Sunday, 02 August 2026
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दलितों का न्यायपालिका में प्रतिनिधित्व क्यों कम है और सुप्रीम कोर्ट में उनकी आवाज़ क्यों नदारद है?

नई दिल्ली, (न्यूज ऑफ द डे)

भारत के सुप्रीम कोर्ट में दलितों का सीमित प्रतिनिधित्व व्यापक जातिगत बहिष्करण की ओर इशारा करता है। देश की कुल जनसंख्या का लगभग 16-17% हिस्सा होने के बावजूद, 1950 में सुप्रीम कोर्ट की स्थापना से लेकर अब तक, दलित समुदाय से गिने-चुने जज ही इस सर्वोच्च न्यायालय में नियुक्त किए गए हैं। यह असमानता सिस्टमेटिक बायस को दर्शाती है, जहां हाशिए पर मौजूद समुदायों को शीर्ष पदों तक पहुंचने में कई बाधाओं का सामना करना पड़ता है।

दलितों के कम प्रतिनिधित्व के कारण

  1. कॉलेजियम प्रणाली की अपारदर्शिता
    भारत में न्यायाधीशों की नियुक्ति कॉलेजियम प्रणाली के तहत होती है, जहां न्यायाधीश ही न्यायाधीशों का चयन करते हैं। इस प्रणाली की पारदर्शिता पर सवाल उठते रहे हैं, क्योंकि इसमें उच्च जातियों का दबदबा है और यह बाहरी हस्तक्षेप से मुक्त रहती है। इससे यह सुनिश्चित करना कठिन हो जाता है कि हाशिए पर मौजूद समुदायों को समान अवसर मिले।
  2. कानूनी शिक्षा और पेशेवर नेटवर्क तक सीमित पहुंच
    उच्च न्यायपालिका तक पहुंचने के लिए न केवल बेहतरीन कानूनी शिक्षा, बल्कि मजबूत पेशेवर नेटवर्क और प्रभावशाली संपर्क भी आवश्यक होते हैं। परंतु, कानूनी क्षेत्र में उच्च जातियों का वर्चस्व होने के कारण, दलित समुदाय के लोगों को इन तक पहुंचने के सीमित अवसर मिलते हैं।
  3. आरक्षण नीति का अभाव

शिक्षा और सरकारी नौकरियों में जाति-आधारित आरक्षण की व्यवस्था मौजूद है, लेकिन न्यायपालिका इस दायरे से बाहर है। सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में किसी प्रकार की संवैधानिक आरक्षण नीति नहीं होने के कारण, उच्च जातियों का प्रभुत्व बना रहता है और न्यायपालिका में विविधता सुनिश्चित करने के कोई ठोस प्रयास नहीं किए जाते।

न्यायपालिका में विविधता की कमी सिर्फ प्रतिनिधित्व का मामला नहीं है, बल्कि यह उस न्यायिक दृष्टिकोण को भी प्रभावित करता है, जिसके तहत दलितों से जुड़े मामलों को सुना और समझा जाता है।

  • जाति-आधारित हिंसा, भेदभाव और सामाजिक न्याय से जुड़े कई मामलों को वह संवेदनशीलता नहीं मिल पाती, जो एक दलित पृष्ठभूमि से आने वाले न्यायाधीश प्रदान कर सकते थे।
  • न्यायपालिका में समान भागीदारी के बिना, समाज के वंचित वर्गों की आवाज़ दब जाती है और न्यायिक निर्णयों में उनकी समस्याओं को लेकर अपेक्षित संवेदनशीलता नहीं दिखती।

समाधान की दिशा में संभावित कदम

  1. न्यायिक नियुक्तियों में पारदर्शिता: कॉलेजियम प्रणाली में सुधार कर इसे अधिक पारदर्शी और समावेशी बनाया जाए, ताकि जातिगत संतुलन सुनिश्चित हो सके।
  2. प्रतिनिधित्व के लिए नीतिगत हस्तक्षेप: उच्च न्यायपालिका में आरक्षण या विशेष प्रतिनिधित्व नीति लागू करने की जरूरत है, ताकि दलित समुदाय के अधिक लोग इन पदों तक पहुंच सकें।
  3. कानूनी शिक्षा और अवसरों का विस्तार:
  • दलित कानून विद्यार्थियों के लिए मेंटरशिप प्रोग्राम, छात्रवृत्ति और विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किए जाएं।
  • उन्हें ऐसे संसाधन उपलब्ध कराए जाएं, जो शीर्ष कानूनी संस्थानों और न्यायिक पदों तक उनकी पहुंच सुनिश्चित कर सकें।

भारत के लोकतंत्र और सामाजिक न्याय के आदर्शों को मजबूत करने के लिए न्यायपालिका में समावेशिता आवश्यक है। जब तक न्यायपालिका में दलितों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं होगा, तब तक यह संस्था पूरी तरह से देश की विविधता को प्रतिबिंबित नहीं कर पाएगी। इस असंतुलन को दूर करने के लिए संस्थागत सुधार, नीति-निर्माण, और सकारात्मक हस्तक्षेप की आवश्यकता है।

अगर न्यायपालिका में जातिगत बाधाएं बनी रहीं, तो यह न्याय की निष्पक्षता और भारत की लोकतांत्रिक आत्मा को कमजोर कर सकता है। इसलिए अब समय आ गया है कि इस असमानता को समाप्त करने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं।

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BN

Bureau NOTD

लेखक

NOTD News के लिए नियमित रूप से समाचार लिखते हैं।

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