विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस मनाने की शुरुआत 1992 में विश्व मानसिक स्वास्थ्य महासंघ (WFMH) ने की थी। जानिए, साल 2026 में इसकी थीम क्या है और मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाने में इस दिवस की क्या भूमिका है।
नई दिल्ली: इंसान की सेहत का मतलब केवल शारीरिक रूप से स्वस्थ होना नहीं है। बेहतर जीवन के लिए मानसिक शांति, भावनाओं पर संतुलन बनाए रखने की क्षमता, तनाव का सामना करने का तरीका और दूसरों के साथ अच्छे संबंध भी उतने ही जरूरी हैं, जितना शारीरिक स्वास्थ्य। हालांकि, मानसिक सेहत को लेकर समाज में अब भी कई मिथक और भ्रांतियां प्रचलित हैं।
मानसिक परेशानी से गुजर रहे कई लोग अपनी स्थिति के बारे में खुलकर बात करने से बचते हैं। वहीं, कुछ लोगों को जरूरत होने के बावजूद समय पर उचित परामर्श और उपचार नहीं मिल पाता। इन चुनौतियों के प्रति लोगों को जागरूक करने और मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने के उद्देश्य से हर साल 10 अक्टूबर को विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस मनाया जाता है।
विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस 2026 की थीम ‘Lived Experiences Heard: Real Voices, Real Change’ है। इसके जरिए उन लोगों की आवाज और उनके अनुभवों को महत्व देने पर जोर दिया गया है, जिन्होंने मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी चुनौतियों का सामना किया है। इसका उद्देश्य उनकी बातों को समझना और उनके अनुभवों को मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार तथा सकारात्मक बदलाव का आधार बनाना है। साथ ही, उनकी वास्तविक जरूरतों को समझकर ऐसे कदम उठाए जाएं, जिनसे मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक दृष्टिकोण में सार्थक सुधार हो सके।
क्यों मनाया जाता है विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस?
विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस का उद्देश्य मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं के बारे में लोगों को जागरूक करना, गलत धारणाओं को दूर करना और जरूरतमंद लोगों तक सहायता पहुंचाने के प्रयासों को बढ़ावा देना है। विश्व मानसिक स्वास्थ्य महासंघ (WFMH) ने 1992 में इस दिवस की शुरुआत की थी।
आज इसका आयोजन दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में जागरूकता अभियानों, चर्चाओं, शैक्षणिक गतिविधियों और सामुदायिक कार्यक्रमों के जरिए किया जाता है।
मानसिक स्वास्थ्य का अर्थ केवल मानसिक बीमारी का न होना नहीं है। इसमें व्यक्ति का भावनात्मक और सामाजिक रूप से बेहतर महसूस करना, रोजमर्रा की चुनौतियों का सामना करना और जीवन में सक्रिय भागीदारी कर पाना भी शामिल है। इसलिए मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल को केवल इलाज तक सीमित रखने के बजाय इसे शिक्षा, कार्यस्थल, परिवार और सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था से जोड़ना जरूरी है।
दुनिया में मानसिक स्वास्थ्य कानूनों की स्थिति क्या है?
मानसिक स्वास्थ्य को लेकर कानूनों का उद्देश्य केवल इलाज की व्यवस्था करना नहीं है। इनके जरिए मरीजों की गरिमा, निजता, भेदभाव से सुरक्षा, उपचार में भागीदारी और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच जैसे अधिकारों की रक्षा भी की जाती है।
WHO की Mental Health Atlas 2024 रिपोर्ट के अनुसार, सर्वे में शामिल 144 देशों में से 104 देशों ने अलग मानसिक स्वास्थ्य कानून होने की जानकारी दी। यह संख्या बताती है कि अनेक देशों ने इस विषय पर कानूनी ढांचा तैयार किया है।
WHO और संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय ने 2023 में मानसिक स्वास्थ्य कानूनों को मानवाधिकारों के अनुरूप बनाने के लिए संयुक्त मार्गदर्शन जारी किया था। इसमें भेदभाव खत्म करने, व्यक्ति की गरिमा और स्वायत्तता का सम्मान करने तथा संस्थानों पर अत्यधिक निर्भरता के बजाय समुदाय आधारित देखभाल को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया है।
भारत में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े कानून
भारत में मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित सेवाओं को सुलभ बनाने और मरीजों के हितों की सुरक्षा के लिए मानसिक स्वास्थ्य देखरेख अधिनियम, 2017 (Mental Healthcare Act, 2017) को अहम कानून माना जाता है।
29 मई 2018 से लागू इस कानून का उद्देश्य मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी उपचार और देखभाल सेवाओं को लोगों के लिए अधिक सुलभ बनाना है। साथ ही, यह मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रहे व्यक्तियों के अधिकारों को सुरक्षित रखने और उन्हें आवश्यक कानूनी संरक्षण प्रदान करने की व्यवस्था करता है।
इस अधिनियम के तहत मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच को अधिकार के रूप में मान्यता दी गई है। इसमें सस्ती, पर्याप्त और अच्छी गुणवत्ता वाली सेवाएं उपलब्ध कराने तथा जाति, धर्म, लिंग, सामाजिक स्थिति या अन्य आधारों पर भेदभाव से बचाने की व्यवस्था शामिल है।
भारत की राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य नीति 2014 भी मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक सुलभ बनाने और अधिकार आधारित दृष्टिकोण को बढ़ावा देने की बात करती है। इसके अतिरिक्त, राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम (National Mental Health Programme) के तहत मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को स्वास्थ्य व्यवस्था से जोड़ने के प्रयास किए जाते हैं। जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम का उद्देश्य भी स्थानीय स्तर पर पहचान, उपचार और सहायता उपलब्ध कराने में मदद करना है।
मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच बढ़ाने के प्रयास
भारत में राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत मानसिक स्वास्थ्य देखभाल को प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं से जोड़ने की कोशिश की जा रही है। जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के माध्यम से लोगों को स्थानीय स्तर पर पहचान, उपचार और रेफरल जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया है।
इसके अलावा, सरकार का Tele-MANAS कार्यक्रम दूरभाष के माध्यम से मानसिक स्वास्थ्य संबंधी सहायता उपलब्ध कराने के लिए शुरू किया गया है। इसके लिए राष्ट्रीय हेल्पलाइन नंबर 14416 है।
इस पहल का मकसद उन लोगों को भी मानसिक स्वास्थ्य संबंधी मदद उपलब्ध कराना है, जिनके लिए विशेषज्ञों तक सीधे पहुंचना आसान नहीं होता। इस सेवा की उपलब्धता और इसमें मिलने वाले विभिन्न भाषाई विकल्पों से जुड़ी नवीनतम जानकारी आधिकारिक माध्यमों पर देखी जा सकती है।
इस सबके बावजूद जागरूकता की कमी
भारत में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े कानून और सरकारी कार्यक्रम मौजूद तो हैं, लेकिन इनके साथ सामाजिक जागरूकता और सेवाओं की उपलब्धता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
कई परिवारों में मानसिक परेशानी को बीमारी के बजाय कमजोरी, नकारात्मक सोच या इच्छाशक्ति की कमी मान लिया जाता है। इसका परिणाम यह हो सकता है कि परेशानी का सामना कर रहा व्यक्ति अपनी बात साझा करने से बचे या सहायता लेने में देरी करे।
विशेष रूप से छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों तक पहुंच, सेवाओं की उपलब्धता और उनके खर्च से जुड़ी बाधाएं महत्वपूर्ण हो सकती हैं। कुछ लोग सामाजिक बदनामी के डर से अपनी परेशानी छिपाते हैं, जबकि कुछ को यह पता ही नहीं होता कि मदद कहां से मिल सकती है।
परिवार और समाज की भूमिका भी अहम है। किसी व्यक्ति की परेशानी को मजाक में उड़ाना, उसे कमजोर कहना या बिना उसकी बात सुने सलाह देना समस्या को और कठिन बना सकता है। इसके विपरीत, ध्यान से सुनना, सम्मानजनक व्यवहार करना और जरूरत पड़ने पर पेशेवर मदद लेने के लिए प्रोत्साहित करना उपयोगी हो सकता है।
ब्रिटेन: मानसिक स्वास्थ्य और मरीजों के अधिकारों पर कानूनी व्यवस्था
ब्रिटेन में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े नियम पूरे देश में एक जैसे नहीं हैं; इंग्लैंड, वेल्स, स्कॉटलैंड और उत्तरी आयरलैंड में अलग-अलग कानूनी व्यवस्थाएं लागू होती हैं।
इंग्लैंड और वेल्स में Mental Health Act मानसिक बीमारी से जुड़े कुछ विशेष हालात में मूल्यांकन, उपचार और अस्पताल में भर्ती की कानूनी प्रक्रिया निर्धारित करता है। इसके साथ अन्य कानून भी व्यक्तियों के अधिकारों और भेदभाव से सुरक्षा से संबंधित हैं।
ब्रिटेन की व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मामलों में मरीज के अधिकार, उपचार की आवश्यकता और कानूनी सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की जाती है। हालांकि, किसी कानून की प्रभावशीलता का आकलन उसके वास्तविक क्रियान्वयन और सेवाओं तक पहुंच के आधार पर ही किया जाना चाहिए।
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अमेरिका: बीमा और सेवाओं तक पहुंच पर जोर
अमेरिका में मानसिक स्वास्थ्य व्यवस्था कई संघीय और राज्य स्तरीय कानूनों के जरिए संचालित होती है। Mental Health Parity and Addiction Equity Act, 2008 का उद्देश्य कई स्वास्थ्य बीमा योजनाओं में मानसिक स्वास्थ्य और नशे से जुड़े उपचार पर लागू सीमाओं को अन्य चिकित्सा सेवाओं के मुकाबले अनुचित रूप से अधिक कठोर होने से रोकना है।
हालांकि, बीमा नियमों के बावजूद सेवाओं की लागत, बीमा कवरेज और विशेषज्ञों की उपलब्धता जैसे मुद्दे लोगों की पहुंच को प्रभावित कर सकते हैं। अमेरिका का उदाहरण दिखाता है कि मानसिक स्वास्थ्य कानूनों में बीमा और वित्तीय पहुंच भी महत्वपूर्ण विषय हैं, लेकिन केवल कानूनी प्रावधान पर्याप्त नहीं होते।
ऑस्ट्रेलिया: राष्ट्रीय नीति और राज्य स्तरीय कानून
ऑस्ट्रेलिया में मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित व्यवस्था राष्ट्रीय नीतियों, सरकारी कार्यक्रमों और राज्यों तथा क्षेत्रों के कानूनों के मेल से चलती है। मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं, रोकथाम और सहायता को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर समन्वय की कोशिश की जाती है, जबकि कई कानूनी प्रक्रियाएं संबंधित राज्य या क्षेत्र के कानूनों के अंतर्गत आती हैं।
यह व्यवस्था इस बात को रेखांकित करती है कि मानसिक स्वास्थ्य को केवल अस्पतालों तक सीमित नहीं रखा जा सकता। समुदाय आधारित सेवाएं, शुरुआती सहायता और अलग-अलग स्वास्थ्य सेवाओं के बीच समन्वय भी जरूरी हैं।
नॉर्वे: मानसिक स्वास्थ्य देखभाल के लिए अलग कानून
नॉर्वे में Mental Health Care Act, 1999 मानसिक स्वास्थ्य देखभाल से जुड़ा एक प्रमुख कानून है। WHO के कानूनी संसाधनों में नॉर्वे के इस कानून और इससे संबंधित नियमों का उल्लेख मिलता है।
ऐसे कानूनों का महत्व इस बात में है कि मानसिक स्वास्थ्य देखभाल के लिए स्पष्ट कानूनी आधार उपलब्ध हो। फिर भी किसी देश को केवल उसके कानून के आधार पर दुनिया का सर्वश्रेष्ठ मॉडल नहीं कहा जा सकता। सेवाओं की गुणवत्ता, मरीजों के अनुभव, अधिकारों की सुरक्षा, उपचार की उपलब्धता और परिणामों को भी देखना जरूरी है।
इन देशों के उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि मानसिक स्वास्थ्य के लिए कोई एक ही कानूनी मॉडल सभी जगह समान रूप से लागू नहीं किया जा सकता। हर देश की स्वास्थ्य व्यवस्था, सामाजिक परिस्थितियां और कानूनी परंपराएं अलग हैं। प्रभावी व्यवस्था वही होगी, जो लोगों को समय पर सहायता दे, उनके अधिकारों की रक्षा करे और इलाज को उनकी वास्तविक जरूरतों के अनुरूप बनाए।
सामाजिक सोच में बदलाव भी अहम
मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी चुनौतियों से निपटने के लिए सरकारों, स्वास्थ्य संस्थानों, शैक्षणिक संगठनों, परिवारों और समाज को साथ मिलकर काम करना होगा। स्कूलों और कॉलेजों में मानसिक स्वास्थ्य की बुनियादी जानकारी देना, कार्यस्थलों पर तनाव और भेदभाव से जुड़े मुद्दों पर ध्यान देना तथा समुदायों में सहायता सेवाओं की जानकारी फैलाना इस दिशा में उपयोगी कदम हो सकते हैं।
साथ ही, मानसिक स्वास्थ्य से जूझ रहे लोगों को केवल उनके अनुभवों के आधार पर परिभाषित नहीं करना चाहिए। उनकी निजता का सम्मान करना और उनकी सहमति के बिना निजी अनुभव सार्वजनिक न करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। सहायता का उद्देश्य व्यक्ति को निर्णय प्रक्रिया से बाहर करना नहीं, बल्कि उसे अपनी जरूरतों और पसंद के अनुसार मदद पाने में सक्षम बनाना होना चाहिए।
