YSR कांग्रेस प्रमुख जगन मोहन रेड्डी ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून को समर्थन देने पर गलती मानी है। जानिए उन्होंने कानून में संशोधन, CJI की भूमिका और निष्पक्ष चयन प्रक्रिया पर क्या कहा।
अमरावती/नई दिल्ली: आंध्र प्रदेश की राजनीति में वाईएस जगन मोहन रेड्डी के ताजा बयान ने राष्ट्रीय स्तर पर भी नई बहस छेड़ दी है। YSR कांग्रेस पार्टी (YSRCP) के प्रमुख और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री ने स्वीकार किया है कि उनकी पार्टी ने 2023 में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े कानून का समर्थन करके गलती की थी।
अब उन्होंने इस कानून में बदलाव की मांग की है और कहा है कि चुनाव आयोग के प्रमुखों की नियुक्ति में निष्पक्ष प्रक्रिया सुनिश्चित करना जरूरी है। उनके बयान ऐसे समय आए हैं, जब चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और चुनावी पारदर्शिता को लेकर विपक्षी दल लगातार सवाल उठा रहे हैं।
दूसरी ओर, जगन के हालिया रुख को लेकर यह चर्चा भी तेज हुई है कि क्या YSRCP भविष्य में कांग्रेस के नेतृत्व वाले INDIA गठबंधन के करीब जा सकती है।
2023 के कानून पर जगन मोहन रेड्डी का बयान
रविवार, 18 अक्टूबर को मीडिया से बातचीत के दौरान जगन मोहन रेड्डी ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की मौजूदा व्यवस्था पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी ने पहले जिस चयन प्रक्रिया का समर्थन किया था, उस पर अब उसे अफसोस है। उनके मुताबिक, चुनाव कराने वाली संस्था के प्रमुखों की नियुक्ति ऐसी व्यवस्था के तहत होनी चाहिए, जिसमें सत्ता में मौजूद सरकार को अनुचित बढ़त न मिले।
जगन ने अपनी बात समझाने के लिए परीक्षा और परीक्षक का उदाहरण दिया। उनका तर्क था कि जिस तरह किसी विद्यार्थी को अपना परीक्षक चुनने का अधिकार नहीं होना चाहिए, उसी तरह चुनाव कराने वाली संस्था के प्रमुखों की नियुक्ति में भी निष्पक्षता का भरोसा जरूरी है। उनके अनुसार, नियुक्त व्यक्ति ईमानदार हो सकता है, लेकिन यदि चयन प्रक्रिया पर ही सवाल उठते हैं तो संस्था की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है।
उन्होंने केंद्र सरकार से कानून में संशोधन करने और चयन समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को फिर से शामिल करने की मांग की। जगन का कहना है कि चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था पर लोगों का भरोसा कायम रखने के लिए नियुक्ति प्रक्रिया का निष्पक्ष होना और निष्पक्ष दिखाई देना, दोनों जरूरी हैं।
क्या है 2023 का कानून?
इस पूरे विवाद को समझने के लिए चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की व्यवस्था को जानना जरूरी है। संसद ने दिसंबर 2023 में Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners (Appointment, Conditions of Service and Term of Office) Act पारित किया था। इस कानून में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए चयन समिति की संरचना तय की गई।
इस कानून के तहत चयन समिति में प्रधानमंत्री, प्रधानमंत्री की ओर से नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता शामिल होते हैं। समिति की सिफारिश के आधार पर राष्ट्रपति चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करते हैं। इस व्यवस्था में भारत के मुख्य न्यायाधीश को चयन समिति का सदस्य नहीं बनाया गया।
विवाद का एक अहम पहलू यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2023 में एक अंतरिम व्यवस्था के तहत चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और CJI की समिति का प्रावधान किया था। यह व्यवस्था तब तक लागू रहनी थी, जब तक संसद इस विषय पर कानून नहीं बना देती। बाद में संसद से पारित कानून ने चयन समिति की संरचना बदल दी और CJI की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित कैबिनेट मंत्री को शामिल किया।
पहले YSRCP ने किया था कानून का समर्थन
जगन के ताजा बयान को राजनीतिक रूप से इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि उनकी पार्टी ने 2023 में इस कानून का समर्थन किया था। अब उसी कानून को लेकर सार्वजनिक रूप से अफसोस जताना YSRCP के पहले के रुख से अलग दिखाई देता है।
जगन ने माना कि उनकी पार्टी से उस समय चयन प्रक्रिया का समर्थन करने में गलती हुई। उनका मौजूदा तर्क है कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए ऐसी समिति होनी चाहिए, जिसमें सरकार और विपक्ष के बीच संतुलन हो तथा किसी एक पक्ष का प्रभाव निर्णायक न बन जाए।
यह बदलाव ऐसे समय सामने आया है, जब चुनाव आयोग की भूमिका और चुनावी प्रक्रिया को लेकर देश में राजनीतिक बहस चल रही है। मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने, पुनरीक्षण प्रक्रिया और आयोग के भीतर लिए जाने वाले फैसलों की पारदर्शिता जैसे मुद्दे विपक्षी दलों की आलोचना का हिस्सा रहे हैं।
चुनाव आयोग की निष्पक्षता और SIR पर भी उठाए सवाल
जगन मोहन रेड्डी ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के अलावा मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर भी चिंता जताई है। इस प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची की जांच की जाती है, ताकि पात्र मतदाताओं के नाम शामिल हों और नियमों के अनुसार जरूरी सुधार किए जा सकें। हालांकि, इस प्रक्रिया में नामों को जोड़ने, हटाने और उनकी बहाली से जुड़े सवाल कई जगह राजनीतिक विवाद का विषय बने हैं।
जगन ने कहा कि चुनाव आयोग जैसे संस्थानों में पारदर्शिता और जवाबदेही जरूरी है। उन्होंने राष्ट्रीय मीडिया में प्रकाशित उन खबरों का भी उल्लेख किया, जिनमें चुनाव आयुक्तों के बीच मतदाता सूची और आयोग के डिजिटल प्लेटफॉर्म ECINet से संबंधित प्रक्रियाओं पर आपत्तियों की बात कही गई थी। उनके मुताबिक, ऐसी खबरों के बाद जनता के मन में उठने वाले सवालों का स्पष्ट जवाब दिया जाना चाहिए।
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आंध्र प्रदेश के स्थानीय निकाय चुनावों को लेकर भी विवाद
जगन मोहन रेड्डी का ताजा रुख केवल राष्ट्रीय स्तर पर चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति तक सीमित नहीं है। उन्होंने आंध्र प्रदेश में स्थानीय निकाय चुनावों की प्रक्रिया को लेकर भी राज्य की सत्तारूढ़ तेलुगु देशम पार्टी (TDP) के नेतृत्व वाले गठबंधन पर आरोप लगाए हैं।
जगन का आरोप है कि विपक्षी उम्मीदवारों को नामांकन दाखिल करने से रोकने के लिए दबाव बनाया गया, पार्टी कार्यकर्ताओं को परेशान किया गया और कुछ स्थानों पर नामांकन पत्र छीनने या उम्मीदवारों को धमकाने जैसी घटनाएं भी सामने आईं। उन्होंने यह भी दावा किया कि पुलिस और प्रशासन को निष्पक्ष भूमिका निभानी चाहिए, लेकिन उनकी पार्टी के कई उम्मीदवारों को पर्याप्त अवसर नहीं मिला।
इन आरोपों के संदर्भ में जगन ने कडपा, तिरुपति, पुंगनूर और पुलिवेंदुला सहित कुछ क्षेत्रों का उल्लेख किया। उन्होंने स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की तैनाती की मांग भी की।
आंध्र प्रदेश की राजनीति में यह विवाद इसलिए भी अहम है, क्योंकि 2024 के विधानसभा चुनाव में YSRCP को सत्ता से बाहर होना पड़ा था और चंद्रबाबू नायडू के नेतृत्व में TDP ने राज्य में सरकार बनाई थी। इसके बाद दोनों दलों के बीच राजनीतिक टकराव जारी है।
क्या जगन ने किया CJP का समर्थन?
जगन मोहन रेड्डी के बयान के साथ-साथ उनकी ओर से कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) से जुड़े प्रदर्शनकारियों के प्रति जताई गई सहानुभूति भी चर्चा में है। CJP नाम से जाना जाने वाला यह समूह मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों में शामिल रहा है। प्रदर्शनकारियों ने SIR और चुनावी प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं को लेकर सवाल उठाए हैं।
जगन ने सोशल मीडिया पर सौरव दास और आशुतोष रांका की गिरफ्तारी का उल्लेख करते हुए कहा कि ऐसी कार्रवाई से समस्या का समाधान नहीं होता, बल्कि स्थिति और बिगड़ सकती है। उन्होंने दोनों के प्रति सहानुभूति जताई और कहा कि व्यवस्था में मौजूद खामियों को दूर करने के लिए सक्रिय कदम उठाने चाहिए।
इस बयान को CJP के विरोध और चुनावी सुधारों की मांग के प्रति समर्थन के तौर पर देखा गया। हालांकि, किसी प्रदर्शनकारी के प्रति सहानुभूति जताना और किसी राजनीतिक गठबंधन में औपचारिक रूप से शामिल होना दो अलग-अलग बाते हैं। जगन की ओर से INDIA गठबंधन में शामिल होने की कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।
YSRCP के आठ सांसदों की भूमिका
YSRCP के पास लोकसभा और राज्यसभा में कुल आठ सांसद हैं। संख्या के लिहाज से यह किसी बड़े राष्ट्रीय दल जितनी नहीं है, लेकिन कुछ विधायी प्रक्रियाओं में छोटे और क्षेत्रीय दलों का समर्थन भी महत्वपूर्ण हो सकता है। खासकर ऐसे संविधान संशोधन विधेयकों में, जिनके पारित होने के लिए विशेष बहुमत की जरूरत होती है, सांसदों की स्थिति पर राजनीतिक दलों की नजर रहती है।
इस वक्त भाजपा YSRCP के रुख पर नजर रख रही है, क्योंकि संसद में भविष्य के कुछ अहम विधायी प्रस्तावों को लेकर उसे अतिरिक्त समर्थन की जरूरत पड़ सकती है। इनमें परिसीमन और संविधान संशोधन से जुड़े मुद्दे भी शामिल हैं।
परिसीमन का संबंध निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं और प्रतिनिधित्व के निर्धारण से है। इस विषय पर दक्षिणी राज्यों की चिंताएं भी रही हैं, क्योंकि जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों को भविष्य में संसद में प्रतिनिधित्व के लिहाज से नुकसान न हो, यह एक महत्वपूर्ण बहस है। जगन पहले भी दक्षिणी राज्यों के हितों की सुरक्षा की बात उठा चुके हैं।
फिर भी, YSRCP का समर्थन किस विधेयक को मिलेगा, यह उसके औपचारिक रुख और उस समय के राजनीतिक निर्णयों पर निर्भर करेगा। केवल चुनाव आयोग पर सरकार की आलोचना करने के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि पार्टी सभी मुद्दों पर विपक्ष के साथ खड़ी होगी।

