लाल सागर में सऊदी तेल टैंकरों पर हूती हमले के दावे ने तनाव बढ़ा दिया है। जानिए यमन संघर्ष, सऊदी-हूती दुश्मनी और वैश्विक तेल बाजार व समुद्री व्यापार पर इसके संभावित असर की पूरी कहानी।
सना/ रियाद: लाल सागर में एक बार फिर ऐसा घटनाक्रम सामने आया है, जिसने मध्य पूर्व की सुरक्षा के साथ-साथ वैश्विक तेल और समुद्री व्यापार को लेकर भी चिंता बढ़ा दी है। यमन के हूती आंदोलन ने 22 जुलाई 2026 को दावा किया कि उसने लाल सागर में दो सऊदी तेल टैंकरों एन्सेलिया (Encelia) और लैला (Layla) को निशाना बनाया। हूतियों के मुताबिक, यह कार्रवाई सऊदी अरब पर लगाए गए उनके कथित नौसैनिक प्रतिबंध या ‘ब्लॉकेड’ का उल्लंघन करने के जवाब में की गई।
सऊदी सरकारी समाचार एजेंसी SPA के अनुसार, Encelia को नुकसान पहुंचा और उसके अगले हिस्से में आग लग गई, लेकिन जहाज के सभी चालक दल सुरक्षित बताए गए।
ब्रिटेन की UK Maritime Trade Operations (UKMTO) ने भी एक टैंकर पर अज्ञात प्रोजेक्टाइल लगने और आग लगने की सूचना दी, हालांकि उसने हमलावर की पहचान नहीं की।
यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि हूतियों और सऊदी अरब के बीच दुश्मनी कोई नई बात नहीं है। दोनों के बीच संघर्ष की जड़ें यमन के गृहयुद्ध, क्षेत्रीय सत्ता संघर्ष और ईरान-सऊदी प्रतिद्वंद्विता तक जाती हैं।
पिछले एक दशक में हूती लड़ाकों ने सऊदी क्षेत्र को मिसाइल और ड्रोन से निशाना बनाया है, जबकि सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने यमन में हूती ठिकानों के खिलाफ सैन्य अभियान चलाया।
हूतियों ने हमले का दावा किया
हूती आंदोलन के अनुसार, Encelia और Layla को निशाना बनाने की कार्रवाई इसलिए की गई क्योंकि इन जहाजों ने सऊदी अरब पर लगाए गए उनके कथित समुद्री प्रतिबंध का उल्लंघन किया था। हूतियों ने दावा किया कि हमले में बैलिस्टिक मिसाइलों, क्रूज मिसाइलों और ड्रोन का इस्तेमाल किया गया।
हूती पक्ष ने यह भी दावा किया कि कई अन्य जहाजों को वापस लौटने या अपना रास्ता बदलने के लिए मजबूर किया गया। कुछ टैंकरों ने हूती चेतावनियों के बाद अपना रास्ता बदला, जबकि कम से कम एक जहाज पर हमले की पुष्टि से जुड़ी जानकारी सामने आई।
सऊदी अरब और हूतियों के बीच दुश्मनी की शुरुआत कैसे हुई?
आज के संघर्ष को समझने के लिए यमन के आधुनिक राजनीतिक इतिहास को समझना जरूरी है।
हूती आंदोलन, जिसे आधिकारिक रूप से Ansar Allah यानी ‘ईश्वर के सहायक’ कहा जाता है, उत्तरी यमन में जायदिया शिया समुदाय के बीच विकसित हुआ। इसका शुरुआती विकास 1980 और 1990 के दशक में धार्मिक और सांस्कृतिक पुनरुत्थान के आंदोलन के रूप में हुआ।

समूह का नाम इसके प्रमुख परिवार अल-हूती से आया। आंदोलन के शुरुआती प्रमुख नेताओं में हुसैन बद्र अल-दीन अल-हूती का नाम महत्वपूर्ण है।

1990 में उत्तर और दक्षिण यमन के एकीकरण के बाद देश में राजनीतिक अस्थिरता बनी रही। लंबे समय तक सत्ता में रहे राष्ट्रपति अली अब्दुल्लाह सालेह के शासन के खिलाफ भी कई समूह असंतुष्ट थे।

2004 में हुसैन अल-हूती के नेतृत्व में सरकार के खिलाफ विद्रोह शुरू हुआ। उनकी मौत के बाद भी हूती आंदोलन समाप्त नहीं हुआ और उसने उत्तरी यमन में अपना प्रभाव बढ़ाना जारी रखा।
समय के साथ हूतियों का विरोध केवल धार्मिक या स्थानीय मुद्दों तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने यमन की सरकार, अमेरिका और सऊदी प्रभाव के खिलाफ भी अपनी राजनीति को मजबूत किया।
2014 में बदला पूरा समीकरण
हूतियों और सऊदी अरब के बीच संघर्ष का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ 2014 में आया।
उस समय यमन में राष्ट्रपति अब्द रब्बुह मंसूर हादी की सरकार सत्ता में थी। देश आर्थिक संकट, बेरोजगारी और राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहा था। ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी के खिलाफ हूतियों ने बड़े पैमाने पर प्रदर्शन किए।
धीरे-धीरे हूती लड़ाकों ने राजधानी सना पर अपना नियंत्रण मजबूत कर लिया। सितंबर 2014 तक वे राजधानी के बड़े हिस्से पर काबिज हो गए और सरकार पर दबाव बढ़ने लगा।
जनवरी 2015 में हूतियों ने राष्ट्रपति भवन पर कब्जा कर लिया। इसके बाद हादी की सरकार कमजोर पड़ गई और वह आखिरकार यमन से निकलकर सऊदी अरब पहुंच गए।
सऊदी अरब का सैन्य अभियान
मार्च 2015 में सऊदी अरब के नेतृत्व में एक सैन्य गठबंधन ने यमन में हूतियों के खिलाफ अभियान शुरू किया। इसका घोषित उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त यमनी सरकार को फिर से सत्ता में स्थापित करना था।
सऊदी अरब के लिए यह संघर्ष कई कारणों से महत्वपूर्ण था। यमन उसके दक्षिणी सीमा से लगा हुआ है और हूतियों के बढ़ते प्रभाव को रियाद अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा मानता रहा है।
दूसरी तरफ हूतियों को ईरान का समर्थन मिलने के आरोप लगातार लगते रहे हैं। ईरान और सऊदी अरब के बीच लंबे समय से क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर प्रतिस्पर्धा रही है। इसलिए यमन का संघर्ष धीरे-धीरे एक व्यापक क्षेत्रीय शक्ति संघर्ष के रूप में भी देखा जाने लगा।
हालांकि ईरान और हूतियों के संबंधों की प्रकृति और समर्थन की सीमा पर अलग-अलग विश्लेषण हैं, लेकिन अमेरिका और अन्य पश्चिमी सरकारें हूतियों को ईरान समर्थित सशस्त्र आंदोलन के रूप में देखती हैं।
हूती आंदोलन इतना शक्तिशाली कैसे बना?
हूतियों की ताकत का सबसे बड़ा कारण यह है कि उन्होंने लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष के बीच उत्तरी और पश्चिमी यमन में अपना मजबूत संगठनात्मक और सैन्य ढांचा तैयार किया।
आज हूतियों का नियंत्रण यमन के बड़े हिस्से पर है, जिसमें राजधानी सना भी शामिल है। उनके पास मिसाइल और ड्रोन क्षमताएं हैं और वे समुद्री मार्गों को प्रभावित करने की क्षमता भी प्रदर्शित कर चुके हैं।
यमन के गृहयुद्ध में उन्हें स्थानीय समर्थन के अलावा ईरान से सैन्य और तकनीकी सहायता मिलने के आरोप लगते रहे हैं। दूसरी ओर सऊदी अरब और उसके सहयोगियों ने लंबे समय तक हूतियों के खिलाफ सैन्य अभियान चलाया।
इससे लाखों लोग विस्थापित हुए और देश में खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य व्यवस्था और बुनियादी सुविधाओं पर गंभीर असर पड़ा।
लाल सागर में हूतियों की भूमिका
यमन की भौगोलिक स्थिति हूतियों को रणनीतिक महत्व देती है। यमन के पश्चिम में लाल सागर है और दक्षिण-पश्चिम में बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य स्थित है। यह जलमार्ग लाल सागर को अदन की खाड़ी और आगे हिंद महासागर से जोड़ता है।
यूरोप और एशिया के बीच समुद्री व्यापार के लिए यह रास्ता बेहद महत्वपूर्ण है। कई जहाज इसी मार्ग से होकर स्वेज नहर तक पहुंचते हैं।
इसलिए यदि हूती हमलों के कारण इस क्षेत्र में जहाजों की आवाजाही जोखिमपूर्ण होती है, तो कंपनियां अपने जहाजों को अफ्रीका के दक्षिणी छोर यानी केप ऑफ गुड होप के रास्ते भेजने पर मजबूर हो सकती हैं। इससे यात्रा का समय और लागत दोनों बढ़ जाते हैं।
तेल टैंकरों के मामले में यह चिंता और गंभीर हो जाती है, क्योंकि लाल सागर और स्वेज मार्ग ऊर्जा आपूर्ति की वैश्विक श्रृंखला का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
2023 के बाद हूती हमले और वैश्विक असर
इजरायल-हमास युद्ध शुरू होने के बाद हूतियों ने नवंबर 2023 से लाल सागर में वाणिज्यिक जहाजों को निशाना बनाना शुरू किया। हूतियों ने इन हमलों को फिलिस्तीनियों के समर्थन में कार्रवाई बताया और कहा कि वे इजरायल से जुड़े जहाजों को निशाना बना रहे हैं।
लेकिन इसके बाद कई अंतरराष्ट्रीय जहाजों पर हमले और मिसाइल-ड्रोन गतिविधियां सामने आईं। अमेरिका और ब्रिटेन ने जनवरी 2024 में यमन में हूती ठिकानों पर हवाई हमले किए।
कई बड़ी शिपिंग कंपनियों ने अपने जहाजों को लाल सागर और स्वेज नहर के बजाय केप ऑफ गुड होप के रास्ते भेजना शुरू किया। इसका सीधा असर माल ढुलाई की लागत, यात्रा के समय और बीमा प्रीमियम पर पड़ा।
अब 2026 में सऊदी तेल टैंकरों पर हमले के दावे ने इस चिंता को फिर से बढ़ा दिया है कि कहीं लाल सागर में संघर्ष का एक नया चरण शुरू न हो जाए।
सऊदी तेल टैंकरों पर हमले का क्या होगा असर?
अगर ऐसे हमले लगातार होते हैं, तो इसका सबसे बड़ा असर समुद्री व्यापार और ऊर्जा बाजार पर पड़ सकता है।
पहला असर तेल परिवहन पर होगा। सऊदी अरब दुनिया के प्रमुख तेल उत्पादकों में से एक है। हालांकि उसके पास तेल निर्यात के लिए लाल सागर के अलावा फारस की खाड़ी और अन्य मार्ग भी हैं, फिर भी समुद्री मार्गों में अस्थिरता लॉजिस्टिक्स को प्रभावित कर सकती है।
दूसरा असर बीमा लागत पर पड़ सकता है। युद्ध क्षेत्र से गुजरने वाले जहाजों के लिए बीमा प्रीमियम बढ़ सकता है।
तीसरा असर शिपिंग लागत पर होगा। अगर कंपनियां जहाजों को लंबा रास्ता अपनाने के लिए मजबूर करती हैं, तो ईंधन और समय दोनों की लागत बढ़ेगी।
चौथा असर वैश्विक तेल बाजार पर मनोवैज्ञानिक हो सकता है। ऊर्जा बाजार अक्सर केवल वास्तविक आपूर्ति पर नहीं, बल्कि संभावित व्यवधान के खतरे पर भी प्रतिक्रिया करता है।
क्या यह सऊदी-हूती संघर्ष का नया दौर है?
सऊदी अरब और हूतियों के बीच पिछले कुछ वर्षों में तनाव कम करने की कोशिशें भी हुई हैं। 2022 में संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता में युद्धविराम से कुछ समय के लिए हिंसा में कमी आई थी। इसके बाद भी दोनों पक्षों के बीच स्थायी राजनीतिक समझौता नहीं हो पाया।
यमन का संघर्ष अभी भी कई स्तरों पर जटिल है। यहां केवल हूती और सऊदी अरब ही पक्ष नहीं हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त यमनी सरकार, दक्षिणी अलगाववादी ताकतें और अन्य स्थानीय गुट भी सत्ता और क्षेत्रीय नियंत्रण की लड़ाई में शामिल हैं।
इसलिए यदि हूतियों और सऊदी अरब के बीच समुद्री टकराव बढ़ता है, तो यह यमन के अंदरूनी संघर्ष को एक बार फिर क्षेत्रीय संकट में बदल सकता है।
ये भी पढ़ें :- अमेरिका-सऊदी परमाणु डील से मचा हड़कंप! क्या यूरेनियम संवर्धन की छूट से सऊदी अरब बना सकता है परमाणु बम?


