जस्टिस एमएस लिब्रहान का 87 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। जानिए उनका न्यायिक सफर और मस्जिद विध्वंस, BJP एवं RSS पर उनकी मुखर राय
अयोध्या/ नई दिल्ली: भारत के न्यायिक इतिहास और बाबरी मस्जिद विध्वंस की जांच से लंबे समय तक जुड़े रहे पूर्व न्यायाधीश जस्टिस मनमोहन सिंह लिब्रहान का 2 अगस्त को निधन हो गया। वह 87 वर्ष के थे। जस्टिस लिब्रहान उस जांच आयोग के अध्यक्ष थे, जिसे 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद के विध्वंस की परिस्थितियों और उससे जुड़े घटनाक्रम की जांच के लिए केंद्र सरकार ने गठित किया था।
लगभग 17 वर्षों तक चली जांच के बाद लिब्रहान आयोग ने 2009 में अपनी रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंपी। रिपोर्ट ने बाबरी मस्जिद विध्वंस को अचानक हुई भीड़ की कार्रवाई मानने के बजाय इसके पीछे एक व्यापक और सुनियोजित प्रक्रिया की ओर संकेत किया और कई राजनीतिक तथा सामाजिक संगठनों के नेताओं की भूमिका पर सवाल उठाए।
आयोग की रिपोर्ट में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी RSS, विश्व हिंदू परिषद, भारतीय जनता पार्टी और उससे जुड़े कई प्रमुख नेताओं की भूमिका का उल्लेख किया गया था।
हालांकि, लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट एक जांच आयोग की रिपोर्ट थी, अदालत का फैसला नहीं। बाद में बाबरी मस्जिद विध्वंस से जुड़े आपराधिक मुकदमे में विशेष CBI अदालत ने 2020 में सभी 32 आरोपियों को बरी कर दिया।
जस्टिस लिब्रहान का निधन ऐसे समय हुआ है जब बाबरी मस्जिद विध्वंस भारतीय राजनीति, न्यायपालिका और सामाजिक विमर्श में आज भी एक बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण अध्याय बना हुआ है। उनके जीवन की सबसे बड़ी सार्वजनिक पहचान इसी जांच से जुड़ी रही, लेकिन उनकी न्यायिक यात्रा इससे कहीं अधिक व्यापक थी।
पंजाब से शुरू हुआ न्यायिक सफर
मनमोहन सिंह लिब्रहान का जन्म 11 नवंबर 1938 को हुआ था। आधिकारिक न्यायिक रिकॉर्ड के अनुसार, उनका जन्म उस क्षेत्र के एक गांव में हुआ जो अब चंडीगढ़ का हिस्सा है। उनके पिता चौधरी बख्तावर सिंह जाने-माने वकील थे।
लिब्रहान ने अपनी शुरुआती शिक्षा अंबाला और चंडीगढ़ में हासिल की। इसके बाद उन्होंने कानून की पढ़ाई की और 10 अक्टूबर 1962 को अधिवक्ता के रूप में नामांकन कराया। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत अंबाला की जिला अदालतों में वकालत से की। वहां उन्होंने सिविल, राजस्व, आपराधिक और श्रम कानून से जुड़े मामलों में काम किया।
1964 में वह पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में प्रैक्टिस करने लगे। उनके कानूनी अनुभव और विशेषज्ञता के चलते उन्हें हरियाणा सरकार में अतिरिक्त महाधिवक्ता और बाद में महाधिवक्ता की जिम्मेदारी भी मिली।
उनका न्यायिक करियर 11 फरवरी 1987 को नई दिशा में पहुंचा, जब उन्हें पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट का स्थायी न्यायाधीश नियुक्त किया गया।
यह वह दौर था जब पंजाब और उत्तर भारत का राजनीतिक और सामाजिक वातावरण बेहद जटिल था। न्यायपालिका में काम करते हुए लिब्रहान ने कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं और धीरे-धीरे उच्च न्यायपालिका के प्रमुख पदों तक पहुंचे।
मद्रास और आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश
जस्टिस लिब्रहान ने 7 जुलाई 1997 को मद्रास हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के रूप में कार्यभार संभाला। इसके बाद दिसंबर 1998 में उनका तबादला आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट में हुआ, जहां उन्होंने मुख्य न्यायाधीश के रूप में जिम्मेदारी संभाली।
आधिकारिक न्यायिक रिकॉर्ड में उनके करियर को एक ऐसे न्यायाधीश के रूप में दर्ज किया गया है, जिन्होंने उच्च न्यायपालिका में कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं। वह COFEPOSA और Narcotic Drugs and Psychotropic Substances Act के तहत हरियाणा में गठित बोर्डों के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी भी संभाल चुके थे।
हालांकि, उनके करियर की सबसे बड़ी सार्वजनिक पहचान न्यायपालिका में मुख्य न्यायाधीश के पद से नहीं, बल्कि उस जांच आयोग से बनी जिसने स्वतंत्र भारत के सबसे विवादित राजनीतिक-सामाजिक घटनाक्रमों में से एक की पड़ताल की।
1992 के बाद बनी जांच आयोग
6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद का विध्वंस हुआ। इस घटना ने देश की राजनीति और सामाजिक ताने-बाने पर गहरा असर डाला। इसके बाद केंद्र सरकार ने इस पूरे घटनाक्रम की जांच के लिए एक आयोग गठित किया और जस्टिस एमएस लिब्रहान को उसका अध्यक्ष बनाया गया।
आयोग का उद्देश्य केवल यह पता लगाना नहीं था कि बाबरी मस्जिद को किसने गिराया। जांच का दायरा उन घटनाओं, परिस्थितियों और प्रशासनिक विफलताओं तक भी फैला था, जिन्होंने विध्वंस की स्थिति पैदा की।

आयोग ने लंबे समय तक गवाहों के बयान दर्ज किए और घटनाक्रम से जुड़े दस्तावेजों, समाचार रिपोर्टों तथा अन्य साक्ष्यों की जांच की। जस्टिस लिब्रहान ने बाद में कहा था कि आयोग के सामने 100 से अधिक गवाहों की गवाही और विभिन्न प्रकार के दस्तावेजी साक्ष्य आए थे।
जांच करीब 17 वर्षों तक चली और आखिरकार साल 2009 में आयोग ने अपनी रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंप दी।
लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट में क्या कहा गया?
लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट के सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्षों में से एक यह था कि बाबरी मस्जिद का विध्वंस अचानक हुई भीड़ की अनियंत्रित कार्रवाई नहीं था। रिपोर्ट ने इसके पीछे एक व्यापक योजना और लंबे समय से चल रही राजनीतिक-संगठनात्मक प्रक्रिया की ओर संकेत किया।
रिपोर्ट में RSS, BJP, विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल समेत कई संगठनों तथा उनसे जुड़े नेताओं की भूमिका का उल्लेख किया गया था। रिपोर्ट में लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और उमा भारती समेत कई प्रमुख नेताओं के नाम भी सामने आए।

आयोग ने अपने निष्कर्षों में यह भी कहा कि आंदोलन से जुड़े विभिन्न संगठन और नेता एक-दूसरे से अलग-थलग होकर काम नहीं कर रहे थे, बल्कि उनके बीच एक व्यापक नेटवर्क और समन्वय मौजूद था।
यहीं से लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट पर सबसे बड़ा राजनीतिक विवाद शुरू हुआ।
BJP और RSS से जुड़े नेताओं ने आयोग के निष्कर्षों को स्वीकार नहीं किया। RSS की ओर से उस समय कहा गया था कि 6 दिसंबर 1992 की घटना लोगों के लंबे समय से जमा आक्रोश का परिणाम थी और इसके लिए कुछ व्यक्तिगत नेताओं को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा।
दूसरी ओर, लिब्रहान ने अपने बाद के सार्वजनिक बयानों में अपने आयोग के निष्कर्षों का बचाव किया।
RSS और बाबरी विध्वंस पर लिब्रहान का नजरिया
जस्टिस लिब्रहान ने अपने सार्वजनिक बयानों में बाबरी मस्जिद विध्वंस को लेकर अपने निष्कर्षों पर कायम रहने की बात कही थी।
2020 में दिए गए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि उनके सामने आए साक्ष्यों के आधार पर वह इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि विध्वंस के पीछे एक सुनियोजित साजिश थी। उन्होंने यह भी कहा था कि आयोग ने उन नेताओं और संगठनों की भूमिका की जांच की थी, जो आंदोलन के दौरान प्रमुख रूप से सामने थे।
लिब्रहान के अनुसार, उन्होंने केवल राजनीतिक आरोपों के आधार पर निष्कर्ष नहीं निकाला था, बल्कि गवाहियों, दस्तावेजों, समाचार रिपोर्टों और आयोग के सामने प्रस्तुत अन्य साक्ष्यों को देखने के बाद अपनी राय बनाई थी।
उनका कहना था कि बाबरी मस्जिद का विध्वंस किसी अचानक हुई घटना का परिणाम नहीं था। उन्होंने इसे एक ऐसी प्रक्रिया के रूप में देखा जिसमें लंबे समय से राजनीतिक और संगठनात्मक स्तर पर माहौल तैयार किया गया था।
RSS को लेकर भी उनके विचार इसी संदर्भ में सामने आए। लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट में RSS को उस व्यापक संगठनात्मक ढांचे का हिस्सा बताया गया था, जिसे आयोग ने बाबरी मस्जिद विध्वंस की पृष्ठभूमि में महत्वपूर्ण माना।
राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद और सुप्रीम कोर्ट का फैसला
बाबरी मस्जिद विवाद का एक अलग और महत्वपूर्ण पहलू जमीन के मालिकाना हक से जुड़ा था। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2019 में अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाया।
सुप्रीम कोर्ट ने विवादित जमीन पर राम मंदिर निर्माण के लिए ट्रस्ट बनाने का निर्देश दिया और मुस्लिम पक्ष को अयोध्या में पांच एकड़ वैकल्पिक जमीन देने का आदेश दिया।
हालांकि, अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद का विध्वंस कानून के शासन का गंभीर उल्लंघन बताया था।
इससे यह स्पष्ट होता है कि बाबरी मस्जिद विवाद के अलग-अलग कानूनी पहलू जमीन का मालिकाना हक, विध्वंस की वैधानिकता और आपराधिक साजिश, अलग-अलग न्यायिक प्रक्रियाओं में देखे गए।
लिब्रहान के जीवन में इस जांच का महत्तव
बाबरी मस्जिद जांच आयोग के साथ करीब 17 वर्षों तक जुड़े रहने के कारण यह मामला जस्टिस लिब्रहान के सार्वजनिक जीवन का सबसे बड़ा हिस्सा बन गया था।
उनके आलोचकों ने आयोग की जांच में हुई लंबी देरी पर सवाल उठाए। आयोग को अपनी रिपोर्ट देने में लगभग 17 वर्ष लगे और इस दौरान देश की राजनीति कई बड़े बदलावों से गुजरी।
लेकिन लिब्रहान का कहना था कि मामले की जटिलता और बड़ी संख्या में गवाहों तथा साक्ष्यों की जांच के कारण प्रक्रिया लंबी चली।
जब रिपोर्ट सामने आई तो उस पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी हुईं। कुछ दलों ने इसे महत्वपूर्ण दस्तावेज बताया, जबकि विरोधियों ने इसे राजनीतिक रूप से प्रभावित और एकतरफा बताया।
लिब्रहान ने हालांकि अपने निष्कर्षों का बचाव किया और जीवन के अंतिम वर्षों तक इस बात पर कायम रहे कि उनके आयोग ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही रिपोर्ट तैयार की थी।
न्यायपालिका के बाहर भी सक्रिय रहे लिब्रहान
जस्टिस लिब्रहान का जीवन केवल अदालत और जांच आयोग तक सीमित नहीं रहा। उच्च न्यायपालिका से जुड़े पदों के अलावा उन्होंने विभिन्न प्रशासनिक और वैधानिक संस्थाओं में भी जिम्मेदारियां संभालीं।
उनकी पहचान एक ऐसे न्यायाधीश के रूप में रही, जिन्होंने अपने लंबे कानूनी करियर में सिविल, आपराधिक, राजस्व और श्रम कानूनों से लेकर संवेदनशील राष्ट्रीय मामलों तक काम किया।
हालांकि, सार्वजनिक जीवन में उनकी सबसे बड़ी पहचान बाबरी मस्जिद विध्वंस जांच आयोग के अध्यक्ष के रूप में ही बनी। उनका नाम उस रिपोर्ट के साथ हमेशा जुड़ा रहेगा, जिसने 1992 के विध्वंस की घटनाओं को लेकर देश में एक नई राजनीतिक और कानूनी बहस को जन्म दिया।
लिब्रहन की जांच आज भी बहस का मुद्दा
जस्टिस एमएस लिब्रहान का निधन भारतीय न्यायपालिका के एक ऐसे अध्याय का अंत है, जिसकी चर्चा आने वाले वर्षों तक होती रहेगी। उनकी न्यायिक यात्रा लंबी और महत्वपूर्ण थी, लेकिन इतिहास उन्हें सबसे अधिक उस व्यक्ति के रूप में याद करेगा जिसने बाबरी मस्जिद विध्वंस की जांच करने वाले आयोग का नेतृत्व किया।
उनकी रिपोर्ट ने RSS, BJP, विश्व हिंदू परिषद और अन्य संगठनों से जुड़े नेताओं की भूमिका को लेकर गंभीर सवाल उठाए और विध्वंस को एक सुनियोजित प्रक्रिया के रूप में देखा।
दूसरी ओर, RSS और संबंधित राजनीतिक पक्षों ने इन निष्कर्षों को खारिज किया और इसे जनता के लंबे समय से चले आ रहे आक्रोश का परिणाम बताया।
बाद में आपराधिक अदालत का फैसला भी आयोग की रिपोर्ट से अलग रहा, जिसने अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों के आधार पर सभी आरोपियों को बरी कर दिया।
यही अंतर इस पूरे मामले को भारतीय लोकतंत्र और न्याय व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण बनाता है। एक ही ऐतिहासिक घटना को लेकर जांच आयोग, आपराधिक अदालत और संवैधानिक अदालत के सामने अलग-अलग सवाल थे और उनके निष्कर्ष भी अलग-अलग कानूनी संदर्भों में आए।
2 अगस्त 2026 को उनके निधन के साथ एक ऐसे व्यक्तित्व के जीवन का भी अंत हो गया, जिसका नाम भारत के सबसे संवेदनशील राजनीतिक और सामाजिक विवादों में से एक के साथ हमेशा जुड़ा रहेगा।
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