बिहार में 87,623 और दिल्ली में 12,078 TB मामलों की पहचान हुई। जानिए बड़े पैमाने पर हुई स्क्रीनिंग से सामने आए ये आंकड़े TB की छिपी बीमारी को लेकर क्या संकेत देते हैं।
नई दिल्ली/पटना: भारत में टीबी यानी Tuberculosis (TB) को खत्म करने की कोशिशों के बीच दिल्ली और बिहार से सामने आए ताजा स्क्रीनिंग आंकड़ों ने सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने बीमारी की बड़ी चुनौती को फिर उजागर किया है। दिल्ली में सिर्फ 42 दिनों के विशेष आंकड़ों अभियान के दौरान 12,078 TB मरीजों की पहचान हुई, जबकि बिहार में करीब छह सप्ताह चले राज्यव्यापी स्क्रीनिंग अभियान में 87,623 मामले सामने आए। बिहार में स्वास्थ्य विभाग ने इस दौरान 2.36 करोड़ से ज्यादा लोगों की स्क्रीनिंग की, जो निर्धारित एक करोड़ के लक्ष्य से दोगुने से भी अधिक है।
इन आंकड़ों को सीधे तौर पर TB के नए संक्रमण में अचानक हुई वृद्धि नहीं माना जा सकता। दरअसल, बड़े पैमाने पर की गई सक्रिय स्क्रीनिंग का उद्देश्य उन मरीजों को भी पहचानना है जिनमें बीमारी के स्पष्ट लक्षण नहीं हैं या जिन्होंने अभी तक इलाज के लिए स्वास्थ्य केंद्र का रुख नहीं किया है।
बिहार में 87 हजार से ज्यादा TB मामले मिले
बिहार में 2 जुलाई से 14 अगस्त 2026 तक राज्यव्यापी TB स्क्रीनिंग और टेस्टिंग अभियान चलाया गया। स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक, अभियान का लक्ष्य एक करोड़ लोगों की स्क्रीनिंग करना था, लेकिन स्वास्थ्यकर्मियों ने 2.36 करोड़ लोगों तक पहुंच बनाई। इस दौरान कुल 87,623 TB मामलों की पहचान हुई।
बिहार State Health Society की अतिरिक्त कार्यकारी निदेशक अनुपमा सिंह के अनुसार, सामने आए मामलों में 21,550 लोग ऐसे थे जिनमें TB के स्पष्ट लक्षण नहीं थे। इसका मतलब यह है कि अगर स्क्रीनिंग केवल उन लोगों तक सीमित रहती जिनमें लगातार खांसी, बुखार या वजन कम होने जैसे पारंपरिक लक्षण मौजूद थे, तो बड़ी संख्या में मरीज पहचान से बाहर रह सकते थे।
स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, अभियान के दौरान 74,871 मरीजों को differentiated TB care के लिए आकलन किया गया। राज्य ने TB की पहचान और निदान को मजबूत करने के लिए अपनी diagnostic infrastructure को भी बढ़ाया है।
बिहार में वर्तमान में 491 Digital X-ray मशीनें उपलब्ध हैं, जिनमें 140 AI-powered ultraportable handheld X-ray मशीन शामिल हैं।
यह तकनीक खासकर उन क्षेत्रों में उपयोगी हो सकती है जहां लोगों को जांच के लिए बड़े अस्पतालों तक पहुंचने में कठिनाई होती है। Portable X-ray और डिजीटल स्क्रीनिंग के जरिए स्वास्थ्यकर्मी समुदाय के बीच जाकर संभावित मरीजों की पहचान कर सकते हैं और जरूरत पड़ने पर आगे की जांच करा सकते हैं।
दिल्ली में 42 दिन में 12,078 मरीजों की पहचान
बिहार से पहले दिल्ली में भी बड़े स्तर पर सक्रिय TB स्क्रीनिंग के नतीजों ने स्वास्थ्य विभाग का ध्यान खींचा था। 24 मार्च से 5 मई 2026 के बीच चले विशेष अभियान में राजधानी में 12,078 TB मामलों की पहचान हुई।
दिल्ली में यह स्क्रीनिंग खास तौर पर high-risk areas और vulnerable communities पर केंद्रित थी। रिपोर्टों के अनुसार, अभियान में झुग्गी बस्तियों और अन्य ऐसे इलाकों को शामिल किया गया जहां TB transmission का जोखिम अपेक्षाकृत ज्यादा हो सकता है। Portable X-ray जैसी तकनीकों की मदद से ऐसे लोगों तक पहुंचने की कोशिश की गई, जो सामान्य परिस्थितियों में जांच के लिए अस्पताल नहीं पहुंचते।
दिल्ली के आंकड़ों में एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आया। उपलब्ध स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, सामने आए मामलों में करीब 42 प्रतिशत Extrapulmonary TB के थे। यानी संक्रमण केवल फेफड़ों तक सीमित नहीं था, बल्कि शरीर के अन्य हिस्सों में भी TB की पहचान हुई।
यह आंकड़ा महत्वपूर्ण है क्योंकि TB को आमतौर पर केवल फेफड़ों की बीमारी समझा जाता है, जबकि वास्तव में Mycobacterium Tuberculosis शरीर के कई अंगों को प्रभावित कर सकता है।
बिना लक्षण वाले मरीजों की बढ़ती तादाद
बिहार की स्क्रीनिंग में 21,550 ऐसे लोगों का मिलना, जिनमें TB के स्पष्ट लक्षण नहीं थे, इस अभियान की सबसे महत्वपूर्ण बातों में से एक है।
TB की सामान्य पहचान लगातार खांसी से की जाती है, लेकिन हर मरीज शुरुआत में इसी तरह सामने नहीं आता। WHO के अनुसार TB के सामान्य लक्षणों में लंबे समय तक रहने वाली खांसी, कभी-कभी खून के साथ खांसी, सीने में दर्द, कमजोरी, थकान, वजन कम होना, बुखार और रात में पसीना आना शामिल हैं।
लेकिन बीमारी के लक्षण व्यक्ति और शरीर के प्रभावित हिस्से के अनुसार बदल सकते हैं। यही कारण है कि केवल symptoms-based approach से सभी मामलों की पहचान करना मुश्किल हो सकता है।
यहीं सक्रिय स्क्रीनिंग की भूमिका बढ़ जाती है। इसमें स्वास्थ्यकर्मी केवल अस्पताल आने वाले मरीजों की जांच नहीं करते, बल्कि high-risk communities में जाकर संभावित मरीजों को खोजते हैं।
TB आखिर 7फैलता कैसे है?
TB एक bacterial infectious disease है, जिसका मुख्य कारण Mycobacterium tuberculosis है। यह बीमारी सबसे ज्यादा फेफड़ों को प्रभावित करती है। फेफड़ों की सक्रिय TB से पीड़ित व्यक्ति के खांसने, छींकने या बोलने के दौरान हवा में मौजूद सूक्ष्म कणों के जरिए संक्रमण दूसरे व्यक्ति तक पहुंच सकता है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि TB संक्रमित व्यक्ति के साथ हर तरह का संपर्क होने पर बीमारी निश्चित रूप से फैल जाएगी। संक्रमण का जोखिम कई परिस्थितियों पर निर्भर करता है, जिनमें संक्रमित व्यक्ति की बीमारी का प्रकार, संपर्क की अवधि और वातावरण जैसी चीजें महत्वपूर्ण हैं।
भारत के लिए TB अभी भी बड़ी चुनौती
TB को खत्म करने की दिशा में भारत ने पिछले वर्षों में निदान, उपचार और सक्रिय केस फाइंडिंग पर जोर बढ़ाया है। लेकिन देश की बड़ी आबादी और सामाजिक-आर्थिक असमानताओं के कारण TB का बोझ अब भी गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बना हुआ है।
संगठन के मुताबिक हर दिन दुनिया भर में लगभग 4,500 लोगों की TB से मौत होती है और करीब 30,000 लोग TB से बीमार पड़ते हैं।
WHO यह भी स्पष्ट करता है कि TB preventable और curable बीमारी है। इसका मतलब है कि सही समय पर diagnosis और प्रभावी treatment से मरीज ठीक हो सकता है और संक्रमण के प्रसार को भी कम किया जा सकता है।
इसलिए दिल्ली और बिहार के screening आंकड़ों का महत्व केवल मरीजों की संख्या में नहीं है। ये आंकड़े यह बताते हैं कि active case finding कितनी महत्वपूर्ण हो सकती है, खासकर उन समुदायों में जहां लोग बीमारी के लक्षणों को नजरअंदाज कर देते हैं या स्वास्थ्य सुविधाओं तक उनकी पहुंच सीमित होती है।
बीमारी की पहचान में स्क्रीनिंग का बढ़ता महत्व
पारंपरिक स्वास्थ्य प्रणाली में आमतौर पर मरीज लक्षण महसूस होने के बाद डॉक्टर के पास पहुंचता है। लेकिन TB में यह तरीका हमेशा पर्याप्त नहीं हो सकता। कुछ मरीज लंबे समय तक बीमारी के साथ रह सकते हैं और निदान में देरी हो सकती है।
इसी वजह से public health programmes increasingly active screening पर जोर दे रहे हैं। दिल्ली और बिहार के अभियान इसका उदाहरण हैं।
बिहार में 2.36 करोड़ लोगों की स्क्रीनिंग और दिल्ली में हजारों मामलों की पहचान यह दिखाती है कि जब स्वास्थ्य व्यवस्था समुदाय के भीतर जाकर जांच करती है तो previously undetected cases की पहचान संभव होती है।
यह रणनीति खास तौर पर उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण है जो आर्थिक, सामाजिक या भौगोलिक कारणों से नियमित healthcare services का इस्तेमाल नहीं कर पाते।
इलाज अधूरा छोड़ना क्यों खतरनाक है?
TB का इलाज संभव है, लेकिन इलाज को डॉक्टर और स्वास्थ्य कार्यक्रम की सलाह के अनुसार पूरा करना जरूरी है। दवा बीच में छोड़ना या अनियमित तरीके से लेना बीमारी के नियंत्रण को मुश्किल बना सकता है और drug-resistant TB जैसी गंभीर समस्या का जोखिम पैदा कर सकता है।
WHO के अनुसार TB preventable और curable है, लेकिन इसके लिए समय पर diagnosis और उचित treatment जरूरी है।
यही कारण है कि केवल मरीज की पहचान करना पर्याप्त नहीं है। स्क्रीनिंग के बाद treatment initiation, adherence, follow-up और contact tracing भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
दिल्ली और बिहार के आंकड़े क्या संदेश देते हैं?
दिल्ली में 42 दिनों में 12,078 और बिहार में छह सप्ताह के अभियान में 87,623 TB मामलों की पहचान एक महत्वपूर्ण public health signal है। लेकिन इन आंकड़ों को सीधे “TB तेजी से बढ़ रही है” कहकर पेश करना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा। दोनों आंकड़े विशेष screening campaigns से आए हैं और इन अभियानों ने उन मामलों को भी पकड़ने की कोशिश की जिन्हें routine healthcare system शायद तुरंत पहचान नहीं पाता।
फिर भी इन आंकड़ों से एक बात स्पष्ट है, TB की छिपी हुई बीमारी को खोजने के लिए सक्रिय स्क्रीनिंग की जरूरत अभी खत्म नहीं हुई है।
बिहार में 2.36 करोड़ लोगों की स्क्रीनिंग और दिल्ली में high-risk communities पर केंद्रित अभियान यह बताते हैं कि बड़े पैमाने पर case-finding से स्वास्थ्य व्यवस्था को बीमारी की वास्तविक तस्वीर समझने में मदद मिल सकती है।
अब चुनौती यह है कि सामने आए मरीजों को समय पर उपचार मिले, उनके संपर्क में आने वाले लोगों की जांच हो और उन समुदायों तक स्क्रीनिंग पहुंचाई जाए जहां TB का जोखिम ज्यादा है।
दिल्ली और बिहार की हालिया screening drives ने कम से कम इतना जरूर दिखाया है कि जो मरीज स्वास्थ्य व्यवस्था तक खुद नहीं पहुंच पा रहे हैं, उन्हें खोजने के लिए स्वास्थ्य व्यवस्था को उनके बीच जाना होगा। यही active screening भारत के TB elimination प्रयासों को मजबूत करने की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण कदमों में से एक हो सकता है।




