फिलिस्तीनी कलाकार स्लिमन मंसूर ने कला को अपनी जमीन, संस्कृति और पहचान से जुड़े संघर्ष का माध्यम बनाया। 79 वर्ष की उम्र में उनके निधन के साथ पांच दशक लंबा एक कला सफर थम गया।
बिरज़ेत, रामल्लाह: फिलिस्तीनी कला जगत के दिग्गज कलाकार स्लिमन मंसूर (Sliman Mansour) का 79 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उनके परिवार ने सोमवार, 24 अगस्त को इंस्टाग्राम पर उनके निधन की जानकारी दी। परिवार के मुताबिक, मंसूर इससे पहले गंभीर रूप से बीमार थे। उनकी मौत की वजह अभी सार्वजनिक नहीं की गई है। मंसूर ने पूर्वी यरुशलम के अल-मकासेद अस्पताल में इलाज के दौरान अंतिम सांस ली।
पांच दशक से अधिक लंबे करियर में मंसूर ने फिलिस्तीनी जीवन, विस्थापन, जमीन से जुड़ाव, स्मृति और संघर्ष को अपनी कला का केंद्र बनाया। उनके चित्रों में जैतून के पेड़, संतरे, पारंपरिक फिलिस्तीनी कढ़ाई, ग्रामीण जीवन, महिलाएं और यरुशलम बार-बार दिखाई देते हैं। उनकी कला सिर्फ चित्रकला तक सीमित नहीं रही। वह चित्रकार के साथ-साथ मूर्तिकार, लेखक और कार्टूनिस्ट भी थे और उन्होंने फिलिस्तीन में कला शिक्षा तथा कला संस्थानों को विकसित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

उनकी सबसे प्रसिद्ध कृतियों में ‘Jamal Al Mahamel’, जिसे अंग्रेजी में ‘Camel of Hardship’ या ‘Camel of Burdens’ के नाम से जाना जाता है, प्रमुख है। इस पेंटिंग में एक बुजुर्ग फिलिस्तीनी व्यक्ति अपनी पीठ पर यरुशलम को उठाए दिखाई देता है। यह चित्र समय के साथ फिलिस्तीनी पहचान और दृढ़ता का एक अंतरराष्ट्रीय प्रतीक बन गया।
बिरज़ेत में हुआ जन्म
स्लिमन मंसूर का जन्म 1947 में रामल्लाह के पास स्थित बिरज़ेत में हुआ था। उनका जन्म उस दौर में हुआ जब फिलिस्तीन का इतिहास बड़े राजनीतिक बदलावों से गुजर रहा था। आगे चलकर यही सामाजिक और ऐतिहासिक परिस्थितियां उनकी कला के महत्वपूर्ण विषय बनीं।
उन्होंने यरुशलम स्थित Bezalel Academy of Arts and Design में फाइन आर्ट्स की पढ़ाई की और 1970 में स्नातक हुए। पढ़ाई के बाद उन्होंने अपनी कला को आसपास के जीवन और फिलिस्तीनी समाज से जोड़ दिया। उनकी पेंटिंग्स में रोजमर्रा की जिंदगी, जमीन और सांस्कृतिक परंपराओं को प्रमुख स्थान मिला।
मंसूर की कला का एक महत्वपूर्ण पहलू यह था कि उन्होंने फिलिस्तीनी संस्कृति को केवल ऐतिहासिक संदर्भ के रूप में नहीं देखा। उन्होंने उसे जीवित अनुभव के तौर पर चित्रित किया। पारंपरिक कपड़े पहने महिलाएं, ग्रामीण इलाकों के दृश्य, जैतून के पेड़ और यरुशलम जैसे प्रतीक उनके काम में बार-बार लौटते रहे।
प्रतिरोध का माध्यम थी मंसूर की कला
मंसूर की कला को समझने के लिए ‘सुमुद’ यानी दृढ़ता और अपनी जमीन पर कायम रहने की अवधारणा को समझना जरूरी है। उनकी पेंटिंग्स में फिलिस्तीनी लोगों का अपनी जमीन और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ाव दिखाई देता है।
मंसूर ने 2024 में Anadolu Agency से बातचीत में कहा था कि उनकी कला का उद्देश्य फिलिस्तीनियों के अपनी जमीन से संबंध, उसे बचाए रखने के संकल्प और फिलिस्तीन की सुंदरता को सामने लाना था। उन्होंने यरुशलम को फिलिस्तीन का प्रतीक और डोम ऑफ द रॉक को यरुशलम का प्रतीक बताया था।
उनकी कला ने 1970 के दशक से ही फिलिस्तीनी संघर्ष से जुड़े कई दृश्य प्रतीकों को मजबूत करने में भूमिका निभाई। संतरे का पेड़ उनके काम में 1948 की नकबा (आपदा) की स्मृति से जुड़ा प्रतीक बना, जबकि जैतून का पेड़ 1967 के युद्ध और जमीन से संबंध का प्रतीक बनकर सामने आया। पारंपरिक फिलिस्तीनी कढ़ाई और ग्रामीण जीवन भी उनके दृश्य संसार का हिस्सा रहे।
कैमल ऑफ हार्डशिप: पीठ पर यरुशलम का बोझ
मंसूर की सबसे चर्चित पेंटिंग ‘जमाल अल महामेल’ यानी ‘Camel of Hardship’ 1973 में बनाई गई थी। इसमें पारंपरिक पोशाक पहने एक बुजुर्ग फिलिस्तीनी व्यक्ति एक विशाल बोझ उठाए आगे बढ़ता दिखाई देता है। उस बोझ के भीतर यरुशलम का चित्र मौजूद है और डोम ऑफ द रॉक इसमें विशेष रूप से दिखाई देता है।
यह पेंटिंग सिर्फ एक व्यक्ति का चित्र नहीं रही। धीरे-धीरे यह फिलिस्तीनी लोगों की अपनी जमीन, इतिहास और यरुशलम से जुड़े भावनात्मक संबंध का प्रतीक बन गई। पेंटिंग में दिखाई देने वाला थका हुआ लेकिन आगे बढ़ता व्यक्ति उस ‘सुमुद’ यानी दृढ़ता का प्रतिनिधित्व करता है, जिसे मंसूर अपने काम के केंद्र में रखते थे।

इस कृति की खास बात यह भी रही कि यह सिर्फ कला दीर्घाओं तक सीमित नहीं रही। इसकी प्रतिकृतियां पोस्टर के रूप में इस्तेमाल हुईं और यह फिलिस्तीनी घरों तथा सार्वजनिक स्थानों में भी दिखाई देने लगी। इस तरह एक पेंटिंग धीरे-धीरे सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बन गई।
‘मदर एंड चाइल्ड’ में मातृत्व और यरुशलम
मंसूर की दूसरी उल्लेखनीय कृतियों में ‘Mother and Child’ भी शामिल है। 2009 की इस पेंटिंग में मां और बच्चे के माध्यम से मातृत्व, परिवार और फिलिस्तीनी पहचान को सामने रखा गया। उनके काम में महिला का चित्रण अक्सर केवल एक व्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि जमीन, परिवार और समुदाय से जुड़े व्यापक प्रतीक के रूप में दिखाई देता है।

इसी तरह ‘द मदर्स सिटी’ में एक मां अपने बच्चे को करीब से पकड़े दिखाई देती है और पृष्ठभूमि में यरुशलम के धार्मिक और ऐतिहासिक प्रतीक मौजूद हैं। इस तरह मंसूर ने मातृत्व और शहर को एक ही दृश्य में जोड़ दिया।
‘ऑलिव पिकिंग’ में जमीन और परंपरा
मंसूर की कला में जैतून का पेड़ एक लगातार दिखाई देने वाला प्रतीक रहा। उनकी ‘Olive Picking’ पेंटिंग में पारंपरिक फिलिस्तीनी कढ़ाई वाले कपड़े पहने एक महिला जैतून की फसल के दौरान दिखाई देती है। यहां खेती का दृश्य सिर्फ ग्रामीण जीवन का चित्रण नहीं है, बल्कि जमीन, परंपरा और पीढ़ियों से चले आ रहे संबंध को भी सामने लाता है।

उनके लिए जैतून और संतरे जैसे पेड़ फिलिस्तीनी भूगोल के सामान्य हिस्से होने के साथ-साथ स्मृति और इतिहास के प्रतीक भी थे। इसी वजह से प्राकृतिक दृश्य उनके चित्रों में केवल पृष्ठभूमि नहीं बने, बल्कि कहानी का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे।
‘एंड द कॉन्वॉय कीप्स गोइंग…’
उनकी चर्चित कृतियों में ‘And the Convoy Keeps Going…’ भी शामिल है। 2016 की इस पेंटिंग में एक महिला, एक लड़की और एक लड़का आगे बढ़ते दिखाई देते हैं, जबकि ऊपर एक सफेद कबूतर उड़ता है। पीछे समुद्र का दृश्य मौजूद है। यह रचना मंसूर के उस व्यापक दृष्टिकोण से जुड़ती है जिसमें परिवार, समुदाय और आगे बढ़ने की भावना महत्वपूर्ण है।

इसके अलावा उनकी ‘The Village Awakens III’, ‘Land Day’ और ‘I Am Ismail’ जैसी कृतियां भी उनके लंबे कलात्मक सफर की अलग-अलग दिशाओं को दिखाती हैं। ‘Land Day’ में जैतून के पेड़ और महिला की आकृति के जरिए जमीन से जुड़ाव को दिखाया गया, जबकि ‘I Am Ismail’ उनकी मिट्टी से बनी रिलीफ श्रृंखला का हिस्सा थी, जिसे 1998 के काहिरा बिएनाले में Grand Nile Prize मिला।
जब कलाकारों ने चुनी स्थानीय मिट्टी और मेंहदी
मंसूर की कला यात्रा में New Visions सामूहिक भी एक महत्वपूर्ण अध्याय रहा। 1987 में प्रथम इंतिफादा के दौरान उन्होंने वेरा तमारी, तयसीर बराकात और नबील अनानी के साथ मिलकर इस समूह की स्थापना की।
समूह ने इजरायली कला-सामग्री के बहिष्कार का फैसला किया और स्थानीय प्राकृतिक सामग्री का इस्तेमाल शुरू किया। इनमें मिट्टी, मेंहदी और अन्य स्थानीय संसाधन शामिल थे।
मंसूर ने मिट्टी को अपने काम का महत्वपूर्ण माध्यम बनाया। उन्होंने लकड़ी की संरचनाओं पर मिट्टी की परतें चढ़ाकर और उन्हें सूखने दिया। सूखने के दौरान मिट्टी में आने वाली दरारें उनके काम को एक अलग बनावट देती थीं। इस तकनीक में इस्तेमाल होने वाली मिट्टी भी उनकी कला को उस जमीन से भौतिक रूप से जोड़ती थी, जिसे उनके काम का केंद्रीय विषय माना जाता है।
1980 की प्रदर्शनी और राजनीतिक कला पर दबाव
मंसूर के करियर में ऐसे मौके भी आए जब उनकी कला को राजनीतिक संदर्भ के कारण दबाव का सामना करना पड़ा। 1980 में रामल्लाह की 79 Gallery में मंसूर, नबील अनानी और इस्साम बद्र की प्रदर्शनी को इजरायली सेना ने कुछ घंटों बाद बंद कर दिया था। इसके बाद कलाकारों को बुलाकर राजनीतिक पेंटिंग बनाने को लेकर चेतावनी दी गई थी।
यह घटना बताती है कि मंसूर के लिए कला केवल स्टूडियो तक सीमित गतिविधि नहीं थी। उनके चित्रों में दिखाई देने वाले प्रतीक उस समय के राजनीतिक और सामाजिक संदर्भ से सीधे जुड़े थे।
फिलिस्तीनी कला को संस्थागत आधार देने में भूमिका
मंसूर ने सिर्फ अपने चित्र नहीं बनाए, बल्कि फिलिस्तीन में कला के लिए संस्थागत ढांचा तैयार करने में भी काम किया। वह League of Palestinian Artists के संस्थापक सदस्यों में शामिल थे और 1986 से 1990 तक इसके नेतृत्व में रहे।
1994 में उन्होंने पूर्वी यरुशलम में Al-Wasiti Art Centre की स्थापना में भूमिका निभाई। इसका उद्देश्य फिलिस्तीनी कला को संरक्षित करना और फिलिस्तीन में रहने वाले कलाकारों तथा विदेशों में रहने वाले फिलिस्तीनी कलाकारों के बीच संबंध बनाए रखना था। मंसूर 1996 से 2003 तक इसके निदेशक भी रहे।
उन्होंने International Academy of Art Palestine के संस्थापक बोर्ड में भी काम किया और 2000 से 2014 तक अल-कुद्स यूनिवर्सिटी में पढ़ाया। इस तरह उन्होंने अगली पीढ़ी के कलाकारों को तैयार करने में भी योगदान दिया।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिली पहचान
मंसूर की कला फिलिस्तीन तक सीमित नहीं रही। उनकी कृतियां दुनिया के कई महत्वपूर्ण कला संग्रहों में शामिल हैं। इनमें British Museum, Mathaf: Arab Museum of Modern Art, Guggenheim Abu Dhabi, Institut du Monde Arabe और Barjeel Art Foundation जैसे संस्थान शामिल हैं।
उन्हें 1998 में Palestine Prize for the Visual Arts और Grand Nile Prize से सम्मानित किया गया। 2019 में उन्हें UNESCO-Sharjah Prize for Arab Culture मिला। UNESCO ने यह सम्मान अरब संस्कृति को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आगे बढ़ाने, कला शिक्षा में योगदान और युवा कलाकारों के लिए मंच तैयार करने के उनके काम के लिए दिया था।
बीमारी के बावजूद स्टूडियो से नहीं टूटा रिश्ता
मंसूर को 2021 में स्ट्रोक आया था, जिसके बाद उनके बाएं हाथ और एकाग्रता पर असर पड़ा। इसके बावजूद उन्होंने स्टूडियो जाना बंद नहीं किया। उन्होंने कहा था कि वह हर दिन स्टूडियो जाने की कोशिश करते हैं, भले ही हर दिन पेंटिंग न कर पाएं। कभी वह पढ़ते, कभी स्केच बनाते और कभी सिर्फ वहां समय बिताते थे।

2023 के अंत में गाजा में युद्ध के बाद उनके काम में भी बदलाव दिखाई दिया। उन्होंने बिना प्रारंभिक स्केच के सीधे कैनवास पर रंग और ब्रशवर्क करना शुरू किया। उन्होंने उस समय कहा था कि उनके मन में आने वाली कई तस्वीरें बेहद भयावह थीं और उन्हें पेंटिंग के जरिए बाहर निकालने की जरूरत महसूस होती थी।
पांच दशक की कला यात्रा के बाद छोड़ी बड़ी विरासत
स्लिमन मंसूर का निधन ऐसे समय हुआ है जब उनकी कला फिलिस्तीनी सांस्कृतिक पहचान की सबसे पहचानी जाने वाली आवाजों में गिनी जाती है। उन्होंने अपनी पेंटिंग्स में सिर्फ संघर्ष नहीं दिखाया, बल्कि जमीन, परिवार, गांव, पेड़, परंपरा और यरुशलम के जरिए एक समाज की सामूहिक स्मृति को दर्ज किया।
उनकी कला की खासियत यह रही कि वह राजनीतिक संदेश को रोजमर्रा की जिंदगी के दृश्यों के भीतर रखते थे। बुजुर्ग व्यक्ति की पीठ पर यरुशलम, जैतून चुनती महिला, मां की गोद में बच्चा या मिट्टी से बनी आकृतियां, इन सभी में इतिहास और वर्तमान एक साथ दिखाई देते हैं।
परिवार ने उनके निधन पर कहा कि दुनिया उनके पीछे सुंदरता, स्मृति और ऐसी विरासत छोड़ने वाले कलाकार को याद रखेगी, जबकि परिवार के लिए उन्होंने एक पिता, प्रेम, शक्ति और घर खोया है। उनकी मौत के बाद भी उनकी पेंटिंग्स और उनके बनाए सांस्कृतिक संस्थान उस कलात्मक विरासत को आगे ले जाएंगे, जिसे उन्होंने पांच दशकों से अधिक समय तक बनाया।
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