लता मंगेशकर को टेस्ट क्रिकेट देखना पसंद था और क्रिकेट के दिग्गजों से उनके करीबी संबंध भी रहे। जानिए राज सिंह डूंगरपुर से उनकी दोस्ती और 1983 विश्व कप के बाद भारतीय टीम के लिए किए गए कॉन्सर्ट की कहानी।
मुंबई: भारतीय संगीत की दुनिया में कुछ आवाजें ऐसी होती हैं, जो किसी एक दौर या पीढ़ी तक सीमित नहीं रहतीं। लता मंगेशकर की आवाज भी ऐसी ही थी। 28 सितंबर 1929 को इंदौर में जन्मीं लता मंगेशकर ने हिंदी सिनेमा के साथ-साथ कई भारतीय भाषाओं के संगीत को अपनी आवाज दी। करीब सात दशक लंबे करियर में उन्होंने हजारों गीत रिकॉर्ड किए और देश की सबसे प्रतिष्ठित गायिकाओं में अपनी जगह बनाई।
लता मंगेशकर अब हमारे बीच नहीं हैं। 6 फरवरी 2022 को 92 वर्ष की उम्र में मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में उनका निधन हुआ था। लेकिन 28 सितंबर को उनकी जयंती के मौके पर उनके गीतों के साथ उनकी जिंदगी से जुड़े वे किस्से भी याद किए जाते हैं, जो उनकी लोकप्रिय छवि से अलग एक दूसरी लता मंगेशकर को सामने लाते हैं।
उनका जन्म पंडित दीनानाथ मंगेशकर और शेवंती मंगेशकर के घर हुआ था। पिता शास्त्रीय गायक होने के साथ-साथ मराठी रंगमंच से भी जुड़े थे। घर का माहौल पूरी तरह संगीत से जुड़ा हुआ था। यही वजह रही कि लता को बचपन से ही संगीत की शिक्षा मिलने लगी। उनके पिता उनके पहले गुरु थे।
13 साल की उम्र में परिवार की जिम्मेदारी
लता मंगेशकर की जिंदगी में बड़ा बदलाव 1942 में आया, जब उनके पिता का निधन हो गया। उस समय उनकी उम्र सिर्फ 13 साल थी। परिवार की सबसे बड़ी संतान होने के कारण छोटी बहनों मीना, आशा और उषा तथा भाई हृदयनाथ की जिम्मेदारी भी उनके कंधों पर आ गई। इसी दौर में उन्होंने अभिनय और गायन के जरिए परिवार की आर्थिक मदद शुरू की।
उन्होंने 1942 में मराठी फिल्म ‘पहिली मंगळागौर’ में अभिनय किया और इसी दौर में फिल्मों के लिए गाना भी शुरू किया। उनका शुरुआती रिकॉर्ड किया गया गीत मराठी फिल्म ‘किती हसाल’ के लिए था। हालांकि यह गीत फिल्म के अंतिम संस्करण में शामिल नहीं किया गया। आगे चलकर उन्होंने 1946 में ‘आप की सेवा में’ के लिए हिंदी फिल्म में पार्श्वगायन किया।
‘आएगा आनेवाला’ ने बदली जिंदगी
लता मंगेशकर के करियर का निर्णायक मोड़ 1949 में आई फिल्म ‘महल’ का गीत ‘आएगा आनेवाला’ बना। मधुबाला पर फिल्माए गए इस गीत ने उनकी आवाज को घर-घर पहुंचा दिया। इससे पहले ‘मजबूर’ के गीत ने भी उन्हें पहचान दिलाई थी, लेकिन ‘महल’ के बाद वह हिंदी फिल्म संगीत की प्रमुख आवाजों में शामिल हो गईं।
इसके बाद लता मंगेशकर ने एक के बाद एक कई पीढ़ियों की अभिनेत्रियों के लिए पार्श्वगायन किया। मधुबाला, नरगिस, मीना कुमारी, वहीदा रहमान, हेमा मालिनी, जया बच्चन से लेकर काजोल तक, अलग-अलग दौर की अभिनेत्रियों के पर्दे पर उनके गीतों को आवाज मिली।
उनकी आवाज की खासियत सिर्फ सुर और मिठास नहीं थी। वह गीत के भाव, परिस्थिति और पर्दे पर मौजूद किरदार को समझकर गाती थीं। इसी वजह से रोमांस, विरह, भक्ति, देशभक्ति और दर्द हर तरह के गीतों में उनकी आवाज अलग प्रभाव पैदा करती थी।
हजारों गीतों का लंबा सफर
लता मंगेशकर ने हिंदी के अलावा मराठी, बंगाली और कई अन्य भारतीय भाषाओं में भी गाया। उनके रिकॉर्ड किए गए गीतों की संख्या को लेकर अलग-अलग आंकड़े मिलते हैं। BFI के अनुसार उनका अनुमानित रिकॉर्डिंग आंकड़ा करीब 25 हजार गीतों और 36 भाषाओं तक बताया गया है।
उनका सफर सिर्फ फिल्मी गीतों तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने भजन, देशभक्ति गीत, गैर-फिल्मी संगीत और क्षेत्रीय भाषाओं के गीत भी रिकॉर्ड किए। 1974 में उन्होंने लंदन के रॉयल अल्बर्ट हॉल में प्रस्तुति दी, जिसे भारतीय संगीत के अंतरराष्ट्रीय विस्तार के महत्वपूर्ण पड़ावों में गिना जाता है।
अब जानते हैं उनकी जिंदगी से जुड़े 6 ऐसे तथ्य, जिनके बारे में आम तौर पर कम चर्चा होती है।
1. जन्म के समय कोई और नाम
लता मंगेशकर का नाम आज भारतीय संगीत की दुनिया में किसी परिचय का मोहताज नहीं है, लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि जन्म के समय उनका नाम ‘हेमा’ रखा गया था।
दरअसल, उनके पिता पंडित दीनानाथ मंगेशकर रंगमंच और शास्त्रीय संगीत से जुड़े हुए थे। शुरुआती वर्षों में ही उनके नाम में बदलाव हुआ। बताया जाता है कि उनके पिता के संगीत नाटक ‘भावबंधन’ में ‘लतिका’ नाम का एक महिला किरदार था। इसी किरदार से प्रभावित होकर उन्होंने अपनी बेटी का नाम ‘हेमा’ से बदलकर ‘लता’ रख दिया। आगे चलकर यही नाम उनकी पहचान बन गया।
‘लता’ नाम के साथ उन्होंने भारतीय फिल्म संगीत में ऐसी जगह बनाई, जिसे दशकों बाद भी याद किया जाता है। उनकी आवाज ने कई पीढ़ियों के संगीत प्रेमियों को प्रभावित किया और उन्हें भारतीय सिनेमा की सबसे प्रतिष्ठित गायिकाओं में शामिल किया।
2. सीमित स्कूली शिक्षा
लता मंगेशकर की औपचारिक स्कूली शिक्षा बहुत कम समय तक ही चली। उनके बचपन से जुड़े विवरणों के अनुसार, उन्होंने स्कूल जाना शुरू तो किया, लेकिन पढ़ाई का यह सिलसिला ज्यादा दिनों तक जारी नहीं रह सका।
एक प्रचलित किस्से के मुताबिक, वह स्कूल में अपनी सहपाठियों को संगीत सिखाने लगी थीं। इस बात को लेकर उनकी शिक्षिका से कहासुनी हुई, जिसके बाद उन्होंने स्कूल छोड़ दिया। हालांकि, उनके स्कूल छोड़ने की कहानी के अलग-अलग विवरण मिलते हैं।
स्कूल की पढ़ाई भले ही अधूरी रह गई, लेकिन संगीत की शिक्षा लगातार जारी रही। लता ने अपने पिता और प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक दीनानाथ मंगेशकर से संगीत की बारीकियां सीखीं। घर का माहौल भी पूरी तरह संगीत से जुड़ा था। यही प्रशिक्षण आगे चलकर उनकी गायकी की मजबूत नींव बना और उन्होंने भारतीय फिल्म संगीत में अपनी अलग पहचान बनाई।
3. पहला रिकॉर्ड किया हुआ गाना फिल्म से हटा दिया गया
लता मंगेशकर के करियर की शुरुआत से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा उनके पहले रिकॉर्ड किए गए गीत से जुड़ा है। उन्होंने महज 13 साल की उम्र में मराठी फिल्म ‘किती हसाल’ के लिए ‘नाचू या गडे, खेळू सारी मनी हौस भारी’ गीत रिकॉर्ड किया था।
हालांकि, रिकॉर्डिंग होने के बावजूद यह गीत फिल्म के अंतिम संस्करण में शामिल नहीं किया गया। इस वजह से लता की आवाज में रिकॉर्ड हुआ उनका शुरुआती गीत उस समय दर्शकों तक नहीं पहुंच सका।
यह घटना उनके लंबे संगीत सफर के शुरुआती संघर्षों को भी दिखाती है। जिस आवाज को आगे चलकर भारतीय सिनेमा के सबसे प्रभावशाली स्वरों में गिना गया, उसके करियर की शुरुआत भी कई अनिश्चितताओं से भरी थी।
4. क्रिकेट की जबरदस्त प्रशंसक
लता मंगेशकर को संगीत के साथ-साथ क्रिकेट में भी गहरी दिलचस्पी थी। कई रिपोर्टों में बताया गया है कि वह क्रिकेट मैच देखने की शौकीन थीं और रिकॉर्डिंग के व्यस्त कार्यक्रम के बीच भी मैच के लिए समय निकाल लेती थीं। उन्हें खास तौर पर टेस्ट क्रिकेट पसंद था। क्रिकेट के प्रति उनका लगाव सिर्फ मैच देखने तक सीमित नहीं था, बल्कि वह इस खेल के बड़े खिलाड़ियों को भी करीब से जानती थीं। उनके पास ऑस्ट्रेलिया के महान बल्लेबाज डॉन ब्रैडमैन की ऑटोग्राफ वाली तस्वीर भी थी, जिसे वह बेहद खास मानती थीं।
उन्होंने 1983 विश्व कप जीत के बाद आर्थिक संकट से जूझ रहे BCCI की मदद के लिए मुफ्त संगीत कार्यक्रम किया था। इस कार्यक्रम से करीब ₹20 लाख जुटाए गए, जिससे विश्व कप विजेता टीम के प्रत्येक खिलाड़ी को ₹1 लाख की पुरस्कार राशि दी गई।
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5. राज सिंह डूंगरपुर के साथ दोस्ती
लता मंगेशकर और पूर्व क्रिकेट प्रशासक राज सिंह डूंगरपुर के बीच लंबे समय तक गहरी दोस्ती रही। दोनों की मुलाकात मुंबई में 1960 के दशक में हुई थी। राज सिंह का लता मंगेशकर के छोटे भाई हृदयनाथ मंगेशकर से भी करीबी संबंध था और वे अक्सर मंगेशकर परिवार के घर क्रिकेट और अन्य विषयों पर चर्चा के लिए आते-जाते थे। इसी दौरान लता मंगेशकर और राज सिंह की दोस्ती धीरे-धीरे गहरी होती गई।
राज सिंह डूंगरपुर राजस्थान के डूंगरपुर के राजघराने से ताल्लुक रखते थे, जबकि लता मंगेशकर का पूरा ध्यान अपने परिवार और संगीत करियर पर था। दोनों के करीबी रिश्ते को लेकर लंबे समय तक चर्चाएं होती रहीं, लेकिन उन्होंने कभी सार्वजनिक रूप से इसे विवाह के रिश्ते में नहीं बदला।
मीडिया में ऐसी रिपोर्टें भी सामने आती रही हैं कि राज सिंह के परिवार को इस रिश्ते पर आपत्ति थी। हालांकि, दोनों ने अपने रिश्ते को सार्वजनिक चर्चा से दूर रखा और जीवनभर एक-दूसरे के करीबी बने रहे।
6. शेरलॉक होम्स और कारों का था खास शौक
संगीत से बाहर लता मंगेशकर की निजी पसंद भी काफी दिलचस्प थी। वह जासूसी उपन्यास पढ़ने की शौकीन थीं और शेरलॉक होम्स की किताबों का पूरा संग्रह उनके पास होने की बात सामने आई है।
उन्हें कारों का भी शौक था। रिपोर्टों में उनकी पसंदीदा कारों में ग्रे हिलमैन, ब्लू शेवरले, क्रिसलर और मर्सिडीज जैसी गाड़ियों का उल्लेख मिलता है। यानी स्टूडियो में घंटों संगीत रिकॉर्ड करने वाली लता मंगेशकर के निजी जीवन में किताबें, क्रिकेट और कारें भी खास जगह रखती थीं।
पुरस्कारों से सम्मानित
लता मंगेशकर को उनके लंबे संगीत सफर में देश-विदेश के कई बड़े सम्मान मिले। उन्हें तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार, चार फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ महिला पार्श्वगायिका पुरस्कार और फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड मिला।
1989 में उन्हें दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया और 2001 में भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न प्रदान किया गया। फ्रांस ने भी उन्हें ऑफिसर ऑफ द लीजन ऑफ ऑनर से सम्मानित किया।
उनकी उपलब्धियों को देखते हुए मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र सरकार ने भी उनके नाम पर पुरस्कार शुरू किए। यानी लता मंगेशकर का प्रभाव केवल एक गायिका तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वह भारतीय संगीत संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गईं।
आखिरी दौर तक संगीत से जुड़ा रहा रिश्ता
लता मंगेशकर ने उम्र बढ़ने के साथ फिल्मों में गायन कम कर दिया, लेकिन संगीत से उनका रिश्ता आखिरी दौर तक बना रहा। 2019 में उन्होंने ‘सौगंध मुझे इस मिट्टी की’ रिकॉर्ड किया था, जिसे देश और भारतीय सेना को समर्पित किया गया था।
8 जनवरी 2022 को कोविड-19 से संक्रमित होने के बाद उन्हें मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। 6 फरवरी 2022 को 92 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया। उन्हें राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई और भारत सरकार ने उनके सम्मान में दो दिन के राष्ट्रीय शोक की घोषणा की थी।
28 सितंबर को उनकी जयंती पर उनके गीत फिर सुनाई देंगे, लेकिन उनके जीवन के ये छोटे-छोटे किस्से यह बताते हैं कि ‘स्वर कोकिला’ के पीछे सिर्फ एक महान गायिका नहीं, बल्कि संगीतकार, क्रिकेट प्रेमी, किताबों की शौकीन और अपने काम को लेकर बेहद सजग रहने वाली एक अलग शख्सियत भी मौजूद थी।
