CJI सूर्यकांत बनने वाले थे मुख्य अतिथि, लेकिन Justice H.R. Khanna Memorial Lecture स्थगित हो गया। जानिए कार्यक्रम और इसके संवैधानिक महत्व के बारे में।
नई दिल्ली: भारतीय न्यायपालिका और संवैधानिक विमर्श से जुड़ा एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम मंगलवार (28 जुलाई) को आयोजित होना था, लेकिन ऐन वक्त पर उसे स्थगित कर दिया गया। यह कार्यक्रम था जस्टिस एच.आर. खन्ना मेमोरियल लेक्चर, जिसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) न्यायमूर्ति सूर्यकांत मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होने वाले थे।
साथ ही इस व्याख्यान में वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद पी. दातार मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित करने वाले थे, जबकि पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति संजीव खन्ना इसकी अध्यक्षता करने वाले थे। कार्यक्रम का विषय दसवीं अनुसूची से संबंधित था।
यह केवल एक औपचारिक स्मृति-व्याख्यान नहीं था, बल्कि भारतीय लोकतंत्र, संविधान और न्यायपालिका के कई महत्वपूर्ण प्रश्नों पर गंभीर चर्चा का मंच बनने वाला था।
खास बात यह थी कि इस अवसर पर देश के महानतम न्यायाधीशों में गिने जाने वाले जस्टिस हंसराज खन्ना (H.R. Khanna) की न्यायिक विरासत, विशेषकर ADM Jabalpur बनाम Shivkant Shukla (1976) मामले में उनके ऐतिहासिक असहमति वाले फैसले पर भी चर्चा प्रस्तावित थी। हालांकि, कार्यक्रम के आयोजकों ने बिना नई तारीख घोषित किए इसे फिलहाल स्थगित कर दिया।
क्या था इस व्याख्यान का विषय?
इस वर्ष के स्मारक व्याख्यान का विषय “दलबदल से विलय तक: दसवीं अनुसूची को रद्द करने की जरूरत” था।
भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची (Tenth Schedule) को 1985 में 52वें संविधान संशोधन के माध्यम से जोड़ा गया था। इसका उद्देश्य निर्वाचित प्रतिनिधियों के दलबदल पर रोक लगाना था। बाद में 2003 में 91वें संविधान संशोधन के जरिए इसमें और बदलाव किए गए।
पिछले कुछ वर्षों में महाराष्ट्र, कर्नाटक, मध्य प्रदेश और अन्य राज्यों में राजनीतिक दलों के विभाजन, विलय और विधायकों के दल बदल से जुड़े विवादों के बाद दसवीं अनुसूची पर नई बहस शुरू हुई है।
कई संवैधानिक विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा कानून लोकतांत्रिक जवाबदेही और विधायकों की स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाने में पूरी तरह सफल नहीं रहा है। इसी संवेदनशील विषय पर वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद पी. दातार अपना व्याख्यान देने वाले थे।
कौन हैं अरविंद पी. दातार?
अरविंद पी. दातार देश के सबसे प्रतिष्ठित वरिष्ठ अधिवक्ताओं में गिने जाते हैं। वे संवैधानिक कानून, कराधान (Taxation) और वाणिज्यिक मामलों के विशेषज्ञ माने जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट में उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण संवैधानिक मामलों में पक्ष रखा है और उनकी कानूनी व्याख्याओं को न्यायिक जगत में विशेष महत्व दिया जाता है।
यही कारण है कि दसवीं अनुसूची जैसे जटिल विषय पर उनका व्याख्यान विधि छात्रों, वकीलों, न्यायाधीशों और संवैधानिक विशेषज्ञों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा था।
पूर्व CJI संजीव खन्ना करने वाले थे अध्यक्षता
इस कार्यक्रम की अध्यक्षता भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति संजीव खन्ना करने वाले थे। न्यायपालिका में उनके कार्यकाल को कई महत्वपूर्ण संवैधानिक मामलों के लिए याद किया जाता है।
जस्टिस एच.आर. खन्ना की न्यायिक विरासत से उनका पारिवारिक संबंध भी विशेष महत्व रखता है, क्योंकि वे उसी परिवार से आते हैं जिसने भारतीय न्यायपालिका को जस्टिस एच.आर. खन्ना जैसा ऐतिहासिक व्यक्तित्व दिया।
इसी वजह से इस कार्यक्रम का प्रतीकात्मक महत्व और भी बढ़ गया था। इसमें एक ओर वर्तमान CJI सूर्यकांत की उपस्थिति प्रस्तावित थी, दूसरी ओर पूर्व CJI संजीव खन्ना इसकी अध्यक्षता करने वाले थे, जबकि देश के अग्रणी संवैधानिक वकीलों में शामिल अरविंद पी. दातार मुख्य व्याख्यान देने वाले थे। यह संयोजन भारतीय न्यायिक विमर्श के लिए विशेष माना जा रहा था।
कौन थे जस्टिस एच.आर. खन्ना?
भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में कुछ ऐसे न्यायाधीश हुए हैं, जिनकी पहचान केवल उनके फैसलों से नहीं, बल्कि संवैधानिक मूल्यों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता से बनी। न्यायमूर्ति हंसराज खन्ना (Justice Hans Raj Khanna) ऐसा ही एक नाम हैं।
उन्हें भारतीय न्यायिक इतिहास में साहस, स्वतंत्र सोच और नागरिक स्वतंत्रताओं के सबसे बड़े संरक्षकों में गिना जाता है। उनकी पहचान विशेष रूप से 1976 के ADM Jabalpur बनाम Shivkant Shukla मामले में दिए गए ऐतिहासिक असहमति वाले फैसले के कारण बनी, जिसे आज भी भारतीय लोकतंत्र के सबसे महत्वपूर्ण न्यायिक क्षणों में गिना जाता है।
इसी विरासत को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से हर वर्ष Justice H.R. Khanna Memorial Lecture का आयोजन किया जाता है, जिसमें संविधान, न्यायपालिका, नागरिक अधिकारों और लोकतांत्रिक संस्थाओं से जुड़े समकालीन विषयों पर चर्चा होती है।
इस वर्ष का कार्यक्रम इसलिए भी विशेष था क्योंकि इसमें व्याख्यान के बाद “Fifty Years After ADM Jabalpur vs. Shivkant Shukla” विषय पर एक विशेष पैनल चर्चा भी प्रस्तावित थी।
क्या था ADM Jabalpur v. Shivkant Shukla मामला?
यह मामला भारतीय न्यायिक इतिहास के सबसे चर्चित मामलों में से एक है। इसकी पृष्ठभूमि 25 जून 1975 को घोषित राष्ट्रीय आपातकाल (Emergency) से जुड़ी है। आपातकाल के दौरान बड़ी संख्या में विपक्षी नेताओं, पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को मीसा (MISA) जैसे कानूनों के तहत बिना मुकदमे के हिरासत में लिया गया।
इन गिरफ्तारियों को चुनौती देते हुए विभिन्न उच्च न्यायालयों में हैबियस कॉर्पस (Habeas Corpus) याचिकाएं दायर की गईं। कई हाई कोर्ट ने नागरिकों के पक्ष में निर्णय दिए और कहा कि अदालतें हिरासत की वैधता की जांच कर सकती हैं। इसके बाद केंद्र सरकार यह मामला सुप्रीम कोर्ट लेकर गई, जहां इसका शीर्षक बना Additional District Magistrate, Jabalpur vs. Shivkant Shukla (1976)
जस्टिस खन्ना की ऐतिहासिक असहमति
इस मामले की सुनवाई पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने की। पीठ में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ए.एन. रे, न्यायमूर्ति एम.एच. बेग, वाई.वी. चंद्रचूड़, पी.एन. भगवती और एच.आर. खन्ना शामिल थे।
बहुमत (4–1) ने सरकार के पक्ष में फैसला दिया और माना कि आपातकाल के दौरान राष्ट्रपति के आदेश के बाद नागरिक हैबियस कॉर्पस याचिका दायर कर अपनी गिरफ्तारी को अदालत में चुनौती नहीं दे सकते।
लेकिन जस्टिस एच.आर. खन्ना ने इस फैसले से असहमति जताई। उन्होंने कहा कि जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता केवल संविधान की देन नहीं, बल्कि मानव के मूल अधिकार हैं, इसलिए राज्य उन्हें पूरी तरह समाप्त नहीं कर सकता। उनका मानना था कि कानून का शासन (Rule of Law) आपातकाल में भी समाप्त नहीं हो सकता। यही असहमति बाद में भारतीय न्यायिक इतिहास की सबसे प्रतिष्ठित न्यायिक राय मानी गई।
अपने फैसले की कीमत भी चुकाई
जस्टिस खन्ना की इस असहमति की कीमत उन्हें अपने करियर में चुकानी पड़ी। परंपरा के अनुसार वे अगले मुख्य न्यायाधीश बनने की वरिष्ठता रखते थे, लेकिन जनवरी 1977 में उनसे जूनियर न्यायाधीश एम.एच. बेग को भारत का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त कर दिया गया। इसे न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर गंभीर सवालों के रूप में देखा गया।
इस निर्णय के विरोध में जस्टिस खन्ना ने सुप्रीम कोर्ट से इस्तीफा दे दिया। उस समय देशभर के अनेक बार एसोसिएशनों और कानूनी समुदाय ने उनके समर्थन में विरोध दर्ज कराया। बाद के वर्षों में उन्हें भारतीय न्यायपालिका में नैतिक साहस का प्रतीक माना जाने लगा।
कार्यक्रम क्यों स्थगित किया गया?
28 जुलाई को आयोजित होने वाला Justice H.R. Khanna Memorial Lecture अंतिम समय में स्थगित कर दिया गया। आयोजकों ने इसकी पुष्टि करते हुए बताया कि कार्यक्रम फिलहाल टाल दिया गया है और नई तारीख बाद में घोषित की जाएगी। हालांकि, सार्वजनिक रूप से स्थगन का कोई विस्तृत आधिकारिक कारण नहीं बताया गया।
कार्यक्रम के स्थगित होने का निर्णय ऐसे समय आया, जब हाल के दिनों में भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत सार्वजनिक और राजनीतिक बहस के केंद्र में रहे हैं। इसी वजह से इस निर्णय ने कानूनी और राजनीतिक हलकों में व्यापक चर्चा को जन्म दिया।
‘Cockroach’ टिप्पणी और उसके बाद का विवाद
हाल के महीनों में CJI सूर्यकांत की एक मौखिक टिप्पणी को लेकर व्यापक विवाद हुआ। सर्वोच्च न्यायालय की एक सुनवाई के दौरान भारत के बेरोजगार युवा वर्ग के लिए “Cockroach” शब्द के प्रयोग को लेकर सोशल मीडिया और राजनीतिक स्तर पर उनके लिए तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आईं।
बाद में इस मुद्दे को लेकर कई विरोध प्रदर्शन हुए और Cockroach Janata Party (CJP) नाम से एक आंदोलन भी सामने आया।
हालांकि, बाद में न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि उनकी टिप्पणी देश के युवाओं के लिए नहीं थी, बल्कि उन लोगों के संदर्भ में थी जो कथित रूप से फर्जी कानून की डिग्रियों के माध्यम से कानूनी पेशे में प्रवेश कर रहे थे। उन्होंने कहा कि उनके बयान का अर्थ गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया और उन्हें भारत के युवाओं पर पूरा विश्वास है। साथ ही उन्होंने यह भी दोहराया कि न्यायपालिका के दरवाजे प्रत्येक नागरिक के लिए खुले हैं।
नई तारीख का इंतजार
जस्टिस एच.आर. खन्ना मेमोरियल लेक्चर का स्थगित होना केवल एक कार्यक्रम के टलने भर की घटना नहीं है। यह व्याख्यान भारतीय न्यायपालिका की उस विरासत का प्रतिनिधित्व करता है, जिसने नागरिक स्वतंत्रता, न्यायिक साहस और संविधान की सर्वोच्चता को सर्वोपरि माना।
एक ओर इस मंच पर दसवीं अनुसूची जैसे समकालीन संवैधानिक प्रश्न पर बहस होनी थी, तो दूसरी ओर ADM Jabalpur vs Shivkant Shukla जैसे ऐतिहासिक फैसले के पचास वर्ष पूरे होने के संदर्भ में जस्टिस एच.आर. खन्ना की असहमति और उसकी विरासत पर चर्चा प्रस्तावित भी थी। ऐसे समय में कार्यक्रम का स्थगित होना स्वाभाविक रूप से ध्यान आकर्षित करता है।
फिलहाल इतना स्पष्ट है कि यह कार्यक्रम रद्द नहीं, बल्कि स्थगित किया गया है और नई तिथि की घोषणा का इंतजार किया जा रहा है। जब भी यह व्याख्यान आयोजित होगा, उससे भारतीय संवैधानिक विमर्श, न्यायिक स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक संस्थाओं की भूमिका पर एक बार फिर गंभीर चर्चा की उम्मीद रहेगी।
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