देश में औसतन हर दिन 25 सरकारी स्कूल बंद हो रहे हैं। 94 हजार स्कूलों के बंद होने, 2.26 करोड़ छात्रों के घटते नामांकन और शिक्षा व्यवस्था पर पड़ रहे असर को विस्तार से समझें।
नई दिल्ली: कल्पना कीजिए कि आपके गांव का सरकारी स्कूल, जहां कभी बच्चों की चहल-पहल गूंजती थी, आज पूरी तरह बंद हो चुका है। खेल का मैदान सूना है, कक्षाओं के दरवाजों पर ताले लगे हैं और ब्लैकबोर्ड पर लिखी आखिरी तारीख भी महीनों पुरानी हो चुकी है। यह किसी एक गांव या एक राज्य की कहानी नहीं, बल्कि देशभर में तेजी से बदलते शिक्षा परिदृश्य की तस्वीर है।
हाल के वर्षों में भारत की स्कूली शिक्षा में कई ऐसे बदलाव देखने को मिले हैं, जो एक साथ उम्मीद भी जगाते हैं और चिंता भी बढ़ाते हैं। एक ओर देश में पहली बार स्कूल शिक्षकों की संख्या 1 करोड़ से अधिक पहुंच गई है, वहीं दूसरी ओर पिछले एक दशक में करीब 94,000 सरकारी स्कूल बंद हो चुके हैं।
छात्रों के नामांकन में 2.26 करोड़ की कमी दर्ज की गई है और आज भी एक लाख से अधिक स्कूल ऐसे हैं, जहां केवल एक शिक्षक पूरे स्कूल की जिम्मेदारी संभाल रहा है।
नीति आयोग की हालिया रिपोर्ट, संसद में साझा किए गए UDISE+ आंकड़ों और शिक्षा मंत्रालय के नवीनतम डेटा ने भारतीय स्कूली शिक्षा व्यवस्था के सामने मौजूद इन विरोधाभासों को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
10 साल में 94 हजार से अधिक सरकारी स्कूल हुए बंद
नीति आयोग की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2014-15 से 2023-24 के बीच देशभर में लगभग 94,000 सरकारी स्कूल बंद हो गए। इसका अर्थ है कि औसतन हर दिन लगभग 25 सरकारी स्कूलों का संचालन बंद हुआ।
इन स्कूलों के बंद होने के पीछे सिर्फ एक कारण नहीं है। कई राज्यों में कम छात्र संख्या वाले स्कूलों को दूसरे स्कूलों में विलय (School Merger) कर दिया गया, जबकि कई स्थानों पर लगातार घटते नामांकन के कारण स्कूलों को बंद करना पड़ा।
कुछ स्कूल प्रशासनिक पुनर्गठन का हिस्सा बने, तो कुछ ऐसे क्षेत्रों में बंद हुए जहां आबादी का पलायन लगातार बढ़ रहा था।
विशेषज्ञों का मानना है कि स्कूलों का एकीकरण संसाधनों के बेहतर उपयोग के लिए किया गया, लेकिन इसका असर दूरदराज के ग्रामीण और आदिवासी इलाकों के बच्चों पर सबसे ज्यादा पड़ा। कई स्थानों पर बच्चों को अब पहले की तुलना में कई किलोमीटर दूर जाकर पढ़ाई करनी पड़ रही है।
मध्य प्रदेश में सबसे ज्यादा असर
रिपोर्ट के अनुसार, सरकारी स्कूलों के बंद होने के मामलों में मध्य प्रदेश सबसे ऊपर है। देशभर में बंद हुए स्कूलों में आधे से अधिक केवल मध्य प्रदेश में दर्ज किए गए हैं।
राज्य सरकार का तर्क है कि बड़ी संख्या में स्कूलों का विलय इसलिए किया गया ताकि संसाधनों और शिक्षकों का बेहतर उपयोग हो सके। हालांकि शिक्षा क्षेत्र से जुड़े कई विशेषज्ञों का कहना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूलों के विलय से प्राथमिक कक्षाओं के बच्चों की नियमित उपस्थिति प्रभावित हुई है। छोटे बच्चों के लिए लंबी दूरी तय करना आसान नहीं होता, जिसका असर नामांकन और पढ़ाई दोनों पर पड़ सकता है।
इसके अलावा उत्तर प्रदेश, राजस्थान, ओडिशा और कुछ अन्य राज्यों में भी सरकारी स्कूलों की संख्या में कमी दर्ज की गई है, हालांकि इन राज्यों में कारण अलग-अलग रहे हैं।
2.26 करोड़ घटे छात्रों के नामांकन
स्कूलों के बंद होने के पीछे सबसे बड़ी वजहों में से एक छात्रों की संख्या में लगातार आई गिरावट है।
UDISE+ के आंकड़ों के अनुसार, पिछले दस वर्षों में सरकारी स्कूलों में नामांकन करीब 2.26 करोड़ कम हुआ है। इसके पीछे कई कारण समझे जा सकते हैं।
सबसे पहला कारण निजी स्कूलों की ओर बढ़ता रुझान है। पिछले एक दशक में छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों तक निजी स्कूलों का विस्तार हुआ है। बेहतर अंग्रेजी माध्यम, आधुनिक सुविधाएं और बेहतर परिणामों की उम्मीद में बड़ी संख्या में अभिभावकों ने अपने बच्चों का दाखिला निजी स्कूलों में कराया।
इसके अलावा शहरीकरण और पलायन भी महत्वपूर्ण कारण रहे हैं। गांवों से शहरों की ओर रोजगार के लिए जाने वाले परिवारों के कारण कई ग्रामीण स्कूलों में छात्रों की संख्या लगातार गिरावट देखी गई है।
जनसंख्या के स्वरूप में बदलाव और कई राज्यों में जन्म दर में कमी का असर भी प्राथमिक विद्यालयों के नामांकन पर दिखाई देने लगा है।
शिक्षा व्यवस्था के सामने दोहरी चुनौती
भारत आज दुनिया की सबसे युवा आबादी वाले देशों में शामिल है। ऐसे में गुणवत्तापूर्ण स्कूली शिक्षा केवल सामाजिक आवश्यकता नहीं बल्कि आर्थिक विकास की भी बुनियाद है।
एक ओर सरकार बुनियादी ढांचे में निवेश, डिजिटल शिक्षा और नई शिक्षा नीति (NEP 2020) के जरिए सुधार की कोशिश कर रही है। दूसरी ओर स्कूलों की घटती संख्या और सरकारी विद्यालयों से छात्रों का दूर होना यह संकेत देता है कि केवल भवन या योजनाएं पर्याप्त नहीं हैं। शिक्षा की गुणवत्ता, स्थानीय स्तर पर स्कूलों की उपलब्धता और समुदाय का भरोसा भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
शिक्षकों की संख्या 1 करोड़ के पार
जहां एक ओर सरकारी स्कूलों की संख्या में कमी आई है, वहीं दूसरी ओर शिक्षा व्यवस्था के लिए एक सकारात्मक संकेत भी सामने आया है।
शिक्षा मंत्रालय के नवीनतम UDISE+ 2023-24 आंकड़ों के अनुसार, भारत में पहली बार स्कूल शिक्षकों की कुल संख्या 1 करोड़ (10 मिलियन) से अधिक हो गई है। यह देश की स्कूली शिक्षा व्यवस्था के विस्तार और शिक्षक भर्ती में हुई प्रगति को दर्शाता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अधिक शिक्षकों की उपलब्धता का सीधा असर कक्षा शिक्षण, विद्यार्थियों पर व्यक्तिगत ध्यान और सीखने की गुणवत्ता पर पड़ सकता है। नई शिक्षा नीति (NEP 2020) भी प्रशिक्षित और पर्याप्त संख्या में शिक्षकों की उपलब्धता को शिक्षा सुधार की सबसे बड़ी जरूरतों में मानती है।
हालांकि, यह तस्वीर पूरी तरह सकारात्मक नहीं है। राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षकों की संख्या बढ़ने के बावजूद उनका वितरण अभी भी असमान बना हुआ है। कई राज्यों के शहरी स्कूलों में पर्याप्त शिक्षक हैं, जबकि दूर-दराज़ और आदिवासी इलाकों में आज भी शिक्षक पद खाली पड़े हैं।
एक शिक्षक के भरोसे एक लाख से अधिक स्कूल
शिक्षा मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, देश में 1.04 लाख से अधिक स्कूल ऐसे हैं जहां केवल एक शिक्षक कार्यरत है।
इन स्कूलों में वही एक शिक्षक अलग-अलग कक्षाओं के बच्चों को पढ़ाने के साथ-साथ प्रशासनिक कार्य, रिकॉर्ड तैयार करना, सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन, मिड-डे मील की निगरानी और कई अन्य जिम्मेदारियां भी निभाता है।
प्राथमिक स्तर पर एक ही शिक्षक द्वारा कई कक्षाओं को एक साथ पढ़ाना सीखने की गुणवत्ता को प्रभावित करता है। ऐसे स्कूलों में प्रत्येक छात्र पर व्यक्तिगत ध्यान देना मुश्किल हो जाता है। खासकर गणित, विज्ञान और भाषा जैसे विषयों में इसका असर साफ दिखाई देता है।
ग्रामीण और दुर्गम क्षेत्रों में यह समस्या सबसे अधिक देखने को मिलती है, जहां नए शिक्षकों की नियुक्ति और उनका लंबे समय तक बने रहना दोनों चुनौती बने हुए हैं।
भारत में एक शिक्षक पर कितने छात्र?
शिक्षा की गुणवत्ता का एक महत्वपूर्ण पैमाना Pupil-Teacher Ratio (PTR) यानी छात्र-शिक्षक अनुपात होता है।
यूनेस्को का मानना है कि प्राथमिक शिक्षा में 15:1 छात्र-शिक्षक अनुपात बेहतर सीखने का अवसर देता है। भारत में भी शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम, 2009 के तहत प्राथमिक स्तर पर लगभग 30:1 और उच्च प्राथमिक स्तर पर लगभग 35:1 का मानक निर्धारित किया गया है।
UDISE+ के हालिया आंकड़ों के अनुसार भारत का औसत Pupil-Teacher Ratio 24:1 है जो कि इन निर्धारित मानकों के भीतर है, जो यह दर्शाता है कि राष्ट्रीय स्तर पर स्थिति पहले की तुलना में बेहतर हुई है।
हालांकि यह औसत पूरे देश की वास्तविक तस्वीर नहीं दिखाता। कई राज्यों और महानगरों में एक शिक्षक पर छात्रों की संख्या कम है, जबकि दूरस्थ क्षेत्रों के अनेक स्कूलों में एक ही शिक्षक कई कक्षाओं को संभाल रहा है। यानी राष्ट्रीय औसत बेहतर होने के बावजूद क्षेत्रीय असमानता अभी भी बड़ी चुनौती बनी हुई है।
ड्रॉपआउट दर में सुधार
सरकारी आंकड़ों के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में स्कूल छोड़ने (Dropout Rate) की दर में कमी आई है। इसका श्रेय छात्रवृत्ति योजनाओं, मिड-डे मील, मुफ्त पाठ्यपुस्तकों, साइकिल योजनाओं और अन्य सरकारी पहलों को दिया जाता है।
फिर भी केवल बच्चों का स्कूल में दाखिला ही पर्याप्त नहीं माना जा सकता। शिक्षा विशेषज्ञ लगातार इस बात पर जोर देते रहे हैं कि वास्तविक चुनौती बच्चों के सीखने के स्तर (Learning Outcomes) को बेहतर बनाना है।
ASER जैसी रिपोर्टें भी समय-समय पर यह दिखाती रही हैं कि कई कक्षाओं के छात्र अपनी कक्षा के अनुरूप पढ़ने और गणित की बुनियादी क्षमता हासिल नहीं कर पा रहे हैं।
ऐसे में शिक्षकों की संख्या बढ़ाने के साथ-साथ उनकी गुणवत्ता, प्रशिक्षण और आधुनिक शिक्षण पद्धतियों पर भी समान रूप से ध्यान देना आवश्यक होगा।
नई शिक्षा नीति से क्या बदलेगी तस्वीर?
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 का उद्देश्य केवल स्कूलों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार लाना है।
इसके तहत आधारभूत साक्षरता और संख्यात्मक ज्ञान (Foundational Literacy and Numeracy), डिजिटल शिक्षा, शिक्षक प्रशिक्षण, व्यावसायिक शिक्षा और स्थानीय भाषाओं में शिक्षा जैसे कई सुधारों पर जोर दिया गया है।
सरकार का मानना है कि यदि इन सुधारों को प्रभावी ढंग से लागू किया गया तो आने वाले वर्षों में सरकारी स्कूलों में लोगों का भरोसा फिर से बढ़ सकता है।
भविष्य की राह
भारत के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती स्कूलों की संख्या बढ़ाने से अधिक उन्हें गुणवत्तापूर्ण बनाना है।
इसके लिए आवश्यक होगा—
- दूरदराज़ क्षेत्रों में शिक्षक पदों को शीघ्र भरना।
- एकल-शिक्षक विद्यालयों की संख्या कम करना।
- ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूलों तक आसान पहुंच सुनिश्चित करना।
- सरकारी विद्यालयों में आधुनिक सुविधाओं का विस्तार करना।
- डिजिटल शिक्षा के साथ-साथ बुनियादी पढ़ाई और गणित पर विशेष ध्यान देना।
- शिक्षकों के नियमित प्रशिक्षण और जवाबदेही को मजबूत करना।
भारत की स्कूली शिक्षा इस समय एक दिलचस्प मोड़ पर खड़ी है। एक तरफ पिछले दस वर्षों में करीब 94 हजार सरकारी स्कूल बंद हुए हैं और सरकारी स्कूलों में 2.26 करोड़ छात्रों का नामांकन घटा है। दूसरी ओर देश में पहली बार शिक्षकों की संख्या 1 करोड़ के पार पहुंची है और छात्र-शिक्षक अनुपात में भी सुधार देखने को मिला है।
इन दोनों तस्वीरों को साथ देखकर यह साफ होता है कि शिक्षा व्यवस्था केवल स्कूलों या शिक्षकों की संख्या का मामला नहीं है, बल्कि यह उनकी उपलब्धता, गुणवत्ता और समान वितरण पर भी निर्भर करती है।
यदि आने वाले वर्षों में सरकार स्कूलों तक समान पहुंच, पर्याप्त शिक्षक, बेहतर बुनियादी सुविधाएं और गुणवत्तापूर्ण शिक्षण सुनिश्चित करने में सफल रहती है, तो भारत अपनी विशाल युवा आबादी को मजबूत मानव संसाधन में बदल सकता है।
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