देश में चीनी की औसत कीमत एक साल में करीब 13% बढ़ी है। ड्यूटी-फ्री इंपोर्ट, E20 नीति, गन्ने और त्योहारी मांग के बीच बढ़ती कीमतों की पूरी वजह समझिए।
नई दिल्ली: देश में चीनी की कीमतों में तेज बढ़ोतरी ने आम लोगों के साथ-साथ सरकार की भी चिंता बढ़ा दी है। घरेलू बाजार में चीनी की सप्लाई पर दबाव और त्योहारी सीजन में बढ़ने वाली मांग के बीच खुदरा और थोक कीमतों में तेजी देखी जा रही है। स्थिति को संभालने के लिए केंद्र सरकार ने करीब एक दशक बाद 10 लाख मीट्रिक टन कच्ची चीनी के ड्यूटी-फ्री इंपोर्ट की अनुमति दी है। सरकार का लक्ष्य घरेलू बाजार में सप्लाई बढ़ाकर कीमतों पर दबाव कम करना है। यह इंपोर्ट 31 अक्टूबर 2026 तक किया जा सकेगा।
यह फैसला ऐसे समय आया है जब देश में गणेश चतुर्थी, दशहरा और दिवाली जैसे बड़े त्योहारों का सीजन शुरू होने वाला है। इस दौरान मिठाइयों और दूसरे खाद्य उत्पादों में चीनी की मांग बढ़ती है। ऐसे में सरकार के सामने एक तरफ उपभोक्ताओं के लिए कीमतों को नियंत्रित रखने की चुनौती है, तो दूसरी तरफ गन्ना किसानों और चीनी उद्योग के हितों का संतुलन बनाए रखना भी जरूरी है।
इस पूरी स्थिति के बीच E20 नीति भी चर्चा के केंद्र में आ गई है। आम आदमी पार्टी ने चीनी की बढ़ती कीमतों को गन्ने के इथेनॉल उत्पादन की ओर बढ़ते इस्तेमाल से जोड़ते हुए केंद्र सरकार की नीति पर सवाल उठाए हैं। वहीं केंद्र सरकार ई20 को ऊर्जा सुरक्षा, कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करने और किसानों के लिए अतिरिक्त बाजार उपलब्ध कराने की नीति के रूप में देखती है।
चीनी के दाम में आखिर कितनी बढ़ोतरी हुई?
चीनी की कीमतों में बढ़ोतरी देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग रही है। उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 18 अगस्त 2026 को देश में चीनी की औसत खुदरा कीमत करीब 52.30 रुपये प्रति किलो थी, जबकि एक साल पहले यह करीब 46.34 रुपये प्रति किलो थी। यानी सालाना आधार पर कीमत में लगभग 13 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है।
हालांकि कई स्थानीय बाजारों में कीमत इससे कहीं अधिक बताई जा रही है। बिहार में पिछले करीब 15 दिनों के दौरान चीनी की कीमत लगभग 48-50 रुपये से बढ़कर 65 रुपये प्रति किलो से ऊपर पहुंचने की रिपोर्ट सामने आई है।
थोक बाजार में भी तेजी दिखाई दी है। महाराष्ट्र के कोल्हापुर जैसे प्रमुख चीनी बाजार में अगस्त की शुरुआत से कीमत करीब 20 प्रतिशत बढ़कर 5,350 रुपये प्रति 100 किलो के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गई।
देश में चीनी की कीमतें पिछले दो महीनों में करीब 40 प्रतिशत तक बढ़ी हैं। घरेलू सप्लाई पर बढ़ते दबाव के कारण भारत को करीब एक दशक बाद चीनी इंपोर्ट की ओर लौटना पड़ा है।
सरकार ने ड्यूटी-फ्री इंपोर्ट का फैसला क्यों लिया?
बढ़ती कीमतों पर काबू पाने के लिए केंद्र ने 10 लाख मीट्रिक टन कच्ची चीनी के ड्यूटी-फ्री इंपोर्ट की अनुमति दी है। सामान्य परिस्थितियों में भारत चीनी के इंपोर्ट पर 100 प्रतिशत शुल्क लगाता है। इस बार सरकार ने सीमित मात्रा में कच्ची चीनी को बिना इंपोर्ट ड्यूटी के लाने की अनुमति दी है।
यह व्यवस्था 31 अक्टूबर 2026 तक लागू रहेगी। चीनी मिलों और रिफाइनरियों को इस शून्य-ड्यूटी कोटे के लिए 21 से 28 अगस्त के बीच आवेदन करना होगा। जो कंपनियां 15 अक्टूबर तक इंपोर्ट पूरा करने का भरोसा देंगी, उन्हें प्राथमिकता दी जा सकती है।
सरकार को उम्मीद है कि इससे घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता बढ़ेगी और कीमतों में तेजी पर रोक लगेगी।
रिपोर्ट के मुताबिक, बंदरगाहों पर मौजूद रिफाइनरियां आयातित कच्ची चीनी को रिफाइन करके घरेलू बाजार में बेच सकती हैं। इससे करीब 3 लाख टन चीनी की सप्लाई अपेक्षाकृत जल्दी बाजार में आने की संभावना है। हालांकि ब्राजील जैसे देशों से आने वाली बड़ी खेप को भारत पहुंचने में समय लग सकता है।
इसका मतलब यह है कि ड्यूटी-फ्री इंपोर्ट का फैसला तुरंत कीमतों में बड़ी गिरावट की गारंटी नहीं देता। बाजार पर इसका असर इस बात पर निर्भर करेगा कि आयातित चीनी कितनी जल्दी भारत पहुंचती है और घरेलू सप्लाई में कितना सुधार होता है।
भारत को चीनी इंपोर्ट करने की जरूरत क्यों पड़ी?
भारत दुनिया के सबसे बड़े चीनी उपभोक्ताओं में शामिल है। लंबे समय तक देश घरेलू मांग पूरी करने के साथ बड़ी मात्रा में चीनी का निर्यात भी करता रहा है। लेकिन इस साल घरेलू सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ी है।
चीनी उत्पादन में कमी, गन्ने की उत्पादकता और रिकवरी पर असर, मौसम की परिस्थितियां और गन्ने के इस्तेमाल में बदलाव जैसे कई कारण बाजार पर दबाव डाल रहे हैं।
सरकार ने घरेलू उपलब्धता बनाए रखने के लिए पहले ही चीनी के निर्यात पर कई तरह के प्रतिबंध लगाए हैं। अब कीमतों में तेजी के बीच इंपोर्ट को आसान बनाने का फैसला किया गया है।
E20 से चीनी की कीमत का कनेक्शन
अब इस पूरे मामले का सबसे ज्यादा चर्चा वाला पहलू E20 है।
ई20 का मतलब है ऐसा पेट्रोल जिसमें 20 प्रतिशत इथेनॉल और 80 प्रतिशत पेट्रोल होता है। भारत ने पिछले कुछ वर्षों में पेट्रोल में इथेनॉल ब्लेंडिंग को लगातार बढ़ाया है।
इथेनॉल बनाने के लिए गन्ने और उससे जुड़े उत्पादों के साथ-साथ मक्का और चावल जैसे फीडस्टॉक का भी इस्तेमाल किया जाता है। ऐसे में जब गन्ने के एक हिस्से का इस्तेमाल चीनी बनाने के बजाय इथेनॉल उत्पादन के लिए होता है तो बाजार में यह सवाल उठता है कि इससे चीनी की उपलब्धता पर कितना असर पड़ता है। यही सवाल अब राजनीतिक बहस का हिस्सा बन गया है।
रिपोर्ट के अनुसार, विशेषज्ञों ने गन्ने के इथेनॉल उत्पादन की ओर डायवर्जन को चीनी की उपलब्धता पर दबाव डालने वाले कारकों में शामिल किया है। हालांकि इसे चीनी की कीमत बढ़ने का एकमात्र कारण नहीं माना जा सकता।
चीनी की कीमत पर उत्पादन में कमी, गन्ने की रिकवरी, मौसम, फसल में बीमारी, स्टॉक और त्योहारी मांग जैसे कई कारक एक साथ असर डालते हैं।
E20 को लेकर आम आदमी पार्टी का हमला
चीनी की कीमत बढ़ने के बाद आम आदमी पार्टी ने केंद्र सरकार की E20 नीति पर सवाल उठाए हैं। पार्टी का तर्क है कि पेट्रोल में इथेनॉल की ब्लेंडिंग बढ़ाने के लिए गन्ने का इस्तेमाल बढ़ा है। इससे चीनी उत्पादन के लिए उपलब्ध गन्ने की मात्रा पर असर पड़ सकता है और घरेलू बाजार में चीनी की सप्लाई कम होने पर कीमत बढ़ सकती है।
पार्टी ने इस स्थिति को “खाद्य बनाम ईंधन” की बहस से जोड़ते हुए सवाल उठाया है कि देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने की नीति का असर आम लोगों के खाद्य बजट पर नहीं पड़ना चाहिए।
आप नेता अरविंद केजरीवाल ने भी E20 नीति और चीनी की कीमतों को लेकर केंद्र पर निशाना साधा है। उन्होंने तर्क दिया कि अगर गन्ने का इस्तेमाल इथेनॉल के लिए बढ़ाया जाता है और बाद में घरेलू जरूरत पूरी करने के लिए चीनी इंपोर्ट करनी पड़ती है, तो नीति के आर्थिक फायदे और नुकसान पर दोबारा विचार करना चाहिए।
सरकार E20 को क्यों बढ़ावा दे रही है?
केंद्र सरकार ई20 कार्यक्रम को सिर्फ इथेनॉल की मांग बढ़ाने वाली नीति के तौर पर नहीं देखती। इसके पीछे ऊर्जा सुरक्षा और कच्चे तेल के इंपोर्ट पर निर्भरता कम करने का बड़ा लक्ष्य है।
सरकार के अनुसार, पेट्रोल में इथेनॉल ब्लेंडिंग बढ़ने से कच्चे तेल के इंपोर्ट की जरूरत कम हो सकती है। इससे विदेशी मुद्रा की बचत और किसानों के लिए इथेनॉल उत्पादन से जुड़ा अतिरिक्त बाजार तैयार होने की उम्मीद है।
सरकार ने यह भी बताया है कि देश ने पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल ब्लेंडिंग का लक्ष्य तय समय से पहले हासिल कर लिया है। हालांकि ई20 के भविष्य को लेकर सरकार ने फिलहाल 20 प्रतिशत से आगे ब्लेंडिंग बढ़ाने पर कोई तत्काल फैसला नहीं किया है। आगे की नीति वैज्ञानिक, तकनीकी और हितधारकों से चर्चा के आधार पर तय की जाएगी।
श्रवण कुमार के बयान से क्यों मचा बवाल?
चीनी की कीमत बढ़ने के बीच बिहार के मंत्री श्रवण कुमार का बयान भी चर्चा में आ गया है। वह जनता दल यूनाइटेड यानी जेडीयू से जुड़े बिहार सरकार के मंत्री हैं।
चीनी की बढ़ती कीमत को लेकर पटना में मीडिया के सवाल पर श्रवण कुमार ने कहा कि इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि लोग वैसे भी कम चीनी खा रहे हैं। उन्होंने डायबिटीज का हवाला देते हुए कहा कि आजकल लोग इस बीमारी से प्रभावित हो रहे हैं और मिठाई भी कम खाते हैं। उनका यह बयान वायरल हो गया और विपक्ष ने इसकी आलोचना शुरू कर दी।
उनकी टिप्पणी ऐसे समय आई जब बिहार में चीनी की खुदरा कीमत करीब 65 रुपये प्रति किलो तक पहुंचने की रिपोर्ट सामने आई थी। ऐसे में विपक्ष ने आरोप लगाया कि मंत्री को महंगाई से परेशान लोगों की चिंता को गंभीरता से लेना चाहिए था।
बयान को लेकर राजनीतिक विवाद इसलिए भी बढ़ा क्योंकि चीनी केवल मिठाई बनाने में इस्तेमाल होने वाली चीज नहीं है। चाय, घरेलू खाना, बेकरी उत्पाद, पेय पदार्थ और कई खाद्य उत्पादों में इसका इस्तेमाल होता है।
सिर्फ ई20 नहीं, इन कारणों से भी महंगी हुई चीनी
चीनी की कीमतों को केवल ई20 से जोड़ना अधूरा विश्लेषण होगा। इसके पीछे कई कारण एक साथ काम कर रहे हैं।
1. घरेलू सप्लाई पर दबाव
जब बाजार में उपलब्ध चीनी की मात्रा कम होती है और मांग बनी रहती है तो कीमतों पर दबाव बढ़ता है। इस समय बाजार में यही स्थिति देखने को मिल रही है।
2. गन्ने की उत्पादकता
गन्ने की फसल पर मौसम और खेती से जुड़ी परिस्थितियों का असर पड़ता है। उत्पादन और चीनी रिकवरी कम होने पर मिलों से मिलने वाली चीनी की मात्रा भी प्रभावित होती है।
3. फसल में बीमारी
कुछ राज्यों में गन्ने की फसल में बीमारी की वजह से उत्पादकता और रिकवरी प्रभावित होने की रिपोर्ट सामने आई है। इससे चीनी उत्पादन पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
4. गन्ने का इथेनॉल की ओर इस्तेमाल
गन्ने का एक हिस्सा इथेनॉल उत्पादन की ओर जाने से चीनी बनाने के लिए उपलब्ध कच्चे माल की मात्रा प्रभावित हो सकती है। यही वजह है कि ई20 नीति इस बहस में महत्वपूर्ण मुद्दा बन गई है।
5. त्योहारी मांग
अगस्त से नवंबर के बीच भारत में त्योहारों का लंबा सीजन रहता है। इस दौरान मिठाई और खाद्य उत्पादों की मांग बढ़ती है। चीनी की खपत बढ़ने से बाजार में कीमतों पर दबाव और बढ़ सकता है।
सरकार ने लगाई स्टॉक लिमिट
चीनी की कीमतों पर नियंत्रण के लिए सरकार ने केवल इंपोर्ट का रास्ता नहीं चुना है। बड़े खरीदारों के लिए स्टॉक लिमिट भी लागू की गई है।
रिपोर्ट के अनुसार, 1 सितंबर से 30 नवंबर 2026 तक हर महीने 10 मीट्रिक टन से ज्यादा चीनी इस्तेमाल करने वाले बड़े उपभोक्ता केवल 15 दिनों की जरूरत के बराबर स्टॉक रख सकेंगे। डीलरों के लिए पहले ही 30 दिनों के स्टॉक की सीमा तय की जा चुकी है।
इसका उद्देश्य जमाखोरी रोकना और बाजार में उपलब्ध चीनी की सप्लाई बनाए रखना है।
ड्यूटी-फ्री इंपोर्ट से क्या चीनी सस्ती हो जाएगी?
सरकार के इस फैसले से बाजार में सप्लाई बढ़ने की उम्मीद है, लेकिन इसका असर तुरंत दिखाई देगा, यह कहना मुश्किल है।
भारत में आने वाली बड़ी मात्रा में कच्ची चीनी को दूसरे देशों से आयात करना होगा। समुद्री रास्ते से आने में समय लगेगा और इसके बाद चीनी को रिफाइन करके घरेलू बाजार में भेजना होगा। इसलिए त्योहारी सीजन से पहले सरकार की सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि आयातित चीनी समय पर बाजार में पहुंचे।
अगर सप्लाई समय पर बढ़ती है तो कीमतों में तेजी पर रोक लग सकती है। लेकिन अगर मांग बहुत ज्यादा रही और सप्लाई सामान्य से कम रही तो कीमतों में गिरावट सीमित रह सकती है।
बढ़ती महंगाई पर आम लोगों का असर
चीनी की कीमत में बढ़ोतरी का असर सिर्फ चाय में इस्तेमाल होने वाली चीनी तक सीमित नहीं रहता। इसका असर मिठाई, बेकरी उत्पाद, पेय पदार्थ और कई पैकेज्ड फूड उत्पादों की लागत पर पड़ सकता है।
त्योहारी सीजन में इसका असर ज्यादा दिखाई दे सकता है क्योंकि मिठाइयों की मांग बढ़ जाती है। अगर चीनी महंगी रहती है तो मिठाई बनाने की लागत भी बढ़ सकती है और उसका कुछ हिस्सा उपभोक्ताओं पर डाला जा सकता है।
इसलिए सरकार के लिए चीनी की कीमत को नियंत्रित करना केवल एक कमोडिटी की कीमत नियंत्रित करने का मामला नहीं है, बल्कि खाद्य महंगाई को लेकर भी महत्वपूर्ण है।


