नई दिल्ली।
तीस हजारी अदालत ने नाबालिग से दुष्कर्म और उसे गर्भवती करने के सनसनीखेज मामले में कड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने आरोपी मोहसिन खान को 25 साल के कठोर कारावास की सजा दी है। इसके साथ ही उस पर 50 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि जिस जगह बच्ची को सुरक्षा मिलनी चाहिए थी, वहीं उसके साथ विश्वासघात हुआ। यह फैसला अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश बबीता पुनिया की अदालत ने सुनाया। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि भले ही सुनवाई के दौरान पीड़िता और उसकी मां अपने बयान से पीछे हट गईं, लेकिन वैज्ञानिक साक्ष्य सच्चाई को सामने लाने के लिए पर्याप्त हैं।
पॉक्सो समेत कई धाराओं में दोषी करार
अदालत ने आरोपी को पॉक्सो अधिनियम की धारा 6 और बीएनएस की संबंधित धाराओं के तहत दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई। साथ ही पीड़िता को 14.50 लाख रुपये मुआवजा देने का भी निर्देश दिया गया।
अस्पताल में खुला मामला, ढाई महीने की गर्भवती थी बच्ची
मामला निहाल विहार इलाके का है। अक्टूबर 2024 में 13 साल की बच्ची को गर्भवती हालत में गुरु गोबिंद सिंह अस्पताल लाया गया था। जांच में सामने आया कि वह करीब ढाई महीने की गर्भवती है। इसके बाद डॉक्टरों की सूचना पर पुलिस ने केस दर्ज कर जांच शुरू की।
रिश्तों की आड़ में वारदात
जांच में पता चला कि पीड़िता की मां और आरोपी की मां के बीच करीबी संबंध थे। बच्ची आरोपी की मां को मौसी और उसे भाई मानती थी। वह काफी समय से उसी घर में रह रही थी। इसी दौरान आरोपी ने कई बार उसके साथ दुष्कर्म किया।
चार्जशीट के बाद DNA ने खोला राज
जांच अधिकारी ने दिसंबर 2024 में अदालत में आरोपपत्र दाखिल किया। मेडिकल प्रक्रिया के दौरान गर्भपात के बाद लिए गए नमूनों की फॉरेंसिक जांच कराई गई। DNA रिपोर्ट में यह साफ हो गया कि भ्रूण का जैविक पिता आरोपी ही है। यही रिपोर्ट केस में सबसे अहम सबूत साबित हुई।
कोर्ट में पलटे बयान, फिर भी नहीं बचा आरोपी
सुनवाई के दौरान पीड़िता ने अपने पुराने बयान से मुकरते हुए कहा कि उसने डर के कारण आरोपी का नाम लिया था। उसने अदालत से आरोपी को छोड़ने की भी अपील की। वहीं, पीड़िता की मां ने भी मामला आगे न बढ़ाने की बात कही और इसे ‘गलती’ बताया। हालांकि अदालत ने इन बयानों को भरोसेमंद नहीं माना। कोर्ट ने कहा कि पारिवारिक या सामाजिक दबाव में बयान बदले जा सकते हैं, लेकिन वैज्ञानिक साक्ष्य झूठ नहीं बोलते। बचाव पक्ष ने आरोपी की उम्र और सुधार की संभावना का हवाला देते हुए नरमी की मांग की थी, जबकि अभियोजन ने इसे बेहद गंभीर और भरोसे के साथ धोखा बताया। अदालत ने अपने फैसले में माना कि यह सिर्फ एक अपराध नहीं, बल्कि रिश्तों के विश्वास की हत्या है।
