Tuesday, 29 September 2026
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Saharanpur Mosque Demolition: कोर्ट के फैसले के बाद सहारनपुर कलेक्ट्रेट की मस्जिद पर चला बुलडोजर, इकरा हसन ने लगाया हाउस अरेस्ट का आरोप

सहारनपुर कलेक्ट्रेट मस्जिद ध्वस्तीकरण से पहले पांचों गेट बंद किए गए और RAF समेत भारी पुलिस बल तैनात रहा। जानिए प्रशासन ने क्यों बढ़ाई सुरक्षा और कैसे हुई कार्रवाई।

सहारनपुर/नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में शनिवार, 5 सितंबर की सुबह कलेक्ट्रेट परिसर स्थित मस्जिद को प्रशासन ने ध्वस्त कर दिया। यह कार्रवाई उस कानूनी विवाद के बाद हुई, जो करीब डेढ़ साल से चल रहा था। नगर मजिस्ट्रेट की अदालत ने जुलाई में मस्जिद को सरकारी जमीन पर बना अवैध निर्माण मानते हुए इसे हटाने का आदेश दिया था।

इस मामले के खिलाफ मस्जिद पक्ष जिला अदालत पहुंचा, लेकिन सितंबर की शुरुआत में जिला जज की अदालत ने भी निचली अदालत के आदेश को बरकरार रखा। इसके बाद प्रशासन ने शनिवार तड़के भारी सुरक्षा व्यवस्था के बीच मस्जिद को हटाने की कार्रवाई शुरू की।

कार्रवाई के दौरान कलेक्ट्रेट परिसर के सभी पांच प्रवेश द्वार बंद कर दिए गए। बड़ी संख्या में पुलिस बल के साथ रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) की तैनाती की गई। रात में ही JCB मशीनें, डंपर और दूसरे उपकरण कलेक्ट्रेट परिसर में पहुंचा दिए गए थे। वरिष्ठ पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी मौके पर मौजूद रहे।

इस मामले ने राजनीतिक रंग भी ले लिया है। कैराना से समाजवादी पार्टी की सांसद इकरा हसन ने आरोप लगाया कि उन्हें सहारनपुर जाने से रोकने के लिए उनके आवास पर पुलिस बल तैनात कर उन्हें हाउस अरेस्ट किया गया। समाजवादी पार्टी ने भी सरकार पर सांसद को रोकने का आरोप लगाया है। दूसरी ओर प्रशासन ने मस्जिद को सरकारी जमीन पर अवैध निर्माण बताते हुए अदालत के फैसले के बाद कार्रवाई की बात कही है।

क्या है सहारनपुर कलेक्ट्रेट मस्जिद का पूरा विवाद?

सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित मस्जिद को लेकर विवाद 2025 में सामने आया। मामले की शुरुआत बजरंग दल के पूर्व प्रांतीय संयोजक विकास त्यागी की शिकायत से हुई। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि कलेक्ट्रेट जैसे संवेदनशील सरकारी परिसर में सरकारी जमीन पर मस्जिद का निर्माण किया गया है। शिकायत में धार्मिक गतिविधियों के अलावा परिसर के कथित व्यावसायिक इस्तेमाल का भी मुद्दा उठाया गया था।

इसके बाद प्रशासन ने मामले की जांच कराई और इसे उत्तर प्रदेश सार्वजनिक परिसर (अनधिकृत अधिभोगियों की बेदखली) अधिनियम, 1972 के तहत नगर मजिस्ट्रेट की अदालत में ले जाया गया। अदालत में भूमि के स्वामित्व, राजस्व रिकॉर्ड और मस्जिद की वैधता से जुड़े दस्तावेजों पर सुनवाई हुई।

विवादित जमीन को राजस्व रिकॉर्ड में कलेक्ट्रेट-कचहरी की सरकारी भूमि के तौर पर दर्ज बताया गया है। अदालत के सामने रखे गए रिकॉर्ड के मुताबिक यह जमीन खसरा नंबर 539 से जुड़ी है और इसका क्षेत्रफल करीब 315 वर्ग मीटर है। अदालत ने इसी आधार पर मस्जिद के निर्माण को सरकारी जमीन पर अनधिकृत कब्जे से जुड़ा मामला माना।

जुलाई में सिटी मजिस्ट्रेट ने दिया था फैसला

लंबी सुनवाई के बाद 16 जुलाई 2026 को नगर मजिस्ट्रेट कुलदीप सिंह की अदालत ने मामले में फैसला सुनाया। अदालत ने मस्जिद को सरकारी जमीन पर बना अवैध निर्माण मानते हुए संबंधित पक्ष को परिसर खाली करने का आदेश दिया। इसके लिए 30 दिन का समय दिया गया था। आदेश में यह भी कहा गया था कि तय अवधि में कब्जा नहीं हटाया गया तो प्रशासन बेदखली की कार्रवाई कर सकता है।

अदालत ने सरकारी जमीन के कथित अनधिकृत कब्जे और इस्तेमाल के लिए 6 करोड़ 41 लाख रुपये से अधिक की क्षतिपूर्ति का आदेश भी दिया। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार आदेश में यह राशि 70 साल की अवधि के कथित अनधिकृत कब्जे के आधार पर निर्धारित की गई थी।

इस फैसले के बाद मस्जिद पक्ष ने इसे चुनौती देने का फैसला किया और जिला जज की अदालत का रुख किया।

जिला अदालत में भी नहीं मिली राहत

मस्जिद पक्ष ने सिटी मजिस्ट्रेट के फैसले को जिला अदालत में चुनौती दी। वहां जमीन के स्वामित्व और मस्जिद की स्थिति को लेकर दोनों पक्षों ने अपनी-अपनी दलीलें सामने रखीं।

मस्जिद पक्ष ने अदालत में यह दावा किया कि यह धार्मिक स्थल पुराना है और इसे वक्फ संपत्ति के तौर पर देखा जाना चाहिए। सुनवाई के दौरान पुराने दस्तावेजों, राजस्व रिकॉर्ड और वक्फ संपत्ति से जुड़े दावों पर भी बहस हुई। 1991 के पूजा स्थल कानून को लेकर भी मस्जिद पक्ष ने अपनी दलील रखी थी। उन्होंने सिटी मजिस्ट्रेट के आदेश में महत्वपूर्ण तथ्यों को नजरअंदाज किए जाने का आरोप भी लगाया।

दूसरी तरफ प्रशासन का कहना था कि उपलब्ध राजस्व रिकॉर्ड में जमीन सरकारी दर्ज है और संबंधित पक्ष इसे मस्जिद की वैध जमीन साबित करने के लिए पर्याप्त दस्तावेज पेश नहीं कर सका।

जिला जज की अदालत ने आखिरकार सिटी मजिस्ट्रेट के आदेश को बरकरार रखते हुए मस्जिद पक्ष की याचिका खारिज कर दी। इसके बाद प्रशासन के लिए मस्जिद को हटाने का रास्ता साफ हो गया।

मस्जिद कितनी पुरानी थी?

इस मामले में मस्जिद की उम्र को लेकर भी अलग-अलग दावे सामने आए हैं।

प्रशासनिक और कई मीडिया रिपोर्टों में मस्जिद को करीब 70 साल पुराना बताया गया है। जुलाई में आए अदालत के आदेश से जुड़ी रिपोर्टों में भी लगभग सात दशक पुराने निर्माण का उल्लेख मिलता है।

हालांकि मस्जिद के मुतवल्ली यानी संरक्षक तनवीर अहमद ने दावा किया कि यह मस्जिद करीब 150 साल पुरानी है। उन्होंने यह भी कहा कि मस्जिद पक्ष ने अदालत में पुराने अस्तित्व को साबित करने की कोशिश की थी। लेकिन अदालत ने उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर सरकारी जमीन पर अनधिकृत कब्जे के निष्कर्ष को बरकरार रखा।

प्रशासन ने बढ़ाई सुरक्षा

मस्जिद के ध्वस्तीकरण से पहले सहारनपुर कलेक्ट्रेट और आसपास के इलाके में सुरक्षा बढ़ा दी गई थी। प्रशासन को आशंका थी कि संवेदनशील धार्मिक मामले में कार्रवाई के दौरान कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ सकती है।

रिपोर्ट के मुताबिक कलेक्ट्रेट के सभी पांच गेट बंद कर दिए गए थे और बाहरी लोगों के प्रवेश पर रोक थी। स्थानीय पुलिस के अलावा दूसरे जिलों से अतिरिक्त बल बुलाया गया था। RAF को भी तैनात किया गया। शुक्रवार देर शाम से ही पुलिस की गतिविधियां बढ़ गई थीं।

सहारनपुर के DIG अभिषेक सिंह ने कहा कि सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत ने मस्जिद को सरकारी जमीन पर अवैध निर्माण पाया था और मस्जिद कमेटी की अपील खारिज होने के बाद कार्रवाई की गई। उनके मुताबिक प्रशासन ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए सभी जरूरी एहतियाती कदम उठाए।

रात में ही पहुंच गए थे JCB और डंपर

ध्वस्तीकरण की कार्रवाई शनिवार सुबह शुरू होने से पहले प्रशासन ने रात में ही तैयारियां पूरी कर ली थीं। कलेक्ट्रेट परिसर में JCB मशीनें, डंपर और अन्य उपकरण पहुंचाए गए। सुबह होते-होते बड़ी संख्या में सुरक्षाकर्मी मौके पर तैनात थे।

प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों की मौजूदगी में मस्जिद के ढांचे को हटाने का काम शुरू हुआ। पूरे ऑपरेशन के दौरान कलेक्ट्रेट परिसर को आम लोगों के लिए बंद रखा गया।

प्रशासन ने यह कदम अदालत के फैसले के अनुपालन के तौर पर उठाया है। जिला अदालत द्वारा निचली अदालत के आदेश को बरकरार रखने के बाद कार्रवाई की गई, इसलिए मामला अब आगे की कानूनी चुनौती पर निर्भर कर सकता है।

इकरा हसन ने लगाया हाउस अरेस्ट का आरोप

ध्वस्तीकरण के बीच कैराना से सपा सांसद इकरा हसन का बयान भी सामने आया। उनका कहना है कि वह सहारनपुर जाने की तैयारी कर रही थीं, लेकिन उनके कैराना स्थित आवास पर बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी पहुंच गए और उन्हें बाहर जाने से रोक दिया गया।

हसन के मुताबिक वह अधिकारियों से मिलने और क्षेत्र के लोगों की चिंताओं को उठाने के लिए सहारनपुर जाना चाहती थीं। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या किसी निर्वाचित जनप्रतिनिधि का अधिकारियों से मिलना अपराध है।

समाजवादी पार्टी ने सरकार पर साधा निशाना

इकरा हसन के कथित हाउस अरेस्ट के बाद समाजवादी पार्टी ने सरकार पर निशाना साधा। पार्टी की ओर से आरोप लगाया गया कि हसन को सहारनपुर जाने से इसलिए रोका गया ताकि वह मस्जिद ध्वस्तीकरण को लेकर अपनी बात न रख सकें।

सपा नेता और सांसद अफजाल अंसारी ने भी इस मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए हसन को रोकने की आलोचना की। पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने भी सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए सरकार की जिम्मेदारी के रूप में सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखने की बात कही।

इस घटनाक्रम के बाद मस्जिद का विवाद सिर्फ प्रशासन और मस्जिद कमेटी के बीच कानूनी मामला नहीं रहा, बल्कि इस पर राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है।

हाईकोर्ट तक जा सकती है बात?

ध्वस्तीकरण के बाद अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या मस्जिद पक्ष इस फैसले को उच्च अदालत में चुनौती देगा। पहले ही मस्जिद कमेटी की ओर से जिला अदालत के फैसले के बाद हाईकोर्ट जाने की तैयारी की बात सामने आई थी।

वहीं दूसरी तरफ प्रशासन ने अपने स्तर पर अदालत के आदेश का पालन किया है। अब आगे की कानूनी लड़ाई इस बात पर केंद्रित हो सकती है कि जमीन की कानूनी स्थिति क्या है, पुराने दस्तावेजों की वैधता क्या है और ध्वस्तीकरण की प्रक्रिया निर्धारित नियमों के अनुरूप हुई या नहीं।

मामले में जमीन के रिकॉर्ड का सवाल सबसे महत्वपूर्ण बना हुआ है। प्रशासन और अदालत के आदेशों में संबंधित भूमि को सरकारी जमीन माना गया है, जबकि मस्जिद पक्ष ने धार्मिक स्थल और वक्फ से जुड़े अधिकारों का दावा किया है।

फिलहाल अदालतों के सामने रखे गए रिकॉर्ड के आधार पर सरकारी जमीन पर अनधिकृत निर्माण इस मामले का कानूनी केंद्र है, जबकि मस्जिद पक्ष की ओर से पुराने अस्तित्व, वक्फ और प्रक्रिया से जुड़े सवाल उठाए गए हैं। यही कानूनी और राजनीतिक विवाद आने वाले दिनों में इस मामले की दिशा तय करेगा।

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MD Faijan

लेखक

मोहम्मद फैजान न्यूज़ ऑफ द डे में पत्रकार हैं, जहाँ वे खेल, मनोरंजन, राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मामलों को कवर करते हैं। इससे पहले वे यूट्यूब चैनल स्पोर्ट्स यारी में सोशल मीडिया एग्जीक्यूटिव के रूप में कार्य कर चुके हैं, जहाँ उन्होंने डिजिटल कंटेंट मैनेजमेंट और ऑडियंस एंगेजमेंट का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त किया। भारत के छत्तीसगढ़ राज्य के कोरिया जिले से संबंध रखने वाले फैजान आधुनिक मीडिया कार्यप्रणालियों की अच्छी समझ रखते हैं और कहानी कहने के विभिन्न रूपों में गहरी रुचि रखते हैं।

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