इंटरव्यू, फोन कॉल या लोगों के सामने बोलते समय हकलाना क्यों बढ़ जाता है? जानिए तनाव, बोलने के डर और हकलाने के बीच बनने वाले फीडबैक लूप को।
नई दिल्ली: किसी बच्चे का बार-बार किसी शब्द का पहला अक्षर दोहराना, बोलते-बोलते अचानक रुक जाना या किसी आवाज को खींचते रहना अक्सर घर में हंसी-मजाक का विषय बना दिया जाता है। कोई उसे “जल्दी बोलो” कहता है, कोई शब्द पूरा कर देता है और कोई उसकी नकल उतारकर हंस देता है। लेकिन जिस बच्चे के लिए बोलना रोज की चुनौती बन रहा हो, उसके लिए यह महज एक छोटी-सी परेशानी नहीं होती।
हकलाना, जिसे चिकित्सा भाषा में Stuttering या Stammering कहा जाता है, बोलने की प्रवाहशीलता से जुड़ी एक जटिल समस्या है। इसमें व्यक्ति आवाज या शब्दांश दोहरा सकता है, किसी ध्वनि को लंबा खींच सकता है या बोलते समय पूरी तरह रुक सकता है। यह समस्या व्यक्ति की बुद्धि या उसके पास कहने के लिए शब्दों की कमी का संकेत नहीं है। कई बार व्यक्ति को बिल्कुल पता होता है कि उसे क्या कहना है, लेकिन बोलने की प्रक्रिया उस क्षण सहज रूप से आगे नहीं बढ़ पाती।
आखिर क्या होती है स्टैमरिंग ?
स्टैमरिंग या हकलाना एक ऐसी समस्या है जिसमें व्यक्ति के बोलने का सामान्य प्रवाह बाधित होता है। मसलन, बच्चा “मुझे पानी चाहिए” कहने की कोशिश में “म-म-मुझे पानी चाहिए” कह सकता है। कभी किसी आवाज को लंबा खींच सकता है, जैसे “म्मम्मुझे”, और कभी शब्द शुरू करने से पहले ही बोलना रुक सकता है।
यह समस्या हर व्यक्ति में एक जैसी नहीं होती। किसी में कुछ परिस्थितियों में ज्यादा दिखाई देती है तो किसी में अपेक्षाकृत कम। उत्साह, जल्दी बोलने की इच्छा, किसी महत्वपूर्ण बात को कहने का दबाव या सामने वाले के सामने असहज महसूस करना हकलाने को बढ़ा सकता है।
बचपन में ही शुरू होती है समस्या
विकासात्मक हकलाना इसका सबसे आम रूप है और आमतौर पर 2 से 5 वर्ष की उम्र के बीच दिखाई देता है। अमेरिकन स्पीच-लैंग्वेज-हियरिंग एसोसिएशन के अनुसार, हकलाने वाले करीब 95% बच्चों में इसकी शुरुआत 4 वर्ष की उम्र से पहले होती है और औसत शुरुआत लगभग 33 महीने की उम्र में होती है।
इस उम्र में बच्चे का दिमाग बहुत तेजी से भाषा और बोलने की क्षमता विकसित कर रहा होता है। बच्चे का शब्द भंडार बढ़ रहा होता है, वाक्य लंबे हो रहे होते हैं और वह अपने विचार पहले की तुलना में कहीं ज्यादा तेजी से व्यक्त करना चाहता है।
बोलने के लिए दिमाग को एक साथ कई काम करने पड़ते हैं। जैसे कि, क्या कहना है, कौन-से शब्द इस्तेमाल करने हैं, उन्हें किस क्रम में बोलना है, सांस कैसे लेनी है और होंठ, जीभ, जबड़े तथा स्वरयंत्र की मांसपेशियों को किस समय कैसे चलाना है। इन सभी प्रक्रियाओं के बीच बेहद सटीक तालमेल जरूरी है। विकास के इस दौर में यह नेटवर्क अभी परिपक्व हो रहा होता है।
इसीलिए छोटे बच्चों में कभी-कभी बोलने की गति और भाषा की बढ़ती मांग के बीच अस्थायी असंतुलन दिखाई दे सकता है।
लेकिन हर बच्चे में इसका कारण सिर्फ भाषा का विकास नहीं होता। आनुवंशिक और न्यूरोफिजियोलॉजिकल कारक भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
क्या माता-पिता के दबाव में आकर हकलाता है बच्चा?
यह एक बेहद आम सी गलतफहमी है कि बच्चे को जल्दी बोलने के लिए मजबूर करने, डांटने या घर के तनावपूर्ण माहौल के कारण हकलाना शुरू होता है। वैज्ञानिक प्रमाण इस धारणा का समर्थन नहीं करते।
हालांकि, तनाव, चिंता, तेज बातचीत की गति या बोलने का दबाव किसी व्यक्ति में हकलाने को बढ़ा सकते हैं। यानी ये परिस्थितियां समस्या को ट्रिगर या अधिक स्पष्ट कर सकती हैं, लेकिन इन्हें विकासात्मक हकलाने का मूल कारण नहीं माना जा सकता।
क्या बड़ों में भी होती है हकलाने की समस्या?
बचपन में शुरू होने वाला हकलाना कई बच्चों में समय के साथ कम हो जाता है। NHS के अनुसार, हकलाने वाले करीब दो-तिहाई बच्चे आगे चलकर धाराप्रवाह बोलने लगते हैं। लेकिन हर बच्चे के बारे में पहले से निश्चित रूप से यह नहीं बताया जा सकता कि हकलाना कब खत्म होगा या वह पूरी तरह खत्म होगा भी या नहीं।
कुछ बच्चों में यह समस्या लंबे समय तक बनी रहती है और किशोरावस्था या वयस्क जीवन तक पहुंच जाती है।
शोध में कुछ ऐसे संकेत मिले हैं जो लंबे समय तक हकलाने की संभावना से जुड़े हैं। इनमें अपेक्षाकृत अधिक उम्र में हकलाना शुरू होना, लंबे समय तक समस्या बने रहना, परिवार में हकलाने का इतिहास, अधिक बार हकलाना और कुछ भाषा संबंधी कठिनाइयां शामिल हैं। लड़कों में इसके बने रहने की संभावना लड़कियों की तुलना में अधिक पाई गई है।
यानी किशोरावस्था तक पहुंचने के बाद भी हकलाना जारी रहना असामान्य नहीं है। इसे सिर्फ यह कहकर खारिज नहीं किया जा सकता कि “उम्र के साथ अपने आप ठीक हो जाएगा।”
दिमाग से क्या है हकलाने का संबंध?
यहीं से हकलाने की कहानी और दिलचस्प हो जाती है। बोलना केवल जीभ और मुंह की गतिविधि नहीं है। यह दिमाग में भाषा, आवाज की योजना, मोटर नियंत्रण और सुनने से जुड़ी कई प्रक्रियाओं के समन्वय से होता है।
वैज्ञानिक शोध में हकलाने वाले लोगों के मस्तिष्क में भाषण से संबंधित नेटवर्क के बीच संरचनात्मक और कार्यात्मक अंतर देखे गए हैं। विशेष रूप से Speech Planning और Auditory-Motor Coordination से जुड़े नेटवर्क पर शोध हुआ है। कुछ अध्ययनों में बाएं Arcuate Fasciculus और Superior Longitudinal Fasciculus जैसे सफेद पदार्थ के मार्गों की संरचना में अंतर की चर्चा की गई है।
इसका मतलब यह है कि हकलाना एक जटिल Neurodevelopmental Condition है, जिसमें कई प्रणालियां मिलकर भूमिका निभाती हैं और हर व्यक्ति का अनुभव अलग हो सकता है।
जेनेटिक्स भी कहानी का हिस्सा है। ASHA के अनुसार करीब 60% लोग जो हकलाते हैं, परिवार में किसी अन्य व्यक्ति के हकलाने की जानकारी देते हैं। परिवार में हकलाने का इतिहास होने पर इसके लंबे समय तक बने रहने की संभावना भी बढ़ सकती है।
क्या तनाव में बढ़ती है हकलाने की समस्या?
यह सवाल बहुत से लोगों के अनुभव में आता है। घर पर व्यक्ति आराम से बोलता है, लेकिन कक्षा में अपना नाम बताते समय, फोन पर बात करते हुए, इंटरव्यू में या किसी अधिकारी के सामने बोलते समय हकलाना बढ़ जाता है।
इसके पीछे मनोवैज्ञानिक और भाषण-संबंधी दोनों प्रक्रियाएं काम कर सकती हैं। जब व्यक्ति को पहले से डर हो कि “मैं अटक जाऊंगा”, तो उसका ध्यान अपनी बात के बजाय अपनी आवाज और संभावित गलती पर ज्यादा केंद्रित हो सकता है।
इससे बोलने की प्रक्रिया पर अत्यधिक निगरानी बढ़ती है और तनाव हकलाने को और स्पष्ट कर सकता है। विशेषज्ञ इसे एक तरह के ‘फीडबैक लूप’ के रूप में समझते हैं। हकलाने का डर चिंता बढ़ाता है और चिंता हकलाने को और कठिन बना सकती है।
समाज की प्रतिक्रिया भी करती है असर
कई लोगों के लिए हकलाने से ज्यादा तकलीफ लोगों की प्रतिक्रिया देती है। स्कूल में बच्चे की नकल उतारना, उसके बोलने से पहले ही वाक्य पूरा कर देना, हंसना, “धीरे बोलो” या “पहले सोचो फिर बोलो” कहना उसके मन में यह धारणा पैदा कर सकता है कि उसकी बोलने की शैली गलत है।
समय के साथ कुछ बच्चे ऐसे शब्दों से बचना शुरू कर देते हैं जिन पर उन्हें अक्सर अटकने का डर रहता है। कोई अपना परिचय देने से बचता है, कोई कक्षा में जवाब नहीं देता और कोई फोन करने तक से बचने लगता है। कुछ बच्चे हकलाने के डर से सामाजिक परिस्थितियों से बचने लगते हैं और अपनी बोलने की शैली बदलने या कुछ शब्दों को छिपाने की कोशिश करते हैं।
यही आगे चलकर समस्या के मनोवैज्ञानिक प्रभाव को बढ़ा सकता है।
आत्मविश्वास पर पड़ता है गहरा असर
किशोरावस्था में यह प्रभाव और गंभीर हो सकता है। यह वह समय है जब दोस्त, सामाजिक स्वीकार्यता, स्कूल-कॉलेज की पहचान और अपने व्यक्तित्व को लेकर संवेदनशीलता बढ़ती है।
ASHA के अनुसार हकलाने वाले किशोरों को peer pressure, bullying और सामाजिक असहजता जैसी अतिरिक्त चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। कई किशोर उपचार लेने से भी इसलिए बचते हैं क्योंकि उन्हें स्टिग्मा या दूसरों के नजरिए की चिंता होती है।
बाद में यही डर नौकरी के इंटरव्यू, सार्वजनिक भाषण, मीटिंग और सामाजिक संबंधों तक पहुंच सकता है।
2023 की दो Systematic Reviews में पाया गया कि हकलाने वाले लोगों पर इसका प्रभाव सामाजिक जीवन, शिक्षा, रोजगार, आय और मानसिक स्वास्थ्य सहित कई क्षेत्रों तक फैल सकता है।
क्या हकलाने का इलाज संभव है?
उपचार व्यक्ति की उम्र, हकलाने की प्रकृति, उसकी गंभीरता और उसके जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव के अनुसार तय किया जाता है। स्पीच और लैंग्वेज थेरेपिस्ट इसकी जांच और उपचार में प्रमुख भूमिका निभाते हैं।
छोटे बच्चों में Indirect Therapy का इस्तेमाल किया जा सकता है, जिसमें माता-पिता को बच्चे से अपेक्षाकृत धीमी और शांत गति से बात करने, उसे बीच में न रोकने और बातचीत में पर्याप्त समय देने जैसी रणनीतियां सिखाई जाती हैं। कुछ बच्चों के लिए Lidcombe Program जैसी Direct Behavioural Therapy भी इस्तेमाल की जाती है।
स्कूल जाने वाले बच्चों, किशोरों और वयस्कों में Therapy केवल प्रवाह पर केंद्रित नहीं होती। इसमें संचार कौशल (Communication Skills), Stuttering के डर को कम करना, Avoidance घटाना, आत्मविश्वास बढ़ाना और अपनी बोलने की शैली को स्वीकार करना भी शामिल हो सकता है।
क्या दवाओं से हकलाना ठीक हो सकता है?
वर्तमान में विकासात्मक या लंबे समय से चले आ रहे हकलाने के लिए ऐसी कोई सामान्य दवा स्थापित उपचार नहीं है जिसे सभी मरीजों के लिए प्रभावी माना जा सके। उपचार में स्पीच और व्यवहारवादी दृष्टिकोण (Behavioural Approaches) की प्रमुख भूमिका है।
बच्चे के सामने क्या करें और क्या नहीं?
सबसे पहले बच्चे की बात पूरी होने दें। उसे बीच में रोककर शब्द पूरा न करें। “धीरे बोलो”, “सही से बोलो”, “घबराओ मत” जैसी बातें अक्सर मदद करने के इरादे से कही जाती हैं, लेकिन बच्चे को यह महसूस करा सकती हैं कि उसके बोलने का तरीका गलत है।
परिवार को बातचीत का ऐसा माहौल बनाना चाहिए जिसमें बच्चे को अपनी बात कहने के लिए पर्याप्त समय मिले। विशेषज्ञ माता-पिता को शांत गति से बोलने, turn-taking को प्रोत्साहित करने और बच्चे की बात के अर्थ पर ध्यान देने की सलाह देते हैं, न कि हर बार उसकी लय सुधारने पर।
हकलाना व्यक्ति की पहचान नहीं है
हकलाने के बारे में सबसे जरूरी बदलाव शायद चिकित्सा से ज्यादा सामाजिक सोच में होना चाहिए।
जो व्यक्ति बोलते समय अटकता है, जरूरी नहीं कि वह कम बुद्धिमान हो, कम सक्षम हो या उसके पास कहने के लिए कम विचार हों। समस्या speech fluency की है, व्यक्ति की क्षमता की नहीं।
कई लोग हकलाने के बावजूद पढ़ाई, नौकरी, कला, राजनीति, मीडिया और दूसरे पेशों में सफल जीवन जीते हैं। इसलिए लक्ष्य सिर्फ किसी व्यक्ति को “बिल्कुल धाराप्रवाह” बोलने के लिए बदलना नहीं होना चाहिए। लक्ष्य यह भी होना चाहिए कि वह बिना डर, शर्म और सामाजिक दबाव के अपनी बात कह सके।
क्योंकि हकलाने वाले व्यक्ति की आवाज में रुकावट हो सकती है, लेकिन उसकी बात की अहमियत में नहीं।
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