महिलाओं की गरिमा और स्वास्थ्य से जुड़े अहम मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने सभी पुलिस स्टेशनों में मासिक धर्म स्वच्छता सुविधाओं का सर्वे कराने का निर्देश दिया है। जानिए पूरा मामला और कोर्ट की टिप्पणी।
नई दिल्ली: किसी भी पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराने पहुंचने वाली महिला या वहां ड्यूटी करने वाली महिला पुलिसकर्मी के लिए सबसे बुनियादी जरूरत क्या है? सुरक्षित माहौल, साफ शौचालय और जरूरत पड़ने पर सैनिटरी नैपकिन जैसी सुविधाएं। लेकिन हकीकत यह है कि देश के कई पुलिस थानों में आज भी मासिक धर्म स्वच्छता (Menstrual Hygiene) से जुड़ी बुनियादी सुविधाएं पर्याप्त नहीं हैं। इसी गंभीर मुद्दे पर अब दिल्ली हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण हस्तक्षेप किया है।
बुधवार, 5 अगस्त को दिल्ली हाई कोर्ट ने राजधानी के सभी पुलिस स्टेशनों में महिलाओं के लिए उपलब्ध मासिक धर्म स्वच्छता सुविधाओं (Menstrual Hygiene Facilities) का विस्तृत सर्वे कराने का निर्देश दिया है।
अदालत ने केंद्र सरकार, दिल्ली पुलिस और दिल्ली सरकार से छह सप्ताह के भीतर इस संबंध में विस्तृत स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने को भी कहा है। यह मामला केवल सैनिटरी पैड उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है, बल्कि महिलाओं की गरिमा, स्वास्थ्य, कार्यस्थल की सुरक्षा और समान अधिकारों से भी जुड़ा हुआ है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि पुलिस स्टेशन जैसी सार्वजनिक संस्थाओं में ही महिलाओं की मूलभूत आवश्यकताओं की अनदेखी होगी, तो यह संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप नहीं माना जा सकता।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला Justice for Rights Foundation द्वारा दायर एक जनहित याचिका (PIL) के माध्यम से दिल्ली हाई कोर्ट पहुंचा। याचिका में कहा गया कि राजधानी के अनेक पुलिस स्टेशनों में महिला पुलिसकर्मियों और शिकायत लेकर आने वाली महिलाओं के लिए मासिक धर्म स्वच्छता संबंधी पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं।
याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि कई थानों में न तो सैनिटरी पैड वेंडिंग मशीनें हैं, न सुरक्षित डिस्पोजल की व्यवस्था और न ही महिलाओं के लिए पर्याप्त स्वच्छ शौचालय उपलब्ध हैं। ऐसी स्थिति में महिला कर्मियों और आम महिलाओं दोनों को गंभीर असुविधा का सामना करना पड़ता है।
याचिका में यह भी कहा गया कि पुलिस स्टेशन 24 घंटे संचालित होते हैं और महिला पुलिसकर्मी अक्सर लंबी शिफ्ट में काम करती हैं। ऐसे में मासिक धर्म के दौरान आवश्यक सुविधाओं का अभाव उनके स्वास्थ्य, कार्यक्षमता और सम्मान तीनों को प्रभावित करता है।
हाई कोर्ट का आदेश
सुनवाई के दौरान दिल्ली हाई कोर्ट ने इस मुद्दे को केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि महिला गरिमा और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ा विषय माना।
अदालत ने निर्देश दिया कि दिल्ली के सभी पुलिस स्टेशनों का सर्वे कर यह जानकारी जुटाई जाए कि वहां –
- महिलाओं के लिए अलग और स्वच्छ शौचालय उपलब्ध हैं या नहीं।
- सैनिटरी पैड वेंडिंग मशीनें लगी हैं या नहीं।
- इस्तेमाल किए गए सैनिटरी पैड के सुरक्षित निस्तारण (Disposal) की व्यवस्था है या नहीं।
- महिला पुलिसकर्मियों और आगंतुक महिलाओं के लिए पर्याप्त स्वच्छता सुविधाएं उपलब्ध हैं या नहीं।
कोर्ट ने केंद्र सरकार, दिल्ली पुलिस और दिल्ली सरकार को निर्देश दिया कि वे निर्धारित समय सीमा के भीतर संयुक्त रूप से विस्तृत रिपोर्ट दाखिल करें।
केवल कर्मचारी नहीं, आम महिलाओं का भी मुद्दा
पुलिस स्टेशन रोजाना हजारों महिलाओं के संपर्क में आते हैं। घरेलू हिंसा, छेड़छाड़, यौन अपराध, संपत्ति विवाद या अन्य शिकायतों के लिए आने वाली महिलाओं को कई बार घंटों तक पुलिस स्टेशन में रहना पड़ सकता है।
यदि इसी दौरान किसी महिला को मासिक धर्म शुरू हो जाए और वहां आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध न हों, तो स्थिति बेहद असहज हो सकती है। कई बार महिलाएं शर्म या असुविधा के कारण अपनी शिकायत तक अधूरी छोड़कर लौट जाती हैं।
इसी वजह से अदालत ने इस विषय को महिलाओं के सम्मानजनक सार्वजनिक जीवन से जोड़कर देखा।
महिला पुलिसकर्मियों की चुनौती
दिल्ली पुलिस में हजारों महिला कर्मचारी विभिन्न जिम्मेदारियां निभा रही हैं। इनमें बीट ड्यूटी, ट्रैफिक प्रबंधन, जांच, सुरक्षा व्यवस्था, वीआईपी ड्यूटी और कानून-व्यवस्था जैसी जिम्मेदारियां शामिल हैं।
कई बार उन्हें लगातार 10 से 12 घंटे तक ड्यूटी करनी पड़ती है। यदि कार्यस्थल पर साफ शौचालय, सैनिटरी पैड या डिस्पोजल की व्यवस्था न हो तो यह उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर सीधा प्रभाव डाल सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि मासिक धर्म के दौरान समय पर पैड न बदल पाने से संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। यही कारण है कि कार्यस्थलों पर Menstrual Hygiene को अब व्यावसायिक स्वास्थ्य का हिस्सा माना जाने लगा है।
आखिर क्यों महत्वपूर्ण है Menstrual Hygiene?
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और यूनिसेफ के अनुसार, मासिक धर्म कोई बीमारी नहीं बल्कि महिलाओं के शरीर की एक सामान्य जैविक प्रक्रिया है। इसके बावजूद दुनिया के कई हिस्सों में इसे लेकर जागरूकता की कमी, सामाजिक संकोच और सुविधाओं का अभाव बना हुआ है।
अपर्याप्त स्वच्छता के कारण महिलाओं में यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन (UTI), प्रजनन तंत्र के संक्रमण और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है। इसके अलावा मानसिक तनाव और सामाजिक असहजता भी एक बड़ी समस्या बन जाती है।
यही वजह है कि अब दुनिया भर में Menstrual Hygiene को केवल स्वास्थ्य का नहीं, बल्कि मानवाधिकार और लैंगिक समानता का विषय माना जा रहा है।
भारत में मासिक धर्म स्वच्छता की स्थिति
दिल्ली हाई कोर्ट की टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब भारत में मासिक धर्म स्वच्छता (Menstrual Hygiene) को लेकर जागरूकता तो पहले की तुलना में बढ़ी है, लेकिन सुविधाओं और पहुंच के मामले में अभी भी लंबा सफर तय करना बाकी है। खासकर ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में लाखों महिलाएं और किशोरियां आज भी सुरक्षित सैनिटरी उत्पादों तक नियमित पहुंच नहीं बना पातीं।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के अनुसार, 15 से 24 वर्ष आयु वर्ग की अधिकांश युवतियां अब स्वच्छ मासिक धर्म उत्पादों का इस्तेमाल कर रही हैं, लेकिन राज्यों और शहरी-ग्रामीण क्षेत्रों के बीच अब भी बड़ा अंतर मौजूद है। कई इलाकों में सैनिटरी पैड की कीमत, उपलब्धता और सामाजिक संकोच इसके प्रमुख कारण बने हुए हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि केवल सैनिटरी पैड उपलब्ध कराना ही पर्याप्त नहीं है। स्वच्छ शौचालय, साफ पानी, साबुन, डिस्पोजल की व्यवस्था और सही जानकारी भी उतनी ही जरूरी है।
भारत सरकार की पहल
पिछले कुछ वर्षों में केंद्र और राज्य सरकारों ने मासिक धर्म स्वच्छता को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं।
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) के तहत Menstrual Hygiene Scheme (MHS) ग्रामीण क्षेत्रों की किशोरियों तक किफायती सैनिटरी नैपकिन पहुंचाने पर केंद्रित है। आशा कार्यकर्ताओं के माध्यम से सैनिटरी पैड उपलब्ध कराने के साथ-साथ मासिक धर्म से जुड़े मिथकों और भ्रांतियों को दूर करने के लिए जागरूकता अभियान भी चलाए जाते हैं।
इसके अलावा प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना (PMBJP) के तहत ‘सुविधा’ (Suvidha) नाम से कम कीमत वाले ऑक्सो-बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी पैड उपलब्ध कराए जा रहे हैं। इनका उद्देश्य कम आय वर्ग की महिलाओं को सस्ती और सुरक्षित स्वच्छता सामग्री उपलब्ध कराना है।
कई राज्यों ने सरकारी स्कूलों, कॉलेजों और सार्वजनिक संस्थानों में सैनिटरी पैड वेंडिंग मशीनें और इन्सिनरेटर (Incinerator) लगाने की भी पहल की है।
पुलिस और सुरक्षा बलों ने भी शुरू की पहल
हाल के वर्षों में कई सुरक्षा एजेंसियों ने भी महिला कर्मचारियों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए कदम उठाए हैं। देश के कई शहरों में पुलिस थानों में महिला हेल्प डेस्क के साथ बेहतर वॉशरूम और सैनिटरी पैड की व्यवस्था की गई है। कुछ राज्यों की पुलिस ने महिला कर्मियों के लिए सैनिटरी नैपकिन उपलब्ध कराने की विशेष व्यवस्था भी शुरू की है।
इसी तरह CRPF, BSF और अन्य सुरक्षा बलों में भी महिला कर्मियों की संख्या बढ़ने के साथ मासिक धर्म स्वच्छता को लेकर सुविधाओं का विस्तार किया गया है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि यह पहल अभी पूरे देश में समान रूप से लागू नहीं हो सकी है।
जागरूकता सबसे बड़ी चुनौती
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में मासिक धर्म को लेकर सबसे बड़ी समस्या केवल संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि सामाजिक सोच भी है। आज भी कई परिवारों में मासिक धर्म पर खुलकर बात नहीं की जाती। कई किशोरियों को पहली बार पीरियड्स आने से पहले इसके बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं होती। परिणामस्वरूप वे भ्रम, डर और असहजता का सामना करती हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी कई स्थानों पर मासिक धर्म से जुड़े अंधविश्वास और सामाजिक प्रतिबंध देखने को मिलते हैं। कुछ जगहों पर महिलाओं को मंदिर में प्रवेश, रसोई में जाने या सामान्य सामाजिक गतिविधियों में भाग लेने से रोका जाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इन धारणाओं को बदलने के लिए केवल सरकारी योजनाएं ही नहीं, बल्कि परिवार, स्कूल और समाज की सक्रिय भागीदारी भी जरूरी है।
स्कूलों और कार्यस्थलों की भूमिका अहम
UNICEF सहित कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का मानना है कि यदि स्कूलों और कार्यस्थलों पर मासिक धर्म स्वच्छता की बेहतर व्यवस्था हो, तो लड़कियों की शिक्षा और महिलाओं की कार्यक्षमता दोनों में सुधार होता है।
कई अध्ययनों में पाया गया है कि पर्याप्त सुविधाएं न होने के कारण अनेक छात्राएं मासिक धर्म के दौरान स्कूल नहीं जा पातीं। इसी प्रकार कार्यस्थलों पर सुविधाओं की कमी महिलाओं की उत्पादकता और मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित करती है।
इसी संदर्भ में विशेषज्ञ दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश को केवल पुलिस स्टेशनों तक सीमित नहीं मानते, बल्कि इसे सभी सार्वजनिक संस्थानों के लिए एक सकारात्मक संदेश के रूप में देखते हैं।
भविष्य की राह
दिल्ली हाई कोर्ट के निर्देश के बाद अब सभी की नजर केंद्र सरकार, दिल्ली सरकार और दिल्ली पुलिस द्वारा दाखिल की जाने वाली स्थिति रिपोर्ट पर होगी। यह रिपोर्ट बताएगी कि राजधानी के कितने पुलिस स्टेशनों में वर्तमान में पर्याप्त मासिक धर्म स्वच्छता सुविधाएं उपलब्ध हैं और किन स्थानों पर सुधार की आवश्यकता है।
अगर इस पहल को प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है, तो यह केवल दिल्ली ही नहीं बल्कि देश के अन्य राज्यों के लिए भी एक उदाहरण बन सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में अस्पतालों, अदालतों, परिवहन केंद्रों, विश्वविद्यालयों और अन्य सरकारी कार्यालयों में भी इसी तरह के मानकों को लागू करने पर विचार किया जा सकता है।
मासिक धर्म को शर्म या संकोच का विषय नहीं, बल्कि सामान्य जैविक प्रक्रिया के रूप में स्वीकार करना ही वास्तविक बदलाव की शुरुआत है। जब तक जागरूकता, बेहतर बुनियादी सुविधाएं और संवेदनशील नीतियां एक साथ आगे नहीं बढ़ेंगी, तब तक मासिक धर्म स्वच्छता को लेकर वास्तविक समानता हासिल करना मुश्किल रहेगा। दिल्ली हाई कोर्ट का यह आदेश इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण और दूरगामी कदम माना जा रहा है।
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