दिल्ली में CJP के प्रस्तावित प्रदर्शन को लेकर लगाए गए प्रतिबंधों पर उठे विवाद के बीच पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार ने सुप्रीम कोर्ट में माफी मांगी है। दो हलफनामों के जरिए उन्होंने अदालत को भरोसा दिलाया कि पुलिस का उद्देश्य न्यायालय के निर्देशों की अवहेलना करना नहीं था।
नई दिल्ली: कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शन के दौरान दिल्ली में मेट्रो परिचालन, इंटरनेट सेवाओं और आम लोगों की आवाजाही पर लगाई गई पाबंदियों को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। इस मामले में दिल्ली पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार ने सुप्रीम कोर्ट से बिना शर्त माफी मांगी है। उन्होंने अदालत में दो हलफनामे पेश करते हुए कहा कि पुलिस की ओर से कोर्ट के निर्देशों का जानबूझकर उल्लंघन नहीं किया गया। साथ ही उन्होंने अपने खिलाफ जारी अवमानना नोटिस वापस लेने का अनुरोध किया है।
पुलिस कमिश्नर का कहना है कि 10 अक्टूबर को प्रस्तावित प्रदर्शन के मद्देनजर उठाए गए कदमों का उद्देश्य राजधानी में कानून-व्यवस्था बनाए रखना और संभावित हिंसा को रोकना था। पुलिस ने अपने पक्ष में 20 जुलाई को आयोजित CJP के मार्च का हवाला देते हुए कहा कि प्रदर्शन के दौरान स्थिति तनावपूर्ण हो गई थी और इस दौरान कुछ पुलिसकर्मी घायल हुए थे।
यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें एक तरफ सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की पुलिस की जिम्मेदारी है, तो दूसरी तरफ शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने और अपनी बात रखने के नागरिकों के अधिकार का सवाल भी जुड़ा हुआ है।
सुप्रीम कोर्ट में क्या बोले दिल्ली पुलिस कमिश्नर?
दिल्ली पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार ने अपने हलफनामे में कहा कि पुलिस की ओर से ऐसा कोई कदम जानबूझकर नहीं उठाया गया, जिसका उद्देश्य सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की अवहेलना करना हो। उन्होंने अदालत के प्रति सम्मान जताते हुए बिना शर्त और स्पष्ट माफी मांगी तथा अवमानना की कार्यवाही से मुक्त किए जाने का अनुरोध किया।
पुलिस का तर्क है कि 10 अक्टूबर को प्रस्तावित प्रदर्शन को लेकर खुफिया सूचनाएं मिली थीं। इन सूचनाओं के मुताबिक, प्रदर्शन की अनुमति नहीं मिलने के बावजूद बड़ी संख्या में लोग जंतर-मंतर पहुंच सकते थे। इससे भीड़ नियंत्रण, सार्वजनिक सुरक्षा और कानून-व्यवस्था को लेकर गंभीर स्थिति पैदा होने की आशंका थी।
कमिश्नर के अनुसार, इन्हीं परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए एहतियाती कदम उठाए गए। पुलिस ने यह भी कहा कि उसका उद्देश्य लोगों को उनके अधिकारों से वंचित करना नहीं, बल्कि संभावित अव्यवस्था को रोकना था।
मेट्रो स्टेशनों पर पाबंदी को लेकर सफाई
इस विवाद का एक प्रमुख पहलू दिल्ली मेट्रो के कई स्टेशनों पर प्रवेश और निकास को सीमित करना था। 10 अक्टूबर के प्रस्तावित प्रदर्शन से पहले 57 मेट्रो स्टेशनों पर प्रतिबंध लगाए गए थे। इस व्यवस्था को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया था।
9 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया था कि दिल्ली मेट्रो और 10 अक्टूबर को दिल्ली आने वाली अन्य ट्रेनों की आवाजाही पर पूरी तरह रोक न लगे। अदालत का कहना था कि विरोध प्रदर्शन के कारण परिवहन व्यवस्था को पूरी तरह ठप नहीं किया जा सकता।
इसके बाद दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन (DMRC) ने अपने हलफनामे में बताया कि प्रभावित स्टेशनों की संख्या 57 से घटाकर 45 कर दी गई थी। निगम के मुताबिक, 303 स्टेशनों वाले नेटवर्क में से 258 स्टेशन पूरी तरह चालू और यात्रियों के लिए उपलब्ध रहे।
DMRC ने यह भी कहा कि 10 अक्टूबर को मेट्रो की 271 ट्रेनों ने निर्धारित 4,157 चक्कर पूरे किए। उसके अनुसार, ट्रेन सेवाओं को रद्द नहीं किया गया और कुल निर्धारित यात्राओं की संख्या में कटौती नहीं की गई। प्रतिबंधित स्टेशनों पर प्रवेश और निकास से जुड़े नियम पुलिस के निर्देशों तथा सुरक्षा एजेंसियों के आकलन के आधार पर लागू किए गए थे।
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इंटरनेट बंद करने पर क्या कहा गया?
दिल्ली पुलिस कमिश्नर के हलफनामे में इंटरनेट सेवाओं पर लगाई गई पाबंदी का भी उल्लेख है। पुलिस के अनुरोध पर 9 अक्टूबर की रात 10 बजे से 10 अक्टूबर की रात 10 बजे तक चार किलोमीटर के दायरे में मोबाइल इंटरनेट सेवाएं निलंबित की गई थीं।
यह क्षेत्र राष्ट्रपति भवन और केंद्र सरकार के महत्वपूर्ण संस्थानों के आसपास स्थित रायसीना हिल को केंद्र में रखकर तय किया गया था। अधिकारियों का तर्क था कि प्रदर्शन के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखने और किसी संभावित गड़बड़ी को रोकने के लिए यह कदम आवश्यक था।
इस संबंध में केंद्र सरकार की ओर से दाखिल अलग हलफनामे में केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन ने भी बिना शर्त माफी मांगी। उन्होंने कहा कि मोबाइल इंटरनेट को अस्थायी रूप से बंद करने का निर्णय शांति और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के उद्देश्य से लिया गया था।
गृह सचिव के अनुसार, पाबंदी केवल मोबाइल नेटवर्क के माध्यम से उपलब्ध इंटरनेट सेवाओं तक सीमित थी। वाई-फाई और ब्रॉडबैंड जैसी गैर-मोबाइल इंटरनेट सेवाओं पर यह रोक लागू नहीं थी।
प्रदर्शनकारियों की गिरफ्तारी पर जवाब
दिल्ली पुलिस ने अपने हलफनामे में उन लोगों के संबंध में भी सफाई दी, जिन्हें प्रदर्शन स्थल से हटाया गया था। पुलिस का कहना है कि निर्देशों का पालन नहीं करने या वहां से हटने से इनकार करने वाले लोगों को न तो पुलिस लॉकअप में रखा गया और न ही जेल भेजा गया।
पुलिस के मुताबिक, ऐसे लोगों को अस्थायी केंद्रों में रखा गया था और परिस्थितियों के सामान्य होने पर उन्हें छोड़ दिया गया। कमिश्नर ने बताया कि अलग-अलग मामलों में यह अवधि लगभग दो से छह घंटे तक रही।
हलफनामे में यह भी दावा किया गया कि हटाए गए लोगों को गर्म और ताजा भोजन दिया गया। पुलिस के अनुसार, जिन राजनीतिक नेताओं को प्रदर्शन स्थल से हटाया गया, उन्हें संबंधित थाने के प्रभारी अधिकारी (SHO) के कक्ष में बैठाया गया। उन्हें चाय, कॉफी, भोजन और अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराई गईं तथा उनके पद की गरिमा का ध्यान रखा गया।
पुलिस ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट परिसर के भीतर कोई नोटिस चिपकाकर लोगों को रोकने की कार्रवाई नहीं की गई थी।
20 जुलाई के प्रदर्शन का हवाला
दिल्ली पुलिस ने अपने बचाव में 20 जुलाई को हुए CJP के ‘चलो संसद’ मार्च का विशेष रूप से उल्लेख किया है। पुलिस के मुताबिक, यह मार्च पेपर लीक के मुद्दे पर आयोजित किया गया था और प्रदर्शनकारियों ने संसद की ओर बढ़ने की कोशिश की थी।
कमिश्नर के हलफनामे के अनुसार, उस समय लागू प्रतिबंधों और पुलिस की चेतावनियों के बावजूद प्रदर्शनकारियों ने कई बैरिकेड पार करने का प्रयास किया। पुलिस का दावा है कि स्थिति नियंत्रित करने के दौरान 240 से अधिक पुलिसकर्मी घायल हुए थे।
पुलिस का कहना है कि जुलाई की घटना से यह आशंका मजबूत हुई कि अक्टूबर में भी अनुमति के बिना प्रदर्शन आयोजित करने पर सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। इसी अनुभव और खुफिया सूचनाओं के आधार पर 10 अक्टूबर को एहतियाती कदम उठाए गए।
कमिश्नर ने यह भी कहा कि दिल्ली में 6, 7 और 8 अक्टूबर को हुए दूसरे राजनीतिक प्रदर्शनों के कारण मध्य दिल्ली में यातायात प्रभावित हुआ था। उनके मुताबिक, लंबे जाम के कारण विद्यार्थियों, आम नागरिकों और यात्रा करने वाले लोगों को परेशानी हुई। पुलिस ने महिला कर्मियों के साथ कथित दुर्व्यवहार और कई कर्मियों के घायल होने का भी उल्लेख किया।
CJP प्रदर्शन और विवाद की पृष्ठभूमि
CJP के 10 अक्टूबर के प्रस्तावित प्रदर्शन को लेकर दिल्ली पुलिस और आयोजकों के बीच पहले से तनाव था। पुलिस ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी थी। इसके बावजूद संगठन की ओर से प्रदर्शन का आह्वान किया गया।
दिल्ली पुलिस के मुताबिक, उसे 9 अक्टूबर को प्रदर्शन के संबंध में सूचना मिली थी, लेकिन यह अनुमति के लिए किया गया औपचारिक आवेदन नहीं था। पुलिस ने अपने हलफनामे में कहा कि अनुमति नहीं होने और पहले के अनुभवों के कारण सुरक्षा संबंधी कदम उठाने पड़े।
विवाद तब बढ़ा जब प्रदर्शन के मद्देनजर मेट्रो स्टेशनों पर प्रतिबंध, दिल्ली आने वाली ट्रेनों की आवाजाही को लेकर चिंता और इंटरनेट सेवाओं पर रोक जैसे मुद्दे सुप्रीम कोर्ट के सामने पहुंचे।
9 अक्टूबर के आदेश में अदालत ने मेट्रो और अन्य ट्रेनों की आवाजाही पर पूरी तरह रोक लगाने से बचने का निर्देश दिया। इसके बाद प्रतिबंधित मेट्रो स्टेशनों की संख्या कम की गई। हालांकि, इन उपायों को लेकर याचिकाकर्ताओं ने अदालत में अवमानना से जुड़ी शिकायतें उठाईं।
क्या बिना अनुमति प्रदर्शन पर पूरी तरह रोक लगाई जा सकती है?
इस विवाद का व्यापक पहलू शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी के बीच संतुलन का है।
भारतीय संविधान नागरिकों को शांतिपूर्ण ढंग से एकत्र होने और अपनी बात रखने का अधिकार देता है। हालांकि, यह अधिकार कानून के तहत उचित प्रतिबंधों के अधीन है। प्रशासन को सार्वजनिक सुरक्षा, यातायात और महत्वपूर्ण संस्थानों की सुरक्षा के लिए कदम उठाने का अधिकार है, लेकिन ऐसे कदमों का औचित्य और उनका दायरा भी महत्वपूर्ण होता है।
दिल्ली पुलिस का तर्क है कि प्रदर्शन की अनुमति नहीं थी और संभावित भीड़ से गंभीर स्थिति पैदा हो सकती थी। इसलिए उसके मुताबिक, पहले से कार्रवाई करना जरूरी था।
दूसरी ओर, ऐसे मामलों में यह जांचना आवश्यक होता है कि क्या सभी प्रतिबंध जरूरी थे, क्या कम कठोर विकल्प उपलब्ध थे और क्या उठाए गए कदम निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप थे।
इसी कारण सुप्रीम कोर्ट के सामने यह मामला केवल मेट्रो स्टेशनों या इंटरनेट सेवाओं तक सीमित नहीं है। यह प्रशासनिक शक्तियों के इस्तेमाल और नागरिक स्वतंत्रताओं के बीच संतुलन से भी जुड़ा है।




