Friday, 24 July 2026
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लोहड़ी 2026: जानिए अग्नि पूजा की परंपरा, दुल्ला भट्टी की पूरी कहानी और लोकगीतों का राज

13 जनवरी को लोहड़ी पर जानिए अग्नि क्यों जलाते हैं, दुल्ला भट्टी ने लड़कियों को कैसे बचाया और साग-रोटी के साथ कैसे मनाते हैं ये त्योहार। पूरी कहानी पढ़ें।

सर्दियों की कड़कड़ाती ठंड में जब नया साल शुरू होता है, तो उत्तर भारत में खुशियों का एक बड़ा मौका आता है – लोहड़ी का त्योहार। इस बार लोहड़ी 13 जनवरी 2026 को मंगलवार के दिन मनाई जाएगी। ये मुख्य रूप से पंजाब का त्योहार है, लेकिन हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू और दिल्ली-पंजाबी समुदाय में भी बड़ी धूमधाम से मनाई जाती है।

लोहड़ी मकर संक्रांति से ठीक एक दिन पहले मनाई जाती है और यह फसल कटाई की खुशी का प्रतीक मानी जाती है। इस मौके पर किसान अपनी रबी फसलों, खासकर गेहूं की अच्छी पैदावार के लिए प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करते हैं। साथ ही, यह पर्व सूर्य के उत्तरायण होने का संकेत भी देता है, जिसका अर्थ है कि अब दिन धीरे-धीरे लंबे होंगे और सर्दी का असर कम होने लगेगा।

लोहड़ी पर अग्नि का खास महत्व

लोहड़ी की शाम सबसे खास मानी जाती है, जब लोग बड़े अलाव के चारों ओर इकट्ठा होते हैं। घरों के बाहर, मोहल्लों में या फिर खेतों में लकड़ियां जमा कर अग्नि प्रज्वलित किया जाता है। हिंदू और सिख, दोनों संस्कृतियों में अग्नि को पवित्र माना गया है, क्योंकि यह ठंडी रातों में गर्माहट देती है और पुरानी नकारात्मकता को जलाकर नई शुरुआत का संदेश देती है। मान्यता है कि अलाव की लपटें आकाश तक पहुंचती हैं और सूर्य देव को यह संकेत देती हैं कि अब वे और अधिक तेज़ी से चमकें।

अग्नि में तिल, गुड़, रेवड़ी, गजक, मूंगफली और पॉपकॉर्न चढ़ाए जाते हैं। ये सब सर्दियों की फसल की पहली पैदावार होती हैं। इन्हें जलाकर किसान कहते हैं कि हमारी मेहनत सफल हुई, अब अच्छे दिन आएंगे। बच्चे और बड़े मिलकर अलाव के इर्द-गिर्द बैठते हैं, गर्मी का मजा लेते हैं और पुरानी नेगेटिविटी को पीछे छोड़ते हैं। ये रस्म सिर्फ मजा नहीं, बल्कि जीवन में नई ऊर्जा भरने वाली है।

दुल्ला भट्टी की रोचक लोककथा

लोहड़ी के गीतों में एक नाम बार-बार गूंजता है – दुल्ला भट्टी। वो मुगल काल के एक बहादुर पंजाबी योद्धा थे, जिन्हें लोग ‘पंजाब का रॉबिन हुड’ कहते हैं। दुल्ला भट्टी अमीरों और जालिमों को लूटते थे और गरीबों की मदद करते थे। उनकी सबसे मशहूर कहानी सुंदरी और मुंदरी नाम की दो लड़कियों की है। उस समय लड़कियों को जबरन गुलाम बनाकर बेचा जाता था। दुल्ला ने इन दोनों को बचाया, उन्हें अपनी बेटियों की तरह पाला और फिर सम्मान से उनकी शादी करवाई। शादी में दहेज के लिए उन्होंने लूट का माल इस्तेमाल किया – एक लड़की को शक्कर का गोना और दूसरी को गुड़ का।

यही वजह है कि लोहड़ी के लोकगीतों में गाया जाता है: “सुंदर मुंदरिये हो! दुल्ला भट्टी वाला हो! दुल्ले दी धी व्याही हो! शक्कर पाई हो!” यह गीत दुल्ला की बहादुरी, दयालुता और लड़कियों के सम्मान की रक्षा की याद दिलाता है। बच्चे खुशी-खुशी घर-घर जाकर इसे गाते हैं और परंपरा के अनुसार बदले में रेवड़ी और मूंगफली लेते हैं। दुल्ला भट्टी की कहानी लोहड़ी को सिर्फ फसल का त्योहार नहीं, बल्कि न्याय और बहादुरी का प्रतीक बनाती है।

लोहड़ी का जश्न कैसे मनाते हैं?


लोहड़ी की तैयारियां सुबह से शुरू हो जाती हैं। घर की सफाई होती है, नए कपड़े पहने जाते हैं। शाम को अलाव जलने के बाद असली मस्ती शुरू होती है। लोग भांगड़ा और गिद्दा नाचते हैं, ढोल की थाप पर लोकगीत गाते हैं। पारंपरिक पंजाबी खाना बनता है – सरसों का साग, मक्के की रोटी, गुड़ की रोटी, खीर और तरह-तरह की मिठाइयां। साग-रोटी तो लोहड़ी का सिग्नेचर डिश है, जो सर्दी में शरीर को गर्म रखता है।

खास बात ये है कि नए शादीशुदा जोड़ों या घर में नए बच्चे के जन्म पर लोहड़ी बहुत धूमधाम से मनाई जाती है। ऐसे घरों में मेहमान ज्यादा आते हैं, तोहफे दिए जाते हैं और जश्न दोगुना हो जाता है। रात भर अलाव की रोशनी में नाच-गाना चलता रहता है और सब एक-दूसरे को खुशियां बांटते हैं। आजकल शहरों में भी कम्युनिटी लोहड़ी पार्टी होती हैं, जहां सब मिलकर ये त्योहार एंजॉय करते हैं।

लोहड़ी का संदेश और शुभकामनाएं

लोहड़ी सिर्फ एक दिन का त्योहार नहीं है, बल्कि ये हमें सिखाता है कि जीवन में मुश्किलें आएंगी लेकिन मेहनत और एकता से हम उन्हें जला कर नई शुरुआत कर सकते हैं। ये परिवार, दोस्तों और समुदाय को जोड़ने वाला पर्व है। फसल की खुशी, बहादुरी की कहानियां और गर्मजोशी भरा माहौल – सब मिलकर लोहड़ी को खास बनाते हैं। इस साल भी अलाव की लपटों में सर्दी को अलविदा कहिए और आने वाले अच्छे दिनों का स्वागत कीजिए। सभी पाठकों को लोहड़ी की ढेर सारी शुभकामनाएं – खुश रहिए, स्वस्थ रहिए और जश्न मनाइए!

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BN

Bureau NOTD

लेखक

NOTD News के लिए नियमित रूप से समाचार लिखते हैं।

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