भारत-नेपाल सीमा विवाद के बीच नेपाल ने 1 रुपये के सिक्के से लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी वाला नक्शा हटाने का फैसला किया है। क्या इससे दोनों देशों के रिश्ते सुधरेंगे?
काठमांडू/ नई दिल्ली: एक छोटे से सिक्के पर बना नक्शा कभी-कभी दो देशों के रिश्तों में बड़ी राजनीतिक बहस खड़ी कर सकता है। नेपाल में अब ऐसा ही एक बदलाव चर्चा का विषय बन गया है। प्रधानमंत्री बालेन शाह (Balen Shah) की सरकार ने नए डिजाइन के 1 नेपाली रुपये के सिक्के को जारी करने की मंजूरी दी है।
इस नए सिक्के से वह राजनीतिक नक्शा हटाया जा रहा है, जिसमें लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी जैसे विवादित क्षेत्रों को नेपाल की सीमा के भीतर दिखाया गया था।

इस नक्शे की जगह सिक्के पर लो घ्याकर (Lo Ghyakar) मठ की तस्वीर लगाने की योजना बनाई जा रही है, जो नेपाल के मुस्तांग जिले के मरांग गांव में स्थित एक प्राचीन बौद्ध मठ है।

यह बदलाव ऐसे समय हुआ है जब भारत और नेपाल के बीच इन क्षेत्रों को लेकर दशकों पुराना सीमा विवाद अब भी पूरी तरह सुलझा नहीं है। इसलिए नेपाल के सिक्के से विवादित नक्शे को हटाने के फैसले को सिर्फ मुद्रा के डिजाइन में बदलाव नहीं, बल्कि काठमांडू की कूटनीतिक दिशा में संभावित संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है।
नेपाल ने सिक्के का डिजाइन क्यों बदला?
नेपाल सरकार ने जुलाई 2026 में नेपाल राष्ट्र बैंक को नए डिजाइन के 1 रुपये और 2 रुपये के सिक्के जारी करने की अनुमति दी। नेपाल राष्ट्र बैंक के प्रवक्ता गुरु प्रसाद पौडेल के अनुसार, सिक्कों के आकार, वजन और डिजाइन में बदलाव का उद्देश्य छोटे मूल्यवर्ग की मुद्रा को अधिक सुविधाजनक और प्रभावी बनाना है।
नई योजना के तहत 1 रुपये के सिक्के का वजन लगभग 4 ग्राम से घटाकर 3.2 ग्राम किया जाना है, जबकि 2 रुपये के सिक्के का वजन 5 ग्राम से घटाकर 3.8 ग्राम किया जाएगा।
नए सिक्के मिश्रित धातु के बजाय स्टील से बनाए जाने की बात कही गई है और उनका रंग भी पहले के पीले रंग के बजाय स्टील जैसा सफेद होगा।
लेकिन इस बदलाव में सबसे अधिक ध्यान 1 रुपये के सिक्के पर है। पुराने डिजाइन में नेपाल का नया राजनीतिक नक्शा शामिल था, जिसमें लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी को नेपाल के क्षेत्र के रूप में दर्शाया गया था। नए डिजाइन में इस नक्शे की जगह लो घ्याकर मठ को शामिल करने की योजना है।
यानी सरकार का आधिकारिक तर्क सिक्के के आकार और वजन में बदलाव से जुड़ा है, लेकिन नक्शे को हटाने का फैसला स्वाभाविक रूप से भारत-नेपाल सीमा विवाद के संदर्भ में राजनीतिक और कूटनीतिक चर्चा का विषय बन गया है।
क्या 1 रुपये के सिक्के से पूरा विवादित नक्शा हटेगा?
ताजा रिपोर्टों के अनुसार, नए 1 रुपये के सिक्के पर नेपाल का विवादित राजनीतिक नक्शा नहीं होगा। उसकी जगह लो घ्याकर मठ की तस्वीर होगी।
हालांकि, 2 रुपये के सिक्के को लेकर स्थिति अलग है। इसमें पुराने डिजाइन वाला नक्शा बरकरार रहने की बात सामने आई है। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि नेपाल ने अपने सभी सिक्कों से विवादित नक्शा हटा दिया है।
यही वजह है कि इस फैसले को भारत-नेपाल सीमा विवाद पर नेपाल की आधिकारिक नीति में पूर्ण बदलाव के तौर पर देखना अभी उचित नहीं होगा। सिक्के का डिजाइन बदलना और किसी क्षेत्र पर आधिकारिक दावा छोड़ना दो अलग-अलग बातें हैं।
नेपाल सरकार ने भी इस फैसले को सीमा विवाद से समझौते के रूप में औपचारिक तौर पर पेश नहीं किया है। दूसरी ओर, नेपाल के कुछ विपक्षी नेताओं ने नक्शा हटाने के फैसले पर सवाल उठाए हैं और सरकार से स्पष्टीकरण मांगा है। नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के वरिष्ठ नेता भीम रावल ने इसे देश की क्षेत्रीय अखंडता से जुड़ा गंभीर मुद्दा बताया और प्रधानमंत्री बालेन शाह की सरकार से स्थिति स्पष्ट करने की मांग की।
विवादित नक्शे में कौन-कौन से इलाके शामिल?
भारत और नेपाल के बीच विवाद का केंद्र मुख्य रूप से कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा क्षेत्र हैं।
ये इलाके हिमालय के पश्चिमी हिस्से में भारत के उत्तराखंड राज्य के पिथौरागढ़ जिले और नेपाल के सुदूरपश्चिम प्रदेश के बीच स्थित सीमा क्षेत्र से जुड़े हैं। यह इलाका भारत, नेपाल और चीन के तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र के त्रि-जंक्शन के आसपास का रणनीतिक क्षेत्र है।
लिपुलेख भारत और तिब्बत के बीच एक महत्वपूर्ण पर्वतीय दर्रा है, जिसका कैलाश मानसरोवर यात्रा के मार्गों में ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व रहा है।
कालापानी क्षेत्र और इसके आसपास के इलाके को भारत अपने भूभाग का हिस्सा मानता रहा है। नेपाल इसके विपरीत इन क्षेत्रों पर अपना दावा करता है और उसका तर्क है कि 1816 की सुगौली संधि के अनुसार महाकाली या काली नदी की वास्तविक उत्पत्ति को सीमा का आधार माना जाना चाहिए।
सुगौली संधि से शुरू हुई सीमा विवाद की कहानी
भारत और नेपाल के बीच कालापानी विवाद को समझने के लिए 19वीं सदी में जाना होगा। साल 1814 से 1816 के बीच ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के बीच एंग्लो-नेपाल युद्ध हुआ। युद्ध समाप्त होने के बाद दोनों पक्षों के बीच 1816 में सुगौली संधि हुई।
इस संधि ने नेपाल की पश्चिमी सीमा निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। संधि में काली नदी को नेपाल की पश्चिमी सीमा से जोड़ते हुए सीमा निर्धारण किया गया था। लेकिन विवाद यह है कि काली नदी का वास्तविक उद्गम कहां से माना जाए।

नेपाल का दावा है कि नदी का उद्गम लिम्पियाधुरा के पास से होता है। इस आधार पर नेपाल का कहना है कि कालापानी और लिपुलेख सहित आसपास का क्षेत्र उसके भूभाग का हिस्सा है।
भारत इस व्याख्या को स्वीकार नहीं करता। भारत का कहना है कि सीमा निर्धारण और ऐतिहासिक प्रशासनिक रिकॉर्ड के आधार पर ये क्षेत्र भारत का हिस्सा हैं।
यानी दोनों देशों के बीच विवाद केवल जमीन के एक टुकड़े को लेकर नहीं है। इसकी जड़ ऐतिहासिक दस्तावेजों, पुराने नक्शों, नदी के उद्गम और प्रशासनिक नियंत्रण की अलग-अलग व्याख्याओं में है।
2020 में बढ़ा भारत-नेपाल विवाद
भारत और नेपाल के रिश्तों में कालापानी-लिपुलेख विवाद ने मई 2020 में नया मोड़ लिया।
भारत ने 8 मई 2020 को उत्तराखंड के धारचूला से लिपुलेख दर्रे तक सड़क मार्ग के उद्घाटन की घोषणा की। भारत के लिए यह सड़क रणनीतिक और धार्मिक दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण थी, क्योंकि इससे कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए मार्ग सुगम होने की उम्मीद थी।
नेपाल ने इस सड़क निर्माण पर कड़ी आपत्ति जताई। काठमांडू का कहना था कि सड़क का एक हिस्सा उस क्षेत्र से होकर गुजरता है जिसे नेपाल अपना क्षेत्र मानता है।
इसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की सरकार ने नेपाल का नया राजनीतिक नक्शा जारी किया। मई 2020 में नेपाल ने आधिकारिक नक्शे में लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी को अपने क्षेत्र में शामिल किया।
इसके बाद नेपाल की संसद ने संविधान में संशोधन कर नए नक्शे को संवैधानिक मान्यता भी दी।
भारत ने नेपाल के इस कदम को स्वीकार नहीं किया। भारतीय विदेश मंत्रालय ने उस समय कहा था कि नेपाल का नया नक्शा ऐतिहासिक तथ्यों और साक्ष्यों पर आधारित नहीं है और भारत ने नेपाल की इस एकतरफा कार्रवाई को स्वीकार नहीं किया। यहीं से दोनों देशों के बीच कूटनीतिक तनाव काफी बढ़ गया।
2025 में भी जारी रहा विवाद
विवाद 2020 के बाद भी खत्म नहीं हुआ। नवंबर 2025 में नेपाल ने नया 100 नेपाली रुपये का नोट जारी किया, जिस पर भी नया राजनीतिक नक्शा शामिल था। इस नक्शे में कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को नेपाल के हिस्से के रूप में दिखाया गया।
इस पर भारत में भी प्रतिक्रिया सामने आई। भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा था कि किसी एकतरफा कदम से जमीन पर वास्तविक स्थिति नहीं बदलती।
इससे स्पष्ट है कि नेपाल के सिक्के और नोट पर नक्शे का इस्तेमाल केवल मुद्रा डिजाइन का मामला नहीं रहा है। यह दोनों देशों के बीच राष्ट्रीय संप्रभुता और क्षेत्रीय दावे का प्रतीक बन चुका है।
ऐसे में 2026 में 1 रुपये के सिक्के से विवादित नक्शा हटाने का फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इससे पहले नेपाल ने अपने आधिकारिक मुद्रा दस्तावेजों में इस नक्शे को प्रमुखता दी थी।
क्या बालेन शाह के फैसले में भारत का दबाव
यह सवाल इस समय सबसे ज्यादा चर्चा में है, लेकिन इसका कोई आधिकारिक प्रमाण सामने नहीं आया है कि प्रधानमंत्री बालेन शाह की सरकार ने भारत के दबाव में यह फैसला लिया।
नेपाल राष्ट्र बैंक के अनुसार सिक्कों का डिजाइन बदलने की प्रक्रिया का संबंध सिक्कों के वजन, आकार और निर्माण से भी है। नए सिक्कों को हल्का और स्टील से बनाने की योजना इसी व्यापक बदलाव का हिस्सा बताई गई है।
दूसरी ओर, भारत और नेपाल के बीच लंबे समय से चले आ रहे सीमा विवाद को देखते हुए इस फैसले का कूटनीतिक अर्थ निकाला जाना स्वाभाविक है।
विशेष रूप से इसलिए क्योंकि सिक्के पर नक्शे की जगह लो घ्याकर मठ की तस्वीर लगाई जा रही है। यह नेपाल की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को दर्शाने वाला प्रतीक है और विवादित भूभाग के राजनीतिक संदेश को हटाता है।
बालेन शाह के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?
प्रधानमंत्री बालेन शाह नेपाल की राजनीति में पारंपरिक दलों से अलग छवि के साथ उभरे हैं। काठमांडू के पूर्व मेयर के रूप में उनकी लोकप्रियता और युवा समर्थकों के बीच उनकी मजबूत पकड़ ने उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में प्रमुख स्थान दिलाया।
उनकी सरकार के सामने एक तरफ नेपाल की आर्थिक और प्रशासनिक चुनौतियां हैं, तो दूसरी तरफ भारत और चीन जैसे दोनों पड़ोसी देशों के साथ संतुलित विदेश नीति बनाए रखने की चुनौती भी है।
नेपाल भौगोलिक रूप से भारत और चीन के बीच स्थित है। ऐसे में भारत के साथ रिश्ते उसके व्यापार, रोजगार, ऊर्जा, परिवहन और आम लोगों के सीमा-पार संपर्क के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण हैं।
भारत और नेपाल के बीच खुली सीमा दोनों देशों के संबंधों को अन्य पड़ोसी देशों से अलग बनाती है। लाखों नेपाली नागरिक भारत में काम करते हैं और दोनों देशों के बीच धार्मिक, सांस्कृतिक तथा पारिवारिक संबंध भी गहरे हैं।
इसलिए काठमांडू और नई दिल्ली के बीच तनाव का असर केवल कूटनीतिक बैठकों तक सीमित नहीं रहता। इसका असर सीमा क्षेत्र के लोगों, व्यापार और पर्यटन पर भी पड़ सकता है।
क्या इस फैसले से भारत-नेपाल संबंध सुधरेंगे?
इस बात की संभावना जरूर है, लेकिन इसे लेकर अभी कोई निश्चित निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। यदि नेपाल सरकार भविष्य में भी भारत के साथ सीमा विवाद को बातचीत और कूटनीतिक माध्यमों से सुलझाने की कोशिश करती है, तो दोनों देशों के रिश्तों में सकारात्मक माहौल बन सकता है।
भारत और नेपाल के बीच कई महत्वपूर्ण सहयोग के क्षेत्र हैं। इनमें बिजली व्यापार, जलविद्युत परियोजनाएं, सड़क और रेल कनेक्टिविटी, सीमा व्यापार और धार्मिक पर्यटन शामिल हैं।
नेपाल के लिए भारत एक बड़ा व्यापारिक साझेदार है। दूसरी तरफ भारत के लिए नेपाल हिमालयी क्षेत्र में रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण पड़ोसी है।
ऐसे में दोनों देशों के बीच बेहतर संबंध दोनों के हित में हैं।
लेकिन कालापानी-लिपुलेख-लिम्पियाधुरा विवाद इतना संवेदनशील है कि केवल सिक्के से नक्शा हटाने भर से इसका समाधान संभव नहीं है।
वास्तविक समाधान के लिए दोनों देशों को ऐतिहासिक दस्तावेजों, सीमा मानचित्रों और प्रशासनिक रिकॉर्ड के आधार पर बातचीत करनी होगी।
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