Monday, 26 October 2026
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जम्मू-कश्मीर में महिला सुरक्षा पर उठते गंभीर सवाल! 2019 से अब तक 16,397 महिलाएं और लड़कियां लापता, 4,271 का कोई सुराग नहीं

NCRB के 2024 के आंकड़ों में जम्मू-कश्मीर में महिलाओं को शादी के लिए मजबूर करने के उद्देश्य से अपहरण या बहला-फुसलाकर ले जाने से जुड़े 1,200 से अधिक मामले दर्ज हुए। गुमशुदगी के आंकड़ों के बीच इन मामलों की जांच और कानूनी कार्रवाई अहम है।

श्रीनगर/जम्मू: जम्मू-कश्मीर में महिलाओं और नाबालिग लड़कियों की गुमशुदगी के आंकड़ों ने सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सूचना के अधिकार (RTI) के तहत मिली जानकारी के मुताबिक, 2019 से 2026 तक केंद्रशासित प्रदेश में 16,397 महिलाएं और लड़कियां लापता होने की सूचना दर्ज हुई। इनमें से 12,126 का पता लगा लिया गया, लेकिन 4,271 अब भी लापता हैं। सबसे ज्यादा चिंता नाबालिग लड़कियों को लेकर है। दर्ज आंकड़ों के अनुसार, लापता हुई 1,804 नाबालिग लड़कियों में से 1,016 का अब तक पता नहीं चला है।

ये आंकड़े ऐसे समय सामने आए हैं, जब महिलाओं की सुरक्षा, मानव तस्करी और नाबालिगों के शोषण को लेकर देशभर में चिंता जताई जाती रही है। जम्मू-कश्मीर के गृह विभाग से प्राप्त जानकारी में वयस्क महिलाओं के मामलों का ब्योरा जून 2026 तक और नाबालिग लड़कियों के मामलों का ब्योरा अगस्त 2026 तक का है।

कुल मामलों में एक चौथाई से अधिक का अनसुलझा रहना पुलिस की जांच, मामलों की निगरानी और प्रभावित परिवारों को जवाब देने की व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है। हालांकि, उपलब्ध आंकड़े अपने आप में यह साबित नहीं करते कि सभी गुमशुदगियां किसी अपराध या संगठित गिरोह से जुड़ी हैं।

2025 में सबसे ज्यादा वयस्क महिलाएं लापता

सालाना आंकड़े बताते हैं कि वयस्क महिलाओं की गुमशुदगी के मामले पिछले कुछ वर्षों में बढ़े हैं। 2019 में 1,388 महिलाओं के लापता होने की सूचना दर्ज हुई थी। 2020 में यह संख्या 1,398 रही, जबकि 2021 में बढ़कर 1,854 हो गई। 2022 में संख्या घटकर 1,766 रही, लेकिन 2023 में फिर बढ़कर 2,242 पहुंच गई।

रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में वयस्क महिलाओं की गुमशुदगी के सबसे अधिक 2,595 मामले दर्ज हुए। इनमें से 2,102 महिलाओं का पता लगा लिया गया, जबकि 493 अब भी लापता हैं। इससे पहले 2023 में 2,242 महिलाएं लापता हुई थीं, जिनमें से 699 का पता नहीं चल पाया था।

नाबालिग लड़कियों के मामलों में भी उतार-चढ़ाव देखा गया। 2019 में 150 और 2020 में 122 लड़कियों के लापता होने की सूचना दर्ज हुई। 2021 में यह संख्या 221 और 2022 में 249 हो गई। 2023 में 261 मामले दर्ज हुए, जबकि 2024 में संख्या घटकर 226 रही। 2025 में 289 नाबालिग लड़कियां लापता हुईं, जिनमें से 166 अब भी नहीं मिली हैं।

2026 में अगस्त तक 286 नाबालिग लड़कियों के लापता होने की सूचना दर्ज हुई। इनमें से 158 का पता नहीं चल पाया था। ये आंकड़े पूरे वर्ष के नहीं हैं, इसलिए इनकी तुलना सीधे 2025 के पूरे साल के आंकड़ों से करते समय सावधानी जरूरी है। फिर भी, नाबालिग लड़कियों के मामलों में बड़ी संख्या का अनसुलझा रहना जांच प्रक्रिया की प्रभावशीलता पर गंभीर सवाल उठाता है।

जम्मू-कश्मीर में मानव तस्करी गिरोह की आशंका?

हजारों महिलाओं और लड़कियों का अब तक पता नहीं चल पाना इस सवाल को महत्वपूर्ण बनाता है। लेकिन फिलहाल उपलब्ध RTI आंकड़े यह साबित नहीं करते कि सभी या बड़ी संख्या में गुमशुदगी के मामलों के पीछे कोई संगठित मानव तस्करी गिरोह काम कर रहा है। किसी गिरोह की मौजूदगी, उसके नेटवर्क या उसके द्वारा महिलाओं और लड़कियों को दूसरे राज्यों में ले जाने के दावे के लिए पुलिस जांच, दर्ज मुकदमों, आरोपपत्रों या अदालत में सामने आए प्रमाणों की जरूरत होगी।

हालांकि, मानव तस्करी की आशंका को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता। रोजगार का झांसा, शादी के नाम पर धोखाधड़ी, जबरन विवाह, यौन शोषण और जबरन मजदूरी ऐसे संभावित पहलू हैं, जिनकी जांच संदिग्ध परिस्थितियों में लापता होने वाले मामलों में की जा सकती है।

पुलिस को यह देखना होगा कि क्या किसी महिला या लड़की को आखिरी बार किसी ऐसे व्यक्ति के साथ देखा गया था जिसने नौकरी, शादी या दूसरे अवसर का वादा किया हो। मोबाइल फोन, सोशल मीडिया संपर्क, यात्रा के रिकॉर्ड और बैंकिंग लेन-देन जैसे सुराग भी कुछ मामलों में जांच के लिए उपयोगी हो सकते हैं।

लेकिन हर गुमशुदगी को मानव तस्करी से जोड़ना गलत होगा। वयस्क महिलाओं के लापता होने के पीछे पारिवारिक विवाद, घरेलू हिंसा, स्वेच्छा से घर छोड़ना, व्यक्तिगत परिस्थितियां या अन्य कारण भी हो सकते हैं।

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शादी के लिए अपहरण के 1,200 से अधिक मामले दर्ज

द ट्रिब्यून की रिपोर्ट में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के 2024 के आंकड़ों का भी उल्लेख है। इनके अनुसार, जम्मू-कश्मीर में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 87 के तहत महिलाओं को शादी के लिए मजबूर करने के उद्देश्य से अपहरण, बहला-फुसलाकर ले जाने या प्रेरित करने से जुड़े 1,202 मामले दर्ज किए गए थे।

भारतीय न्याय संहिता की धारा 87 ऐसे मामलों से संबंधित है, जिनमें किसी महिला का अपहरण या उसे बहला-फुसलाकर ले जाने का उद्देश्य उसकी इच्छा के विरुद्ध विवाह के लिए मजबूर करना या उसे अवैध यौन संबंध के लिए विवश करना हो। इस तरह के मामलों में आरोपों और परिस्थितियों के आधार पर कानूनी कार्रवाई की जाती है।

पुलिस को ऐसे मामलों में यह जांचना चाहिए कि संबंधित महिला की सहमति थी या नहीं, क्या उस पर दबाव डाला गया और क्या किसी व्यक्ति या समूह ने उसे धोखे से अपने साथ जाने के लिए मजबूर किया। नाबालिग लड़कियों से जुड़े मामलों में उम्र और बाल संरक्षण कानूनों के प्रावधानों का भी विशेष महत्व है।

प्रशासन की लापरवाही बड़ा कारण?

4,271 महिलाओं और लड़कियों का अब तक पता नहीं चलना प्रशासन से जवाब मांगता है। इसके लिए प्रत्येक मामले में जांच की प्रगति, उपलब्ध सुरागों, उठाए गए कदमों और संबंधित अधिकारियों की भूमिका की समीक्षा जरूरी है।

फिर भी, जिलावार जानकारी का अभाव और इतने बड़े स्तर पर अनसुलझे मामलों की मौजूदगी पारदर्शिता की कमी को उजागर करती है। परिवारों को यह जानने का अधिकार है कि उनके परिजनों की तलाश के लिए क्या कदम उठाए गए हैं और जांच किस चरण में है। लंबे समय तक कोई जानकारी न मिलना परिवारों के लिए मानसिक, सामाजिक और आर्थिक परेशानी का कारण बन सकता है।

प्रशासन को ऐसे मामलों की समय-समय पर समीक्षा करनी चाहिए। पुराने मामलों में नए सुरागों की जांच, मोबाइल और डिजिटल रिकॉर्ड का दोबारा विश्लेषण, अस्पतालों तथा आश्रय गृहों के रिकॉर्ड से मिलान और दूसरे राज्यों की पुलिस के साथ समन्वय मददगार हो सकता है। यदि जांच में किसी अधिकारी की लापरवाही सामने आती है, तो जिम्मेदारी तय करने के लिए स्पष्ट प्रक्रिया होनी चाहिए।

जम्मू-कश्मीर में पुलिस और कानून-व्यवस्था केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में हैं। ऐसे में केंद्रीय गृह मंत्रालय और केंद्रशासित प्रदेश के प्रशासन की भी जिम्मेदारी बनती है कि वे मामलों की निगरानी और जवाबदेही के लिए प्रभावी व्यवस्था सुनिश्चित करें।

घटनाओं पर रोक लगाने के लिए क्या किया जा सकता है?

महिलाओं और लड़कियों की गुमशुदगी रोकने के लिए केवल पुलिस की कार्रवाई पर्याप्त नहीं होगी। खोज अभियान, अपराध की जांच, सामाजिक सहायता और परिवारों के साथ संवाद को एक साथ मजबूत करना होगा। इसके लिए कुछ कदम अहम हो सकते हैं।

1. शिकायत दर्ज करने और खोज करने में देरी न हो: किसी महिला या लड़की के लापता होने की सूचना मिलते ही पुलिस को जोखिम का आकलन कर तुरंत जरूरी कदम उठाने चाहिए। नाबालिगों के मामलों में विशेष सतर्कता बरतनी चाहिए और लागू मानक संचालन प्रक्रिया का पालन सुनिश्चित करना चाहिए।

2. हर मामले की नियमित समीक्षा: पुलिस थानों और जिला स्तर पर अनसुलझे मामलों की समीक्षा की जाए। परिवारों को जांच की स्थिति की जानकारी दी जाए और हर मामले में अगले कदम तथा जिम्मेदार अधिकारी का रिकॉर्ड रखा जाए।

3. मानव तस्करी की आशंका वाले मामलों की जांच: रोजगार या शादी का झांसा देने, जबरन ले जाने, शोषण या दूसरे राज्यों में ले जाने के संकेत मिलने पर संबंधित एजेंसियों के साथ समन्वय किया जाए। एक ही तरह के मामलों में समान संपर्कों और संदिग्ध गतिविधियों की जांच हो।

4. जिलावार आंकड़े सार्वजनिक किए जाएं: प्रशासन को सालाना और मासिक स्तर पर दर्ज मामलों, खोजे गए लोगों, अनसुलझे मामलों और जांच की स्थिति का सत्यापित ब्योरा जारी करना चाहिए। इससे संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान और संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल में मदद मिलेगी।

5. दूसरे राज्यों की पुलिस के साथ समन्वय: यदि किसी लापता व्यक्ति के दूसरे राज्य में होने की आशंका हो, तो संबंधित पुलिस इकाइयों के बीच सूचना साझा करने और खोज अभियान की व्यवस्था हो। अस्पतालों, आश्रय गृहों और अन्य संबंधित संस्थानों के रिकॉर्ड से मिलान भी उपयोगी हो सकता है।

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MD Faijan

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लेखक

मोहम्मद फैजान न्यूज़ ऑफ द डे में पत्रकार हैं, जहाँ वे खेल, मनोरंजन, राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मामलों को कवर करते हैं। इससे पहले वे यूट्यूब चैनल स्पोर्ट्स यारी में सोशल मीडिया एग्जीक्यूटिव के रूप में कार्य कर चुके हैं, जहाँ उन्होंने डिजिटल कंटेंट मैनेजमेंट और ऑडियंस एंगेजमेंट का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त किया। भारत के छत्तीसगढ़ राज्य के कोरिया जिले से संबंध रखने वाले फैजान आधुनिक मीडिया कार्यप्रणालियों की अच्छी समझ रखते हैं और कहानी कहने के विभिन्न रूपों में गहरी रुचि रखते हैं।

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