फिल्मी दुनिया से अलग नाना पाटेकर का सेना से भी जुड़ाव रहा। वह टेरिटोरियल आर्मी में शामिल हुए और 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान अपनी सेवाएं दीं, जिससे उनके सार्वजनिक जीवन का एक अलग पक्ष सामने आया।
मुंबई/गोवा: हिंदी और मराठी सिनेमा के दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर का 8 अक्टूबर 2026 को 75 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। वह गोवा के डोना पाउला स्थित अपने घर पर बेहोश मिले थे, जिसके बाद उन्हें मणिपाल अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टरों ने करीब 45 मिनट तक CPR देकर उन्हें बचाने की कोशिश की, लेकिन उन्हें सुबह करीब 5:20 बजे मृत घोषित कर दिया गया। अस्पताल की ओर से सामने आई जानकारी के मुताबिक उनकी मौत कार्डियक अरेस्ट के बाद हुई।
नाना पाटेकर का करीब पांच दशक लंबा करियर सिर्फ फिल्मों की सफलता तक सीमित नहीं था। उन्होंने थिएटर से शुरुआत की, हिंदी और मराठी फिल्मों में अलग-अलग तरह के किरदार निभाए, फिल्म निर्देशन और लेखन में भी हाथ आजमाया और बाद के वर्षों में किसानों तथा ग्रामीण समुदायों के लिए सामाजिक काम से जुड़े। ‘परिंदा’, ‘क्रांतिवीर’, ‘अग्निसाक्षी’, ‘खामोशी: द म्यूजिकल’, ‘अब तक छप्पन’, ‘नटसम्राट’ और ‘वेलकम’ जैसी फिल्मों ने उनके अभिनय के अलग-अलग रंग दिखाए।
उनकी पहचान ऐसे अभिनेता की रही, जो पारंपरिक बॉलीवुड हीरो की छवि में फिट नहीं बैठते थे, लेकिन अपनी आवाज, संवाद अदायगी, चेहरे के भाव और किरदार में उतर जाने की क्षमता से उन्होंने अपनी अलग जगह बनाई।
मुश्किल बचपन से अभिनय की दुनिया तक
नाना पाटेकर का जन्म 1 जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के मुरुड-जंजीरा में विश्वनाथ पाटेकर के रूप में हुआ था। उनका बचपन आर्थिक संघर्षों के बीच बीता। वह सर जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट से जुड़े और आगे चलकर थिएटर ने उनके जीवन को नई दिशा दी। एक पुराने इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि बचपन में ही उन्हें नाटक और अभिनय की ओर आकर्षण होने लगा था।
फिल्मों में उनका सफर 1978 की फिल्म ‘गमन’ से शुरू हुआ। शुरुआत में उन्हें छोटे और सहायक किरदार मिले, लेकिन उन्होंने धीरे-धीरे अपनी ऐसी अभिनय शैली विकसित की, जिसमें संवाद से ज्यादा किरदार की आंतरिक बेचैनी और भावनाएं दिखाई देती थीं।
1980 के दशक में ‘अंकुश’, ‘प्रतिघात’, ‘अंधा युद्ध’ जैसी फिल्मों में काम करने के बाद उन्हें गंभीर अभिनेता के तौर पर पहचान मिलने लगी। 1988 में मीरा नायर की ‘सलाम बॉम्बे!’ में उनकी भूमिका ने उनकी प्रतिभा को बड़े दर्शक वर्ग तक पहुंचाया।
‘परिंदा’ ने बदल दी पहचान
नाना पाटेकर के करियर का बड़ा मोड़ 1989 की ‘परिंदा’ रही। विधु विनोद चोपड़ा की इस फिल्म में उन्होंने अन्ना नाम के गैंगस्टर का किरदार निभाया था। उनका अभिनय इतना प्रभावशाली रहा कि यह किरदार हिंदी सिनेमा के यादगार खलनायकों में शामिल हो गया।
‘परिंदा’ के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का सम्मान मिला। इसी फिल्म के लिए उन्होंने फिल्मफेयर पुरस्कार भी जीता।
यही वह दौर था जब नाना ने साबित किया कि मुख्यधारा के सिनेमा में भी किसी अभिनेता की ताकत सिर्फ उसके चेहरे या स्टारडम में नहीं, बल्कि किरदार को विश्वसनीय बनाने की क्षमता में होती है।
फिल्मफेयर अवार्ड लेते समय कही थी दिल की बात
नाना पाटेकर का 1995 में ‘क्रांतिवीर’ के लिए मिला फिल्मफेयर बेस्ट एक्टर अवॉर्ड स्वीकार करने का भाषण आज भी याद किया जाता है।
उन्होंने मंच पर अपने सामान्य अंदाज में कहा था कि उन्हें कभी-कभी लगता था कि फिल्मफेयर जैसे पुरस्कार खरीदे जाते हैं। लेकिन जब उन्हें खुद यह सम्मान मिला तो उनका नजरिया बदल गया। उन्होंने इस बात पर भी खुशी जताई कि उनके जैसे अभिनेता, जो पारंपरिक हिंदी फिल्म हीरो की शक्ल-सूरत में फिट नहीं बैठते, उन्हें भी इंडस्ट्री ने स्वीकार किया।
उनका यह भाषण इसलिए भी खास था क्योंकि उसमें किसी तैयार किए गए स्टार भाषण की चमक नहीं थी। उन्होंने हिंदी में बेहद सहज अंदाज में अपने संघर्ष और फिल्म इंडस्ट्री से मिले सम्मान की बात की।
तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार ने बनाया अलग मुकाम
नाना पाटेकर उन चुनिंदा कलाकारों में रहे जिन्हें अभिनय के लिए तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिले।
- ‘परिंदा’ (1989) – सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता
- ‘क्रांतिवीर’ (1994) – सर्वश्रेष्ठ अभिनेता
- ‘अग्निसाक्षी’ (1996) – सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता
‘क्रांतिवीर’ में प्रताप नारायण तिलक के किरदार ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दी। वहीं ‘अग्निसाक्षी’ में उनके नियंत्रित और डरावने अभिनय ने एक अलग तरह की चुनौतीपूर्ण भूमिका को यादगार बनाया।
इसके अलावा उन्हें फिल्मफेयर में ‘परिंदा’ के लिए बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर, ‘क्रांतिवीर’ के लिए बेस्ट एक्टर और ‘अंगार’ तथा ‘अपहरण’ के लिए बेस्ट विलेन जैसे सम्मान मिले। मराठी सिनेमा में भी उन्हें ‘नटसम्राट’ के लिए सम्मानित किया गया। 2013 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया था।
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गंभीर किरदारों से कॉमेडी तक
नाना की खासियत यह थी कि उन्होंने खुद को किसी एक तरह की भूमिका तक सीमित नहीं किया। ‘परिंदा’ में गैंगस्टर, ‘क्रांतिवीर’ में विद्रोही तेवर वाला आम आदमी, ‘अग्निसाक्षी’ में खतरनाक पति और ‘खामोशी: द म्यूजिकल’ में संवेदनशील पिता के बाद उन्होंने कॉमेडी में भी अपनी छाप छोड़ी।
‘वेलकम’ में उदय शेट्टी का किरदार इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। एक तरफ नाना गंभीर और राजनीतिक भूमिकाओं के लिए पहचाने जाते थे, वहीं उदय शेट्टी के रूप में उनकी कॉमिक टाइमिंग ने नई पीढ़ी के दर्शकों को भी उनका प्रशंसक बना दिया।
मराठी सिनेमा में ‘नटसम्राट’ उनके सबसे महत्वपूर्ण कामों में शामिल रही। इस फिल्म में उन्होंने एक ऐसे रंगमंच अभिनेता की भूमिका निभाई, जो जीवन के आखिरी दौर में परिवार, सम्मान और अकेलेपन से जूझता है।
निर्देशक भी बने नाना
नाना पाटेकर सिर्फ अभिनेता नहीं थे। 1991 में उन्होंने ‘प्रहार: द फाइनल अटैक’ का निर्देशन किया। फिल्म में उन्होंने अभिनय भी किया और कहानी के स्तर पर सैनिकों के जीवन तथा युद्ध प्रशिक्षण की कठोरता को सामने रखा।
उनकी सेना के प्रति रुचि केवल फिल्म तक सीमित नहीं रही। वह टेरिटोरियल आर्मी से जुड़े और 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान भी अपनी सेवाएं दीं।
विधु विनोद चोपड़ा से हुआ था विवाद
नाना पाटेकर के करियर से जुड़ा एक चर्चित किस्सा ‘परिंदा’ की शूटिंग का भी है। फिल्म के निर्देशक विधु विनोद चोपड़ा के साथ शूटिंग के दौरान उनका विवाद हो गया था और मामला हाथापाई तक पहुंच गया था।
रिपोर्टों के मुताबिक, इसी दौरान चोपड़ा ने नाना का कुर्ता फाड़ दिया था। इस घटना के ठीक बाद नाना पाटेकर को एक सीन कुर्ते में देना था। लेकिन कुर्ता फट जाने की वजह से उन्हें वो पूरा सीन बगैर कुर्ते के ही देना पड़ा। नाना और चोपड़ा के बीच मतभेद लंबे समय तक चर्चा में रहे, हालांकि दोनों की बनाई फिल्म भारतीय सिनेमा की महत्वपूर्ण फिल्मों में शामिल हो गई।
यह घटना नाना के उस व्यक्तित्व की झलक भी देती है, जिसे उनके साथ काम करने वाले लोग बेहद जुनूनी और अपने काम को लेकर बहुत गंभीर बताते रहे।
चमक-दमक से दूर कैसी जिंदगी जीते थे नाना?
बॉलीवुड के बड़े सितारों के बीच रहने के बावजूद नाना पाटेकर की निजी जिंदगी अपेक्षाकृत सादगी भरी रही। वह महंगी जीवनशैली और स्टारडम के प्रदर्शन से दूर रहने के लिए जाने जाते थे।
उनका मुंबई में भी साधारण जीवन से जुड़ाव रहा और बाद के वर्षों में गोवा उनके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया। खेती और प्रकृति से उनका जुड़ाव रहा। यही वजह थी कि फिल्मों के अलावा उनका समय सामाजिक काम और ग्रामीण क्षेत्रों से जुड़े मुद्दों में भी बीतता था।
उनके निधन के बाद सामने आई रिपोर्टों में भी उनके अपेक्षाकृत शांत और निजी जीवन का जिक्र हुआ है। वह लोकप्रियता के बावजूद सार्वजनिक जीवन में लगातार मौजूद रहने वाले सेलिब्रिटी नहीं थे।
नाना पाटेकर का पारिवारिक जीवन
नाना पाटेकर ने 1978 में नीलकांति पाटेकर से शादी की थी। नीलकांति खुद भी थिएटर और मराठी फिल्मों से जुड़ी रही हैं। दोनों बाद के वर्षों में अलग-अलग रहने लगे थे, लेकिन उनका कानूनी रूप से तलाक नहीं हुआ था।
दंपति के दो बेटे थे। बड़े बेटे दुर्वासा का बचपन में ही बीमारी के कारण निधन हो गया था। उनके दूसरे बेटे मल्हार पाटेकर फिल्म निर्माण से जुड़े रहे हैं। नाना के निधन की पुष्टि भी मल्हार ने की।
‘नाम फाउंडेशन’ से किसानों के लिए काम
नाना पाटेकर की विरासत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा उनका सामाजिक काम भी है। 2015 में उन्होंने अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर NAAM Foundation की शुरुआत की।
यह पहल महाराष्ट्र में सूखे, किसान संकट और किसानों की आत्महत्या से प्रभावित परिवारों के बीच काम करने के उद्देश्य से शुरू हुई थी। फाउंडेशन के मुताबिक, इसका काम जल संरक्षण, गांवों के विकास, सिंचाई व्यवस्था को मजबूत करने और किसानों को अधिक टिकाऊ आजीविका के अवसर उपलब्ध कराने पर केंद्रित रहा है।
नाना का मानना था कि केवल आर्थिक मदद से किसान परिवारों की समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं हो सकता। इसलिए संस्था ने जलस्रोतों के पुनर्जीवन, नहरों और बांधों के काम तथा ग्रामीण विकास जैसी गतिविधियों पर भी जोर दिया।
यानी कैमरे के सामने किसानों और आम लोगों के संघर्ष को निभाने वाले नाना कैमरे के पीछे भी उनके लिए काम करते रहे।
MeToo विवाद में आया नाम
नाना पाटेकर के जीवन का एक विवादित अध्याय 2018 का MeToo मामला भी रहा। अभिनेत्री तनुश्री दत्ता ने 2008 की फिल्म ‘Horn ‘OK’ Pleassss’ की शूटिंग के दौरान नाना पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए। नाना ने आरोपों से इनकार किया था।
मामला सामने आने के बाद मुंबई पुलिस ने 2019 में जांच पूरी करते हुए क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की और कहा कि आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं मिले। बाद में तनुश्री दत्ता ने इस रिपोर्ट को चुनौती देने की कोशिश की थी।
इसलिए नाना के निधन पर इस प्रकरण का उल्लेख करते समय यह तथ्य स्पष्ट रखना जरूरी है कि आरोप लगाए गए थे, नाना ने उन्हें खारिज किया था और पुलिस ने पर्याप्त सबूत नहीं मिलने की बात कहते हुए क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की थी।
75 साल की उम्र में उनके निधन के साथ भारतीय सिनेमा ने एक ऐसा अभिनेता खो दिया है, जिसे पर्दे पर सुनते ही किरदार की मौजूदगी महसूस होने लगती थी। उनकी फिल्में और उनके निभाए किरदार आने वाली पीढ़ियों के लिए उनके अभिनय की पहचान बने रहेंगे।
