प्रति महिला 2.1 बच्चों की दर को प्रतिस्थापन प्रजनन स्तर माना जाता है। भारत की प्रजनन दर इससे नीचे आ चुकी है। जानें डेमोग्राफिक मोमेंटम क्या है और इसका भारत के भविष्य से क्या संबंध है।
नई दिल्ली: भारत में लंबे समय तक बढ़ती जनसंख्या को एक बड़ी आर्थिक और सामाजिक चुनौती के रूप में देखा जाता रहा है। परिवार नियोजन, गर्भनिरोधक साधनों की उपलब्धता, स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार और शिक्षा के प्रसार के कारण जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने की कोशिश की गई।
लेकिन अब तस्वीर काफी हद तक बदलती नजर आ रही है। देश में प्रजनन दर लगातार गिरते हुए जरूरी स्तर से नीचे पहुंच गई है। इससे भविष्य में कामकाजी आबादी, बुजुर्गों की देखभाल और आर्थिक विकास को लेकर नई चुनौतियों के पैदा होने की संभावनाएं बढ़ती जा रही हैं।
क्या होती है कुल प्रजनन दर?
कुल प्रजनन दर यानी टोटल फर्टिलिटी रेट (TFR) एक ऐसा आंकड़ा होता जो किसी महिला के प्रजनन काल, सामान्यतः 15 से 49 वर्ष की उम्र के दौरान औसतन बच्चों को जन्म देने की संख्या बताती है। यह किसी एक महिला के वास्तव में होने वाले बच्चों की संख्या नहीं, बल्कि आबादी के स्तर पर इस्तेमाल किया जाने वाला जनसांख्यिकीय संकेतक है।
प्रजनन दर के संदर्भ में 2.1 का आंकड़ा खास महत्व रखता है। इसे रिप्लेसमेंट फर्टिलिटी लेवल या प्रतिस्थापन प्रजनन स्तर कहा जाता है। सामान्य परिस्थितियों में इस स्तर पर एक पीढ़ी अपनी जगह अगली पीढ़ी को बनाए रखने में सक्षम होती है।
हालांकि, 2.1 से नीचे प्रजनन दर होने का मतलब यह नहीं है कि उस देश की आबादी तत्काल घटने लगेगी। भारत में फिलहाल एक बड़ी संख्या में युवा और प्रजनन उम्र के लोग हैं। ऐसे में प्रति महिला बच्चों की औसत संख्या कम होने के बावजूद कुल जन्मों की संख्या कुछ समय तक काफी अधिक रह सकती है। इस प्रभाव को जनसांख्यिकीय गति (डेमोग्राफिक मोमेंटम) कहा जाता है।
1950 से अब तक भारत की प्रजनन दर
भारत में प्रजनन दर की गिरावट एकाएक शुरू नहीं हुई। यह प्रक्रिया कई वर्षों से जारी है, लेकिन हाल के वर्षों में इसका स्तर उस सीमा तक पहुंच गया है, जहां इसके दीर्घकालीन आर्थिक एवं सामाजिक परिणामों पर गंभीरता से विचार करना अब वाजिब हो गया है।
संयुक्त राष्ट्र के वर्ल्ड पॉपुलेशन प्रॉस्पेक्ट्स 2024 पर आधारित नतीजों के अनुसार, भारत की प्रजनन दर में लगातार गिरावट इस प्रकार रही है –
- 1950: प्रति महिला औसतन लगभग 5.7 बच्चे।
- 1960 का दशक: प्रजनन दर करीब 5.9 के आसपास रही। इस दौरान परिवार बड़े होते थे और शिशु मृत्यु दर भी आज की तुलना में अधिक थी।
- 1970 का दशक: दर में गिरावट शुरू हुई और दशक के अंत तक यह लगभग 5.0 के आसपास पहुंच गई।
- 1980 का दशक: प्रजनन दर घटकर लगभग 4.4 तक आ गई।
- 1990 का दशक: परिवारों में बच्चों की औसत संख्या घटकर 4.0 से नीचे जाने लगी।
- 2000: प्रति महिला औसतन करीब 3.4 बच्चे।
- 2010: आंकड़ा घटकर लगभग 2.6 हो गया।
- 2020: UN के अनुमान में प्रजनन दर करीब 2.0 आंकी गई
- 2024: भारत के सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (SRS) की सांख्यिकीय रिपोर्ट के अनुसार दर 1.9 दर्ज की गई।
- 2025: संयुक्त राष्ट्र के अनुमान में भारत की प्रजनन दर घटकर 1.9 हुई।
भारत में प्रजनन दर के घटने का कारण?
प्रजनन दर में गिरावट के पीछे कोई एक कारण नहीं है। शिक्षा, स्वास्थ्य, शहरीकरण, आर्थिक दबाव, गर्भनिरोधक साधनों तक पहुंच और परिवार को लेकर बदलती सोच एक साथ इस बदलाव को प्रभावित कर रहे हैं। अलग-अलग राज्यों में इन कारकों का असर भी अलग है।
1. महिलाओं की शिक्षा और मातृत्व से जुड़ी सोच
महिलाओं की शिक्षा में वृद्धि प्रजनन दर में गिरावट के प्रमुख कारणों में शामिल है। शिक्षित महिलाएं सामान्यतः स्वास्थ्य, गर्भनिरोधक विकल्पों, गर्भधारण के बीच अंतर और बच्चों की परवरिश से जुड़े फैसलों के बारे में अधिक सतर्क हो सकती हैं। शिक्षा से उन्हें परिवार के आकार पर निर्णय लेने और अपने जीवन की योजनाएं तय करने में भी मदद मिलती है।
पहले के समय में परिवारों में कम उम्र में शादी और जल्दी बच्चे पैदा करने का चलन था। अब पढ़ाई पूरी करने, रोजगार हासिल करने और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने की प्राथमिकता बढ़ी है। इसके चलते विवाह और पहले बच्चे के जन्म में देरी हो सकती है।
हालांकि, महिलाओं की शिक्षा को प्रजनन दर में गिरावट का अकेला कारण मानना सही नहीं होगा। शिक्षा के साथ स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता, परिवार की आर्थिक स्थिति, सामाजिक मान्यताएं और पुरुषों की घरेलू जिम्मेदारियों में भागीदारी भी महत्वपूर्ण हैं।
2. करियर और आर्थिक आत्मनिर्भरता
महिलाओं के लिए शिक्षा और रोजगार के अवसर बढ़ने से जीवन की योजनाओं में बदलाव आया है। कई महिलाएं पहले अपनी पढ़ाई पूरी करना, नौकरी में स्थिरता हासिल करना और आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करना चाहती हैं। ऐसे में विवाह या मातृत्व को कुछ वर्षों के लिए टालने का फैसला अब आम होता जा रहा है।
शहरी क्षेत्रों में यह सोच विशेष रूप से उजागर होती है। यहां रोजगार की प्रतिस्पर्धा, लंबे कामकाजी घंटे और बच्चों की देखभाल के लिए सीमित सहायता जैसी चुनौतियां सामने आती हैं। दंपति को लगता है कि बच्चा होने के बाद नौकरी, आय या पेशेवर प्रगति प्रभावित हो सकती है, जिसकी वजह से वे कम बच्चे पैदा करने या मातृत्व-पितृत्व को टालने का विकल्प चुन सकते हैं।
3. देर से शादी
देर से विवाह और देर से माता-पिता बनने की प्रवृत्ति भी प्रजनन दर को प्रभावित करती है। जब दंपति परिवार शुरू करने का फैसला देर से लेते हैं, तो उनके पास बच्चे पैदा करने के लिए उपलब्ध समय कम हो सकता है। उम्र बढ़ने के साथ प्रजनन क्षमता में प्राकृतिक बदलाव भी इस प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं।
विवाह में देरी के पीछे उच्च शिक्षा, नौकरी की तलाश, आर्थिक स्थिरता की जरूरत, शहरी जीवन और व्यक्तिगत प्राथमिकताएं जैसे कई कारण हो सकते हैं। कुछ लोग पहले घर खरीदने या पर्याप्त बचत करने को प्राथमिकता देते हैं, जबकि दूसरे विवाह को जीवन की अनिवार्य समयसीमा के बजाय व्यक्तिगत निर्णय के रूप में देखते हैं।
4. बच्चों की परवरिश का बढ़ता दबाव
आज बच्चों को पालने की आर्थिक जिम्मेदारी भी परिवार के फैसलों को प्रभावित करती है। आवास, भोजन, स्वास्थ्य सेवाओं, स्कूल की फीस, कोचिंग, परिवहन और अन्य जरूरतों पर होने वाला खर्च परिवार के बजट का बड़ा हिस्सा बन सकता है।
विशेष रूप से शहरों में किराये या मकान की कीमत, कामकाजी माता-पिता के लिए डे-केयर और घरेलू सहायता की लागत अधिक हो सकती है। ऐसे में कई परिवार ज्यादा बच्चों की जगह कम बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और भविष्य पर अधिक संसाधन खर्च करना पसंद करते हैं।
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5. परिवार नियोजन तक बेहतर पहुंच
गर्भनिरोधक साधनों की उपलब्धता ने दंपतियों को यह तय करने में अधिक स्वतंत्रता दी है कि उन्हें बच्चे कब और कितने चाहिए। परिवार नियोजन सेवाओं के जरिए गर्भधारण के बीच अंतर रखना और अनचाहे गर्भ से बचना भी संभव हुआ है।
पहले कई परिवारों में गर्भधारण के समय और बच्चों की संख्या पर नियंत्रण के विकल्प सीमित थे। अब गर्भनिरोधक उपायों के बारे में जागरूकता और स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ने से परिवार अपने संसाधनों और प्राथमिकताओं के अनुसार फैसले ले सकते हैं।
इस बदलाव को केवल जन्मों की संख्या घटने के रूप में नहीं, बल्कि प्रजनन संबंधी स्वास्थ्य और व्यक्तिगत निर्णय लेने की क्षमता में सुधार के रूप में भी देखना चाहिए। परिवार नियोजन का उद्देश्य लोगों को बच्चे पैदा करने से रोकना नहीं, बल्कि उन्हें सुरक्षित और सूचित विकल्प उपलब्ध कराना है।
6. शिशु मृत्यु दर में कमी
प्रजनन दर में गिरावट का एक महत्वपूर्ण कारण शिशु और बाल मृत्यु दर में कमी भी है। जब बच्चों के शुरुआती वर्षों में जीवित रहने की संभावना कम होती है, तो कुछ परिवार अधिक बच्चे पैदा करने का फैसला कर सकते हैं। इसके विपरीत, टीकाकरण, पोषण, प्रसव संबंधी सेवाओं और चिकित्सा सुविधाओं में सुधार होने से बच्चों के जीवित रहने की संभावना बढ़ती है।
अल जजीरा की जून 2026 की रिपोर्ट में SRS के आंकड़ों के हवाले से बताया गया कि भारत में शिशु मृत्यु दर 2019 में प्रति 1,000 जीवित जन्म पर 30 थी, जो 2024 में घटकर 24 रह गई। यह बदलाव स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के महत्व को दिखाता है।
इसके अलावा, शहरीकरण और छोटे परिवारों की बढ़ती स्वीकार्यता ने भी बच्चों की संख्या को प्रभावित किया है। हालांकि, इन कारणों का प्रभाव राज्यों और सामाजिक समूहों के बीच समान नहीं है।
प्रजनन दर में गिरावट क्यों है चिंता का विषय?
घटती प्रजनन दर अपने आप में किसी समाज की विफलता नहीं है। छोटे परिवार, बेहतर स्वास्थ्य और महिलाओं को अधिक विकल्प मिलना सकारात्मक बदलाव भी हो सकते हैं। चिंता तब बढ़ती है जब प्रजनन दर लंबे समय तक कम बनी रहे और देश की आर्थिक तथा सामाजिक व्यवस्थाएं बदलती जनसांख्यिकी के अनुरूप तैयार न हों।
1) कामकाजी आबादी पर पड़ सकता है असर
भारत की अर्थव्यवस्था को लंबे समय से युवा आबादी का लाभ मिला है। बड़ी संख्या में कामकाजी उम्र के लोग उत्पादन, सेवाओं, कर संग्रह और उपभोग में योगदान दे सकते हैं। अर्थव्यवस्था के लिए यह अवसर तभी उपयोगी होता है, जब पर्याप्त रोजगार, कौशल विकास और उत्पादकता बढ़ाने वाली सुविधाएं उपलब्ध हों।
यदि आने वाले दशकों में जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या लगातार कम होती है, तो भविष्य में कामकाजी उम्र में पहुंचने वाले लोगों की संख्या भी कम हो सकती है। इससे कुछ क्षेत्रों में कर्मचारियों की कमी और आर्थिक विकास की गति बनाए रखने की चुनौती पैदा हो सकती है।
हालांकि, केवल प्रजनन दर कम होने से अर्थव्यवस्था कमजोर होना तय नहीं है। बेहतर शिक्षा, महिलाओं की रोजगार में अधिक भागीदारी, तकनीकी विकास और श्रम उत्पादकता बढ़ाकर इस प्रभाव को काफी हद तक संतुलित किया जा सकता है।
2) बुजुर्गों की बढ़ती आबादी और सामाजिक सुरक्षा
प्रजनन दर लंबे समय तक कम रहने और जीवन प्रत्याशा बढ़ने के कारण आबादी में बुजुर्गों का हिस्सा बढ़ सकता है। इसका मतलब है कि भविष्य में अधिक लोगों को पेंशन, स्वास्थ्य सेवाओं, दीर्घकालीन देखभाल और नियमित आर्थिक सहायता की जरूरत हो सकती है।
यदि परिवारों में बच्चों की संख्या कम है, तो बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल की जिम्मेदारी अपेक्षाकृत कम वयस्क बच्चों पर आ सकती है। वहीं, असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले लोगों के लिए नियमित पेंशन और पर्याप्त बचत की व्यवस्था न होने पर वृद्धावस्था अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकती है।
3) राज्यों के बीच बढ़ता जनसांख्यिकीय अंतर
भारत में प्रजनन दर सभी राज्यों में एक जैसी नहीं है। SRS 2024 के अनुसार, बिहार में यह 2.9 थी, जबकि दिल्ली में 1.2 दर्ज की गई। केरल, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में यह 1.3 के आसपास रही।
इस अंतर के पीछे शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, महिलाओं की सामाजिक स्थिति, शहरीकरण और आर्थिक विकास जैसे कारक हैं। जिन राज्यों में प्रजनन दर पहले ही काफी नीचे आ चुकी है, वहां आबादी की उम्र बढ़ने की प्रक्रिया अपेक्षाकृत जल्दी तेज हो सकती है। दूसरी ओर, अधिक प्रजनन दर वाले राज्यों में युवाओं की संख्या लंबे समय तक अधिक रह सकती है।
