राज्य के तीन-चौथाई इलाकों को सूखा प्रभावित घोषित करने के फैसले के बाद जानिए महाराष्ट्र में सूखा घोषित करने की प्रक्रिया, साथ ही प्रभावित किसानों को किस तरह की राहत मिल सकती है।
मुंबई: महाराष्ट्र में इस साल खरीफ सीजन के दौरान कम बारिश और लंबे समय तक बारिश नहीं होने से पैदा हुई सूखे जैसी स्थिति को देखते हुए राज्य सरकार ने बड़ा फैसला लेते हुए 265 तालुकों में सूखा घोषित किया है।
यह संख्या राज्य के कुल तालुकों का करीब तीन-चौथाई हिस्सा है। सरकार के फैसले के बाद इन इलाकों में किसानों, खेतिहर मजदूरों, पशुपालकों और ग्रामीण परिवारों के लिए कई राहत उपाय लागू किए जाने की भी बात सामने आई है।
सरकार के मुताबिक इन 265 तालुकों में ट्रिगर-1 लागू हुआ है। इसके बाद जिलाधिकारियों को फसल नुकसान का पंचनामा जल्द से जल्द पूरा करने के निर्देश दिए गए हैं। पंचनामे में फसल की स्थिति, नुकसान की तस्वीरें और GPS आधारित जानकारी दर्ज की जानी है।
आखिर क्या है ट्रिगर-1?
महाराष्ट्र के कई हिस्सों में मानसून के दौरान बारिश में कमी के साथ लंबे समय तक बारिश का अंतराल रहा। इसका असर खरीफ की फसलों पर पड़ा। सरकार के कृषि आयुक्त की रिपोर्ट के अनुसार जून से ही कई इलाकों में बारिश की कमी और दूसरे संबंधित कारकों के कारण सूखे जैसी स्थिति बनी हुई थी। इसी आधार पर 265 तालुकों में ट्रिगर-1 के मानदंड लागू पाए गए।
ट्रिगर-1 को दुष्काल प्रबंधन व्यवस्था में शुरुआती चेतावनी का महत्वपूर्ण चरण माना जाता है। भारतीय मौसम और कृषि परिस्थितियों के संदर्भ में इसका संबंध बारिश की कमी और लंबे समय तक सूखे के अंतराल से है।
रिपोर्ट के अनुसार महाराष्ट्र के संबंधित सरकारी प्रस्ताव में मानसून के दौरान कम से कम 21 दिनों तक महत्वपूर्ण बारिश नहीं होने वाले लगातार सूखे अंतराल को Trigger-1 के एक प्रमुख आधार के रूप में बताया गया है। वहीं महाराष्ट्र सरकार के नियमों के तहत 75 प्रतिशत से कम बारिश या लंबे समय तक बारिश में अंतराल को Trigger-1 से जोड़ा गया है।
किन इलाकों में ज्यादा असर?
सरकार की सूची में महाराष्ट्र के कई हिस्सों को शामिल किया गया है। कोकण क्षेत्र में रायगढ़, रत्नागिरी और सिंधुदुर्ग के कुछ तालुकों को शामिल किया गया है। उत्तर महाराष्ट्र में नाशिक, धुले, जलगांव, नंदुरबार और अहिल्यानगर के बड़े हिस्से सूची में हैं।
पुणे राजस्व संभाग में पुणे, सोलापुर, सांगली, सातारा और कोल्हापुर के कई तालुकों को ट्रिगर-1 के तहत शामिल किया गया है। मराठवाड़ा क्षेत्र में छत्रपति संभाजीनगर, जालना, बीड, लातूर, धाराशिव, नांदेड, परभणी और हिंगोली के कई तालुकों का नाम सूची में है।
विदर्भ में बुलढाणा, अमरावती, अकोला, वाशिम, यवतमाल, वर्धा, नागपुर, भंडारा, गोंदिया, चंद्रपुर और गढ़चिरौली के कई तालुकों को भी इसमें शामिल किया गया है। सरकारी सूची के अनुसार कुल संख्या 265 तालुकों की है।
किसानों को क्या राहत मिलेगी?
सूखा घोषित होने के बाद राज्य सरकार ने किसानों और ग्रामीण परिवारों के लिए कई उपायों की घोषणा की है। इनमें सबसे महत्वपूर्ण राहत जमीन के राजस्व में छूट, फसल कर्ज का पुनर्गठन और कृषि से जुड़े कर्ज की वसूली पर रोक है। इससे उन किसानों को तत्काल आर्थिक दबाव से कुछ राहत मिल सकती है जिनकी फसल खराब होने के कारण आमदनी प्रभावित हुई है।
इसके अलावा कृषि पंपों के बिजली बिल में भी राहत दी गई है। सरकार के अनुसार 7.5 हॉर्सपावर तक के कृषि पंपों का बिजली बिल पहले ही माफ किया जा चुका है। अब इससे अधिक क्षमता वाले कृषि पंपों के चालू बिजली बिल में भी छूट का प्रावधान किया गया है। जिन गांवों में टंचाई यानी पानी की कमी की स्थिति घोषित की गई है, वहां किसानों के कृषि पंपों का बिजली कनेक्शन काटने से भी बचने की व्यवस्था की गई है।
अकाल प्रभावित परिवारों के बच्चों को भी राहत देने का फैसला किया गया है। शालेय और महाविद्यालयीन विद्यार्थियों के परीक्षा शुल्क में छूट दी जाएगी। इसके अलावा रोजगार गारंटी योजना के तहत ज्यादा से ज्यादा काम शुरू करने के लिए नियमों में आवश्यक ढील देने की बात कही गई है। इससे खेती से रोजगार प्रभावित होने वाले ग्रामीण परिवारों को वैकल्पिक रोजगार मिल सकता है।
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पानी और चारे की समस्या से निपटने की तैयारी
सूखे की स्थिति का सबसे सीधा असर पीने के पानी और पशुओं के चारे पर पड़ सकता है। बारिश की कमी और लंबे समय तक बारिश नहीं होने से कई ग्रामीण इलाकों में जलस्रोतों पर दबाव बढ़ सकता है। ऐसे में सरकार ने जरूरत वाले क्षेत्रों में टैंकरों के जरिए पीने का पानी उपलब्ध कराने और स्थिति के अनुसार अतिरिक्त इंतजाम करने की बात कही है। पशुओं के लिए पर्याप्त पानी और चारे की उपलब्धता सुनिश्चित करना भी प्रशासन की प्राथमिकताओं में शामिल है।
सूखे के कारण खेती प्रभावित होने पर किसानों और खेतिहर मजदूरों की आय पर भी असर पड़ सकता है। ऐसे परिवारों के लिए खाद्यान्न की उपलब्धता बनाए रखना जरूरी होगा, ताकि पानी और फसल संकट का असर खाद्य सुरक्षा पर न पड़े।
वहीं, सरकार की ओर से जलसंधारण और जल संरक्षण के कामों पर भी जोर दिया जा रहा है। खेत तालाब, छोटे बांध, चेक डैम, नाला गहरीकरण और वर्षा जल संचयन जैसी संरचनाओं के जरिए बारिश के पानी को ज्यादा से ज्यादा रोकने और भूजल स्तर सुधारने की कोशिश की जा सकती है। इन उपायों का उद्देश्य मौजूदा जल संकट से निपटने के साथ भविष्य में सूखे के प्रभाव को कम करना भी है।
महाराष्ट्र में सूखे से कौन-कौन सी समस्याएं बढ़ सकती हैं?
सबसे पहला असर कृषि उत्पादन पर पड़ सकता है। महाराष्ट्र में सोयाबीन, कपास, मक्का, ज्वार, धान और दूसरी खरीफ फसलें कई इलाकों में बारिश पर काफी निर्भर रहती हैं। बारिश की कमी या लंबे सूखे अंतराल से फसल की बढ़वार रुक सकती है, पैदावार कम हो सकती है और कुछ क्षेत्रों में फसल पूरी तरह खराब होने का खतरा बढ़ सकता है। हालिया रिपोर्टों में भी इन फसलों पर प्रभाव की बात सामने आई है।
दूसरी बड़ी समस्या पशुधन की होगी। चारे की कमी होने पर किसानों को पशुओं को पालने में अतिरिक्त खर्च करना पड़ सकता है। पानी की उपलब्धता कम होने से दूध उत्पादन और पशुओं के स्वास्थ्य पर भी असर पड़ सकता है।
तीसरी चुनौती पीने के पानी की है। भूजल स्तर नीचे जाने पर ग्रामीण क्षेत्रों में कुएं और बोरवेल प्रभावित हो सकते हैं। अगर सूखा लंबे समय तक चलता है तो टैंकरों पर निर्भरता बढ़ सकती है।
चौथा असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। खेती में नुकसान होने से किसान और खेतिहर मजदूरों की आय घटती है। इसका असर स्थानीय दुकानों, कृषि व्यापार, परिवहन और दूसरे छोटे व्यवसायों पर भी पड़ सकता है।
सूखे से बचने के लिए सरकार को क्या करना चाहिए?
सबसे जरूरी कदम राहत के साथ-साथ जल प्रबंधन को स्थायी बनाना है। सिर्फ टैंकर भेजना या नुकसान के बाद मुआवजा देना पर्याप्त नहीं होगा। जिन क्षेत्रों में बार-बार बारिश की कमी होती है, वहां जलसंधारण और भूजल पुनर्भरण की योजनाओं को प्राथमिकता देनी होगी।
सरकार को स्थानीय स्तर पर उपलब्ध पानी का वैज्ञानिक आकलन कराना चाहिए। बड़े जलाशयों के साथ छोटे जलस्रोतों, खेत तालाबों, चेक डैम और वर्षा जल संचयन को बढ़ावा देना जरूरी है। जहां भूजल का अत्यधिक दोहन हो रहा है, वहां फसल और सिंचाई की योजना स्थानीय जल उपलब्धता के हिसाब से तय करनी होगी।
कृषि विभाग को किसानों तक ऐसी फसलों और किस्मों की जानकारी पहुंचानी चाहिए जिन्हें कम पानी में उगाया जा सके। सूखा प्रभावित क्षेत्रों में माइक्रो-इरिगेशन, ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी सिंचाई तकनीकों का विस्तार भी पानी की बचत कर सकता है।
इसके साथ ही फसल बीमा और नुकसान के आकलन की प्रक्रिया को तेज और पारदर्शी बनाना जरूरी है। पंचनामों में GPS और फोटो आधारित रिकॉर्ड का इस्तेमाल किया जा रहा है, लेकिन किसानों को यह जानकारी भी मिलनी चाहिए कि उनके खेत का आकलन कब हुआ और सहायता के लिए उनका मामला किस स्तर पर है।
आम लोगों की भूमिका
सूखे से निपटना सिर्फ सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में पानी की बर्बादी रोकना जरूरी है। घरों में अनावश्यक पानी का इस्तेमाल कम करना, वर्षा जल संचयन को बढ़ावा देना और स्थानीय जलस्रोतों को प्रदूषण व अतिक्रमण से बचाना महत्वपूर्ण कदम हैं।
किसानों के स्तर पर भी उपलब्ध पानी के अनुसार फसल चयन, ड्रिप सिंचाई, खेत में नमी बनाए रखने के उपाय और बारिश के पानी को खेत में रोकने की तकनीकों को अपनाना उपयोगी हो सकता है। सामुदायिक स्तर पर गांवों में जल बजट तैयार करना भी यह तय करने में मदद कर सकता है कि उपलब्ध पानी का इस्तेमाल किस तरह किया जाए।
स्थायी समाधान की जरूरत
महाराष्ट्र में 265 तालुकों में सूखा घोषित होना सिर्फ मौजूदा खरीफ सीजन की समस्या नहीं है। यह राज्य के उन इलाकों के लिए चेतावनी भी है जहां कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था बड़ी हद तक बारिश और भूजल पर निर्भर है।
सरकार ने जमीन के राजस्व में छूट, कर्ज पुनर्गठन, बिजली बिल में राहत, रोजगार गारंटी के काम, पानी के टैंकर, खाद्यान्न और चारे की व्यवस्था जैसे कदम घोषित किए हैं। अब इन उपायों का जमीन पर तेजी से लागू होना सबसे महत्वपूर्ण होगा।
इसके साथ ही पंचनामों में देरी न हो और वास्तविक नुकसान झेलने वाले किसानों तक आर्थिक सहायता समय पर पहुंचे, यह भी बड़ी चुनौती होगी। क्योंकि सूखे का असर केवल खेत तक सीमित नहीं रहता। इसका प्रभाव किसान की आय, पशुधन, ग्रामीण रोजगार, पानी की उपलब्धता और पूरे स्थानीय बाजार पर पड़ता है।
