अबू सलेम की रिहाई का मामला भारत और पुर्तगाल के बीच हुए प्रत्यर्पण आश्वासन से जुड़ा है। भारत ने 2002 में भरोसा दिया था कि सलेम को मौत की सजा नहीं दी जाएगी और उसकी कैद 25 साल से अधिक नहीं होगी।
नई दिल्ली: 1993 मुंबई सीरियल बम धमाकों के दोषी गैंगस्टर अबू सलेम को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार, 10 सितंबर को उसकी समय से पहले रिहाई की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया है। सलेम ने दावा किया था कि वह जेल में 25 साल की अवधि पूरी कर चुका है और भारत-पुर्तगाल प्रत्यर्पण समझौते के तहत अब उसे रिहा किया जाना चाहिए। उसका तर्क था कि जेल में अच्छे आचरण के लिए मिली रिमिशन और विचाराधीन कैदी के तौर पर बिताया गया समय भी 25 साल की अवधि की गणना में शामिल किया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। इससे पहले बॉम्बे हाईकोर्ट भी अप्रैल 2026 में सलेम की याचिका खारिज कर चुका था और कहा था कि प्रत्यर्पण के दौरान भारत की ओर से दी गई 25 साल की सीमा को सामान्य जेल रिमिशन के जरिए और कम नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट के मुताबिक, 25 साल की अवधि नवंबर 2030 में पूरी होगी।
अबू सलेम की रिहाई का मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल एक दोषी की सजा का सवाल नहीं है, बल्कि भारत की ओर से पुर्तगाल को दिए गए उस संप्रभु आश्वासन से जुड़ा है जिसके आधार पर सलेम को भारत प्रत्यर्पित किया गया था।
सलेम ने मांगी थी समय से पहले रिहाई
अबू सलेम ने अपनी याचिका में मूल रूप से 25 साल की अवधि की अलग गणना की थी। उसका कहना था कि भारत में गिरफ्तारी के बाद बतौर अंडरट्रायल बिताया गया समय, दोषी ठहराए जाने के बाद जेल में बिताया गया समय और अच्छे आचरण के लिए मिली रिमिशन को जोड़ने पर उसकी कुल अवधि 25 साल से अधिक हो जाती है।
सलेम के वकील ने जुलाई 2026 में सुप्रीम कोर्ट में दलील दी थी कि उसे जेल में अच्छे आचरण के आधार पर करीब तीन साल और दो महीने की रिमिशन मिली है। इसके अलावा अंडरट्रायल अवधि को भी सजा की गणना में शामिल किया जाना चाहिए। उनका तर्क था कि इन अवधियों को जोड़ने पर सलेम 25 साल की सीमा पार कर चुका है।
सलेम की ओर से यह भी कहा गया कि विशेष TADA अदालत ने उसके अंडरट्रायल समय को सेट-ऑफ करने का आदेश दिया था। इसी आधार पर उसकी ओर से जेल अधिकारियों द्वारा की गई गणना पर सवाल उठाया गया।
हालांकि, सरकार का रुख बिल्कुल अलग रहा। केंद्र और महाराष्ट्र सरकार ने कहा कि 25 साल की अवधि को सामान्य जेल रिमिशन के साथ जोड़कर कम नहीं किया जा सकता।
भारत ने पुर्तगाल को क्या आश्वासन दिया था?
अबू सलेम की रिहाई की पूरी कानूनी कहानी भारत और पुर्तगाल के बीच हुए प्रत्यर्पण से जुड़ी है।
सलेम को भारत में कई गंभीर मामलों में आरोपी बनाए जाने के बाद पुर्तगाल से प्रत्यर्पित किया गया था। प्रत्यर्पण की प्रक्रिया के दौरान भारत सरकार ने 17 दिसंबर 2002 को पुर्तगाल सरकार को आश्वासन दिया था कि यदि सलेम को भारत भेजा जाता है तो उसे मौत की सजा नहीं दी जाएगी और उसकी कैद की अवधि 25 साल से अधिक नहीं होगी।
पुर्तगाल की अदालतों में भी इस आश्वासन पर विचार हुआ। इसके बाद लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद अबू सलेम को नवंबर 2005 में भारत प्रत्यर्पित किया गया। वह 11 नवंबर 2005 को भारत लाया गया और इसके बाद उसके खिलाफ अलग-अलग मामलों में सुनवाई चली।
यही आश्वासन बाद में उसके लिए सबसे महत्वपूर्ण कानूनी आधार बन गया। सलेम ने अदालतों में कहा कि जब भारत ने खुद 25 साल से अधिक जेल न रखने का वादा किया है तो उसे उस सीमा के बाद हिरासत में नहीं रखा जा सकता।
2022 में सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था?
अबू सलेम की रिहाई के मामले में 2022 का सुप्रीम कोर्ट का फैसला बेहद महत्वपूर्ण है।
11 जुलाई 2022 को सुप्रीम कोर्ट ने उसकी दोषसिद्धि से जुड़े मामले पर फैसला देते हुए भारत सरकार के पुर्तगाल को दिए गए संप्रभु आश्वासन को ध्यान में रखा। अदालत ने कहा कि सरकार को उस आश्वासन का सम्मान करना होगा और 25 साल की अवधि पूरी होने के बाद रिहाई के लिए जरूरी प्रक्रिया पर विचार करना होगा।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने उस समय सलेम को कोई विशेष रियायत देने से इनकार किया था। अदालत ने अपराध की गंभीरता को भी ध्यान में रखा और यह स्पष्ट किया कि प्रत्यर्पण की शर्तों के कारण 25 साल की सीमा लागू होना अपने आप में एक महत्वपूर्ण राहत है।
सलेम का कहना था कि उसे जेल नियमों के तहत मिली रिमिशन को भी 25 साल में जोड़ा जाना चाहिए, जबकि सरकार और बाद में बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसा करने से 25 साल की सीमा और कम हो जाएगी।
बॉम्बे हाईकोर्ट का अप्रैल 2026 का फैसला
सुप्रीम कोर्ट से पहले सलेम ने बॉम्बे हाईकोर्ट का रुख किया था। अप्रैल 2026 में जस्टिस अजय एस. गडकरी और जस्टिस कमल खाता की पीठ ने उसकी याचिका खारिज कर दी।
हाईकोर्ट ने कहा कि सलेम ने जेल में अच्छे आचरण के लिए मिली रिमिशन को 25 साल की सीमा में शामिल करके अपनी रिहाई का दावा किया है, लेकिन यह कानूनी रूप से स्वीकार्य नहीं है। अदालत के मुताबिक, प्रत्यर्पण समझौते के तहत तय 25 साल की अवधि को सामान्य जेल रिमिशन से और कम नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि 25 साल की सीमा खुद जीवनभर की सजा के मुकाबले एक बड़ी रियायत है। अगर इसके ऊपर सामान्य रिमिशन भी लागू कर दी जाए तो सजा की अवधि उस सीमा से भी नीचे चली जाएगी, जो भारत ने पुर्तगाल को दिए आश्वासन के संदर्भ में तय की थी।
अदालत ने इस आधार पर कहा कि सलेम की तत्काल रिहाई की मांग समय से पहले और कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि 25 साल की अवधि नवंबर 2030 में पूरी होगी।
सुप्रीम कोर्ट में जुलाई 2026 की सुनवाई
मामला दोबारा सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो जुलाई 2026 में जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने सुनवाई की।
सलेम के वरिष्ठ वकील ऋषि मल्होत्रा ने दलील दी कि जेल में उसके अच्छे आचरण के कारण मिली रिमिशन को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने यह भी कहा कि अंडरट्रायल अवधि को सेट-ऑफ करने का आदेश पहले ही दिया जा चुका है।
वकील ने अदालत के सामने यह तर्क भी रखा कि सलेम ने कुल मिलाकर 25 साल से अधिक की अवधि जेल से जुड़ी विभिन्न अवधियों में पूरी कर ली है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सुनवाई पूरी करने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। अब 10 सितंबर को अदालत ने उसकी समयपूर्व रिहाई की मांग खारिज कर दी।
1993 मुंबई ब्लास्ट में अबू सलेम की भूमिका
अबू सलेम का नाम 12 मार्च 1993 को मुंबई में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों के मामले में प्रमुख आरोपियों में रहा है।
इन धमाकों में मुंबई के अलग-अलग हिस्सों में कई जगह विस्फोट हुए थे। हमलों में 257 लोगों की मौत हुई थी और बड़ी संख्या में लोग घायल हुए थे। मामले की जांच में सलेम की भूमिका हथियार और विस्फोटक पहुंचाने तथा साजिश से जुड़े नेटवर्क से जोड़ी गई थी।

अभियोजन के अनुसार, धमाकों की साजिश बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद पैदा हुए सांप्रदायिक तनाव की पृष्ठभूमि में रची गई थी। सलेम पर हथियारों और गोला-बारूद की व्यवस्था तथा उन्हें संबंधित लोगों तक पहुंचाने में भूमिका निभाने का आरोप था।
यह मामला भारत के सबसे बड़े और लंबे समय तक चलने वाले आतंकवादी मामलों में से एक रहा है।
2017 में मिली थी उम्रकैद
मुंबई की विशेष TADA अदालत ने सितंबर 2017 में अबू सलेम को 1993 मुंबई बम धमाकों के मामले में दोषी ठहराया और उम्रकैद की सजा सुनाई।
इससे पहले 2015 में उसे मुंबई के बिल्डर प्रदीप जैन की हत्या के मामले में भी उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। दोनों मामलों में मिली सजा को लेकर बाद में अलग-अलग कानूनी कार्यवाही हुई।
सलेम का कहना रहा है कि पुर्तगाल को दिए गए भारत सरकार के आश्वासन के कारण उसकी जेल की अवधि 25 साल से ज्यादा नहीं हो सकती।
क्या 2030 में होगी अबू सलेम की रिहाई?
सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा फैसले का मतलब यह नहीं है कि अदालत ने सलेम को जीवनभर जेल में रखने का रास्ता खोल दिया है। असल विवाद 25 साल की अवधि से पहले रिहाई को लेकर था।
भारत सरकार ने पहले ही सुप्रीम कोर्ट के सामने स्पष्ट किया था कि वह पुर्तगाल को दिए गए आश्वासन से बंधी है और 25 साल की अवधि पूरी होने पर उसके अनुरूप कार्रवाई करेगी। सरकार ने 2022 में अदालत को बताया था कि यह अवधि नवंबर 2030 में पूरी होगी।
बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी अप्रैल 2026 में यही स्थिति दोहराई थी। इसलिए मौजूदा फैसला तत्काल रिहाई की मांग को खारिज करता है; यह 25 साल की प्रत्यर्पण-आधारित सीमा को खत्म नहीं करता।
हालांकि, सलेम की रिहाई की अंतिम प्रक्रिया उस समय लागू कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के अनुसार होगी। 2022 के सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार सरकार को 25 साल की अवधि पूरी होने के आसपास रिमिशन और रिहाई से संबंधित प्रक्रिया पर कार्रवाई करनी होगी।
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