क्या कोई इंसान बिना किसी द्वीप पर उतरे, बिना किसी बचाव अभियान के, खुले समुद्र में 438 दिनों तक जीवित रह सकता है?
नई दिल्ली: सुनने में यह किसी हॉलीवुड मूवी की कहानी लगती है लेकिन यह घटना कोई काल्पनिक नहीं बल्कि वास्तविक है। यह कहानी है जोस साल्वाडोर अलवारेंगा (José Salvador Alvarenga) की जो दुनिया के सबसे लंबे समय तक खुले समुद्र में जिंदा रहने वालों लोगों में गिने जाते हैं। उनकी कहानी सिर्फ़ किस्मत की नहीं बल्कि मानसिक मजबूती हालातों के हिसाब से खुद को ढालने की क्षमता और जिंदा रहने की इच्छा शक्ति की मिसाल है।
एक साधारण मछुआरा, जिसने कभी नहीं सोचा था कि उसकी जिंदगी हमेशा के लिए बदल जाएगी
जोस साल्वाडोर अलवारेंगा मूल रूप से एल साल्वाडोर के रहने वाले थे लेकिन वे कई वर्षों से मेक्सिको के चियापास राज्य के तटीय इलाके कोस्टा अज़ुल (Costa Azul) में मछली पकड़ने का काम करते थे। समुद्र उनके लिए नया नहीं था। वे अनुभवी मछुआरे थे और कई बार लंबी दूरी तक जाकर मछली पकड़ चुके थे। लेकिन 17 नवंबर 2012 की सुबह उनकी जिंदगी का सबसे कठिन समय शुरू होने वाला था।
उस दिन वे हमेशा की तरह मछली पकड़ने निकले थे और उनके साथ एक युवा साथी था एज़ेकियल कॉर्डोबा (Ezequiel Córdoba) जो उनके जितना अनुभवी नहीं था। दोनों लगभग सात मीटर लंबी फाइबरग्लास नाव पर सवार थे। नाव में एक आउटबोर्ड इंजन, कुछ ईंधन, बर्फ, मछली पकड़ने के जाल, एक जीपीएस और रेडियो संचार उपकरण मौजूद थे।
मौसम सामान्य दिखाई दे रहा था। दोनों ने सोचा कि वे कुछ दिनों में वापस लौट आएंगे। उन्हें नहीं पता था कि यह सफर एक साल से भी ज्यादा लंबा होने वाला है
जब समुद्र ने अपना असली रूप दिखाया
समुद्र में कुछ ही घंटों बाद मौसम अचानक बदल गया। तेज हवाओं के साथ भीषण तूफान शुरू हो गया। कई मीटर ऊंची लहरें उनकी छोटी नाव को लगातार इधर उधर उछाल रही थीं। अलवारेंगा ने रेडियो के जरिए अपने मालिक से संपर्क किया और मदद मांगी। उन्होंने अपनी स्थिति भी बताई, लेकिन मौसम इतना खराब था कि बचाव दल उन्हें खोज नहीं सका।
लगातार कई दिनों तक तूफान चलता रहा। इस दौरान उनकी नाव का इंजन खराब हो गया। तेज लहरों में जीपीएस और रेडियो ने भी काम करना बंद कर दिया। नाव अब पूरी तरह समुद्री धाराओं और हवाओं के भरोसे थी। अब उनके पास दिशा भी नहीं थी और कोई संपर्क भी नहीं।
बचा हुआ राशन भी खत्म हो गया
शुरुआत में नाव पर मौजूद थोड़ा-बहुत खाने और पीने के पानी का दोनों ने सावधानी से इस्तेमाल किया। लेकिन कुछ ही दिनों में न खाने के लिए कुछ था न पीने के लिए पानी अब उनके सामने सबसे बड़ा सवाल था जिंदा कैसे रहें? अलवारेंगा ने समुद्र को ही अपना भोजन बना लिया। वे हाथों से या छोटे जाल की मदद से मछलियां पकड़ते। कभी समुद्री पक्षियों को पकड़ लेत, तो कभी छोटे कछुए उनके भोजन का हिस्सा बनते जिनको वो कच्चा कहते थे उनके पास आग जलाने का कोई साधन नहीं था।
पानी की हर बूंद की कीमत समझ में आई
समुद्र चारों ओर था, लेकिन पीने के लिए एक बूंद भी नहीं। समुद्री पानी पीने से शरीर तेजी से डिहाइड्रेट हो सकता था, इसलिए अलवारेंगा उससे बचते रहे। बारिश होने पर वे नाव में मौजूद डिब्बों, प्लास्टिक कंटेनरों और अन्य बर्तनों में पानी इकट्ठा करते।
जब कई दिनों तक बारिश नहीं होती, तब स्थिति बेहद गंभीर हो जाती। ऐसे समय में उन्होंने कछुओं का खून और सीमित मात्रा में अपना मूत्र पीकर खुद को जीवित रखने की कोशिश की। विशेषज्ञ बताते हैं कि मूत्र पीना लंबे समय तक सुरक्षित उपाय नहीं है लेकिन अत्यधिक संकट में कुछ लोग ऐसा करने की कोशिश करते हैं। अलवारेंगा ने भी इसे केवल मजबूरी में अपनाया।
सबसे बड़ा झटका
शारीरिक भूख से भी ज्यादा खतरनाक था मानसिक अकेलापन। उनके साथी एज़ेकियल कॉर्डोबा समुद्री जीवों का कच्चा मांस खाने के लिए तैयार नहीं थे। धीरे-धीरे उनका शरीर कमजोर होता गया। गभग चार महीने बाद उनकी मौत हो गई।
अलवारेंगा के लिए यह पल सबसे दर्दनाक था। वे कई दिनों तक अपने साथी के शव को नाव में ही रखते रहे। अकेलेपन का डर इतना ज्यादा था कि वे उसे समुद्र में छोड़ने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे। आखिरकार उन्हें समझ आया कि आगे बढ़ने के लिए यह करना जरूरी है। भारी मन से उन्होंने अपने साथी के शव को समुद्र को सौंप दिया।
उम्मीद ही उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी
438 दिनों तक किसी इंसान से बात न करना आसान नहीं होता। अलवारेंगा बाद में बताते हैं कि वे खुद से बातें करते थे। वे अपने परिवार को याद करते, भविष्य की कल्पना करते और लगातार प्रार्थना करते थे। उन्होंने समय का अंदाजा लगाने के लिए सूर्योदय और सूर्यास्त गिने। वे पक्षियों की दिशा देखते और उम्मीद करते कि शायद कहीं जमीन पास हो। कई बार उन्हें दूर कोई जहाज दिखाई देता, लेकिन वह उनकी नाव तक नहीं पहुंचता। हर बार उम्मीद टूटती। फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी।
हजारों किलोमीटर की अनियंत्रित यात्रा
समुद्री वैज्ञानिकों के अनुसार उनकी नाव प्रशांत महासागर की शक्तिशाली धाराओं के साथ बहती रही। इस दौरान वे मेक्सिको के तट से हजारों किलोमीटर दूर निकल गए थे बिना किसी इंजन और दिशा निर्देशन के उनकी नाव समुद्र की लहरों के सहारे बिना किसी मानव नियंत्रण के पश्चिम की ओर बढ़ती रही।
30 जनवरी 2014
लगभग 438 दिनों बाद उन्हें दूर एक छोटा द्वीप दिखाई दिया। पहले तो उन्हें विश्वास नहीं हुआ। धीरे-धीरे उनकी नाव मार्शल द्वीप समूह के एबोन एटोल (Ebon Atoll) तक पहुंच गई। वे किसी तरह नाव से उतरकर किनारे आए। स्थानीय लोगों ने जब उन्हें देखा तो वे बेहद कमजोर, दुबले और धूप से झुलसे हुए थे। उनकी दाढ़ी और बाल काफी बढ़ चुके थे। उन्हें तुरंत स्थानीय स्वास्थ्य केंद्र पहुंचाया गया। डॉक्टर यह देखकर हैरान थे कि इतनी लंबी समुद्री यात्रा के बाद भी वे जीवित थे।
क्या लोगों ने उनकी कहानी पर विश्वास किया?
शुरुआत में दुनिया के कई लोगों को उनकी कहानी अविश्वसनीय लगी। कुछ लोगों ने कहा कि कोई इंसान इतने लंबे समय तक समुद्र में जीवित नहीं रह सकता। लेकिन बाद में पत्रकारों, समुद्री विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं ने उनके दावों की जांच की।
समुद्री धाराओं के मॉडल, मौसम के रिकॉर्ड, संभावित बहाव के रास्तों और उनके द्वारा बताए गए कई विवरणों का अध्ययन किया गया। हालांकि उनकी यात्रा का हर दिन स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं किया जा सकता था, लेकिन विशेषज्ञों ने माना कि मेक्सिको से मार्शल द्वीप तक समुद्री धाराओं के सहारे बहना वैज्ञानिक रूप से संभव था। उनकी कहानी में बताए गए अधिकांश प्रमुख तथ्य उपलब्ध साक्ष्यों और जांच से मेल खाते हैं।
क्या जोस साल्वाडोर अलवारेंगा पर अपने साथी की मौत का आरोप लगा था?
438 दिनों बाद लौटने पर अलवारेंगा की कहानी पर कई लोगों ने सवाल उठाए। उनके साथी एज़ेकियल कॉर्डोबा के परिवार ने भी संदेह जताया कि उनकी मौत कैसे हुई। हालांकि किसी भी जांच में ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं मिला जिससे यह साबित हो सके कि अलवारेंगा ने अपने साथी की हत्या की थी। उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार एज़ेकियल की मौत लंबे समय तक भूख, प्यास और कुपोषण के कारण हुई थी। इसलिए अलवारेंगा पर संदेह तो किया गया लेकिन उन्हें कभी भी हत्या का दोषी नहीं ठहराया गया।
उनकी कहानी किताब भी बनी
अलवारेंगा की इस असाधारण यात्रा पर बाद में पत्रकार जोनाथन फ्रैंकलिन ने पुस्तक 438 Days: An Extraordinary True Story of Survival at Sea लिखी। इस पुस्तक में अलवारेंगा के अनुभवों, समुद्री परिस्थितियों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर पूरी घटना का विस्तृत वर्णन किया गया है।
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