
नई दिल्ली, न्यूज ऑफ द डे
लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अहम टिप्पणी करते हुए साफ किया है कि किसी व्यक्ति का शादीशुदा होना उसके मौलिक अधिकारों में बाधा नहीं बन सकता। अदालत ने कहा कि अगर दो लोग बालिग हैं, तो उन्हें अपनी मर्जी से साथ रहने और सुरक्षा पाने का पूरा अधिकार है। यह मामला एक ऐसे कपल से जुड़ा था, जो लिव-इन में रह रहा है, जबकि महिला पहले से शादीशुदा है। दोनों ने परिवार और महिला के पति की ओर से मिल रही धमकियों के चलते कोर्ट से सुरक्षा की मांग की थी। इस पर सुनवाई करते हुए जस्टिस सौरभ बनर्जी की बेंच ने उन्हें राहत दी।
क्या है पूरा मामला
याचिका में बताया गया कि महिला पिछले कई सालों से अपने पति के साथ रह रही थी, लेकिन 2016 से उसे मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना झेलनी पड़ रही थी। हालात से परेशान होकर उसने अलग रास्ता चुनने का फैसला किया और फरवरी 2026 से एक अन्य व्यक्ति के साथ हैदराबाद में रहने लगी। इसके बाद दोनों को महिला के परिवार और पति की तरफ से लगातार धमकियां मिलने लगीं। आरोप है कि स्थानीय स्तर पर पुलिस की दखल से भी उनकी परेशानी बढ़ी। ऐसे में वे दिल्ली पहुंचे और अदालत का दरवाजा खटखटाया।
अदालत की साफ टिप्पणी
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविधान के तहत हर बालिग व्यक्ति को अपनी जिंदगी के फैसले लेने की आजादी है। चाहे कोई शादीशुदा हो, अविवाहित हो या लिव-इन में रह रहा हो—इन आधारों पर उसके अधिकारों को सीमित नहीं किया जा सकता। बेंच ने कहा कि अनुच्छेद 19 और 21 के तहत नागरिकों को जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार मिला हुआ है, जिसमें अपनी पसंद से जीवनसाथी चुनना भी शामिल है।
सुरक्षा देने का निर्देश
मामले में कोर्ट ने कपल को राहत देते हुए संबंधित अधिकारियों को उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। अदालत ने माना कि दोनों याचिकाकर्ता बालिग हैं और उन्हें अपनी शर्तों पर जीवन जीने का पूरा अधिकार है, इसलिए उनकी सुरक्षा जरूरी है। इस फैसले के बाद एक बार फिर व्यक्तिगत स्वतंत्रता और पारिवारिक-सामाजिक दबाव के बीच संतुलन को लेकर नई बहस छिड़ गई है।
