EPFO 3.0 भारत के करोड़ों कामगारों के लिए नई पेंशन व्यवस्था ला सकता है। जानिए प्राइवेट नौकरी, गिग वर्कर्स और निर्माण श्रमिकों को कैसे मिलेगी रिटायरमेंट और परिवार की सुरक्षा।
नई दिल्ली: अगर आप प्राइवेट नौकरी करते हैं, किसी कंपनी में काम करते हैं, डिलीवरी पार्टनर हैं, कैब चलाते हैं, फ्रीलांस काम करते हैं या असंगठित क्षेत्र में रोजगार से जुड़े हैं, तो आने वाले समय में आपकी रिटायरमेंट प्लानिंग का तरीका बदल सकता है।
केंद्र सरकार और Employees Provident Fund Organisation यानी EPFO एक ऐसे नए पेंशन मॉडल पर काम कर रहे हैं, जिसका उद्देश्य मौजूदा संगठित क्षेत्र से आगे बढ़कर देश के बड़े कार्यबल को सामाजिक सुरक्षा और रिटायरमेंट सेवाओं के दायरे में लाना है।
इस प्रस्तावित सुधार व्यवस्था को EPFO 3.0 के नाम से जोड़ा जा रहा है। इसके तहत भविष्य में एक ऐसी योगदान आधारित पेंशन व्यवस्था तैयार करने की योजना है, जिसमें कर्मचारी के अलावा नियोक्ता, सरकार, गिग वर्कर्स के मामले में एग्रीगेटर और कुछ परिस्थितियों में CSR या अन्य तीसरे पक्ष से भी योगदान आ सकता है।
प्रस्ताव अभी अंतिम रूप से लागू नहीं हुआ है और सरकार की ओर से इसका पूरा अंतिम ढांचा या लागू करने की समयसीमा घोषित नहीं की गई है। लेकिन अगर प्रस्तावित मॉडल लागू होता है, तो इसका असर भारत के करोड़ों कर्मचारियों और कामगारों की रिटायरमेंट सिक्योरिटी पर पड़ सकता है।
सबसे बड़ा बदलाव यह होगा कि पेंशन को केवल पारंपरिक नौकरी और नियमित वेतन से जोड़ने के बजाय काम करने के अलग-अलग तरीकों से जुड़े लोगों तक पहुंचाने की कोशिश की जाएगी।
क्या है EPFO 3.0?
भारत में बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जो किसी नियमित संगठित क्षेत्र के अंतर्गत नहीं आते। इनमें छोटे कारोबारों में काम करने वाले कर्मचारी, निर्माण क्षेत्र के श्रमिक, डिलीवरी पार्टनर, कैब ड्राइवर, फ्रीलांसर और विभिन्न डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़े गिग वर्कर्स शामिल हैं।
इनमें से बड़ी आबादी के पास नौकरी खत्म होने या रिटायरमेंट के बाद नियमित आय का कोई मजबूत और व्यवस्थित स्रोत नहीं होता।
EPFO की प्रस्तावित नई व्यवस्था का लक्ष्य संगठित और असंगठित दोनों क्षेत्रों के कामगारों के लिए योगदान आधारित पेंशन मॉडल विकसित करना है। रिपोर्ट में बताया गया है कि यह योजना मौजूदा EPFO सदस्यों के साथ-साथ उन लोगों को भी कवर करने की दिशा में तैयार की जा रही है, जो वर्तमान Employees Pension Scheme यानी EPS के दायरे से बाहर हैं।
भारत में लगभग 60 करोड़ से अधिक लोगों के कार्यबल से जुड़े होने का उल्लेख EPFO 3.0 की चर्चा में किया गया है, जिनमें तीन-चौथाई से अधिक लोग असंगठित क्षेत्र से जुड़े बताए गए हैं।
क्या प्राइवेट नौकरी करने वालों को मिलेगा फायदा?
प्राइवेट सेक्टर के कर्मचारियों के लिए EPFO पहले से ही भविष्य निधि और पेंशन से जुड़ी व्यवस्था संचालित करता है। इसलिए EPFO 3.0 का सबसे बड़ा बदलाव मौजूदा PF खाताधारकों को अचानक नई पेंशन देने के बजाय उन लोगों तक कवरेज बढ़ाना होगा, जो मौजूदा पेंशन व्यवस्था से बाहर हैं।
प्रस्तावित नई व्यवस्था में ऐसे कर्मचारियों और कामगारों को भी योगदान आधारित रिटायरमेंट सेवाओं से जोड़ने का विचार है, जो मौजूदा EPS के दायरे में नहीं आते।
इसका मतलब यह भी हो सकता है कि भविष्य में अधिक आय वाले कर्मचारी या ऐसे लोग जिनकी नौकरी की प्रकृति पारंपरिक EPFO ढांचे से अलग है, वे अपनी रिटायरमेंट सेविंग्स को एक संरचित पेंशन खाते में जमा कर सकें।
गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स को मिल सकती है व्यवस्थित पेंशन
EPFO 3.0 की सबसे बड़ी खासियत गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स को सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाने की कोशिश हो सकती है।
आज लाखों लोग ऐप आधारित प्लेटफॉर्म से जुड़े काम करते हैं। इनमें फूड डिलीवरी पार्टनर, कैब ड्राइवर, ई-कॉमर्स डिलीवरी एजेंट और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म वर्कर्स शामिल हैं।
इन लोगों की नौकरी पारंपरिक अर्थों में एक ही नियोक्ता से जुड़ी नहीं होती। एक व्यक्ति एक साथ कई प्लेटफॉर्म के लिए काम कर सकता है और उसकी आय भी अलग-अलग स्रोतों से आ सकती है। इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए प्रस्तावित EPFO 3.0 मॉडल में ‘वन-टू-मेनी मैपिंग’ की व्यवस्था पर विचार किया जा रहा है।
इसके तहत एक कर्मचारी या गिग वर्कर का एक ही Universal Account Number यानी UAN कई नियोक्ताओं या एग्रीगेटर्स से जुड़ सकेगा।
गिग वर्कर्स के योगदान में एग्रीगेटर की भूमिका
संभावित पेंशन मॉडल के अनुसार इनमें खुद कामगार का योगदान, नियोक्ता का योगदान, कम आय वाले श्रमिकों के लिए सरकारी सह-योगदान और गिग वर्कर्स के मामले में एग्रीगेटर का योगदान शामिल हो सकता है।
इसके अलावा, प्रस्तावित ढांचे में CSR फंड, NGOs, व्यक्तिगत दानदाताओं या अन्य तीसरे पक्ष के योगदान को भी ट्रैक करने की संभावना बताई गई है।
Code on Social Security, 2020 ने पहली बार गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स को सामाजिक सुरक्षा के कानूनी ढांचे में पहचान दी थी। प्रस्तावित EPFO 3.0 मॉडल इसी व्यापक सामाजिक सुरक्षा ढांचे को व्यावहारिक रूप देने की दिशा में एक कदम हो सकता है।
रिपोर्टों के अनुसार, कोड में एग्रीगेटर्स के योगदान का प्रावधान है, जो उनके वार्षिक टर्नओवर के 1-2 प्रतिशत के दायरे में हो सकता है, हालांकि कुल योगदान की सीमा भी निर्धारित है।
60 साल की उम्र में कैसे मिलेगी पेंशन?
प्रस्तावित योजना को Defined Contribution यानी योगदान आधारित मॉडल के रूप में तैयार किए जाने की बात सामने आई है। इसमें कर्मचारी के खाते में समय के साथ योगदान जमा होगा और उसे लंबी अवधि के निवेश के जरिए बढ़ाने का प्रयास किया जाएगा।
रिपोर्ट के अनुसार, प्रस्तावित मॉडल में Target Retirement Sum यानी TRS की अवधारणा पर विचार किया जा रहा है। इसके तहत किसी व्यक्ति की रिटायरमेंट जरूरत और अपेक्षित रिटायरमेंट उम्र के आधार पर एक लक्ष्य राशि तय की जा सकती है।
व्यक्ति के योगदान और निवेश से समय के साथ यह राशि तैयार होगी। प्रस्ताव के मुताबिक, रिटायरमेंट के समय इस राशि को पेंशन के लिए इस्तेमाल किया जा सकेगा।
परिवार को भी मिल सकता है पेंशन सुरक्षा का फायदा
प्रस्तावित EPFO 3.0 मॉडल में केवल कर्मचारी की रिटायरमेंट आय ही नहीं, बल्कि परिवार की सामाजिक सुरक्षा पर भी ध्यान देने की बात सामने आई है।
रिपोर्टों के अनुसार, प्रस्तावित व्यवस्था में Family and Survivor Pension का प्रावधान हो सकता है। इसके तहत कर्मचारी की मृत्यु की स्थिति में उसके पति या पत्नी, बच्चों और अनाथ आश्रितों को पेंशन लाभ देने की व्यवस्था तैयार की जा सकती है।
इसके लिए एक अलग Family Benefit Fund बनाने का प्रस्ताव सामने आया है, जिसे Actuarial Principles के आधार पर संचालित करने की बात कही गई है।
अगर यह व्यवस्था लागू होती है, तो परिवार के कमाने वाले सदस्य की मृत्यु के बाद आर्थिक सुरक्षा को मजबूत करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, इसके लिए पात्रता, योगदान और भुगतान के अंतिम नियम अभी तय होने बाकी हैं।
निर्माण क्षेत्र के श्रमिकों को भी जोड़ने की तैयारी
भारत में लाखों निर्माण श्रमिक ऐसे हैं जिनका रोजगार स्थायी नहीं होता। वे एक प्रोजेक्ट से दूसरे प्रोजेक्ट में जाते हैं और अलग-अलग ठेकेदारों के साथ काम कर सकते हैं।
रिपोर्टों के मुताबिक, EPFO अगले पांच वर्षों में करीब 2.5 करोड़ गिग वर्कर्स और Building and Other Construction Workers (BOCW) को प्रस्तावित सामाजिक सुरक्षा ढांचे में शामिल करने की संभावनाओं को ध्यान में रख रहा है।
निर्माण श्रमिकों के लिए अलग-अलग राज्य कल्याण बोर्डों के माध्यम से सेस भी एकत्र किया जाता है। प्रस्तावित व्यवस्था में इन संसाधनों को टिकाऊ पेंशन सुरक्षा से जोड़ने की संभावना पर विचार किया जा रहा है।
अगर ऐसा होता है, तो अस्थायी रोजगार वाले श्रमिकों को रिटायरमेंट के बाद आय की अधिक स्थिर सुरक्षा मिल सकती है।
2026 में EPF के नियमों में क्या बदलाव हुआ?
EPFO 3.0 की प्रस्तावित योजना से अलग, सरकार ने EPF Scheme, 2026 को अधिसूचित किया है, जिसने 1952 की पुरानी EPF Scheme को बदला है।
नए ढांचे में EPF योगदान की मूल दर में बदलाव नहीं किया गया है। कर्मचारी और नियोक्ता का सामान्य योगदान अभी भी 12 प्रतिशत के ढांचे में है और कुछ अधिसूचित प्रतिष्ठानों के लिए 10 प्रतिशत की दर जारी है।
नई व्यवस्था में आंशिक निकासी के नियमों को भी सरल बनाया गया है और पहले की कई श्रेणियों को तीन व्यापक श्रेणियों Essential needs, Housing needs और Special circumstances में रखा गया है।
इसके अलावा 15,000 रुपये प्रति माह की वैधानिक वेतन सीमा के संदर्भ में अनिवार्य योगदान और उससे ऊपर के स्वैच्छिक योगदान को लेकर भी स्पष्टता दी गई है।
इसलिए EPF Scheme 2026 और EPFO 3.0 को एक ही चीज नहीं समझना चाहिए। पहला नया अधिसूचित ढांचा है, जबकि दूसरा व्यापक भविष्य के सुधारों का प्रस्तावित चरण है।
क्या EPFO 3.0 से बदलेगी सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था?
अगर EPFO 3.0 अपने प्रस्तावित स्वरूप में लागू होता है, तो यह भारत के सामाजिक सुरक्षा ढांचे में बड़ा बदलाव ला सकता है।
इसका कारण सिर्फ यह नहीं है कि करोड़ों लोगों को पेंशन मिल सकती है। असली बदलाव यह होगा कि सामाजिक सुरक्षा को नौकरी की स्थिरता से अलग करके व्यक्ति के पूरे कार्यजीवन से जोड़ने की कोशिश की जाएगी।
एक व्यक्ति कंपनी बदले, फ्रीलांस काम करे, गिग प्लेटफॉर्म से जुड़े या अलग-अलग नियोक्ताओं के साथ काम करे, उसकी सामाजिक सुरक्षा एक पोर्टेबल UAN के साथ चल सकती है।
यह मॉडल भारत जैसे देश के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है, जहां रोजगार का स्वरूप तेजी से बदल रहा है और बड़ी आबादी पारंपरिक स्थायी नौकरियों के बाहर काम करती है।
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