मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर चल रही कानूनी बहस के बीच जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की टिप्पणी सामने आई है। उन्होंने बड़े पैमाने पर मताधिकार से वंचित किए जाने को संवैधानिक व्यवस्था के लिए गंभीर सवाल बताया।
हैदराबाद/ नई दिल्ली: मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision (SIR) को लेकर देश में चल रही राजनीतिक और कानूनी बहस के बीच सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की टिप्पणी ने इस मुद्दे को एक बार फिर केंद्र में ला दिया है।
हैदराबाद में आयोजित एक कार्यक्रम में जस्टिस भुइयां ने कहा कि अगर कोई प्रक्रिया लाखों-करोड़ों भारतीय नागरिकों को उनके मतदान के अधिकार से वंचित करती है और उन्हें अपने ही देश में वोट के अधिकार के बिना नागरिक बना देती है, तो ऐसी प्रक्रिया स्वभाव से ही मनमानी होगी। उन्होंने कहा कि इसे किसी भी तरह के तर्क या ‘व्हाटअबाउटरी’ से सही नहीं ठहराया जा सकता।
जस्टिस भुइयां ने यह टिप्पणी NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ, हैदराबाद में 19वें NALSAR-Justice B.R. Sawhney Memorial Moot Court Competition के समापन समारोह में दी। उन्होंने मतदान के अधिकार को केवल संसद के कानून से मिलने वाला वैधानिक अधिकार मानने के बजाय संविधान के अनुच्छेद 326 से जुड़ा संवैधानिक अधिकार बताया और कहा कि यह लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियादी संरचना से जुड़ा है।
जस्टिस भुइयां ने क्या कहा?
जस्टिस भुइयां ने कहा कि ऐसे नागरिक जिनके पास मतदान का अधिकार हो और दूसरे ऐसे जिनके पास यह अधिकार न हो, भारतीय संविधान इन दो वर्गों की कल्पना नहीं करता। उनके मुताबिक, ऐसी कोई भी प्रक्रिया जिसके कारण बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक अपने वोट के अधिकार से वंचित हो जाएं, संविधान के अनुच्छेद 14 और 326 के खिलाफ होगी।
उन्होंने यह भी कहा कि किसी भारतीय नागरिक को मतदाता सूची में शामिल होने के अधिकार से अलग करना ऐसा होगा जैसे शरीर से आत्मा को अलग कर देना। उनके मुताबिक नागरिकता और वोट देने का अधिकार लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हैं।
जस्टिस भुइयां ने यह सवाल भी उठाया कि अगर कोई व्यक्ति भारतीय नागरिक है लेकिन उसके पास वोट देने का अधिकार नहीं है, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था में उसकी नागरिक स्थिति का क्या अर्थ रह जाता है।
उन्होंने कहा कि किसी प्रक्रिया के जरिए लाखों लोगों को मतदान से वंचित करना ‘संवैधानिक व्यवस्था का निषेध’ होगा और किसी भी प्राधिकरण या अदालत को संविधान से ऊपर नहीं माना जा सकता।
वोट का अधिकार सिर्फ वैधानिक अधिकार नहीं
जस्टिस भुइयां की टिप्पणी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा मतदान के अधिकार की संवैधानिक स्थिति से जुड़ा है।
उन्होंने कहा कि वोट देने या मतदाता सूची में शामिल होने का अधिकार केवल Representation of the People Act, 1951 जैसे संसदीय कानूनों से पैदा होने वाला अधिकार नहीं है। उनके अनुसार, यह संविधान के अनुच्छेद 326 से जुड़ा संवैधानिक अधिकार है और लोकतंत्र की बुनियादी संरचना के ढांचे में इसकी महत्वपूर्ण जगह है।
अनुच्छेद 326 लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं के चुनावों को वयस्क मताधिकार के आधार पर कराए जाने का प्रावधान करता है। भारत में सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियाद है।
जस्टिस भुइयां ने भारत के स्वतंत्रता संघर्ष से भी मतदान के अधिकार को जोड़ा। उन्होंने कहा कि देश में वोट देने का अधिकार लंबे संघर्ष और बलिदान के बाद मिली स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति है। इसलिए अनुच्छेद 326 के साथ किसी भी तरह की ऐसी छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिए जिससे नागरिकों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व ही समाप्त हो जाए।
अनुच्छेद 14 का भी किया जिक्र
जस्टिस भुइयां ने अपने भाषण में संविधान के अनुच्छेद 14 का भी उल्लेख किया। यह अनुच्छेद कानून के समक्ष समानता और समान संरक्षण की गारंटी देता है।
उनके तर्क के अनुसार, अगर मतदाता सूची में ऐसी प्रक्रिया अपनाई जाती है जिसके कारण बड़ी संख्या में पात्र नागरिक वोट देने के अधिकार से बाहर हो जाते हैं, तो यह समानता के संवैधानिक सिद्धांत से जुड़ा सवाल बन जाता है।
उन्होंने यह भी कहा कि अगर कोई कानून नागरिकों के मतदान के अधिकार को अनुचित या अविवेकपूर्ण तरीके से सीमित नहीं कर सकता, तो यही बात प्रशासनिक कार्रवाई पर भी लागू होनी चाहिए। यानी केवल कानून के स्तर पर ही नहीं, बल्कि किसी प्रशासनिक प्रक्रिया के जरिए भी बड़े पैमाने पर नागरिकों को मतदान से बाहर करने के लिए उचित संवैधानिक आधार और प्रक्रिया जरूरी होगी।
आखिर क्या है SIR?
Special Intensive Revision (SIR) मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया है। इसका उद्देश्य मतदाता सूची को अपडेट करना, पात्र मतदाताओं को शामिल करना और मृत, स्थानांतरित, अनुपस्थित या डुप्लीकेट प्रविष्टियों जैसी गलतियों को दूर करना है।
निर्वाचन आयोग ने 2025 में बिहार से इस प्रक्रिया को शुरू किया था। इसके बाद दूसरे राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में भी SIR की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई।
नवंबर 2025 में आयोग ने दूसरे चरण के तहत नौ राज्यों और तीन केंद्रशासित प्रदेशों में SIR शुरू करने का आदेश दिया था। इनमें छत्तीसगढ़, गोवा, गुजरात, केरल, मध्य प्रदेश, राजस्थान, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल के अलावा अंडमान-निकोबार, लक्षद्वीप और पुडुचेरी शामिल थे।
निर्वाचन आयोग का तर्क है कि मतदाता सूची में मृत, स्थानांतरित या डुप्लीकेट नाम बने रहने से चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है। इसलिए समय-समय पर गहन पुनरीक्षण जरूरी है।
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बिहार SIR पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला
SIR को लेकर मौजूदा बहस को समझने के लिए मई 2026 का सुप्रीम कोर्ट का फैसला महत्वपूर्ण है।
27 मई 2026 को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने बिहार में SIR की प्रक्रिया की संवैधानिक वैधता बरकरार रखी थी। अदालत ने माना था कि निर्वाचन आयोग के पास संविधान के अनुच्छेद 324 और संबंधित चुनाव कानूनों के तहत मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण की शक्ति है।
अदालत के मुताबिक, मतदाता सूची चुनाव की पूरी प्रक्रिया की बुनियाद है और उसकी शुद्धता, विश्वसनीयता और सटीकता सुनिश्चित करना स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के संवैधानिक लक्ष्य से जुड़ा है।
इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने SIR को पूरी तरह खारिज नहीं किया, लेकिन प्रक्रिया के दौरान हटाए गए नामों से जुड़े मामलों में उचित कानूनी प्रक्रिया का महत्व भी सामने आया।
पश्चिम बंगाल में SIR को लेकर क्यों बढ़ा विवाद?
SIR को लेकर पश्चिम बंगाल में विवाद खास तौर पर बड़ा रहा है। निर्वाचन आयोग के अनुसार, वहां पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में नाम हटाए गए और इसके बाद बड़ी संख्या में लोगों ने अपील दायर की।
हाल की जानकारी के मुताबिक, पश्चिम बंगाल में SIR के दौरान हटाए गए 27.16 लाख मतदाताओं में से 22 लाख से ज्यादा ने दोबारा नाम शामिल कराने के लिए अपील की। कुल मिलाकर 38.31 लाख अपीलें दाखिल हुई थीं, जिनमें नाम जोड़ने और हटाने दोनों से जुड़ी अपील शामिल हैं।
यही आंकड़ा इस बहस का अहम हिस्सा बन गया है कि मतदाता सूची को साफ करने और पात्र मतदाताओं को गलती से बाहर होने से बचाने के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
पश्चिम बंगाल में SIR से जुड़े मामलों के लिए अपीलीय ट्रिब्यूनल बनाए गए हैं। निर्वाचन आयोग ने मामलों के तेजी से निपटारे के लिए ट्रिब्यूनल की संख्या बढ़ाने की जरूरत भी बताई है।
निर्वाचन आयोग का क्या तर्क है?
इस पूरे विषय पर निर्वाचन आयोग का कहना है कि SIR का उद्देश्य पात्र मतदाताओं को हटाना नहीं, बल्कि मतदाता सूची को अधिक सटीक और विश्वसनीय बनाना है।
बिहार में SIR के अंतिम आंकड़ों के मुताबिक, 24 जून 2025 को करीब 7.89 करोड़ मतदाता थे। ड्राफ्ट सूची से 65 लाख नाम बाहर रहे, लेकिन दावों और आपत्तियों की प्रक्रिया के बाद करीब 21.53 लाख पात्र मतदाताओं को जोड़ा गया और अंतिम सूची में लगभग 7.42 करोड़ मतदाता रहे। आयोग ने करीब 3.66 लाख अपात्र मतदाताओं को अंतिम सूची से हटाए जाने की जानकारी दी थी।
आयोग का कहना है कि ऐसे पुनरीक्षण से मृत, स्थानांतरित, अनुपस्थित और डुप्लीकेट नामों की पहचान की जा सकती है और मतदाता सूची को अधिक विश्वसनीय बनाया जा सकता है।
राजनीतिक विवाद भी तेज
जस्टिस भुइयां की टिप्पणी के बाद राजनीतिक प्रतिक्रिया भी सामने आई है। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने उनके बयान का हवाला देते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर निशाना साधा और आरोप लगाया कि SIR के संचालन को लेकर संवैधानिक सवाल खड़े होते हैं। उन्होंने कहा कि जस्टिस भुइयां की टिप्पणी CEC की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाती है।
विपक्षी दल पहले से ही SIR के जरिए बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम हटाए जाने का आरोप लगाते रहे हैं। दूसरी ओर निर्वाचन आयोग और सत्तारूढ़ पक्ष इन आरोपों को खारिज करते हुए कहते हैं कि प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूची को साफ और विश्वसनीय बनाना है।
CEC की भूमिका पर भी उठ रहे सवाल
SIR को लेकर अब केवल मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने का सवाल नहीं रह गया है। निर्वाचन आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली और मुख्य चुनाव आयुक्त की भूमिका भी बहस का हिस्सा बन गई है।
हाल में सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की कार्यप्रणाली और SIR को चुनौती देने वाली एक याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति दी है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि कुछ फैसले आयोग के अन्य सदस्यों की सहमति के बिना लिए गए। निर्वाचन आयोग ने दूसरी ओर कहा है कि SIR से जुड़े आदेश आयोग की स्वीकृति से जारी हुए और उसके फैसलों को कानूनी आधार प्राप्त है।
फिलहाल इतना स्पष्ट है कि SIR को लेकर विवाद केवल मतदाता सूची के आंकड़ों तक सीमित नहीं है। यह चुनाव आयोग की शक्तियों, प्रशासनिक प्रक्रिया, नागरिकों के मताधिकार, संविधान के अनुच्छेद 14 और 326 तथा लोकतांत्रिक व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़ा व्यापक मुद्दा बन चुका है। जस्टिस भुइयां की टिप्पणी ने इसी संवैधानिक पहलू को सबसे तीखे तरीके से सामने रखा है।
