने अनशन समाप्त किया और लोकतांत्रिक राजनीति के माध्यम से संघर्ष जारी रखने का फैसला किया। हालांकि AFSPA पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ, लेकिन उनके आंदोलन ने मानवाधिकारों पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बहस को नई दिशा दी। आज भी इरोम शर्मिला को “Iron Lady of Manipur” के नाम से जाना जाता है।
2. भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त (116 दिन)
साल 1929 में लाहौर सेंट्रल जेल में स्वतंत्रता सेनानी भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ इतिहास की सबसे चर्चित जेल भूख हड़तालों में से एक शुरू की।
यह आंदोलन किसी व्यक्तिगत सुविधा के लिए नहीं था, बल्कि भारतीय राजनीतिक कैदियों को यूरोपीय कैदियों के बराबर सम्मान, बेहतर भोजन, पढ़ने की सुविधा, साफ कपड़े और मानवीय व्यवहार दिलाने की मांग को लेकर था।
इस भूख हड़ताल में बाद में कई अन्य क्रांतिकारी भी शामिल हुए। ब्रिटिश प्रशासन ने आंदोलन तोड़ने के लिए कैदियों को जबरन भोजन देने की कोशिश की, जिससे उनकी शारीरिक स्थिति लगातार बिगड़ती गई। इसी आंदोलन के दौरान क्रांतिकारी जतिन दास ने 63 दिनों की भूख हड़ताल के बाद प्राण त्याग दिए, जिससे पूरे देश में भारी जनाक्रोश फैल गया।
लगभग 116 दिनों तक चले इस आंदोलन ने ब्रिटिश शासन की जेल व्यवस्था को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कठघरे में खड़ा कर दिया। हालांकि सभी मांगें तुरंत स्वीकार नहीं हुईं, लेकिन इस भूख हड़ताल ने भगत सिंह को केवल क्रांतिकारी ही नहीं, बल्कि राजनीतिक अधिकारों के प्रतीक के रूप में भी स्थापित कर दिया।
3. बॉबी सैंड्स (66 दिन)
1981 में उत्तरी आयरलैंड की HM Prison Maze जेल में आयरिश रिपब्लिकन आर्मी (IRA) के सदस्य बॉबी सैंड्स ने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ भूख हड़ताल शुरू की। उनकी मांग थी कि IRA कैदियों को सामान्य अपराधी नहीं, बल्कि राजनीतिक कैदी का दर्जा दिया जाए। इसे “Five Demands” आंदोलन के नाम से जाना गया।
भूख हड़ताल शुरू होने के कुछ ही समय बाद बॉबी सैंड्स ब्रिटिश संसद के लिए सांसद (Member of Parliament) भी निर्वाचित हो गए, जिससे यह आंदोलन वैश्विक सुर्खियों में आ गया। इसके बावजूद तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर ने उनकी मांगें मानने से इनकार कर दिया।
लगातार 66 दिनों तक भोजन न करने के बाद 5 मई 1981 को बॉबी सैंड्स की मृत्यु हो गई। उनके बाद नौ अन्य आयरिश कैदियों की भी भूख हड़ताल के दौरान मौत हुई। इस घटना ने पूरी दुनिया में राजनीतिक कैदियों के अधिकारों पर नई बहस छेड़ दी और उत्तरी आयरलैंड संघर्ष (The Troubles) के इतिहास में यह एक निर्णायक मोड़ माना गया।
4. पोट्टी श्रीरामुलु (56 दिन)
भारत के इतिहास में यदि किसी अनशन ने सीधे-सीधे देश की राजनीतिक और प्रशासनिक संरचना को बदल दिया, तो वह था पोट्टी श्रीरामुलु का आमरण अनशन।
गांधीवादी नेता और स्वतंत्रता सेनानी पोट्टी श्रीरामुलु ने 19 अक्टूबर 1952 को तत्कालीन मद्रास राज्य में तेलुगु भाषी लोगों के लिए अलग राज्य की मांग को लेकर अनिश्चितकालीन उपवास शुरू किया। उनका मानना था कि भाषा और सांस्कृतिक पहचान के आधार पर प्रशासनिक इकाइयों का गठन होना चाहिए।
शुरुआत में केंद्र सरकार ने उनके आंदोलन को गंभीरता से नहीं लिया। लेकिन जैसे-जैसे दिन बीतते गए, उनकी तबीयत लगातार बिगड़ती गई। 56 दिनों तक भोजन त्यागने के बाद 15 दिसंबर 1952 को उनका निधन हो गया।
उनकी मृत्यु के बाद आंध्र क्षेत्र में व्यापक विरोध प्रदर्शन और हिंसा भड़क उठी। जनदबाव इतना बढ़ गया कि तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को अलग राज्य के गठन की घोषणा करनी पड़ी। परिणामस्वरूप 1 अक्टूबर 1953 को आंध्र राज्य अस्तित्व में आया, जो बाद में 1956 के राज्य पुनर्गठन आयोग (States Reorganisation Commission) के लिए भी आधार बना।
रामुलु का अनशन यह साबित करता है कि कभी-कभी अहिंसक संघर्ष देश की राजनीतिक दिशा बदलने की क्षमता भी रखता है।
5. सोलांज फर्नेक्स (40 दिन)
फ्रांस की पर्यावरणविद्, यूरोपीय संसद की सदस्य और ग्रीन मूवमेंट की प्रमुख नेता सोलांज फर्नेक्स (Solange Fernex) ने 1986 में परमाणु ऊर्जा के खिलाफ लंबी भूख हड़ताल की। यह वही वर्ष था जब सोवियत संघ के चेरनोबिल परमाणु हादसे ने पूरी दुनिया को झकझोर दिया था और परमाणु संयंत्रों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए थे।
फर्नेक्स ने लगभग 40 दिनों तक उपवास रखा। उनका उद्देश्य फ्रांस में कैटेनोम (Cattenom) परमाणु ऊर्जा संयंत्र का विरोध करना और यूरोप में परमाणु हथियारों तथा परमाणु ऊर्जा के बढ़ते खतरे के प्रति लोगों को जागरूक करना था। उन्होंने सरकार से ऊर्जा नीति में बदलाव और पर्यावरणीय जोखिमों पर गंभीर चर्चा की मांग की।
यद्यपि उनकी भूख हड़ताल के बाद फ्रांस ने तत्काल अपनी परमाणु नीति नहीं बदली, लेकिन इस आंदोलन ने पूरे यूरोप में पर्यावरण संरक्षण और परमाणु सुरक्षा पर नई बहस शुरू कर दी। सोलांज फर्नेक्स का संघर्ष इस बात का उदाहरण माना जाता है कि भूख हड़ताल केवल राजनीतिक अधिकारों के लिए ही नहीं, बल्कि पर्यावरण और मानवता के भविष्य के लिए भी प्रभावी विरोध का माध्यम बन सकती है।
6. एलिस पॉल (22 दिन)
अमेरिका में महिलाओं को मतदान का अधिकार दिलाने के आंदोलन में एलिस पॉल (Alice Paul) का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। 1917 में उन्होंने और उनकी सहयोगियों ने व्हाइट हाउस के बाहर लगातार प्रदर्शन किया। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान राष्ट्रपति वुडरो विल्सन के खिलाफ प्रदर्शन करने पर उन्हें गिरफ्तार कर Occoquan Workhouse जेल भेज दिया गया।
जेल में एलिस पॉल ने 22 दिनों तक भूख हड़ताल की। प्रशासन ने उनका आंदोलन तोड़ने के लिए उन्हें जबरन भोजन (Force Feeding) दिया, जिसे बाद में मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन माना गया। इस अमानवीय व्यवहार की खबर अमेरिकी मीडिया में प्रमुखता से छपी और जनता में सरकार के खिलाफ भारी नाराजगी फैल गई।
एलिस पॉल और उनकी साथियों के संघर्ष ने अमेरिकी महिला मताधिकार आंदोलन को नई गति दी। आखिरकार 1920 में अमेरिकी संविधान का 19वां संशोधन (Nineteenth Amendment) पारित हुआ, जिसने महिलाओं को मतदान का संवैधानिक अधिकार दिया। आज एलिस पॉल की भूख हड़ताल को महिलाओं के समान अधिकारों की लड़ाई का ऐतिहासिक मोड़ माना जाता है।
7. महात्मा गांधी (21 दिन)
यदि भूख हड़ताल को नैतिक शक्ति का प्रतीक बनाने का श्रेय किसी एक व्यक्ति को जाता है, तो वह हैं महात्मा गांधी। उन्होंने अपने जीवन में कई बार उपवास किए, लेकिन सबसे चर्चित उनके 21 दिनों के उपवास रहे। गांधी के उपवास किसी सरकार को गिराने के लिए नहीं, बल्कि समाज की आत्मा को झकझोरने के लिए होते थे।
उन्होंने 1924 में हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए, 1932 में अस्पृश्यता और पूना पैक्ट के संदर्भ में तथा 1943 में ब्रिटिश शासन के विरोध में 21 दिनों के लंबे उपवास किये। उनके लिए उपवास आत्मशुद्धि (Self-purification), नैतिक दबाव और अहिंसक प्रतिरोध का माध्यम था। पूरी दुनिया ने देखा कि बिना हिंसा के भी एक व्यक्ति सत्ता को संवाद के लिए मजबूर कर सकता है।
गांधी के उपवासों ने केवल भारत ही नहीं, बल्कि मार्टिन लूथर किंग जूनियर, नेल्सन मंडेला और दुनिया के अनेक अहिंसक आंदोलनों को भी प्रेरित किया। यही कारण है कि उन्हें आधुनिक इतिहास में भूख हड़ताल को नैतिक आंदोलन का स्वरूप देने वाला सबसे प्रभावशाली नेता माना जाता है।
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