राजा वड़िंग के नेतृत्व में कांग्रेस ने 2024 के लोकसभा चुनाव में पंजाब की 13 में से 7 सीटें जीती थीं। वड़िंग खुद लुधियाना से सांसद बने थे। इसके बावजूद विधानसभा चुनाव से पहले प्रदेश संगठन में नेतृत्व परिवर्तन किया गया है।
नई दिल्ली/चंडीगढ़: पंजाब में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले कांग्रेस ने अपने प्रदेश संगठन में बड़ा बदलाव करने का फैसला किया है। अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग ने पंजाब प्रदेश कांग्रेस कमेटी (PPCC) के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया है।
पार्टी के अंदर लंबे समय से चल रही गुटबाजी और नेताओं के बीच मतभेदों के बीच यह फैसला सामने आया है। कांग्रेस हाईकमान की ओर से वड़िंग को पद छोड़ने के लिए कहे जाने के बाद उन्होंने अपना इस्तीफा सौंपा। इसके साथ ही उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अपना परिचय भी बदलकर ‘Former Punjab Pradesh Congress Committee President’ कर दिया।
यह बदलाव ऐसे समय में हुआ है जब कांग्रेस पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार के खिलाफ अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने और 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुटी है। ऐसे में प्रदेश अध्यक्ष का पद छोड़ना केवल संगठनात्मक बदलाव नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर नेतृत्व और रणनीति से जुड़ा महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है।
कौन हैं अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग?
अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग पंजाब कांग्रेस के प्रमुख युवा नेताओं में गिने जाते हैं। उनका जन्म 29 नवंबर 1977 को पंजाब के मुक्तसर जिले में हुआ था। उनका राजनीतिक सफर छात्र राजनीति और युवा कांग्रेस से शुरू हुआ।
वड़िंग ने भारतीय युवा कांग्रेस में भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं। वह 2014 से 2018 तक भारतीय युवा कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे। इस दौरान उन्होंने देशभर में संगठन को मजबूत करने के लिए काम किया।
वह गिद्दड़बाहा विधानसभा सीट से विधायक चुने गए और पंजाब की राजनीति में अपनी पहचान बनाई। 2022 के विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस ने उन्हें प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी। उन्होंने अप्रैल 2022 में नवजोत सिंह सिद्धू की जगह यह पद संभाला था।
2022 के चुनाव में कांग्रेस को 117 सदस्यीय विधानसभा में केवल 18 सीटें मिली थीं, जबकि 2017 में पार्टी ने 77 सीटें हासिल कर सरकार बनाई थी। इस हार के बाद संगठन को फिर से खड़ा करना वड़िंग के सामने बड़ी चुनौती थी।
2024 के लोकसभा चुनाव में वड़िंग खुद लुधियाना सीट से जीतकर संसद पहुंचे। पंजाब में कांग्रेस ने इस चुनाव में 13 में से 7 लोकसभा सीटें जीतीं। इस प्रदर्शन को पार्टी के लिए राज्य में अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने के प्रयास के तौर पर देखा गया।
राजा वड़िंग ने क्यों छोड़ा प्रदेश अध्यक्ष का पद?
वड़िंग के इस्तीफे के पीछे कांग्रेस की पंजाब इकाई में लंबे समय से चल रही खींचतान को प्रमुख वजह माना जा रहा है। पार्टी के भीतर एक धड़ा वड़िंग को प्रदेश अध्यक्ष बनाए रखने के फैसले का विरोध कर रहा था। इस धड़े का नेतृत्व पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी से जुड़े नेता कर रहे थे। उनकी मांग थी कि संगठन की कमान किसी दूसरे नेता को सौंपी जाए, ताकि पार्टी में सभी गुटों को साथ लेकर आगे बढ़ा जा सके।
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, कांग्रेस हाईकमान ने पंजाब में संगठन की स्थिति का आकलन करने के लिए पार्टी के पंजाब प्रभारी सचिन पायलट को जिम्मेदारी दी थी। पायलट ने राज्य के वरिष्ठ नेताओं, विधायकों, पदाधिकारियों और जिला स्तर के कार्यकर्ताओं से बातचीत की। इसके बाद उन्होंने अपनी रिपोर्ट पार्टी नेतृत्व को सौंपी। इस फीडबैक के आधार पर प्रदेश अध्यक्ष बदलने का फैसला लिया गया।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, पायलट ने पंजाब में 50 से अधिक नेताओं और कार्यकर्ताओं से बातचीत की थी। उनकी रिपोर्ट पर राहुल गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के बीच चर्चा हुई। इसके बाद वड़िंग को नेतृत्व के फैसले से अवगत कराया गया।
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जुलाई में भी उठी थी नेतृत्व परिवर्तन की मांग
पंजाब कांग्रेस में नेतृत्व को लेकर यह विवाद अचानक शुरू नहीं हुआ है। इस साल जून और जुलाई में भी प्रदेश संगठन में बदलाव की मांग तेज हुई थी। पार्टी हाईकमान ने इस दौरान राज्य के नेताओं से बातचीत करने के लिए पर्यवेक्षकों की टीम भेजी थी। इसमें अजय माकन, मीनाक्षी नटराजन और भजन लाल जाटव शामिल थे।
इस प्रक्रिया के दौरान प्रदेश अध्यक्ष के पद के लिए कई नामों पर चर्चा हुई। पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी का नाम भी प्रमुखता से सामने आया था। हालांकि, 1 जुलाई को कांग्रेस नेतृत्व ने वड़िंग को प्रदेश अध्यक्ष के पद पर बनाए रखने का फैसला किया।
इस व्यवस्था के तहत चन्नी को चुनाव प्रचार समिति का अध्यक्ष बनाया गया, जबकि विजय इंदर सिंगला को चुनाव प्रबंधन समिति की जिम्मेदारी दी गई। पार्टी ने अलग-अलग नेताओं को संगठन में जिम्मेदारियां देकर गुटों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की।
लेकिन यह व्यवस्था लंबे समय तक विवाद को खत्म नहीं कर सकी। चन्नी के समर्थक नेताओं ने वड़िंग को हटाने की मांग जारी रखी। कुछ नेताओं ने उनके नेतृत्व में होने वाले पार्टी कार्यक्रमों से भी दूरी बनाई। इस कारण प्रदेश कांग्रेस में मतभेद सार्वजनिक रूप से सामने आने लगे।
सचिन पायलट बने प्रभारी
पंजाब कांग्रेस में गुटबाजी को नियंत्रित करने के लिए पार्टी हाईकमान ने सितंबर की शुरुआत में एक और बड़ा संगठनात्मक बदलाव किया। 5 सितंबर को सचिन पायलट को पंजाब कांग्रेस का प्रभारी महासचिव नियुक्त किया गया। उन्होंने छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की जगह यह जिम्मेदारी संभाली।
पायलट की नियुक्ति को पंजाब इकाई में चल रहे मतभेदों को सुलझाने की कोशिश के तौर पर देखा गया। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती अलग-अलग गुटों के नेताओं को एक मंच पर लाना और आगामी विधानसभा चुनाव के लिए संगठन को तैयार करना था।
पद संभालने के बाद पायलट ने पंजाब के नेताओं से मुलाकात की और उनकी शिकायतें सुनीं। उन्होंने अलग-अलग गुटों के प्रतिनिधियों से बातचीत की और संगठन की जमीनी स्थिति का आकलन किया।
15 सितंबर को चंडीगढ़ में आम आदमी पार्टी सरकार के खिलाफ कांग्रेस के विरोध प्रदर्शन के दौरान पार्टी के अलग-अलग गुटों के नेता एक साथ नजर आए थे। इस दौरान नेताओं ने एकजुट होकर सरकार के खिलाफ आवाज उठाने की बात कही। हालांकि, इस सार्वजनिक एकजुटता के बावजूद प्रदेश अध्यक्ष को लेकर विवाद पूरी तरह खत्म नहीं हुआ।
चरणजीत सिंह चन्नी और राजा वड़िंग के बीच विवाद?
पंजाब कांग्रेस में गुटबाजी का सबसे प्रमुख चेहरा चरणजीत सिंह चन्नी और राजा वड़िंग के बीच का मतभेद रहा है। चन्नी सितंबर 2021 से मार्च 2022 तक पंजाब के मुख्यमंत्री रहे थे। कैप्टन अमरिंदर सिंह के मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद उन्हें यह जिम्मेदारी दी गई थी।
2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को आम आदमी पार्टी के हाथों हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद पार्टी ने प्रदेश संगठन में बदलाव करते हुए अप्रैल 2022 में राजा वड़िंग को पंजाब कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया।
हालांकि, समय के साथ वड़िंग के नेतृत्व को लेकर पार्टी के भीतर असहमति बढ़ती गई। चन्नी से जुड़े नेताओं का मानना था कि प्रदेश संगठन में नेतृत्व परिवर्तन की जरूरत है। दूसरी ओर, वड़िंग के समर्थक उनके नेतृत्व में संगठन को आगे बढ़ाने के पक्ष में थे।
चन्नी के समर्थकों की ओर से उन्हें 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित करने की मांग भी उठती रही। वहीं, कांग्रेस विधायक दल के नेता प्रताप सिंह बाजवा और अन्य नेताओं के बीच भी संगठन की रणनीति को लेकर मतभेद सामने आए।
नए प्रदेश अध्यक्ष की रेस में कौन-कौन से नाम?
राजा वड़िंग के इस्तीफे के बाद अब कांग्रेस में नए प्रदेश अध्यक्ष के चयन को लेकर चर्चाएं तेज हैं। पार्टी के सामने केवल किसी एक नेता को जिम्मेदारी सौंपने का सवाल नहीं है, बल्कि पंजाब के अलग-अलग क्षेत्रों, समुदायों और गुटों के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती भी है।
1) विजय इंदर सिंगला:
पूर्व मंत्री और पूर्व सांसद विजय इंदर सिंगला का नाम सबसे प्रमुख दावेदारों में शामिल है। वह पंजाब के संगरूर क्षेत्र से आते हैं और पार्टी में संगठनात्मक जिम्मेदारियां संभाल चुके हैं। उन्हें कांग्रेस का एक प्रमुख हिंदू चेहरा माना जाता है। वह पहले भी प्रदेश अध्यक्ष पद की चर्चा में रहे थे। इस बार भी उनका नाम सबसे आगे बताया जा रहा है।
2) परगट सिंह:
पूर्व भारतीय हॉकी कप्तान और जालंधर कैंट से विधायक परगट सिंह का नाम भी चर्चा में है। वह जाट सिख समुदाय से आते हैं और पंजाब की राजनीति में अपनी अलग पहचान रखते हैं। संगठन के भीतर उनकी भूमिका और अनुभव को देखते हुए उन्हें भी संभावित दावेदार माना जा रहा है।
3) सुखजिंदर सिंह रंधावा:
गुरदासपुर से सांसद सुखजिंदर सिंह रंधावा का नाम भी प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए सामने आया है। वह पंजाब के पूर्व उपमुख्यमंत्री रह चुके हैं और राज्य की राजनीति में लंबे समय से सक्रिय हैं। वह जाट सिख समुदाय से आते हैं।
4) चरणजीत सिंह चन्नी:
पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री चन्नी का नाम भी चर्चा में है। वह दलित समुदाय से आते हैं और राज्य की राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। हालांकि, उन्हें मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनाने की मांग और प्रदेश अध्यक्ष पद की संभावित दावेदारी को अलग-अलग राजनीतिक चर्चाओं के रूप में देखना चाहिए।
5) राणा केपी सिंह और सुखबिंदर सिंह सरकारिया:
पूर्व विधानसभा अध्यक्ष राणा केपी सिंह और राजा सांसी से विधायक सुखबिंदर सिंह सरकारिया के नाम भी संभावित दावेदारों में शामिल हैं।
इन नामों से साफ है कि कांग्रेस नेतृत्व के सामने पंजाब में क्षेत्रीय और सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखकर फैसला लेने की चुनौती है। हालांकि, अंतिम निर्णय पार्टी हाईकमान को ही करना है।
2027 के विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के सामने बड़ी चुनौती
पंजाब में विधानसभा चुनाव 2027 की शुरुआत में होने हैं। ऐसे में कांग्रेस के लिए प्रदेश संगठन में स्थिरता बनाए रखना महत्वपूर्ण है। राज्य में फिलहाल आम आदमी पार्टी की सरकार है और भगवंत मान मुख्यमंत्री हैं।
2022 के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने 117 में से 92 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी। कांग्रेस को 18 सीटों से संतोष करना पड़ा था। शिरोमणि अकाली दल को 3 और भारतीय जनता पार्टी को 2 सीटें मिली थीं।
कांग्रेस अब अगले चुनाव में अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रही है। इसके लिए पार्टी को केवल सरकार के खिलाफ मुद्दे उठाने तक सीमित नहीं रहना होगा, बल्कि बूथ स्तर पर संगठन, कार्यकर्ताओं की सक्रियता और स्थानीय नेताओं के बीच तालमेल पर भी ध्यान देना होगा।
राजा वड़िंग के कार्यकाल में 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन बेहतर रहा था। पार्टी ने सात सीटें जीतकर राज्य में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। लेकिन विधानसभा चुनाव का राजनीतिक समीकरण लोकसभा चुनाव से अलग होता है। इसलिए कांग्रेस के सामने इस प्रदर्शन को विधानसभा स्तर पर दोहराने की चुनौती रहेगी।

