फ्रांस में सितंबर से शुरू हुआ छात्र विरोध अक्टूबर में देशव्यापी आंदोलन बन गया है। छात्रों के साथ शिक्षक, अभिभावक और ट्रेड यूनियन भी सड़कों पर हैं। जानें शिक्षा व्यवस्था की समस्याओं ने इतने बड़े विरोध का रूप कैसे लिया।
पेरिस: फ्रांस में स्कूलों की बदहाल स्थिति, शिक्षकों की कमी, बड़ी कक्षाओं और शिक्षा व्यवस्था के लिए पर्याप्त बजट नहीं मिलने को लेकर शुरू हुआ छात्र आंदोलन अब देशव्यापी विरोध में बदल गया है। मंगलवार, 6 अक्टूबर को आंदोलन के सबसे बड़े प्रदर्शनों में से एक हुआ, जिसमें फ्रांस के गृह मंत्रालय के अनुसार करीब 2.66 लाख लोग सड़कों पर उतरे। इनमें पेरिस में ही करीब 56 हजार प्रदर्शनकारी शामिल थे।
प्रदर्शन के दौरान कई जगह पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प हुई, जिसके बाद आंसू गैस और पानी की बौछार का इस्तेमाल किया गया। इस बीच करीब 488 लोगों को हिरासत में भी लिया गया।
मंगलवार को छात्रों के साथ शिक्षक, अभिभावक और ट्रेड यूनियन से जुड़े लोग भी सड़कों पर उतरे। आंदोलन अब सिर्फ शिक्षा नीति का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि सरकार की आर्थिक नीतियों, पुलिस की कार्रवाई और अगले साल होने वाले राष्ट्रपति चुनाव से भी जुड़ गया है।
1,800 से ज्यादा स्कूल प्रभावित
फ्रांस के नेशनल हाई स्कूल स्टूडेंट्स यूनियन के अनुसार, देश के करीब 3,700 हाई स्कूलों में से लगभग 1,800 स्कूल मंगलवार को बंद या प्रदर्शनकारियों की नाकेबंदी से प्रभावित हुए। कुछ स्थानीय शिक्षा अधिकारियों ने छात्रों को ऑनलाइन पढ़ाने की व्यवस्था करने की कोशिश की। शिक्षा मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक मंगलवार को 891 स्कूलों में कक्षाएं पूरी या आंशिक रूप से निलंबित रहीं।
प्रदर्शनकारियों ने कई स्कूलों के बाहर कूड़ेदान और दूसरी वस्तुओं से अस्थायी बैरिकेड बनाए। कुछ स्थानों पर आगजनी और तोड़फोड़ की घटनाएं भी हुईं। शिक्षा मंत्रालय के मुताबिक आंदोलन शुरू होने के बाद कम से कम 24 स्कूलों में आग लगाई गई या उन्हें नुकसान पहुंचाया गया। सरकार का कहना है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार अपनी जगह है, लेकिन हिंसा और स्कूलों को नुकसान पहुंचाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
क्या है छात्रों की मुख्य मांग?
छात्रों की मांगों का केंद्र फ्रांस की सरकारी शिक्षा व्यवस्था में निवेश बढ़ाना है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि कई स्कूलों में शिक्षकों की कमी लंबे समय से बनी हुई है। किसी शिक्षक के अनुपस्थित होने पर कई बार उनकी जगह दूसरा शिक्षक नहीं मिलता, जिससे पढ़ाई प्रभावित होती है।
इसके अलावा छात्र कक्षाओं में विद्यार्थियों की संख्या कम करने, स्कूलों की जर्जर इमारतों की मरम्मत, लंबे स्कूल घंटों की समीक्षा और अलग-अलग सामाजिक वर्गों के स्कूलों के बीच मौजूद असमानता को कम करने की मांग कर रहे हैं।
प्रधानमंत्री सेबास्टियन लेकोर्नू ने इन मांगों में शिक्षकों की जगह वैकल्पिक शिक्षक उपलब्ध कराने, सुबह 8 बजे से शाम 6 बजे तक के लंबे स्कूल समय की समीक्षा और पुरानी इमारतों की मरम्मत जैसे मुद्दों पर काम करने का निर्देश दिया है।
कई छात्रों का कहना है कि उनका विरोध किसी एक राजनीतिक दल या नेता के समर्थन में नहीं है। उनका सवाल शिक्षा व्यवस्था के भविष्य को लेकर है। प्रदर्शन में शामिल छात्रों के मुताबिक जब सरकार युवाओं को देश का भविष्य बताती है तो उसे उनकी समस्याओं को भी गंभीरता से सुनना चाहिए।
स्कूलों में कैसी समस्याओं की शिकायत?
प्रदर्शन के दौरान छात्रों और शिक्षकों ने स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी कई समस्याएं उठाईं। इनमें जर्जर इमारतें, पानी का रिसाव, खराब रखरखाव, चूहों की समस्या, भीड़भाड़ वाली कक्षाएं और शिक्षकों की कमी प्रमुख हैं।
सितंबर के अंत में रॉयटर्स से बातचीत में पेरिस के उत्तर में स्थित सेंट-डेनिस की एक 17 वर्षीय छात्रा ने स्कूल में कॉकरोच और चूहों की समस्या तथा मौसम के अनुसार कक्षाओं के अत्यधिक गर्म या ठंडे होने की शिकायत की थी।
यही शिकायतें अब आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत बन गई हैं। छात्रों का कहना है कि शिक्षा की गुणवत्ता केवल पाठ्यक्रम या परीक्षा के परिणाम से तय नहीं होती। अगर स्कूल की इमारत सुरक्षित नहीं है, शिक्षक पर्याप्त नहीं हैं और कक्षा में जरूरत से ज्यादा विद्यार्थी हैं, तो पढ़ाई प्रभावित होना स्वाभाविक है।
हिंसा ने बदला आंदोलन का स्वरूप
शुरुआत में आंदोलन का मुख्य फोकस स्कूलों और शिक्षा व्यवस्था पर था, लेकिन कई शहरों में प्रदर्शन के दौरान हिंसा की घटनाओं ने स्थिति को गंभीर बना दिया। पुलिस पर वस्तुएं फेंकने, कूड़ेदानों में आग लगाने और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की घटनाएं भी सामने आई हैं। इसके जवाब में पुलिस ने आंसू गैस, लाठी और दंगा नियंत्रण के अन्य साधनों का इस्तेमाल किया। पेरिस, स्ट्रासबर्ग, रेन और टूलूज समेत कई शहरों में पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पें हुईं।
फ्रांस के गृह मंत्रालय के मुताबिक मंगलवार को करीब 488 लोगों को हिरासत में लिया गया और 48 सुरक्षा कर्मी घायल हुए। सरकार के आंकड़ों के मुताबिक आंदोलन शुरू होने के बाद 6,500 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है, जिनमें बड़ी संख्या नाबालिगों की है।
प्रधानमंत्री लेकोर्नू ने बातचीत का रास्ता खोला
बढ़ते दबाव के बीच प्रधानमंत्री सेबास्टियन लेकोर्नू ने छात्रों की मांगों पर ध्यान देने का संकेत दिया है। उन्होंने मंत्रियों को छात्रों की प्रमुख शिकायतों पर काम करने का निर्देश दिया है। सरकार शिक्षकों की अनुपस्थिति में वैकल्पिक व्यवस्था, स्कूल भवनों की मरम्मत और स्कूल के लंबे समय को लेकर प्रस्ताव तैयार कर रही है।
लेकोर्नू ने कहा है कि स्कूलों और सरकार को छात्रों की बात सुननी होगी और उनकी समस्याओं का समाधान तलाशना होगा। सरकार ने मंत्रियों से अक्टूबर के अंत तक शुरुआती प्रस्ताव देने को कहा है।
हालांकि, प्रदर्शनकारियों के एक वर्ग को सरकार के इन आश्वासनों पर भरोसा नहीं है। उनका कहना है कि वर्षों से चली आ रही समस्याओं के लिए केवल घोषणाएं पर्याप्त नहीं होंगी। पेरिस में प्रदर्शन कर रहे अभिभावकों ने भी कहा कि उन्हें ऐसी नीतियां चाहिए जिनका असर बच्चों के रोजमर्रा के स्कूल जीवन में दिखाई दे।
सरकार के सामने बजट की चुनौती
छात्रों और शिक्षकों की मांगों को पूरा करना फ्रांस सरकार के लिए आसान नहीं होगा। देश पहले से ही बढ़ते सरकारी कर्ज, धीमी आर्थिक वृद्धि और बजट घाटे की समस्या से जूझ रहा है। ऐसे में सरकार 2027 के बजट में सार्वजनिक खर्च को सीमित करने और वित्तीय स्थिति को सुधारने की कोशिश कर रही है। दूसरी ओर, शिक्षा क्षेत्र में अतिरिक्त निवेश की मांग लगातार जोर पकड़ रही है।
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि स्कूलों में पर्याप्त शिक्षक, बेहतर सुविधाएं और जरूरी संसाधन उपलब्ध कराने के लिए सरकार को शिक्षा बजट बढ़ाना चाहिए। उनका तर्क है कि लंबे समय से शिक्षा व्यवस्था पर बढ़ते दबाव का असर छात्रों और शिक्षकों दोनों पर पड़ रहा है। हालांकि, सरकार के लिए अतिरिक्त खर्च की व्यवस्था करना मौजूदा आर्थिक परिस्थितियों में चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
शिक्षा पर खर्च बढ़ाने का यह मुद्दा अब केवल स्कूलों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि देश की व्यापक आर्थिक नीति से भी जुड़ गया है। सरकार को एक तरफ सरकारी खर्च और कर्ज पर नियंत्रण बनाए रखना है, वहीं दूसरी तरफ छात्रों और शिक्षकों की मांगों को नजरअंदाज करने से सामाजिक और राजनीतिक असंतोष बढ़ने का जोखिम है। ऐसे में 2027 का बजट सरकार के लिए आर्थिक अनुशासन और सार्वजनिक सेवाओं की जरूरतों के बीच संतुलन बनाने की बड़ी परीक्षा बन सकता है।
आंदोलन में राजनीति की एंट्री
फ्रांस में छात्र आंदोलन ऐसे समय में तेज हुआ है जब देश अगले राष्ट्रपति चुनाव की तैयारी की ओर बढ़ रहा है। 2027 में होने वाले चुनाव में राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों तीसरे कार्यकाल के लिए चुनाव नहीं लड़ सकते। ऐसे में मौजूदा सामाजिक असंतोष का राजनीतिक असर भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
वामपंथी नेता जीन-ल्यूक मेलेंशों और उनकी पार्टी ‘ला फ्रांस इंसूमीज’ (La France Insoumise) ने छात्रों के आंदोलन का समर्थन किया है। पार्टी के कई सांसद स्कूलों की नाकेबंदी में शामिल भी हुए हैं। सरकार और उसके समर्थकों ने आरोप लगाया है कि कट्टर वामपंथी नेता आंदोलन को भड़का रहे हैं या उसे राजनीतिक दिशा दे रहे हैं। ला फ्रांस इंसूमीज ने इन आरोपों को खारिज किया है।
दूसरी तरफ दक्षिणपंथी नेशनल रैली (National Rally) की नेता मरीन ले पेन ने आंदोलन के दौरान हुई हिंसा का मुद्दा उठाया है और दंगा विरोधी कानूनों को सख्त करने की मांग की है। इस तरह शिक्षा व्यवस्था से शुरू हुआ आंदोलन अब फ्रांस की आगामी राजनीतिक लड़ाई का भी हिस्सा बनता दिखाई दे रहा है।
आंदोलन आगे किस दिशा में जाएगा?
छात्र संगठनों ने सरकार के ठोस कदम उठाने तक प्रदर्शन जारी रखने के संकेत दिए हैं। मंगलवार की रैली के बाद भी कई समूह नए प्रदर्शनों की तैयारी कर रहे हैं। सरकार के सामने अब दोहरी चुनौती है। एक तरफ स्कूलों में सामान्य पढ़ाई बहाल करना और दूसरी तरफ छात्रों की मूल शिकायतों का समाधान करना।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सरकार सीमित बजट के बीच स्कूलों में जरूरी निवेश कर पाएगी। अगर सरकार की ओर से केवल बातचीत और आश्वासन मिलते रहे और छात्रों को जमीनी स्तर पर बदलाव दिखाई नहीं दिया, तो आंदोलन और बड़ा हो सकता है। दूसरी ओर हिंसा बढ़ने पर सरकार की पुलिस कार्रवाई भी और सख्त हो सकती है।
फिलहाल फ्रांस में शिक्षा व्यवस्था को लेकर शुरू हुआ यह आंदोलन देश की सड़कों से लेकर संसद और राष्ट्रपति चुनाव की राजनीति तक पहुंच चुका है। 6 अक्टूबर का प्रदर्शन इस आंदोलन का अब तक का सबसे बड़ा शक्ति प्रदर्शन के रूप में दर्ज किया गया।

