दुलारचंद यादव के पोते नीरज कुमार ने अनंत सिंह को पटना हाईकोर्ट से मिली जमानत को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। याचिका में उनके आपराधिक इतिहास और मामले की गंभीरता का मुद्दा उठाया गया था।
नई दिल्ली/ पटना: बिहार के मोकामा से विधायक अनंत सिंह की मुश्किलें एक बार फिर बढ़ गई हैं। दुलारचंद यादव हत्याकांड में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें पटना हाईकोर्ट से मिली जमानत रद्द कर दी है। शीर्ष अदालत ने अनंत सिंह को 1 दिसंबर 2026 तक संबंधित अधिकारियों के सामने सरेंडर करने का निर्देश दिया है।
यह मामला 30 अक्टूबर 2025 को बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान मोकामा में हुई हिंसक झड़प और दुलारचंद यादव की हत्या से जुड़ा है। यादव उस समय जन सुराज पार्टी के उम्मीदवार के समर्थन में चुनाव प्रचार कर रहे थे। उनकी हत्या के मामले में अनंत सिंह को मुख्य आरोपी माना गया था।
वह नवंबर 2025 में गिरफ्तार हुए थे और मार्च 2026 में हाईकोर्ट से जमानत मिलने के बाद जेल से बाहर आए थे। अब सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश के बाद उन्हें दोबारा सरेंडर करना होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने रद्द की अनंत सिंह की जमानत
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने शुक्रवार, 30 अक्टूबर को दुलारचंद यादव हत्याकांड में अनंत सिंह को मिली जमानत के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई की। पीठ में जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस पीवी वराले शामिल थे। अदालत ने पटना हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके तहत अनंत सिंह को इस मामले में जमानत दी गई थी। शीर्ष अदालत ने उन्हें 1 दिसंबर तक संबंधित अधिकारियों के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पटना हाईकोर्ट ने अनंत सिंह को जमानत देते समय अपराध की प्रकृति और उनके आपराधिक इतिहास पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया था। अदालत के अनुसार, किसी आरोपी को जमानत देने के फैसले में मामले की गंभीरता और उससे जुड़े दूसरे महत्वपूर्ण पहलुओं पर विचार करना जरूरी है। इस मामले में हाईकोर्ट के आदेश में इन पहलुओं का पर्याप्त आकलन नहीं किया गया।
दुलारचंद यादव के पोते नीरज कुमार ने हाईकोर्ट के जमानत आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। याचिका में अनंत सिंह के आपराधिक रिकॉर्ड का हवाला देते हुए दलील दी गई थी कि जमानत देते समय उनके खिलाफ दर्ज अन्य मामलों और आपराधिक पृष्ठभूमि पर समुचित विचार नहीं हुआ। इसी चुनौती पर सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट से मिली राहत को समाप्त कर दिया।
चार महीने में जांच पूरी करने के निर्देश
अनंत सिंह की जमानत रद्द करने के साथ सुप्रीम कोर्ट ने मामले की जांच को लेकर भी बिहार पुलिस को स्पष्ट निर्देश दिया है। अदालत ने कहा है कि पुलिस चार महीने के भीतर जांच पूरी करे। इसके बाद मामले को आगे की सुनवाई के लिए चार महीने बाद सूचीबद्ध किया गया है।
यह निर्देश इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि दुलारचंद यादव की हत्या को एक साल पूरा हो चुका है, लेकिन मामले की जांच अब भी जारी है। अदालत ने जांच को समयबद्ध तरीके से पूरा करने पर जोर दिया है। इससे पुलिस को उपलब्ध साक्ष्यों, घटनाक्रम और आरोपों की जांच निर्धारित अवधि में पूरी करनी होगी।
मामले में दुलारचंद यादव के परिवार की ओर से भी न्यायिक प्रक्रिया को लेकर लगातार सवाल उठाए गए हैं। उनके पोते नीरज कुमार ने ही अनंत सिंह को मिली जमानत के खिलाफ शीर्ष अदालत का रुख किया था। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अब जांच की प्रगति और आगे की सुनवाई पर नजर रहेगी।
दुलारचंद यादव हत्याकांड क्या है?
यह मामला बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के प्रचार के दौरान हुई एक हिंसक घटना से जुड़ा है। 30 अक्टूबर 2025 को मोकामा टाल इलाके में दुलारचंद यादव की हत्या कर दी गई थी। उस समय बिहार में विधानसभा चुनाव का प्रचार चल रहा था। दुलारचंद यादव पूर्व में राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) से जुड़े रहे थे और चुनाव के दौरान जन सुराज पार्टी के उम्मीदवार पीयूष प्रियदर्शी का समर्थन कर रहे थे।
इसी दौरान दुलारचंद यादव के समर्थकों और अनंत सिंह के काफिले के बीच टकराव हुआ। घटना के बाद दोनों पक्षों के बीच विवाद और हिंसा की खबर सामने आई। दुलारचंद यादव की मौत के बाद पुलिस ने मामले की जांच शुरू की और अनंत सिंह को मुख्य आरोपी बनाया गया।
घटना को लेकर घोसवरी थाने में दर्ज प्राथमिकी में आरोप लगाया गया कि अनंत सिंह और उनके सहयोगियों ने दुलारचंद यादव को उनकी गाड़ी से बाहर निकाला, उनके पैर में गोली मारी, मारपीट की और फिर SUV से उन्हें कुचल दिया। हालांकि, ये प्राथमिकी में लगाए गए आरोप हैं। इनका अंतिम सत्यापन जांच और अदालत में होने वाली सुनवाई के दौरान होना है।
दूसरी ओर, अनंत सिंह ने घटना को राजनीतिक साजिश करार दिया था। उनका दावा था कि विरोधी राजनीतिक पक्ष की ओर से उनके खिलाफ साजिश रची गई और जन सुराज के समर्थकों ने पहले उनके काफिले पर हमला किया था। इस तरह घटना को लेकर दोनों पक्षों के दावे अलग-अलग रहे हैं।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत की वजह क्या बताई गई?
दुलारचंद यादव की मौत के कारण को लेकर भी जांच के दौरान अहम जानकारी सामने आई थी। रिपोर्ट के अनुसार, पोस्टमार्टम रिपोर्ट में उनकी मौत का कारण चोटों के बाद हुए सदमे से उत्पन्न कार्डियोरेस्पिरेटरी फेल्योर (Cardiorespiratory Failure) बताया गया था। रिपोर्ट में कहा गया कि किसी कठोर और कुंद वस्तु से लगी चोटों के कारण उनके हृदय और फेफड़ों को नुकसान पहुंचा था।
वहीं, दुलारचंद यादव के परिवार ने आरोप लगाया था कि उन्हें पहले गोली मारी गई और उसके बाद वाहन से कुचला गया। पुलिस की जांच में SUV से कुचले जाने का आरोप भी शामिल है। इन दावों और पोस्टमार्टम में दर्ज निष्कर्षों के बीच घटना की पूरी परिस्थितियों को स्पष्ट करना जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
ये भी पढ़ें :- PM Kisan 24th Installment: दिवाली से पहले किसानों के खाते में आए 2,000 रुपये, 9.34 करोड़ लाभार्थियों को मिला फायदा; ऐसे चेक करें स्टेटस
नवंबर 2025 में गिरफ्तार हुए थे अनंत सिंह
दुलारचंद यादव हत्याकांड में नाम आने के बाद बिहार पुलिस ने अनंत सिंह को 1 नवंबर 2025 को गिरफ्तार किया था। गिरफ्तारी के बाद उन्हें न्यायिक हिरासत में बेऊर सेंट्रल जेल भेज दिया गया था। इसके बावजूद उन्होंने जेल में रहते हुए बिहार विधानसभा चुनाव लड़ा और मोकामा सीट से जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के टिकट पर जीत हासिल की।
इसके बाद 19 मार्च 2026 को पटना हाईकोर्ट ने उन्हें इस मामले में जमानत दे दी थी। जमानत मिलने के बाद वह जेल से बाहर आ गए थे। हालांकि, इस फैसले को दुलारचंद यादव के परिवार की ओर से चुनौती दी गई। परिवार के सदस्य नीरज कुमार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर हाईकोर्ट के आदेश पर सवाल उठाए।
याचिका में अनंत सिंह के आपराधिक इतिहास और मामले की गंभीरता का मुद्दा उठाया गया था। याचिकाकर्ता की दलील थी कि जमानत देते समय इन पहलुओं पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया।
बेटी की शादी का हवाला देकर मांगी थी राहत
अनंत सिंह ने सुप्रीम कोर्ट के सामने तत्काल सरेंडर करने से राहत देने का अनुरोध किया था। इसके लिए उन्होंने अपनी बेटी की शादी का हवाला दिया था। हालांकि, अदालत ने इस आधार पर उन्हें राहत नहीं दी और सरेंडर के लिए 1 दिसंबर की समयसीमा तय कर दी।
इस आदेश का सीधा असर उनकी मौजूदा कानूनी स्थिति पर पड़ेगा। पटना हाईकोर्ट से मिली जमानत अब प्रभावी नहीं रहेगी और उन्हें इस मामले में फिर से न्यायिक हिरासत का सामना करना पड़ सकता है।
जेडीयू से भी छह साल के लिए निष्कासित
सुप्रीम कोर्ट का फैसला ऐसे समय आया है, जब अनंत सिंह का अपनी पार्टी जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के साथ भी विवाद चल रहा है। पार्टी ने हाल ही में उन्हें छह साल के लिए निष्कासित कर दिया था। साथ ही उनकी पत्नी और पूर्व विधायक नीलम देवी को भी पार्टी से छह साल के लिए बाहर कर दिया गया है। JDU ने दोनों के खिलाफ पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगाया था।
अनंत सिंह पर पार्टी नेतृत्व के निर्देशों की अनदेखी करने और दूसरे उम्मीदवार के समर्थन में प्रचार करने का आरोप लगा था। मामला पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के विधान परिषद चुनाव से जुड़ा है। अनंत सिंह ने जन सुराज के उम्मीदवार अनुज कुमार सिंह के पक्ष में प्रचार किया था, जबकि जेडीयू ने इस सीट पर अपने आधिकारिक उम्मीदवार और मौजूदा एमएलसी नीरज कुमार को समर्थन दिया था।
पार्टी नेतृत्व की अपील के बावजूद अनंत सिंह ने अपना रुख नहीं बदला। उन्होंने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और नेतृत्व के फैसलों पर भी सवाल उठाए थे। इसके बाद JDU ने उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की।
पार्टी से निष्कासन के बाद नीलम देवी को राज्य स्तरीय कार्यक्रम कार्यान्वयन समिति में मिली जिम्मेदारी से भी हटा दिया गया। इसके साथ ही उन्हें मंत्री राज्य मंत्री का दर्जा और सरकारी आवास की सुविधा भी वापस ले ली गई। 26 अक्टूबर को बिहार सरकार के भवन निर्माण विभाग ने पटना के 1, मॉल रोड स्थित सरकारी आवास को खाली करने का नोटिस जारी किया था।
विधानसभा सदस्यता पर भी उठे सवाल
अनंत सिंह के JDU से निष्कासन के बाद उनकी विधानसभा सदस्यता को लेकर भी राजनीतिक और कानूनी हलचल शुरू हुई है। जेडीयू ने बिहार विधानसभा अध्यक्ष प्रेम कुमार के समक्ष अनंत सिंह की सदस्यता समाप्त करने की मांग रखी है। यह कदम दल-बदल विरोधी कानून के तहत उठाया गया है। पार्टी की ओर से इस संबंध में याचिका दाखिल की गई है।
हालांकि, विधानसभा सदस्यता को लेकर अंतिम फैसला स्पीकर को संबंधित कानूनी प्रावधानों और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर करना होगा।
अनंत सिंह ने जेडीयू की कार्रवाई पर भी नाराजगी जताई थी। रिपोर्टों के अनुसार, उन्होंने पार्टी नेतृत्व के फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा था कि उन्हें इस कार्रवाई का कोई पछतावा नहीं है। ऐसे में उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर भी सवाल बने हुए हैं।
फिलहाल, जमानत रद्द होने और सरेंडर का निर्देश मिलने से उनकी कानूनी स्थिति निश्चित रूप से बदल गई है। अब इस मामले में पुलिस की जांच, 1 दिसंबर तक सरेंडर और आगामी सुनवाई पर सबकी नजर रहेगी।
