2011 की भारतीय जनगणना के अनुसार 52.83 करोड़ से अधिक लोगों ने हिंदी को अपनी मातृभाषा बताया था। यह आंकड़ा भारत में हिंदी की बड़ी मौजूदगी दिखाता है, जबकि विदेशों में प्रवासी समुदाय इसकी वैश्विक यात्रा को आगे बढ़ाते हैं।
नई दिल्ली: हर साल 14 सितंबर को भारत में हिंदी दिवस मनाया जाता है। इस दिन का संबंध 14 सितंबर 1949 के उस ऐतिहासिक फैसले से है, जब संविधान सभा ने हिंदी को देवनागरी लिपि में संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया था। संविधान के अनुच्छेद 343 में भी संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी निर्धारित की गई है। हालांकि, हिंदी को भारत की राष्ट्रभाषा घोषित नहीं किया गया है।
लेकिन हिंदी की कहानी केवल भारत तक सीमित नहीं है। भारत से बाहर भी करोड़ों लोग हिंदी या हिंदी से जुड़ी भाषाओं का इस्तेमाल अपनी दैनिक दिनचर्या में करते हैं। कहीं हिंदी शिक्षा और सांस्कृतिक गतिविधियों का हिस्सा है, तो कहीं भारतीय मूल के समुदायों ने समय के साथ हिंदी से जुड़ी अपनी अलग भाषाई परंपराएं विकसित की हैं। उन सभी देशों में हिंदी या उससे जुड़ी भाषाई परंपराओं की मौजूदगी देखी जा सकती है। इसके अलावा खाड़ी देशों सहित दुनिया के कई हिस्सों में भारतीय समुदाय के बीच हिंदी संवाद की महत्वपूर्ण भाषा बनी हुई है।
भारत में हिंदी का आधार
भारत में हिंदी सबसे बड़ी मातृभाषा है। 2011 की जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक 52.83 करोड़ से अधिक लोगों ने हिंदी को अपनी मातृभाषा बताया था। यह उस समय देश की कुल आबादी का लगभग 43.63 प्रतिशत था। जनगणना के आधिकारिक भाषा आंकड़े हिंदी सहित विभिन्न भाषाओं और मातृभाषाओं की संख्या उपलब्ध कराते हैं।
हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। भारत में “हिंदी” के अंतर्गत जनगणना में कई मातृभाषाओं और बोलियों को एक व्यापक समूह में गिना जाता है।
विदेशों में हिंदी कैसे पहुंची?
दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में हिंदी की मौजूदगी का इतिहास भारत से हुए प्रवासन से जुड़ा है। 19वीं और 20वीं सदी में बड़ी संख्या में भारतीय मजदूरों को ब्रिटिश औपनिवेशिक व्यवस्था के तहत मॉरीशस, फिजी, कैरेबियाई देशों और दक्षिण अफ्रीका सहित कई क्षेत्रों में ले जाया गया।
इन समुदायों के साथ भारत की भाषाएं, धार्मिक परंपराएं, लोकगीत, साहित्य और सांस्कृतिक रीति-रिवाज भी विदेश पहुंचे। समय के साथ स्थानीय भाषाओं और दूसरी भारतीय भाषाओं के प्रभाव से इन क्षेत्रों में हिंदी से जुड़ी अलग-अलग भाषाई किस्में विकसित हुईं।
मॉरीशस: हिंदी की अंतरराष्ट्रीय पहचान का बड़ा केंद्र
मॉरीशस हिंदी के वैश्विक प्रसार का एक महत्वपूर्ण केंद्र है। भारतीय मूल की बड़ी आबादी वाले इस देश में हिंदी का संबंध केवल बोलचाल से नहीं बल्कि शिक्षा, साहित्य, संस्कृति और धार्मिक गतिविधियों से भी रहा है।
इस देश में हिंदी के प्रचार-प्रसार को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संस्थागत पहचान भी मिली है। विश्व हिंदी सचिवालय का मुख्यालय मॉरीशस में है। इसका उद्देश्य हिंदी को अंतरराष्ट्रीय भाषा के रूप में बढ़ावा देना और संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा के रूप में हिंदी की मान्यता के प्रयासों को आगे बढ़ाना है।
विश्व हिंदी सचिवालय की स्थापना का विचार विश्व हिंदी सम्मेलनों की प्रक्रिया से जुड़ा रहा है। इसके जरिए हिंदी से जुड़े सम्मेलन, शोध, शिक्षण और अंतरराष्ट्रीय संपर्क को बढ़ावा दिया जाता है।
मॉरीशस में हिंदी फिल्मों, गीतों, साहित्य और भारतीय सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने भी भाषा की लोकप्रियता बनाए रखने में भूमिका निभाई है।
फिजी में हिंदी का अलग रूप
प्रशांत महासागर के द्वीपीय देश फिजी में भी हिंदी का मजबूत सांस्कृतिक आधार है। यहां भारतीय मूल के लोगों की बड़ी आबादी है, जिनके पूर्वज 19वीं सदी के अंत में गिरमिटिया मजदूरों के रूप में फिजी पहुंचे थे।
समय के साथ भारत से पहुंची अलग-अलग बोलियों और भाषाओं ने स्थानीय परिस्थितियों में एक नई भाषाई किस्म को जन्म दिया, जिसे फिजी हिंदी कहा जाता है। इसमें अवधी, भोजपुरी और दूसरी भारतीय भाषाओं के साथ अंग्रेजी और फिजी की स्थानीय भाषाओं का भी प्रभाव दिखाई देता है।
फिजी में हिंदी फिल्मों, भारतीय संगीत और धार्मिक-सांस्कृतिक गतिविधियों ने भी हिंदी से जुड़े समुदायों के बीच भाषा के इस्तेमाल को बनाए रखा है। उपलब्ध अनुमानों के अनुसार फिजी की आबादी के एक बड़े हिस्से को हिंदी से जुड़ी भाषाई किस्मों का ज्ञान या संपर्क है, हालांकि ऐसे आंकड़े स्रोत और परिभाषा के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं।
सूरीनाम में सुनाई देती है सरनामी
दक्षिण अमेरिका का छोटा सा देश सूरीनाम हिंदी के वैश्विक सफर की एक दिलचस्प मिसाल है। यहां भारतीय मूल की आबादी के बीच सरनामी हिंदुस्तानी का इस्तेमाल होता है।
सरनामी का विकास भारतीय प्रवासियों की भाषाओं, खासकर भोजपुरी और अवधी से जुड़ी भाषाई परंपराओं तथा स्थानीय भाषाई वातावरण के मेल से हुआ। आज इसे वहां के हिंदुस्तानी मूल के समुदाय की महत्वपूर्ण सांस्कृतिक पहचान माना जाता है।
यानी भारत से हजारों किलोमीटर दूर पहुंचने के बाद हिंदी से जुड़ी भाषाओं ने स्थानीय समाज के साथ घुलकर अपना अलग रूप विकसित किया।
कैरेबियाई देशों में हिंदी की विरासत
त्रिनिदाद और टोबैगो तथा गुयाना जैसे कैरेबियाई देशों में भी भारतीय मूल के समुदायों के बीच हिंदी और हिंदुस्तानी परंपरा का प्रभाव देखने को मिलता है।
यहां भी भारतीय मजदूरों के औपनिवेशिक दौर में हुए प्रवासन ने भाषा और संस्कृति को पहुंचाया। समय के साथ स्थानीय भाषाओं के प्रभाव के कारण पारंपरिक हिंदी के स्वरूप में बदलाव आया।
आज इन देशों में मानक हिंदी हर व्यक्ति की रोजमर्रा की भाषा नहीं है, लेकिन हिंदी से जुड़ी धार्मिक, सांस्कृतिक और संगीत परंपराएं भारतीय मूल के समुदायों में मौजूद हैं। विशेष रूप से भजन, रामायण पाठ, भारतीय संगीत और धार्मिक आयोजनों में भारतीय भाषाओं की विरासत दिखाई देती है।
नेपाल में हिंदी की समझ कितनी है?
नेपाल का मामला थोड़ा अलग है। नेपाल की प्रमुख भाषा नेपाली है और देश की अपनी मजबूत भाषाई विविधता है। इसके बावजूद भारत और नेपाल के बीच लंबे समय से चले आ रहे सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक संबंधों के कारण हिंदी को वहां काफी लोग समझते हैं।
भारतीय फिल्मों, टेलीविजन और डिजिटल सामग्री की पहुंच ने भी हिंदी की समझ को बढ़ाया है। हालांकि नेपाल को हिंदी-भाषी देश कहना सही नहीं होगा। वहां हिंदी का प्रभाव मुख्य रूप से संपर्क, मनोरंजन, पर्यटन और भारतीय समुदाय से जुड़े क्षेत्रों में दिखाई देता है।
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खाड़ी देशों में हिंदी क्यों समझी जाती है?
संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, कतर, कुवैत, ओमान और बहरीन जैसे खाड़ी देशों में बड़ी संख्या में भारतीय और दक्षिण एशियाई प्रवासी रहते हैं। इन देशों में हिंदी, उर्दू, भोजपुरी, मलयालम, तमिल, तेलुगु और दूसरी भारतीय भाषाओं के बोलने वाले समुदाय मौजूद हैं।
विशेष रूप से भारतीय प्रवासी समुदाय के बीच हिंदी कई बार अलग-अलग भाषाई पृष्ठभूमि वाले लोगों के बीच संवाद की भाषा बन जाती है। दुकानों, बाजारों, टैक्सी सेवाओं, निर्माण क्षेत्र, आतिथ्य उद्योग और प्रवासी समुदाय के रोजमर्रा के संपर्क में हिंदी या हिंदी-उर्दू मिश्रित बोलचाल सुनाई दे सकती है।
हिंदी दिवस और विश्व हिंदी दिवस में अंतर
हिंदी के अंतरराष्ट्रीय स्वरूप की चर्चा करते समय हिंदी दिवस और विश्व हिंदी दिवस को अलग-अलग समझना जरूरी है।
भारत में हिंदी दिवस हर साल 14 सितंबर को मनाया जाता है। इसका संबंध 1949 में संविधान सभा द्वारा हिंदी को संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किए जाने से है। दूसरी ओर विश्व हिंदी दिवस 10 जनवरी को मनाया जाता है। इसका उद्देश्य दुनिया में हिंदी के प्रचार-प्रसार और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसकी पहुंच को बढ़ावा देना है।
यानी 14 सितंबर मुख्य रूप से भारत में हिंदी की संवैधानिक और प्रशासनिक भूमिका की याद दिलाता है, जबकि 10 जनवरी हिंदी के वैश्विक विस्तार और अंतरराष्ट्रीय पहचान से जुड़ा है।
क्या हिंदी संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा है?
यह भी हिंदी से जुड़ा एक आम भ्रम है। हिंदी अभी संयुक्त राष्ट्र की छह आधिकारिक भाषाओं में शामिल नहीं है। विश्व हिंदी सचिवालय हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता दिलाने की दिशा में काम करने वाले प्रमुख संस्थानों में से एक है।
संयुक्त राष्ट्र की मौजूदा छह आधिकारिक भाषाएं अरबी, चीनी, अंग्रेजी, फ्रेंच, रूसी और स्पेनिश हैं।
इसलिए हिंदी की वैश्विक पहुंच बड़ी होने के बावजूद उसे संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा के तौर पर फिलहाल मान्यता प्राप्त नहीं हुई है।
इंटरनेट और एआई के दौर में हिंदी का नया विस्तार
हिंदी का वैश्विक सफर अब केवल प्रवासी भारतीयों तक सीमित नहीं है। इंटरनेट, सोशल मीडिया, ऑनलाइन शिक्षा, वीडियो प्लेटफॉर्म और कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने हिंदी के लिए एक नया वैश्विक मंच तैयार किया है।
भारत में ही हिंदी के करोड़ों उपयोगकर्ता इंटरनेट पर समाचार पढ़ते हैं, वीडियो देखते हैं, सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं और डिजिटल सेवाओं का उपयोग करते हैं। भाषा प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी हिंदी के लिए भाषण पहचान, मशीन अनुवाद और प्राकृतिक भाषा प्रसंस्करण जैसे क्षेत्रों में लगातार काम हो रहा है। भारतीय भाषाओं के लिए बनाए जा रहे तकनीकी संसाधनों में हिंदी भी प्रमुख भाषाओं में शामिल है।
इस बदलाव का मतलब यह है कि हिंदी अब केवल किताब, अखबार, रेडियो या टेलीविजन की भाषा नहीं रह गई है। यह सर्च इंजन, मोबाइल ऐप, सोशल मीडिया, वीडियो, ऑनलाइन शिक्षा और एआई तक पहुंच चुकी है।
हिंदी की विविधता उसकी असली ताकत
हिंदी की वैश्विक यात्रा को केवल “विदेशों में हिंदी बोलने वाले लोगों” की संख्या से समझना अपर्याप्त होगा। असल कहानी यह है कि भारत से बाहर पहुंचने के बाद हिंदी और उससे जुड़ी भाषाई परंपराओं ने स्थानीय समाजों के साथ मिलकर नए रूप बनाए।
फिजी हिंदी, सरनामी हिंदुस्तानी और कैरेबियाई हिंदुस्तानी इसके उदाहरण हैं। ये भाषाई रूप बताते हैं कि कोई भाषा जब एक समाज से दूसरे समाज तक पहुंचती है तो वह बिल्कुल स्थिर नहीं रहती। वह नए शब्द अपनाती है, उच्चारण बदलती है और स्थानीय संस्कृति के साथ जुड़कर नई पहचान बनाती है।
आज हिंदी दुनिया की सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषाओं में शामिल है और भारत के बाहर भी इसकी सांस्कृतिक पहुंच दिखाई देती है। 2011 की भारतीय जनगणना में 52 करोड़ से अधिक लोगों द्वारा हिंदी को मातृभाषा बताए जाने का आंकड़ा इसकी घरेलू ताकत दिखाता है, जबकि विदेशों में भारतीय मूल के समुदाय इसकी अंतरराष्ट्रीय यात्रा की कहानी बताते हैं।




