इस जमीन में से 500 वर्ग मीटर हिस्सा आवासीय इस्तेमाल के लिए मुफ्त दिया जाएगा, जबकि बाकी 478 वर्ग मीटर जमीन बाजार मूल्य के 55 प्रतिशत पर आवंटित करने का प्रस्ताव है। इस जमीन को लेकर वर्ष 2012 से विवाद चल रहा है।
वडोदरा: गुजरात के वडोदरा में पूर्व भारतीय क्रिकेटर यूसुफ पठान से जुड़े जमीन विवाद में एक नया मोड़ आया है। राज्य सरकार ने नगर निगम के स्वामित्व वाले 978 वर्ग मीटर के प्लॉट को पठान को आवंटित करने की मंजूरी दे दी है। यह जमीन शहर के तांदलजा इलाके में स्थित है और पठान के परिवार के आवास के पास है। इस मामले में पहले नगर निगम ने कथित अतिक्रमण को लेकर उन्हें नोटिस जारी किया था, जबकि गुजरात हाई कोर्ट में भी आवंटन को लेकर कानूनी लड़ाई चली थी।
गुजरात सरकार ने इस जमीन के आवंटन के लिए अपनी सहमति दे दी है। प्रस्ताव के मुताबिक, 500 वर्ग मीटर जमीन आवासीय उपयोग के लिए बिना कीमत के दी जाएगी। शेष 478 वर्ग मीटर जमीन वडोदरा अर्बन डेवलपमेंट अथॉरिटी (वीयूडीए) की मूल्यांकन समिति द्वारा तय बाजार मूल्य के 55 प्रतिशत पर आवंटित की जाएगी।
20.53 करोड़ रुपये की जमीन
विवादित प्लॉट का कुल क्षेत्रफल 978 वर्ग मीटर बताया गया है। वडोदरा नगर निगम की स्थायी समिति ने जुलाई 2026 में इस जमीन का मूल्यांकन 2.10 लाख रुपये प्रति वर्ग मीटर के हिसाब से मंजूर किया था। इस आधार पर पूरी जमीन की अनुमानित कीमत करीब 20.53 करोड़ रुपये बैठती है।
सरकार की ओर से मंजूर व्यवस्था के तहत जमीन को दो हिस्सों में बांटा गया है। पहला हिस्सा 500 वर्ग मीटर का है, जिसे आवासीय उपयोग के लिए मुफ्त आवंटित किया जाना है। दूसरा हिस्सा 478 वर्ग मीटर का है, जिसे निर्धारित मूल्यांकन के 55 प्रतिशत पर दिया जाएगा। इसका मतलब है कि यूसुफ पठान को दूसरे हिस्से के लिए बाजार मूल्य पर 45 प्रतिशत की छूट मिलेगी।
सरकारी प्रस्ताव में यह भी कहा गया है कि इस व्यवस्था को भविष्य के मामलों के लिए मिसाल नहीं माना जाएगा। इसके अलावा, राज्य के राजस्व विभाग को नगर निगम द्वारा हस्तांतरित जमीन के मूल्य के बराबर दूसरी जमीन नगर निगम को आवंटित करनी होगी।
2012 में शुरू हुआ था जमीन का विवाद
यूसुफ पठान और वडोदरा नगर निगम के बीच जमीन को लेकर विवाद करीब 14 साल पुराना है। मार्च 2012 में पठान ने नगर निगम से तांदलजा इलाके में स्थित इस खाली प्लॉट को 99 साल की लीज पर आवंटित करने का अनुरोध किया था। वह इस जमीन को सार्वजनिक नीलामी के बिना हासिल करना चाहते थे।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, पठान ने जमीन आवंटित करने की मांग करते हुए अपनी अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटर की पहचान से जुड़ी सुरक्षा जरूरतों का उल्लेख किया था। उन्होंने परिवार के घर के नजदीक स्थित इस भूखंड को आवासीय इस्तेमाल के लिहाज से उपयुक्त भी बताया था।
उस समय वडोदरा नगर निगम की स्थायी समिति और सामान्य बोर्ड ने उनके प्रस्ताव को मंजूरी दे दी थी। तब जमीन का मूल्य 57,270 रुपये प्रति वर्ग मीटर निर्धारित किया गया था। इस दर से पूरे प्लॉट की कीमत लगभग 5.6 करोड़ रुपये आंकी गई थी और पठान ने यह राशि देने की इच्छा जताई थी।
लेकिन नगर निगम की मंजूरी के बाद भी जमीन का आवंटन अंतिम रूप नहीं ले सका। चूंकि प्रस्ताव में सार्वजनिक नीलामी के बिना जमीन देने की बात थी, इसलिए गुजरात सरकार के शहरी विकास विभाग की अनुमति जरूरी थी।
लोकसभा चुनाव के बाद नगर निगम ने भेजा था नोटिस
जमीन का मामला जून 2024 में फिर चर्चा में आया। उस समय यूसुफ पठान पश्चिम बंगाल की बहरामपुर लोकसभा सीट से तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीतकर सांसद बने थे। उन्होंने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अधीर रंजन चौधरी को हराया था।
चुनाव परिणाम आने के कुछ ही दिनों बाद वडोदरा नगर निगम ने पठान को नोटिस जारी किया। नोटिस में उनसे तांदलजा इलाके के उस प्लॉट से कथित अतिक्रमण हटाने को कहा गया था। यह जमीन नगर निगम के स्वामित्व में थी और पठान के परिवार के घर के पास स्थित थी।
पठान ने नगर निगम की कार्रवाई को गुजरात हाई कोर्ट में चुनौती दी। उनका पक्ष जमीन के आवंटन और उस पर अपने दावे से जुड़ा था। दूसरी ओर, नगर निगम का कहना था कि आवंटन की आवश्यक प्रक्रिया पूरी नहीं हुई थी और जमीन पर कब्जे का कोई वैध आधार नहीं था।
हाई कोर्ट ने भी उठाए थे सवाल
अगस्त 2025 में गुजरात हाई कोर्ट के एकल न्यायाधीश ने राज्य सरकार के उस फैसले को बरकरार रखा था, जिसमें जमीन आवंटित करने के प्रस्ताव को खारिज कर दिया गया था। अदालत ने कहा था कि लंबे समय तक किसी जमीन पर कब्जा बनाए रखने और उसके लिए भुगतान नहीं करने से अपने आप कानूनी अधिकार पैदा नहीं हो जाता।
इस आदेश के खिलाफ पठान ने हाई कोर्ट की खंडपीठ में अपील की। जून 2026 में सुनवाई के दौरान अदालत ने सवाल उठाया कि औपचारिक आवंटन और भुगतान की प्रक्रिया पूरी हुए बिना सार्वजनिक जमीन पर कब्जा कैसे किया जा सकता है।
खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान मौखिक रूप से कहा था कि अगर जमीन पर अवैध कब्जे की पुष्टि होती है, तो आवंटन संबंधी राहत मिलने के बावजूद कब्जे की अवधि के लिए शुल्क या मुआवजे की देनदारी पर अलग से विचार किया जा सकता है। अदालत ने यह भी संकेत दिया था कि जमीन पर कब्जा लगातार बने रहने से संबंधित वित्तीय देनदारी बढ़ सकती है।
इसके बाद पठान के वकील ने राज्य की अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों के लिए जमीन आवंटन संबंधी नीति के तहत राहत मांगने के लिए समय मांगा था। अदालत ने उन्हें चार सप्ताह का समय दिया।
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नीलामी की तैयारी के बीच बदला घटनाक्रम
जमीन के मूल्यांकन को लेकर नगर निगम में भी चर्चा हुई थी। जुलाई 2026 में स्थायी समिति ने प्लॉट का मूल्यांकन 2.10 लाख रुपये प्रति वर्ग मीटर के हिसाब से मंजूर किया और सार्वजनिक नीलामी की प्रक्रिया आगे बढ़ाने की तैयारी की गई।
लेकिन नगर निगम के सामान्य बोर्ड ने इस जमीन पर कथित अतिक्रमण का मुद्दा उठाया। सदस्यों ने सवाल किया कि जब जमीन पर कब्जे का विवाद सुलझा नहीं है, तो इसे नीलामी के लिए कैसे आगे बढ़ाया जा सकता है। इसके बाद नीलामी संबंधी प्रस्ताव पर आगे की कार्रवाई रोक दी गई थी।
इसी बीच राज्य सरकार ने जमीन के आवंटन के लिए नया निर्णय लिया। सरकार का प्रस्ताव 13 अगस्त 2026 के सरकारी आदेश पर आधारित है। यह आदेश 29 अगस्त को नगर निगम तक पहुंचा था, यानी पठान की हाई कोर्ट अपील वापस लिए जाने से दो दिन पहले।
टीएमसी से अलग होने के बाद फैसले ने बढ़ाई राजनीतिक चर्चा
यूसुफ पठान से जुड़े जमीन आवंटन के फैसले का समय भी चर्चा का विषय बना है। वह 2024 में तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा पहुंचे थे। हालांकि, 2026 में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद राजनीतिक घटनाक्रम बदला।
जून 2026 में पठान उन 20 सांसदों में शामिल थे, जिन्होंने तृणमूल कांग्रेस से अलग होकर नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) का रुख किया। इस घटनाक्रम के करीब दो महीने बाद गुजरात सरकार ने वडोदरा की विवादित जमीन के आवंटन को मंजूरी दी।
इस समय-संबंध के कारण फैसले पर राजनीतिक चर्चा हो रही है। चर्चाएं तेज हैं कि जमीन आवंटन का निर्णय सीधे उनके पार्टी बदलने के साथ जुड़ा हुआ है। हालांकि, उपलब्ध रिपोर्टों के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा
अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों के लिए जमीन आवंटन की नीति
गुजरात सरकार ने इस मामले में अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों के लिए जमीन आवंटन संबंधी राज्य नीति का सहारा लिया है। रिपोर्टों के मुताबिक, इसी नीति के तहत पठान के दावे पर फिर विचार किया गया।
हालांकि, इस नीति के तहत जमीन आवंटन का पात्र होना और किसी विशेष जमीन पर स्वयं कानूनी अधिकार मिल जाना दो अलग बातें हैं। इस मामले में पहले नगर निगम ने प्रस्ताव को मंजूरी दी थी, लेकिन राज्य सरकार ने 2014 में इसे अस्वीकार कर दिया था। बाद में हाई कोर्ट ने भी पुराने फैसले को बरकरार रखा।
अब राज्य सरकार ने नई शर्तों के साथ आवंटन को मंजूरी दी है। इसमें 500 वर्ग मीटर जमीन मुफ्त देने और शेष हिस्से को रियायती दर पर आवंटित करने की बात है। सरकारी आदेश में इसे भविष्य के मामलों के लिए मिसाल नहीं मानने की शर्त भी शामिल है।
इसलिए यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि नगर निगम के अंतिम प्रस्ताव में जमीन के मूल्य, भुगतान, कब्जे की अवधि और किसी संभावित देनदारी से संबंधित शर्तों को किस तरह तय किया जाता है।
