राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने बीजिंग में चीनी उपराष्ट्रपति हान झेंग से मुलाकात की। सीमा पर शांति और द्विपक्षीय संबंधों पर चर्चा के बाद अब वांग यी के साथ अहम वार्ता होगी।
बीजिंग/ नई दिल्ली: भारत और चीन के बीच सीमा विवाद को लेकर कूटनीतिक बातचीत एक बार फिर तेज हुई है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) और भारत के विशेष प्रतिनिधि (Special Representative) अजित डोभाल सोमवार, 24 अगस्त को दो दिवसीय यात्रा पर बीजिंग पहुंचे।
मंगलवार, 25 अगस्त को उन्होंने चीन के उपराष्ट्रपति हान झेंग से मुलाकात की और सीमा क्षेत्रों में शांति एवं स्थिरता बनाए रखने तथा दोनों देशों के संबंधों को आगे बढ़ाने के तरीकों पर चर्चा की। इसके बाद डोभाल की चीन के विदेश मंत्री और सीमा वार्ता में उनके समकक्ष वांग यी के साथ 25वें दौर की Special Representatives वार्ता होनी है।
यह बातचीत ऐसे समय हो रही है जब भारत और चीन 2020 के गलवान संघर्ष के बाद पैदा हुए तनाव से धीरे-धीरे बाहर निकलने की कोशिश कर रहे हैं। पूर्वी लद्दाख में सैनिकों के बीच लंबे समय तक चले गतिरोध के बाद दोनों देशों ने कुछ इलाकों में सैन्य तनाव कम करने के कदम उठाए हैं, लेकिन वास्तविक सीमा विवाद का समाधान अभी दूर है। अरुणाचल प्रदेश को लेकर दोनों देशों के दावे, सीमा पर गश्त और सैन्य प्रबंधन तथा भविष्य की सीमा-व्यवस्था जैसे मुद्दे अभी भी संवेदनशील बने हुए हैं।
हान झेंग से अजीत डोभाल की मुलाकात
भारतीय दूतावास के अनुसार, 25 अगस्त को अजित डोभाल ने चीनी उपराष्ट्रपति हान झेंग से मुलाकात की। दोनों ने सीमा क्षेत्रों में शांति और स्थिरता मजबूत करने तथा आर्थिक, राजनीतिक और बहुपक्षीय मंचों पर भारत-चीन संबंधों को आगे बढ़ाने के तरीकों पर चर्चा की। यह बैठक वांग यी के साथ 25वें दौर की सीमा वार्ता से पहले हुई।
इस मुलाकात का महत्व इसलिए भी है क्योंकि भारत लगातार यह रुख रखता आया है कि सीमा पर शांति और स्थिरता व्यापक द्विपक्षीय संबंधों के लिए जरूरी है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी डोभाल-वांग वार्ता से पहले कहा था कि सीमा क्षेत्रों में शांति और स्थिरता चीन के साथ अच्छे संबंधों की बुनियादी शर्त है।
डोभाल और हान की बातचीत केवल सीमा तक सीमित नहीं रही। दोनों पक्षों ने आर्थिक, राजनीतिक और बहुपक्षीय सहयोग को आगे बढ़ाने की संभावनाओं पर भी बात की। इससे संकेत मिलता है कि नई दिल्ली और बीजिंग सीमा विवाद को संभालते हुए बाकी द्विपक्षीय संबंधों को भी धीरे-धीरे सामान्य करने की कोशिश कर रहे हैं।
25वें दौर की बातचीत का महत्व
अजित डोभाल और वांग यी भारत-चीन सीमा विवाद पर Special Representatives हैं। दोनों देशों ने 2003 में यह तंत्र बनाया था ताकि सीमा विवाद का राजनीतिक समाधान खोजने के लिए व्यापक ढांचा तैयार किया जा सके। अब तक यह तंत्र सीमा विवाद को अंतिम रूप से हल नहीं कर पाया है, लेकिन दोनों देशों के बीच संवेदनशील मुद्दों पर उच्चस्तरीय संवाद का महत्वपूर्ण माध्यम बना हुआ है।
25वें दौर की बातचीत में सीमा विवाद के साथ-साथ द्विपक्षीय संबंधों और क्षेत्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर भी चर्चा होने की उम्मीद है। चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियान ने कहा है कि Special Representatives की वार्ता सीमा मुद्दे पर भारत और चीन के बीच बातचीत का मुख्य माध्यम है और दोनों पक्ष साझा हितों से जुड़े मुद्दों पर संवाद का भी इसका इस्तेमाल करते हैं।
चीन के अनुसार, अगस्त 2025 में हुए 24वें दौर में दोनों पक्षों ने सीमा प्रश्न पर गहन बातचीत की थी और कई साझा समझ बनी थीं। इस बार की बातचीत में उन्हीं समझों के आधार पर सीमा क्षेत्रों में शांति और स्थिरता बनाए रखने पर आगे चर्चा की जानी है।
गलवान संघर्ष के बाद रिश्तों में बदलाव?
भारत-चीन संबंधों में सबसे बड़ा झटका मई 2020 में पूर्वी लद्दाख में शुरू हुए सैन्य गतिरोध और जून 2020 के गलवान संघर्ष से लगा। दोनों देशों के सैनिक लंबे समय तक आमने-सामने रहे और सीमा पर भारी संख्या में सैनिक तथा सैन्य संसाधन तैनात किए गए।
इसके बाद कई दौर की सैन्य और कूटनीतिक बातचीत हुई। दोनों पक्षों ने गलवान घाटी, पैंगोंग त्सो, गोगरा और हॉट स्प्रिंग्स सहित कई friction points पर रिहाई की प्रक्रिया पूरी की। 2024 में देपसांग और डेमचोक में भी रिहाई पर सहमति बनी, जिसके बाद वहां आपसी सहमति के आधार पर गश्त फिर शुरू हुई।
हालांकि, रिहाई का अर्थ सीमा विवाद का समाधान नहीं है। इसे तनाव कम करने की दिशा में पहला कदम माना गया था। इसके बाद तनाव कम करना और सीमा क्षेत्रों से सैनिकों की व्यापक डी-इंडक्शन जैसे अगले चरण बाकी रहे हैं।
अरुणाचल प्रदेश क्यों बना बड़ा मुद्दा?
पूर्वी सेक्टर में अरुणाचल प्रदेश भारत-चीन सीमा विवाद के सबसे संवेदनशील हिस्सों में से एक है। चीन पूरे अरुणाचल प्रदेश पर दावा करता है और इसे दक्षिणी तिब्बत के रूप में संदर्भित करता है। भारत चीन के इस दावे को पूरी तरह खारिज करता है और अरुणाचल प्रदेश को भारत का अभिन्न हिस्सा मानता है।
हाल के महीनों में अरुणाचल प्रदेश के कुछ हिस्सों में चीनी गतिविधियों और सैन्य मौजूदगी को लेकर रिपोर्टों ने भी चिंता बढ़ाई है। ऐसे में पूर्वी सेक्टर का मुद्दा सीमा वार्ता में महत्वपूर्ण बना हुआ है।
भारत के लिए चुनौती यह है कि पूर्वी लद्दाख में तनाव कम होने के बावजूद पूरे सीमा विवाद को केवल एक सेक्टर तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। पश्चिमी सेक्टर में लद्दाख, मध्य सेक्टर और पूर्वी सेक्टर में अरुणाचल प्रदेश – तीनों से जुड़े सवाल व्यापक सीमा समाधान का हिस्सा हैं।
क्या भारत ‘ऑल-सेक्टर’ सीमा समझौते से पीछे हट सकता है?
इस दौर की बातचीत से जुड़ा एक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या भारत और चीन सीमा विवाद के अंतिम समाधान तक पहुंचने के लिए पूरे सीमा क्षेत्र को एक साथ देखने की अपनी पुरानी नीति में बदलाव करेंगे।
2005 में दोनों देशों ने सीमा विवाद के समाधान के लिए राजनीतिक मापदंडों और मार्गदर्शक सिद्धांतों (Political Parameters and Guiding Principles) पर समझौता किया था। इसमें कहा गया था कि अंतिम सीमा समाधान सभी सेक्टर को कवर करने वाला होना चाहिए। यानी समाधान को किसी एक क्षेत्र तक सीमित करने के बजाय पूरे सीमा विवाद के संदर्भ में देखा जाना था।
इसी पृष्ठभूमि में चीन की ओर से अपेक्षाकृत कम विवादित क्षेत्रों में पहले समझौता करने यानी ‘early harvest’ जैसे विचार की चर्चा महत्वपूर्ण हो जाती है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार, दोनों पक्ष कम विवादित हिस्सों में सीमा निर्धारण पर विशेषज्ञ स्तर की बातचीत आगे बढ़ाने पर विचार कर रहे हैं। इसमें सिक्किम सेक्टर को अपेक्षाकृत कम विवादित क्षेत्र के रूप में देखा जा रहा है।
हालांकि, इसे भारत की नीति में अंतिम बदलाव के रूप में देखना जल्दबाजी होगी। 25वें दौर की बातचीत में अगर इस तरह के प्रस्ताव पर चर्चा होती भी है, तो यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि नई दिल्ली इसे व्यापक सीमा समाधान के अपने पुराने ढांचे के साथ कैसे जोड़ती है।
24वीं वार्ता के परिणाम क्या थे?
अगस्त 2025 में भारत और चीन के Special Representatives के बीच 24वां दौर हुआ था। चीनी विदेश मंत्रालय के अनुसार, उस बैठक में दोनों पक्षों ने सीमा प्रश्न पर खुलकर और गहराई से विचारों का आदान-प्रदान किया था तथा कुछ साझा समझ बनी थी।
इसके बाद सीमा विवाद को लेकर विशेषज्ञ समूह के स्तर पर बातचीत आगे बढ़ाने की दिशा में भी कदम उठे। इसका उद्देश्य सीमा क्षेत्रों में संभावित समाधान और सीमा निर्धारण से जुड़े मुद्दों को तकनीकी स्तर पर देखना था। यही प्रक्रिया इस बार की बातचीत के लिए भी पृष्ठभूमि तैयार करती है।
इसके अलावा, दोनों देश सीमा पर शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिए पुराने सैन्य और कूटनीतिक संवाद तंत्रों का इस्तेमाल जारी रखना चाहते हैं।
मोदी-शी जिनपिंग मुलाकात से पहले डोभाल की यात्रा
डोभाल की बीजिंग यात्रा का समय भी महत्वपूर्ण है। भारत सितंबर में नई दिल्ली में BRICS शिखर सम्मेलन की मेजबानी करेगा। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के इसमें शामिल होने की संभावना जताई जा रही है, हालांकि उनकी यात्रा की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है।
अगर शी जिनपिंग भारत आते हैं, तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके बीच द्विपक्षीय बैठक की संभावना बन सकती है। ऐसे में डोभाल-वांग वार्ता को उस संभावित उच्चस्तरीय बैठक से पहले संबंधों के संवेदनशील मुद्दों पर जमीन तैयार करने की कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है।
मोदी और शी की पिछली मुलाकात अगस्त 2025 में तियानजिन में शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन के दौरान हुई थी। उससे पहले अक्टूबर 2024 में दोनों नेताओं ने रूस के कज़ान में BRICS शिखर सम्मेलन के दौरान मुलाकात की थी। कज़ान बैठक के बाद दोनों देशों ने सीमा पर तनाव कम करने और संबंधों को स्थिर करने की दिशा में कदम बढ़ाए थे।
व्यापार और व्यापक संबंध भी एजेंडे में शामिल
भारत और चीन के रिश्ते केवल सीमा विवाद तक सीमित नहीं हैं। दोनों एशिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं और व्यापार, निवेश, आपूर्ति श्रृंखला, बहुपक्षीय संस्थानों तथा क्षेत्रीय मुद्दों पर भी एक-दूसरे से जुड़े हैं।
यही वजह है कि दोनों देशों के Special Representatives की बातचीत में सीमा प्रश्न के अलावा द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर विचार-विमर्श भी शामिल है। चीन के विदेश मंत्रालय ने भी स्पष्ट किया है कि 25वें दौर में सीमा के साथ इन व्यापक मुद्दों पर विचारों का आदान-प्रदान होगा।
नई दिल्ली के लिए चुनौती यह है कि सीमा पर स्थिरता और सामान्य संबंधों की दिशा में आगे बढ़ते हुए सुरक्षा हितों से समझौता न हो। वहीं बीजिंग के लिए भारत के साथ स्थिर संबंध क्षेत्रीय कूटनीति और आर्थिक हितों के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं।
अभी तक उपलब्ध संकेतों से इतना स्पष्ट है कि भारत और चीन के रिश्तों में तनाव कम करने की कोशिश जारी है, लेकिन सीमा विवाद का अंतिम समाधान अभी भी लंबी और जटिल बातचीत की मांग करता है।
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