हांगकांग के CBDC प्रयोग ने डिजिटल करेंसी में निजता, नियंत्रण और व्यवहारिक चुनौतियों को उजागर किया, जिनसे भारत को सीख लेनी होगी।
नई दिल्ली:
भारत पिछले कुछ वर्षों से चुपचाप अपनी डिजिटल करेंसी की दिशा तैयार कर रहा है। भारतीय रिजर्व बैंक ने 2022 में डिजिटल रुपया पायलट शुरू किया था और तब से इस प्रयोग का दायरा लगातार बढ़ता ही जा रहा है। RBI अब कई केंद्रीय बैंकों के साथ CBDC के जरिए सीमा-पार भुगतान को सक्षम बनाने पर सक्रिय चर्चा कर रहा है। फरवरी 2026 में भारत ने गुजरात में CBDC आधारित सार्वजनिक वितरण प्रणाली की शुरुआत की, जहां प्रोग्रामेबल डिजिटल टोकन के माध्यम से सब्सिडी वाला अनाज सीधे लाभार्थियों तक पहुंचाया गया और बिचौलियों की पारंपरिक श्रृंखला को पीछे छोड़ दिया गया। अब तस्वीर पहले से कहीं अधिक स्पष्ट है। भारत अपनी डिजिटल करेंसी को केवल भुगतान का माध्यम नहीं, बल्कि कल्याणकारी योजनाओं की डिलीवरी और रेमिटेंस से जुड़ी पुरानी समस्याओं के समाधान के तौर पर देख रहा है। लेकिन इस महत्वाकांक्षा की बारीकी से जाँच जरूरी है और इन सवालों को समझने के लिए हांगकांग का अनुभव एक महत्वपूर्ण उदाहरण बनकर सामने आता है।
हांगकांग ने क्या उजागर किया
दो वर्षों के दौरान हांगकांग मॉनेटरी अथॉरिटी ने दुनिया के सबसे व्यापक रिटेल CBDC प्रयोगों में से एक को अंजाम दिया। ब्लैकरॉक, HSBC, Mastercard और DBS समेत प्रमुख वित्तीय संस्थानों के 11 समूहों ने सेटलमेंट, प्रोग्रामेबल पेमेंट्स और ऑफलाइन ट्रांजैक्शन में CBDC के इस्तेमाल का परीक्षण किया। 2025 के आखिर में सामने आए निष्कर्ष कई मायनों में बेहद महत्वपूर्ण थे।
प्रोग्रामेबिलिटी के मामले में पायलट प्रोजेक्ट्स ने दिखाया कि जब डिजिटल करेंसी के साथ कुछ शर्तें जुड़ी होती हैं, जैसे ऐसे वाउचर जिन्हें केवल तय उद्देश्यों के लिए ही इस्तेमाल किया जा सकता है, तब असली दक्षता CBDC से नहीं बल्कि स्मार्ट कॉन्ट्रैक्ट्स से आती है। स्मार्ट कॉन्ट्रैक्ट्स शर्तें पूरी होते ही स्वतः लेनदेन निष्पादित करते हैं और कई तरह की सेटलमेंट प्रणालियों पर काम कर सकते हैं। यानी भुगतान को प्रोग्रामेबल बनाने के लिए हर स्थिति में CBDC की आवश्यकता नहीं पड़ती।
ऑफलाइन भुगतान के मामले में हांगकांग की मौजूदा व्यवस्था पहले से ही 98 प्रतिशत आबादी तक पहुंच रखती है। लोगों को नई प्रणाली अपनाने का कोई बड़ा कारण नहीं दिखा, व्यापारी अतिरिक्त लागत उठाने के लिए तैयार नहीं थे और रिपोर्ट में कोई ठोस व्यावसायिक मॉडल भी सामने नहीं आया। भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि निजता से जुड़े सवाल एक बड़ी बाधा बनकर उभरे। लगभग 35 प्रतिशत उपयोगकर्ताओं ने कहा कि वे रोजमर्रा के लेनदेन के लिए डिजिटल करेंसी से बचेंगे क्योंकि वे नहीं चाहते कि केंद्रीय बैंक उनके खर्च से जुड़ा डेटा देखे। यह चिंता अधिक नियंत्रित और निजी नेटवर्क वातावरण में भी लगातार बनी रही।
भारत को इस पर ध्यान क्यों देना चाहिए
भारत की परिस्थितियां निश्चित रूप से अलग हैं। UPI ने कई समस्याओं को आसान बनाया है, लेकिन सभी चुनौतियां अब भी खत्म नहीं हुई हैं। कल्याणकारी योजनाओं में लीकेज आज भी चिंता का विषय है और रेमिटेंस की लागत भी लगातार ऊंची बनी हुई है। ऐसे में यह तर्क पूरी तरह वाजिब लगता है कि प्रोग्रामेबल डिजिटल मनी उन समस्याओं का समाधान कर सकती है जिन्हें एक साधारण पेमेंट ऐप हल नहीं कर सकता। लेकिन हांगकांग का अनुभव यह भी याद दिलाता है कि तकनीक से जुड़ी उम्मीदों को वास्तविकता से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
इसके साथ एक और कठिन सवाल जुड़ा है, जिसका भारत ने अभी तक खुलकर सामना नहीं किया है। प्रोग्रामेबिलिटी अपने स्वभाव में ही यह तय करती है कि धन का उपयोग कैसे और कहां किया जा सकता है। यदि कोई टोकन केवल अधिकृत दुकान से अनाज खरीदने के लिए इस्तेमाल हो सकता है, तो आपात स्थिति में उसी पैसे से दवा नहीं खरीदी जा सकेगी। जो व्यवस्था राशन डीलर को अनाज की हेराफेरी से रोकती है, वही लाभार्थी की स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता को भी सीमित कर सकती है। इसलिए भारत को यह तय करना होगा कि वह आखिर किस तरह की कल्याणकारी व्यवस्था बनाना चाहता है। यदि ट्रांसफर केवल कुछ निश्चित शर्तों के तहत इस्तेमाल किए जा सकें, जैसे केवल अनाज खरीदने वाले वाउचर, तो ऐसी प्रणाली स्वाभाविक रूप से अधिक नियंत्रण और ट्रैसेबिलिटी लेकर आएगी। उस स्थिति में निजता का क्षरण किसी दुर्घटना का परिणाम नहीं, बल्कि व्यवस्था का एक सोचा-समझा हिस्सा बन सकता है।
ऑफलाइन भुगतान के संदर्भ में देखें तो UPI पहले ही हर महीने 18 अरब से अधिक ट्रांजैक्शन प्रोसेस कर रहा है और शहरी भारत में सड़क किनारे दुकानदारों से लेकर ऑटो-रिक्शा चालक तक QR पेमेंट स्वीकार कर रहे हैं। लेकिन ग्रामीण परिवारों या स्मार्टफोन न रखने वाले लाभार्थियों के लिए ऑफलाइन CBDC, जिसे नेटवर्क कनेक्शन के बिना भी दो डिवाइसों के बीच काम करने के लिए डिजाइन किया गया है, शायद अब भी व्यावहारिक समाधान साबित न हो। ऐसा डिजिटल टोकन जिसे विशेष डिवाइस और समय-समय पर इंटरनेट से जुड़ने की जरूरत हो, वह नकद से अधिक सरल नहीं कहा जा सकता। और यदि सिस्टम जरूरत के समय काम न करे या लोगों के लिए अब भी अपरिचित बना रहे, तो उसका पूरा उद्देश्य ही कमजोर पड़ सकता है।
भारत को वास्तव में किन सवालों के जवाब देने हैं
हांगकांग ने निष्कर्ष निकाला कि उसकी डिजिटल करेंसी रिटेल भुगतान की तुलना में होलसेल बाजारों में अधिक उपयोगी दिखाई देती है। जैसे-जैसे डिजिटल रुपया बड़े स्तर पर आगे बढ़ेगा, भारत के नीति-निर्माताओं को भी इन सवालों का गंभीरता से सामना करना होगा। महत्वाकांक्षी लक्ष्य अपने आप में गलत नहीं हैं, लेकिन उनके साथ ऐसा मॉडल जो व्यावहारिक रूप से टिकाऊ हो, मजबूत निजता सुरक्षा और और इस बात का ईमानदार आकलन आवश्यक है कि सीबीडीसी विशिष्ट रूप से क्या प्रदान करता है और क्या नहीं।
