क्रिप्टो पर ब्रिटेन का नया रुख, भारत के सामने नई चुनौती

नई दिल्ली, 25 मई 2026

ब्रिटेन ने क्रिप्टो को लेकर अपने रवैये में बड़ा बदलाव किया है। जिसे कभी जोखिम भरा और अस्थिर क्षेत्र माना जाता था, अब उसे मुख्यधारा की वित्तीय व्यवस्था में शामिल किया जा रहा है। ब्रिटेन अब ऐसा रेगुलेटरी ढांचा बना रहा है, जहां क्रिप्टो कंपनियों को भी बैंकों और दूसरी वित्तीय संस्थाओं की तरह नियमों के तहत काम करना होगा। फाइनेंशियल कंडक्ट अथॉरिटी (FCA) ने इसके लिए समयसीमा तय कर दी है। सितंबर 2026 से कंपनियां लाइसेंस के लिए आवेदन कर सकेंगी और 2027 तक नया ढांचा पूरी तरह लागू होने की उम्मीद है।

ब्रिटेन की रणनीति साफ है। वहां सरकार और रेगुलेटर एक तरफ नई तकनीक और इनोवेशन को बढ़ावा देना चाहते हैं, तो दूसरी तरफ नियम तोड़ने वालों पर सख्ती भी कर रहे हैं। स्टेबलकॉइन को पेमेंट सिस्टम का हिस्सा बनाने पर काम हो रहा है और कंपनियों को नियंत्रित माहौल में नए प्रयोग करने की अनुमति दी जा रही है। इस दौरान क्रिप्टो नेटवर्क्स के खिलाफ कार्रवाई भी तेज हुई है।

वहीं भारत का रवैया इससे काफी अलग रहा है। यहां अब तक कोई व्यापक रेगुलेटरी ढांचा नहीं बनाया गया है। सरकार ने फिलहाल टैक्स को ही मुख्य नीति का आधार बनाया है। क्रिप्टो से होने वाले मुनाफे पर 30% टैक्स और हर ट्रांजैक्शन पर 1% टीडीएस लगाया गया है, जिस वजह से भारत दुनिया के सबसे ज्यादा टैक्स वाले क्रिप्टो बाजारों में गिना जाता है। लेकिन इसके बावजूद एक्सचेंज, निवेशकों की सुरक्षा और कस्टडी जैसे मुद्दों पर अब भी स्पष्ट नियम नहीं हैं।

यहीं सबसे बड़ा असंतुलन पैदा होता है। सरकार क्रिप्टो पर टैक्स तो ले रही है, लेकिन उसे पूरी तरह रेगुलेटेड वित्तीय उत्पाद का दर्जा नहीं दे रही। यानी सरकार बाजार से राजस्व तो चाहती है, हालांकि एक व्यापक नियामक ढांचा अभी आना बकी है।दूसरी तरफ भारतीय रिजर्व बैंक लगातार वित्तीय स्थिरता को लेकर चिंता जताता रहा है और निजी क्रिप्टो के बजाय सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी (CBDC) को ज्यादा सुरक्षित विकल्प मानता है।

ब्रिटेन और भारत की नीतियों का अंतर उनकी सोच को भी दिखाता है। ब्रिटेन क्रिप्टो को सिस्टम के भीतर लाकर नियंत्रित करना चाहता है। वहीं भारत अभी भी सतर्क दूरी बनाए हुए है और वैश्विक स्थिति साफ होने का इंतजार कर रहा है। दोनों दृष्टिकोण अपने-अपने हिसाब से सही हो सकते हैं, लेकिन उनके असर अलग होंगे।

ब्रिटेन का मॉडल स्पष्टता देता है। कंपनियों को पता है कि नियम क्या हैं, निवेशक जोखिम समझते हैं और इनोवेशन तय सीमाओं के भीतर होता है। भारत में अभी सबसे बड़ी समस्या अनिश्चितता है। भारी टैक्स और नियमों की कमी के कारण कई गतिविधियां विदेशी प्लेटफॉर्म्स की ओर जा रही हैं, जबकि देश के भीतर क्रिप्टो में रुचि लगातार बनी हुई है। उद्योग जगत भी लंबे समय से साफ नियमों और टैक्स में राहत की मांग कर रहा है।

अब यह साफ हो चुका है कि क्रिप्टो सिर्फ टेक्नोलॉजी या निवेश का मामला नहीं रह गया है। यह आर्थिक रणनीति और वैश्विक प्रतिस्पर्धा का हिस्सा बन चुका है। ब्रिटेन खुद को एक भरोसेमंद क्रिप्टो हब के रूप में स्थापित करना चाहता है। वहीं भारत अभी भी संतुलन बनाने की कोशिश में है — एक तरफ वित्तीय जोखिम की चिंता और दूसरी तरफ नई तकनीक में पीछे छूटने का डर।

आखिरकार भारत के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या उसकी मौजूदा “बीच का रास्ता” वाली नीति लंबे समय तक टिक पाएगी। बाजार आमतौर पर उन देशों की तरफ जाते हैं जहां नियम साफ हों, चाहे वे सख्त ही क्यों न हों। सिर्फ टैक्स लगाना, लेकिन स्पष्ट रेगुलेशन न देना, लंबे समय तक काम नहीं करता। क्योंकि नीति में इंतजार करना भी एक फैसला होता है और वही तय करता है कि भविष्य की वित्तीय दुनिया में कौन आगे रहेगा और कौन पीछे।

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