Monday, 02 November 2026
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राहुल गांधी के ‘भगोड़ा’ बयान पर सियासत गरम, गृहमंत्री अमित शाह ने संसद की गरिमा के विरुद्ध माना! जानिए संसद के भीतर बीजेपी नेताओं के 6 सबसे विवादित बयान

अमित शाह और राहुल गांधी के बीच ‘भगोड़ा’ बयान को लेकर सियासी टकराव तेज है। जानिए संसद के भीतर रमेश बिधूड़ी, नरेंद्र मोदी, अमित शाह समेत बीजेपी नेताओं के 6 विवादित बयान।

नई दिल्ली: संसद लोकतंत्र का वह मंच है जहां सरकार और विपक्ष से देश के सबसे अहम मुद्दों पर बहस की उम्मीद की जाती है। लेकिन कई बार यही सदन तीखी राजनीतिक भाषा, व्यक्तिगत हमलों और विवादित टिप्पणियों के कारण सुर्खियों में आ जाता है। बुधवार, 12 अगस्त 2026 को भी ऐसा ही देखने को मिला, जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने विपक्ष के उन आरोपों पर पलटवार किया, जिनमें उन्हें संसद से ‘लापता’, ‘भागा हुआ’ और ‘भगोड़ा’ कहा जा रहा था।

शाह ने संसद परिसर में पत्रकारों से कहा कि वह सत्र शुरू होने के बाद से नियमित रूप से संसद आ रहे हैं और अपने कक्ष में बैठते हैं, लेकिन विपक्ष के लगातार हंगामे के कारण सदन की कार्यवाही नहीं चल पा रही है। उन्होंने कहा कि ऐसे शब्द हाल के दिनों में सार्वजनिक और संसदीय जीवन में बढ़ते जा रहे हैं।

यह विवाद मौजूदा मानसून सत्र में छात्रों के विरोध और 20 जुलाई को हुए ‘चलो संसद’ मार्च के दौरान पुलिस कार्रवाई को लेकर है। विपक्ष गृह मंत्री से इस मामले पर सदन में जवाब मांग रहा है। शाह ने बुधवार को कहा कि सरकार चर्चा के लिए तैयार है और वह खुद हर सवाल का जवाब देने के लिए सदन में मौजूद रहेंगे। उन्होंने यहां तक कहा कि जरूरत पड़ने पर प्रश्नकाल स्थगित कर लंबी चर्चा भी की जा सकती है।

राहुल गांधी ने पूछे गंभीर सवाल

राहुल गांधी ने शाह के प्रस्ताव को खारिज करते हुए कहा कि विपक्ष गृह मंत्री का ‘लेक्चर’ सुनने में दिलचस्पी नहीं रखता। राहुल गांधी ने पुलिस कार्रवाई को लेकर सवाल उठाते हुए पूछा कि छात्रों पर कार्रवाई का आदेश किसने दिया।

इस मौजूदा टकराव के बीच यह याद करना भी जरूरी है कि संसद के भीतर पिछले वर्षों में भाजपा के कई बड़े नेताओं के बयान विवाद का कारण बन चुके हैं। इनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, पूर्व भाजपा सांसद रमेश बिधूड़ी और भाजपा सांसद निशिकांत दुबे के बयान प्रमुख रहे हैं।

1. रमेश बिधूड़ी का दानिश अली पर आपत्तिजनक बयान

संसद में भाषा की मर्यादा को लेकर सबसे चर्चित घटनाओं में से एक 21 सितंबर 2023 की है। नए संसद भवन में लोकसभा की कार्यवाही के दौरान भाजपा सांसद रमेश बिधूड़ी ने बहुजन समाज पार्टी के तत्कालीन सांसद कुंवर दानिश अली के खिलाफ बेहद आपत्तिजनक और सांप्रदायिक शब्दों का इस्तेमाल किया।

यह घटना चंद्रयान-3 की सफलता पर लोकसभा में हो रही चर्चा के दौरान हुई थी। बिधूड़ी की टिप्पणियों पर विपक्षी दलों ने कड़ी आपत्ति जताई और दानिश अली ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से कार्रवाई की मांग की। बिधूड़ी की कई टिप्पणियों को बाद में सदन की कार्यवाही से हटा दिया गया।

मामले की गंभीरता का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि तत्कालीन रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सदन में बिधूड़ी की टिप्पणी पर खेद जताया था। भाजपा ने भी बिधूड़ी को कारण बताओ नोटिस जारी किया।

बाद में इस विवाद में निशिकांत दुबे का नाम भी सामने आया। उन्होंने बिधूड़ी की भाषा को अस्वीकार्य बताया, लेकिन साथ ही दानिश अली पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ कथित आपत्तिजनक टिप्पणी करके बिधूड़ी को उकसाने का आरोप लगाया।

2. प्रधानमंत्री मोदी का ‘रेनकोट’ वाला बयान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक बयान 2017 में संसद के उच्च सदन में राजनीतिक भाषा को लेकर बड़े विवाद का कारण बना था।

8 फरवरी 2017 को राज्यसभा में नोटबंदी पर राष्ट्रपति के अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा का जवाब देते हुए मोदी ने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि इतने वर्षों तक आर्थिक फैसलों से जुड़े रहने और सरकार में भ्रष्टाचार के आरोपों के बावजूद मनमोहन सिंह की व्यक्तिगत छवि पर दाग नहीं लगा और इसी संदर्भ में उन्होंने ‘रेनकोट पहनकर नहाने’ की टिप्पणी की।

इस बयान पर कांग्रेस सांसदों ने कड़ी आपत्ति जताई और सदन में विरोध किया। कांग्रेस के कई सांसदों ने इसे पूर्व प्रधानमंत्री के पद और व्यक्तिगत गरिमा के खिलाफ बताया।

यह घटना इसलिए महत्वपूर्ण रही क्योंकि यह किसी चुनावी रैली में नहीं, बल्कि संसद के भीतर प्रधानमंत्री के भाषण के दौरान हुई थी। इसने यह बहस छेड़ी कि राजनीतिक विरोध करते समय नेताओं को व्यक्तिगत टिप्पणियों और नीतिगत आलोचना के बीच सीमा कहां खींचनी चाहिए।

3. प्रधानमंत्री मोदी का ‘आंदोलनजीवी’ बयान

किसान आंदोलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राज्यसभा में ‘आंदोलनजीवी’ शब्द का इस्तेमाल किया। 8 फरवरी 2021 को राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान उन्होंने कहा कि देश में एक नई तरह की ‘जमात’ सामने आई है, जिसे उन्होंने ‘आंदोलनजीवी’ कहा।

मोदी के अनुसार, ऐसे लोग अलग-अलग आंदोलनों में दिखाई देते हैं और आंदोलनों के सहारे अपना राजनीतिक या सामाजिक प्रभाव बनाए रखते हैं। आधिकारिक राज्यसभा रिकॉर्ड में भी ‘आंदोलनजीवी’ शब्द वाला हिस्सा दर्ज है।

विपक्ष ने इस टिप्पणी को किसान आंदोलन और प्रदर्शनकारियों को बदनाम करने वाला बताया। आलोचकों ने सवाल उठाया कि भारत का लोकतांत्रिक इतिहास ही आंदोलनों और जनभागीदारी से जुड़ा रहा है।

यह बयान सीधे तौर पर किसी एक व्यक्ति के लिए नहीं था, लेकिन राजनीतिक रूप से बेहद विवादित रहा। इसलिए इसे संसद में राजनीतिक भाषा के बदलते स्वरूप की महत्वपूर्ण घटनाओं में गिना जाता है।

4. अमित शाह का डॉ. आंबेडकर पर बयान

दिसंबर 2024 में राज्यसभा में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के डॉ. भीमराव आंबेडकर से जुड़े बयान ने राष्ट्रीय राजनीति में बड़ा विवाद खड़ा किया।

संसद में संविधान पर चर्चा के दौरान शाह ने विपक्ष पर आरोप लगाया कि वह राजनीतिक लाभ के लिए आंबेडकर के नाम का इस्तेमाल करता है। इसी दौरान उन्होंने आंबेडकर के संदर्भ में ऐसा बयान दिया जिसे कांग्रेस और विपक्षी दलों ने अपमानजनक बताया।

इसके बाद संसद परिसर में भाजपा और कांग्रेस सांसदों के बीच तीखा टकराव देखने को मिला। कांग्रेस ने शाह से माफी और इस्तीफे की मांग की, जबकि भाजपा ने आरोप लगाया कि शाह के बयान को संदर्भ से काटकर पेश किया गया।

इस विवाद की खास बात यह थी कि मामला सिर्फ भाषण तक सीमित नहीं रहा। संसद परिसर में दोनों पक्षों के सांसदों के बीच धक्का-मुक्की के आरोप भी सामने आए और राजनीतिक टकराव कई दिनों तक जारी रहा।

यह घटना दिखाती है कि संसद में किसी ऐतिहासिक व्यक्तित्व को लेकर की गई टिप्पणी किस तरह तुरंत राष्ट्रीय राजनीतिक विवाद का रूप ले सकती है।

5. साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर का नाथूराम गोडसे पर ‘देशभक्त’ बयान

27 नवंबर 2019 को लोकसभा में विशेष सुरक्षा समूह (संशोधन) विधेयक पर चर्चा के दौरान बीजेपी की तत्कालीन सांसद साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर की एक टिप्पणी ने बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया।

डीएमके सांसद ए. राजा महात्मा गांधी की हत्या के संदर्भ में नाथूराम गोडसे के बयान का उल्लेख कर रहे थे। इसी दौरान प्रज्ञा ठाकुर ने गोडसे को ‘देशभक्त’ कहकर संबोधित किया। उनके इस बयान का विपक्षी सांसदों ने सदन में जोरदार विरोध किया।

विवाद बढ़ने के बाद बीजेपी ने भी प्रज्ञा ठाकुर की टिप्पणी से दूरी बनाई। तत्कालीन संसदीय कार्य मंत्री ने स्पष्ट किया कि पार्टी ऐसे बयान का समर्थन नहीं करती। लोकसभा की कार्यवाही से उनकी टिप्पणी का विवादित हिस्सा हटा दिया गया। इसके अलावा, बीजेपी ने प्रज्ञा ठाकुर को रक्षा मंत्रालय की संसदीय सलाहकार समिति से हटा दिया और उन्हें संसदीय पार्टी की बैठकों में शामिल नहीं होने का निर्देश भी दिया। बाद में प्रज्ञा ठाकुर ने अपने बयान के लिए खेद व्यक्त किया।

6. निशिकांत दुबे का जवाहरलाल नेहरू पर विवादित बयान

28 जुलाई 2026 को लोकसभा में भाजपा सांसद निशिकांत दुबे की पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को लेकर की गई टिप्पणी ने राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया। लोक परीक्षा (अनुचित साधन निवारण) संशोधन विधेयक पर चर्चा के दौरान दुबे ने नेहरू और उनके निजी जीवन से जुड़े दावे करते हुए कुछ पुस्तकों का हवाला दिया।

उनके बयान में नेहरू के लिए ‘debauchee (अय्य्श)’ जैसे आपत्तिजनक शब्द का इस्तेमाल किये गये, जिसका अर्थ चरित्रहीन या व्यभिचारी व्यक्ति के संदर्भ में लिया जाता है।

दुबे की टिप्पणी के बाद सदन में विपक्षी सांसदों ने विरोध जताया और इसे देश के पहले प्रधानमंत्री के सम्मान के खिलाफ बताया। बाद में दुबे ने अपने बयान से पीछे हटने के बजाय कहा कि वह नेहरू को लेकर कही गई अपनी बात पर कायम हैं और जिन पुस्तकों का उन्होंने हवाला दिया है, उन्हें प्रमाणित करने के लिए तैयार हैं।

इस घटनाक्रम ने संसद में ऐतिहासिक व्यक्तित्वों और उनके निजी जीवन को लेकर राजनीतिक बहस की मर्यादा पर भी सवाल खड़े किए।

सियासी टकराव के बीच संसद की गरिमा का सवाल बरकरार

संसद में नेताओं के विवादित बयान भारतीय राजनीति में बदलते संवाद की तस्वीर पेश करते हैं। अमित शाह और राहुल गांधी के बीच ‘भगोड़ा’ बयान को लेकर मौजूदा टकराव हो या रमेश बिधूड़ी, , साध्वी प्रज्ञा ठाकुर और निशिकांत दुबे की टिप्पणियां, इन घटनाओं ने संसद की भाषा और मर्यादा पर बहस को जन्म दिया है।

लोकतंत्र में सरकार और विपक्ष के बीच तीखी बहस स्वाभाविक है, लेकिन व्यक्तिगत टिप्पणियां और आपत्तिजनक भाषा अक्सर मूल मुद्दे से ध्यान भटका देती हैं। संसद देश की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्थाओं में से एक है, इसलिए यहां होने वाली हर बहस और टिप्पणी का व्यापक असर पड़ता है। ऐसे में राजनीतिक असहमति के बावजूद संवाद की गरिमा बनाए रखना जरूरी है, ताकि संसद राजनीतिक टकराव का नहीं, बल्कि गंभीर और सार्थक लोकतांत्रिक बहस का मंच बनी रहे।

ये भी पढ़ें :- केरल का नाम होगा ‘केरलम’, लोकसभा ने दी मंजूरी! जानिए नाम बदलने के पीछे की पूरी कहानी

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MD Faijan

लेखक

मोहम्मद फैजान न्यूज़ ऑफ द डे में पत्रकार हैं, जहाँ वे खेल, मनोरंजन, राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मामलों को कवर करते हैं। इससे पहले वे यूट्यूब चैनल स्पोर्ट्स यारी में सोशल मीडिया एग्जीक्यूटिव के रूप में कार्य कर चुके हैं, जहाँ उन्होंने डिजिटल कंटेंट मैनेजमेंट और ऑडियंस एंगेजमेंट का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त किया। भारत के छत्तीसगढ़ राज्य के कोरिया जिले से संबंध रखने वाले फैजान आधुनिक मीडिया कार्यप्रणालियों की अच्छी समझ रखते हैं और कहानी कहने के विभिन्न रूपों में गहरी रुचि रखते हैं।

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