Wednesday, 02 September 2026
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63 की उम्र में भी यूट्यूब पर पढ़ा रहीं विज्ञान, 12 किताबों की लेखिका; अब राष्ट्रपति से सम्मानित होंगी डॉ. रेनू त्रिपाठी

सरकारी स्कूल में कम लागत वाले मॉडल से विज्ञान पढ़ाने वाली डॉ. रेनू त्रिपाठी राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार 2026 के लिए चुनी गई हैं। जानिए उनकी पूरी कहानी।

नई दिल्ली/ गाजियाबाद: सरकारी स्कूलों में पढ़ाई को अक्सर सीमित संसाधनों और पारंपरिक तरीकों से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन गाजियाबाद की विज्ञान शिक्षिका डॉ. रेनू त्रिपाठी ने अपने काम के जरिए इस धारणा को चुनौती दी है। 63 वर्ष की उम्र में भी वह न केवल कक्षा 6 से 10 तक के विद्यार्थियों को विज्ञान पढ़ा रही हैं, बल्कि यूट्यूब, वॉट्सऐप और डिजिटल शैक्षणिक सामग्री का इस्तेमाल कर पढ़ाई को कक्षा की चारदीवारी से बाहर ले जा रही हैं। कम लागत वाले मॉडल, फील्ड विजिट और गतिविधि आधारित सीखने पर उनका जोर रहा है।

विज्ञान शिक्षा के क्षेत्र में उनके लंबे योगदान को अब राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है। डॉ. रेनू त्रिपाठी को राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार 2026 के लिए चुने गए 48 शिक्षकों में शामिल किया गया है। शिक्षा मंत्रालय की आधिकारिक सूची में उनका नाम उत्तर प्रदेश के राजकीय बालिका इंटर कॉलेज, विजय नगर, गाजियाबाद के साथ दर्ज है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू 5 सितंबर 2026 को शिक्षक दिवस के अवसर पर नई दिल्ली के विज्ञान भवन में चयनित शिक्षकों को सम्मानित करेंगी।

यह सम्मान केवल उनके शिक्षक के रूप में काम को नहीं, बल्कि सरकारी स्कूलों में उपलब्ध सीमित संसाधनों के बीच नए तरीकों से विज्ञान पढ़ाने की उनकी कोशिश को भी रेखांकित करता है।

1987 में शुरू हुआ सफर

डॉ. रेनू त्रिपाठी का शिक्षण क्षेत्र में सफर सीधे शिक्षक के तौर पर शुरू नहीं हुआ। उन्होंने वर्ष 1987 में एक सरकारी कार्यालय में प्रोजेक्ट ऑफिसर के रूप में करियर शुरू किया। उनकी जिम्मेदारियों में स्कूल छोड़ चुके बच्चों की पहचान करना, उन्हें समझाना और दोबारा शिक्षा की मुख्यधारा में लाने का प्रयास करना शामिल था।

इसी दौरान उनके भीतर शिक्षा के प्रति जुड़ाव और मजबूत हुआ। उनके पिता खुद शिक्षक और स्कूल प्रिंसिपल थे और चाहते थे कि रेनू भी शिक्षण के क्षेत्र में आए।

रेनू त्रिपाठी ने बताया कि नौकरी शुरू करने के करीब तीन महीने बाद उनके पिता की हार्ट अटैक से मृत्यु हो गई। इसके बाद उन्होंने उनके सपने को पूरा करने का फैसला किया। वर्ष 2003 में उन्होंने बुलंदशहर के एक स्कूल में विज्ञान शिक्षिका के रूप में काम शुरू किया। वर्ष 2006 में वह गाजियाबाद के राजकीय बालिका इंटर कॉलेज, विजय नगर से जुड़ीं, जहां वह अब भी विज्ञान पढ़ा रही हैं।

शिक्षा के क्षेत्र में उनकी यात्रा का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि स्कूल से बाहर रहने वाले बच्चों को दोबारा शिक्षा से जोड़ने के काम से शुरू हुआ उनका सफर आज विज्ञान की कक्षा को ज्यादा व्यावहारिक और सुलभ बनाने तक पहुंच चुका है।

लर्निंग बाय डूइंग’ को बनाया पढ़ाने का आधार

डॉ. रेनू त्रिपाठी के शिक्षण का सबसे प्रमुख हिस्सा ‘करके सीखना’ यानी Learning by Doing है। उनका मानना है कि विज्ञान जैसे विषय को केवल किताबों और ब्लैकबोर्ड के जरिए समझाना पर्याप्त नहीं है। विद्यार्थियों को जब किसी वैज्ञानिक अवधारणा को अपने आसपास की वास्तविक दुनिया से जोड़ने का मौका मिलता है तो विषय को समझना आसान हो जाता है।

इसी सोच के तहत वह विद्यार्थियों को कम लागत वाले शिक्षण मॉडल और अलग-अलग गतिविधियों के माध्यम से पढ़ाती हैं। उनके मॉडल ऐसे संसाधनों पर आधारित होते हैं जिन्हें सरकारी स्कूलों में आसानी से उपलब्ध कराया जा सके। इसका मकसद महंगे उपकरणों पर निर्भरता कम करते हुए विद्यार्थियों को प्रयोग और गतिविधि के जरिए सीखने का अवसर देना है।

उनकी कक्षा केवल स्कूल की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहती। वह विद्यार्थियों को फील्ड विजिट पर भी ले जाती हैं, ताकि वे किताबों में पढ़े विषयों को वास्तविक वातावरण में देख सकें।

उदाहरण के तौर पर नोएडा के बॉटनिकल गार्डन की यात्रा के दौरान उन्होंने विद्यार्थियों से अलग-अलग प्रकार के पेड़ों की पहचान करने को कहा। इस तरह पौधों से जुड़ी जानकारी केवल पाठ्यपुस्तक का अध्याय नहीं रही, बल्कि विद्यार्थियों के लिए प्रत्यक्ष अनुभव बन गई।

NEP 2020 के बाद शिक्षण में बढ़ते प्रयोग

राष्ट्रीय शिक्षा नीति यानी NEP 2020 में अनुभव आधारित, गतिविधि आधारित और विद्यार्थी-केंद्रित शिक्षा पर जोर दिया गया है। डॉ. त्रिपाठी ने भी अपनी शिक्षण पद्धति में कई अहम बदलाव किए।

उन्होंने बताया कि NEP 2020 लागू होने के बाद उन्होंने अपने पढ़ाने के तरीकों में नवाचार बढ़ाया और विद्यार्थियों के प्रदर्शन में सुधार देखा।

उनके द्वारा तैयार किए गए संसाधनों में कम लागत वाले मॉडल और अलग-अलग वैज्ञानिक अवधारणाओं को सरल तरीके से समझाने वाली सामग्री शामिल है। उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार के लिए चुने गए तीन शिक्षकों के संबंध में प्रकाशित रिपोर्ट में भी उनके NEP 2020 के अनुरूप विकसित किए गए Teaching-Learning Materials और 12 पुस्तकों का उल्लेख किया गया है।

यह मॉडल खास तौर पर सरकारी स्कूलों के संदर्भ में महत्वपूर्ण है, जहां हर कक्षा में अत्याधुनिक प्रयोगशाला या महंगे उपकरण उपलब्ध होना जरूरी नहीं है।

यूट्यूब को बनाया पढ़ाई का माध्यम

डॉ. त्रिपाठी की कहानी का एक और खास पहलू उनकी डिजिटल तकनीक को अपनाने की क्षमता है। 63 वर्ष की उम्र में भी उन्होंने खुद को तकनीकी बदलाव से जोड़े रखा है।

वह विद्यार्थियों के लिए दो यूट्यूब चैनलों का इस्तेमाल करती हैं और विज्ञान से जुड़े विषयों को डिजिटल माध्यम से समझाती हैं। उनके ऑनलाइन शैक्षणिक काम में वेबसाइट, YouTube, SlideShare और अन्य डिजिटल संसाधनों के जरिए तैयार की गई सामग्री शामिल है।

उनकी डिजिटल सामग्री में विज्ञान के कई विषयों को सरल तरीके से समझाने का प्रयास किया गया है। इनमें आनुवंशिकता, जैव विकास, पादप कोशिका, परमाणु की संरचना और जीवन की मूलभूत इकाई जैसे विषय शामिल हैं।

इसके अलावा वह प्रत्येक कक्षा के लिए वॉट्सऐप ग्रूप के जरिए भी विद्यार्थियों से संपर्क बनाए रखती हैं। इससे पढ़ाई केवल स्कूल के समय तक सीमित नहीं रहती और जरूरत पड़ने पर विद्यार्थी घर से भी शैक्षणिक सामग्री तक पहुंच सकते हैं।

कोविड के बाद डिजिटल शिक्षा को बनाया स्थायी हिस्सा

डिजिटल माध्यम का इस्तेमाल केवल तकनीक दिखाने के लिए नहीं, बल्कि विद्यार्थियों तक शिक्षा की पहुंच बढ़ाने के लिए किया गया। खासकर ऐसे समय में जब विद्यार्थी स्कूल नहीं पहुंच पा रहे थे, ऑनलाइन माध्यम ने शिक्षकों और छात्रों के बीच संपर्क बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

डॉ. त्रिपाठी ने इसी अनुभव को आगे भी जारी रखा। अब डिजिटल प्लेटफॉर्म उनके नियमित शिक्षण संसाधनों का हिस्सा हैं। यूट्यूब पर विज्ञान के वीडियो और वॉट्सऐप पर कक्षा समूहों के जरिए वह विद्यार्थियों के साथ संवाद बनाए रखती हैं।

इस पहल का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि उन्होंने तकनीक का इस्तेमाल कर उम्र की सभी सीमाओँ को पीछे छोड़ दिया है। जहां डिजिटल शिक्षा को अक्सर युवा शिक्षकों से जोड़ा जाता है, वहीं रेनू त्रिपाठी का काम दिखाता है कि तकनीक को अपनाने की क्षमता उम्र से तय नहीं होती।

12 किताबें भी लिखीं

शिक्षण के साथ डॉ. त्रिपाठी ने लेखन और शैक्षणिक सामग्री निर्माण को भी अपने काम का हिस्सा बनाया। वह 12 किताबों की लेखिका हैं और कई शोध पत्र भी लिख चुकी हैं।

उनका लेखन विज्ञान शिक्षा और शिक्षण संसाधनों से जुड़ा रहा है। इससे उनकी भूमिका केवल कक्षा में पढ़ाने वाले शिक्षक तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वह विज्ञान को विद्यार्थियों के लिए सरल बनाने वाली शैक्षणिक सामग्री तैयार करने का भी काम करती हैं।

एक शिक्षक के लिए यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि विद्यार्थियों की जरूरतें केवल पाठ्यपुस्तक से पूरी नहीं होतीं। सरल भाषा में तैयार की गई अतिरिक्त सामग्री कठिन अवधारणाओं को समझने में मदद कर सकती है।

एक विद्यार्थी की सफलता ने दिखाया प्रयोगों का असर

डॉ. त्रिपाठी की शिक्षण पद्धति का असर उनके विद्यार्थियों की उपलब्धियों में भी दिखाई देता है। उनके द्वारा पढ़ाई गई एक छात्रा ने कक्षा 6 में उनके साथ पढ़ने के बाद 2019 में मिट्टी के कटाव यानी Soil Erosion पर बनाए मॉडल के लिए राष्ट्रीय स्तर का पुरस्कार हासिल किया। बाद में वही छात्रा शिक्षा विभाग में ब्लॉक एजुकेशन ऑफिसर बनी।

डॉ. त्रिपाठी के लिए यह अनुभव उनके प्रयोग आधारित शिक्षण की सफलता का महत्वपूर्ण उदाहरण बना। उनके अनुसार, इस तरह की गतिविधियों ने उन्हें यह समझने में मदद की कि बच्चों को सिर्फ जानकारी देने के बजाय उन्हें कुछ बनाने, देखने और प्रयोग करने का अवसर देना कितना प्रभावी हो सकता है।

उनके कई पूर्व विद्यार्थी आर्थिक चुनौतियों के बावजूद डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक और बैंक अधिकारी बने हैं।

सरकारी स्कूल की छात्राओं के लिए खास भूमिका

गाजियाबाद के जिस राजकीय बालिका इंटर कॉलेज में डॉ. त्रिपाठी पढ़ाती हैं, वहां उनकी भूमिका सिर्फ विज्ञान विषय पढ़ाने तक सीमित नहीं है। उनके काम का एक बड़ा हिस्सा छात्राओं को सीखने के लिए नए अवसर देना है।

सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले कई विद्यार्थियों के पास निजी संस्थानों जैसी सुविधाएं नहीं होतीं। ऐसे में कम लागत वाले मॉडल, डिजिटल सामग्री और फील्ड विजिट जैसे तरीके उनके लिए अतिरिक्त सीखने के अवसर पैदा करते हैं।

डॉ. त्रिपाठी ने खुद सरकारी स्कूल से पढ़ाई की थी। उनके अनुसार, उनके समय में न स्मार्ट क्लास थी और न मोबाइल फोन, लेकिन आज उपलब्ध तकनीक ने शिक्षक और विद्यार्थियों को एक-दूसरे से अलग-अलग परिस्थितियों में भी जोड़े रखने की संभावना पैदा की है।

नो चाइल्ड लेफ्ट बिहाइंड’ से जुड़ी सोच

डॉ. त्रिपाठी की पूरी पेशेवर यात्रा में ‘किसी बच्चे को शिक्षा से पीछे नहीं छूटने देने’ का विचार लगातार दिखाई देता है।

1987 में प्रोजेक्ट ऑफिसर के तौर पर काम करते समय उन्होंने स्कूल छोड़ चुके बच्चों को दोबारा शिक्षा से जोड़ने का प्रयास किया। बाद में शिक्षक बनने के बाद भी उन्होंने कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि वाले विद्यार्थियों को आगे बढ़ाने पर ध्यान दिया।

उनके लिए शिक्षा केवल परीक्षा में अंक हासिल करने का माध्यम नहीं है। उनका जोर विद्यार्थियों में जिज्ञासा पैदा करने और उन्हें अपने आसपास की दुनिया को वैज्ञानिक नजरिए से देखने के लिए प्रेरित करने पर है।

राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार के लिए 48 शिक्षक चयनित

राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार 2026 के लिए इस साल देशभर से 48 स्कूल शिक्षकों का चयन किया गया है। शिक्षा मंत्रालय के अनुसार ये शिक्षक 27 राज्यों, 7 केंद्रशासित प्रदेशों और केंद्र सरकार के 6 संगठनों से चुने गए हैं। इनमें 26 पुरुष और 22 महिला शिक्षक शामिल हैं।

चयन प्रक्रिया तीन चरणों – जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर पूरी हुई है। इसके लिए पात्र शिक्षकों से 15 जून से 20 जुलाई 2026 तक ऑनलाइन स्व-नामांकन मांगे गए थे। मंत्रालय के मुताबिक चयन प्रक्रिया कठोर, पारदर्शी और ऑनलाइन रही।

डॉ. रेनू त्रिपाठी उत्तर प्रदेश से चयनित तीन शिक्षकों में शामिल हैं। उनके साथ बलिया के डॉ. इफ्तखार खान और रसूलाबाद की शिक्षिका शालिनी कुशवाहा का भी चयन हुआ है।

5 सितंबर को राष्ट्रपति करेंगी सम्मानित

राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार हर वर्ष शिक्षक दिवस के अवसर पर दिया जाता है। इस साल राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू 5 सितंबर 2026 को विज्ञान भवन, नई दिल्ली में 48 चयनित शिक्षकों को सम्मानित करेंगी। कार्यक्रम में प्रत्येक शिक्षक के काम और उपलब्धियों पर आधारित लघु डॉक्यूमेंट्री भी दिखाई जाएगी।

डॉ. रेनू त्रिपाठी के लिए यह सम्मान दो दशक से अधिक समय से चले आ रहे उनके शिक्षण प्रयासों की राष्ट्रीय पहचान है। हालांकि उनकी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू पुरस्कार नहीं, बल्कि वह तरीका है जिससे उन्होंने सरकारी स्कूल में उपलब्ध संसाधनों के भीतर विज्ञान की पढ़ाई को असान, सुलभ और व्यावहारिक बनाने की कोशिश की।

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MD Faijan

लेखक

मोहम्मद फैजान न्यूज़ ऑफ द डे में पत्रकार हैं, जहाँ वे खेल, मनोरंजन, राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मामलों को कवर करते हैं। इससे पहले वे यूट्यूब चैनल स्पोर्ट्स यारी में सोशल मीडिया एग्जीक्यूटिव के रूप में कार्य कर चुके हैं, जहाँ उन्होंने डिजिटल कंटेंट मैनेजमेंट और ऑडियंस एंगेजमेंट का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त किया। भारत के छत्तीसगढ़ राज्य के कोरिया जिले से संबंध रखने वाले फैजान आधुनिक मीडिया कार्यप्रणालियों की अच्छी समझ रखते हैं और कहानी कहने के विभिन्न रूपों में गहरी रुचि रखते हैं।

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