मामले की सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और वरिष्ठ अधिवक्ता एस. मुरलीधर के बीच ‘नक्सली’ टिप्पणी को लेकर तीखी बहस छिड़ गई। मुरलीधर ने टिप्पणी पर आपत्ति जताई, जबकि मेहता ने इसे वापस लेने से इनकार किया।
नई दिल्ली: वंदे मातरम् के सभी छह अंतरों के गायन और इसे लेकर 2026 में किए गए कानूनी बदलाव को चुनौती देने वाली याचिका पर मंगलवार, 22 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और वरिष्ठ अधिवक्ता एस. मुरलीधर के बीच तीखी बहस हो गई।
विवाद उस समय बढ़ा जब मेहता ने कानून बनाने की प्रक्रिया पर मुरलीधर की दलीलों का जवाब देते हुए ‘नक्सली’ शब्द का इस्तेमाल किया। मुरलीधर ने इस टिप्पणी पर कड़ी आपत्ति जताई और इसे वापस लेने की मांग की। मेहता ने टिप्पणी वापस लेने से इनकार किया। इसके बाद पीठ ने मामले को राजनीतिक या भावनात्मक बहस के बजाय संवैधानिक और कानूनी सवाल तक सीमित रखने की बात कही।
मामला कर्नाटक संगीत के गायक टी.एम. कृष्णा की याचिका से जुड़ा है। कृष्णा ने केंद्र सरकार के उस निर्देश को चुनौती दी है, जिसमें सार्वजनिक और आधिकारिक कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के आधिकारिक छह-अंतरे वाले संस्करण के गायन से संबंधित प्रोटोकॉल तय किए गए हैं।
सुप्रीम कोर्ट में उठा विवाद
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे। कृष्णा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. एस. मुरलीधर ने दलील दी कि कानून में ‘राष्ट्रीय गीत’ शब्द का इस्तेमाल किया गया है, लेकिन मूल कानून में इस शब्द की स्पष्ट परिभाषा नहीं थी।
उनका तर्क था कि जब किसी कानून के उल्लंघन पर आपराधिक सजा का प्रावधान हो, तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि किस आचरण को अपराध माना जाएगा।
मुरलीधर ने यह भी कहा कि कानून में बदलाव जल्दबाजी में किया गया और कानून बनाने की प्रक्रिया तथा उसके संवैधानिक प्रभाव पर व्यापक रूप से विचार किया जाना चाहिए था। उन्होंने दलील दी कि संवैधानिक निर्णय प्रक्रिया को केवल ऐतिहासिक संदर्भ के आधार पर तय नहीं किया जा सकता।
सुनवाई के दौरान पीठ की ओर से यह टिप्पणी भी आई कि भारतीय इतिहास से परिचित व्यक्ति राष्ट्रीय गीत के रूप में वंदे मातरम् की स्थिति को समझता है। न्यायमूर्ति बागची ने हालांकि यह संकेत दिया कि अदालत इस बात की जांच कर सकती है कि नए कानून के तहत आपराधिक परिणाम किस तरह लागू होंगे।
‘नक्सली’ टिप्पणी पर कैसे बढ़ा विवाद?
कानून बनाने की प्रक्रिया पर मुरलीधर की दलीलों के जवाब में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि कानून बनाने की प्रक्रिया संविधान के अनुरूप होनी चाहिए और यह प्रक्रिया ‘नक्सलियों के विचार’ के अनुसार नहीं हो सकती। इसी टिप्पणी पर मुरलीधर ने तत्काल आपत्ति जताई।
मुरलीधर ने कहा कि वह नहीं चाहते कि इस तरह का शब्द सुप्रीम कोर्ट की लाइव कार्यवाही के दौरान रिकॉर्ड हो। उन्होंने मेहता से टिप्पणी वापस लेने की मांग की और कहा कि एक कानून अधिकारी से इस तरह की भाषा की अपेक्षा नहीं की जाती।
मेहता ने टिप्पणी वापस लेने से इनकार करते हुए स्पष्ट किया कि उनका संदर्भ कानून बनाने और संविधान की व्याख्या के तरीके से था। उन्होंने दोबारा कहा कि उनका आशय संवैधानिक प्रक्रिया के विपरीत किसी विचारधारा के आधार पर कानून बनाने से था।
पीठ ने हस्तक्षेप करते हुए बहस को कानूनी सवाल तक सीमित रखने की कोशिश की। न्यायमूर्ति बागची ने भी इस आदान-प्रदान के दौरान अनावश्यक तनाव और भावनात्मक स्थिति से बचने का संकेत दिया। इसके बाद सुनवाई दोबारा मुख्य संवैधानिक सवालों पर केंद्रित हुई।
टी.एम. कृष्णा ने क्यों दायर की याचिका?
टी.एम. कृष्णा की याचिका में केंद्र के 2026 के निर्देशों और राष्ट्रीय सम्मान से जुड़े कानून में किए गए संशोधन को चुनौती दी गई है। याचिका का एक प्रमुख मुद्दा वंदे मातरम् के छह अंतरों के गायन से जुड़ा है।
कृष्णा की ओर से दलील दी गई है कि वंदे मातरम् के बाद के अंतरों में देवी-देवताओं से जुड़े धार्मिक संदर्भ हैं। याचिका में कहा गया है कि सभी छह अंतरों के गायन को आधिकारिक कार्यक्रमों के संदर्भ में अनिवार्य रूप से लागू करने से व्यक्ति की अंतरात्मा, धार्मिक स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्षता से जुड़े संवैधानिक सवाल पैदा हो सकते हैं।
याचिका में यह भी चुनौती दी गई है कि वंदे मातरम् को लेकर नए कानूनी प्रावधानों के तहत किसी व्यक्ति के व्यवहार को आपराधिक अपराध के रूप में कब देखा जाएगा।
वंदे मातरम् से जुड़े हालिया बदलाव
इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि में 2026 में हुए दो महत्वपूर्ण बदलाव हैं। पहला, गृह मंत्रालय ने वंदे मातरम् के आधिकारिक संस्करण और इसे गाने या बजाने के अवसरों को लेकर नए निर्देश जारी किए। दूसरा, संसद ने Prevention of Insults to National Honour Act, 1971 में संशोधन किया।
गृह मंत्रालय के आधिकारिक दस्तावेज में वंदे मातरम् को भारत का ‘राष्ट्रीय गीत’ बताया गया है और इसके आधिकारिक छह अंतरों का पाठ दिया गया है। मंत्रालय ने अलग-अलग सरकारी और सार्वजनिक अवसरों पर इसके गायन या वादन तथा ऐसे अवसरों पर उचित सम्मान और मर्यादा बनाए रखने से जुड़े निर्देश भी जारी किए हैं।
नए कानून में क्या प्रावधान है?
1971 के मूल कानून में राष्ट्रीय ध्वज, संविधान और राष्ट्रीय गान के अपमान से जुड़े प्रावधान मौजूद थे। इसके तहत राष्ट्रीय गान के गायन को जानबूझकर रोकने या उसके गायन में जुटी सभा में बाधा डालने पर तीन साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों की सजा का प्रावधान था।
2026 के संशोधन के बाद इसी कानूनी सुरक्षा के दायरे में राष्ट्रीय गीत का संदर्भ भी जोड़ा गया है। इसका अर्थ यह है कि वंदे मातरम् के गायन को जानबूझकर रोकना या उसके गायन में लगी सभा को बाधित करना भी दंडनीय प्रावधान के दायरे में आ सकता है।
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पहले भी सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था मामला
वंदे मातरम् को लेकर यह सुप्रीम कोर्ट में पहली याचिका नहीं है। मार्च 2026 में भी अदालत ने गृह मंत्रालय के वंदे मातरम् से संबंधित निर्देशों को चुनौती देने वाली याचिका पर विचार किया था। उस समय अदालत ने कहा था कि मंत्रालय का निर्देश सलाहकारी प्रकृति का है और उसमें वंदे मातरम् नहीं गाने पर कोई दंड निर्धारित नहीं किया गया है। इसी आधार पर उस याचिका को समय से पहले दायर माना गया था।
उस सुनवाई में भी ‘देशभक्ति को मजबूर नहीं किया जा सकता जैसे तर्क सामने आए थे। वहीं अदालत ने यह सवाल उठाया था कि यदि निर्देश में कोई दंड नहीं है तो तत्काल न्यायिक हस्तक्षेप का आधार क्या है।
मौजूदा मामले में स्थिति अलग है, क्योंकि अब चुनौती केवल प्रशासनिक निर्देश तक सीमित नहीं है। 2026 में कानून में किए गए संशोधन के बाद वंदे मातरम् को लेकर कुछ कृत्यों के लिए आपराधिक दंड का प्रावधान भी लागू हुआ है। यही वजह है कि इस बार याचिका में मौलिक अधिकारों और आपराधिक कानून के बीच संबंध पर सवाल उठाया गया है।
‘बिजो एमैनुअल’ मामले का भी आया जिक्र
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले ‘बिजो इमैनुएल बनाम केरल राज्य’ का संदर्भ भी सामने आया। यह मामला उन छात्रों से जुड़ा था जिन्होंने अपनी धार्मिक मान्यताओं के कारण राष्ट्रगान नहीं गाया था, लेकिन उसके दौरान सम्मानपूर्वक खड़े रहे थे।
मौजूदा सुनवाई में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने इस फैसले के संवैधानिक सिद्धांतों का उल्लेख किया। अदालत के सामने यह सवाल रखा गया कि यदि कोई व्यक्ति अंतरात्मा के आधार पर वंदे मातरम् के एक या सभी अंतरों को गाने से इनकार करता है, तो क्या केवल इस आधार पर उसके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की जा सकती है।
रिपोर्टों के मुताबिक, न्यायमूर्ति बागची ने संकेत दिया कि अंतरात्मा के आधार पर किसी व्यक्ति द्वारा वंदे मातरम् न गाने को स्वतः आपराधिक अभियोजन का आधार नहीं माना जाना चाहिए। हालांकि, मामले के अंतिम कानूनी निष्कर्ष का फैसला अभी होना बाकी है।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब
सुनवाई के अंत में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को याचिका पर जवाब दाखिल करने के लिए कहा। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को याचिका की पेपर बुक लेने और दो सप्ताह के भीतर केंद्र का जवाब दाखिल करने को कहा गया है। मामले को 12 अक्टूबर 2026 को आगे सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया है।
इसका मतलब है कि मंगलवार की सुनवाई में अदालत ने वंदे मातरम् से जुड़े नए कानून को अंतिम रूप से वैध या अवैध घोषित नहीं किया। फिलहाल अदालत ने केंद्र का पक्ष मांगा है और आगे की सुनवाई में संवैधानिक तथा कानूनी सवालों पर विस्तार से विचार किया जाएगा।
विवाद का केंद्र अब सिर्फ वंदे मातरम् नहीं
पूरे मामले में तीन अलग-अलग सवाल एक साथ जुड़े हुए हैं। पहला, वंदे मातरम् के आधिकारिक छह-अंतरे वाले संस्करण का इस्तेमाल और उसके लिए तय प्रोटोकॉल।
दूसरा, राष्ट्रीय गीत को कानूनी संरक्षण देने वाला 2026 का संशोधन।
और तीसरा, किसी व्यक्ति की अंतरात्मा तथा धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार और राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान से जुड़े वैधानिक दायित्वों के बीच सीमा।
सुप्रीम कोर्ट को अब यह तय करना है कि इन प्रावधानों को संविधान के मौलिक अधिकारों के साथ किस तरह पढ़ा जाए। अदालत की अगली सुनवाई में केंद्र के जवाब के बाद इन सवालों पर आगे बहस होने की संभावना है।



