Thursday, 17 September 2026
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घुटना प्रत्यारोपण से पहले नया विकल्प: बिना सर्जरी इलाज से मरीजों को राहत

जिन मरीज़ों को डॉक्टरों ने सर्जरी ही एकमात्र विकल्प बताया, उनमें से कई ने लुधियाना में बिना ऑपरेशन के राहत पाई

72 वर्षीय अनिल जैन, दिल्ली के एक जाने-माने कारोबारी हैं। हमेशा आत्मनिर्भर जीवन जीने वाले जैन साहब ने कभी नहीं सोचा था कि एक समय ऐसा भी आएगा, जब दो कदम चलने के लिए भी उन्हें सहारे की ज़रूरत पड़ेगी।

उम्र के साथ शरीर में बदलाव स्वाभाविक हैं—ऊर्जा कम होती है, हड्डियाँ कमजोर पड़ती हैं। लेकिन अनिल जैन के मामले में समस्या केवल उनके घुटनों तक सीमित थी। वे जितने भी डॉक्टरों के पास गए, लगभग सभी ने एक ही सलाह दी: “अब घुटना बदलवाना ही पड़ेगा।”

हालाँकि, जैन इस विकल्प को लेकर पहले ही जानकारी जुटा चुके थे और समझते थे कि सर्जरी हमेशा स्थायी समाधान नहीं होती। इसके बाद उन्होंने विकल्पों की तलाश शुरू की और घुटने के विशेषज्ञों से मिलना शुरू किया। इसी क्रम में उनकी मुलाकात डॉ. एन.के. अग्रवाल से हुई। पचास वर्षों से अधिक अनुभव रखने वाले डॉ. अग्रवाल ने हाल के वर्षों में घुटने के दर्द के लिए एक ऐसा उपचार विकसित किया है, जिसमें सर्जरी की आवश्यकता नहीं पड़ती।

अनिल जैन बताते हैं कि जिन गतिविधियों को उन्होंने लगभग छोड़ दिया था, वे इलाज शुरू होने के महज दो महीने के भीतर फिर से करने लगे।

वे कहते हैं, “कई काम जो मैं बिना सोचे-समझे कर लिया करता था, वे सब धीरे-धीरे छूट गए थे। सुबह की सैर बंद हो गई थी, और सीढ़ियाँ चढ़ने में डर लगने लगा था। चार डॉक्टरों ने साफ कह दिया था कि ऑपरेशन के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है।”

लेकिन सुधार की रफ्तार ने उन्हें खुद हैरान कर दिया। “करीब छह हफ्तों बाद मुझे महसूस हुआ कि सुबह उठते समय अब कोई अकड़न नहीं है। फिर एक दिन अचानक ध्यान आया कि मैं सीढ़ियाँ चढ़ रहा हूँ—और इस बात के बारे में सोच भी नहीं रहा,” वे बताते हैं।

यह इलाज क्या है?

अनिल जैन अकेले नहीं हैं। डॉ. अग्रवाल के अनुसार, सैकड़ों मरीज अब तक इस उपचार से गुजर चुके हैं, जिसे वे ‘लुधियाना प्रोटोकॉल’ कहते हैं। इसमें घुटने के जोड़ की सफाई, उसमें चिकनाई डालना, मरीज के अपने खून से तैयार विशेष इंजेक्शन (पीआरपी) देना और शरीर में सूजन कम करने के उपाय शामिल हैं। इस प्रक्रिया में न अस्पताल में भर्ती होने की आवश्यकता होती है, न बेहोशी की दवा की, और न ही लंबे आराम की जरूरत पड़ती है।

वैंकूवर से लुधियाना तक का सफर

79 वर्षीय डॉ. मदन लाल सिंगला, जो कनाडा के वैंकूवर में रहते हैं, की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। वहाँ के डॉक्टरों ने उन्हें भी घुटना बदलवाने की सलाह दी थी। लेकिन वे भारत ऑपरेशन कराने के लिए नहीं, बल्कि उससे बचने के विकल्प की तलाश में आए थे।

डॉ. सिंगला बताते हैं, “इस उम्र में इतना बड़ा ऑपरेशन और उसके बाद महीनों की रिकवरी—यह सोचकर ही डर लगता था।” उन्होंने भारत में रहकर यह इलाज पूरा किया और बिना किसी सर्जरी के संतोष के साथ कनाडा लौट गए।

परिवार के अनुसार, सुधार इलाज के दौरान ही दिखने लगा था। “जब ये यहाँ आए थे, तो कुर्सी से उठने में भी मदद की जरूरत पड़ती थी। लेकिन वापसी के समय एयरपोर्ट पर ये खुद चलकर गए।”

अब वे अपने काम खुद संभाल रहे हैं और उन गतिविधियों में लौट आए हैं, जो दर्द की वजह से छूट गई थीं। वे कहते हैं, “मैं यहाँ राहत की उम्मीद लेकर आया था, लेकिन लौटते समय लगा जैसे मैं फिर से अपनी सामान्य ज़िंदगी में लौट आया हूँ।”

सिर्फ घुटना नहीं, पूरी समस्या पर ध्यान

डॉ. अग्रवाल बताते हैं कि वे भारत में घुटना प्रत्यारोपण करने वाले शुरुआती सर्जनों में से एक रहे हैं, लेकिन नई रिसर्च ने उनकी सोच में बदलाव लाया है। उनके अनुसार, घुटने का गठिया केवल जोड़ की घिसावट नहीं, बल्कि उम्र के साथ होने वाली एक धीमी सूजन प्रक्रिया भी है।

वे कहते हैं, “अगर हम सिर्फ जोड़ को ठीक करें और मूल कारण को नजरअंदाज कर दें, तो हम बीमारी का नहीं, सिर्फ दर्द का इलाज कर रहे होते हैं।”

उनके अनुसार, इस उपचार से गुजरने वाले 95 प्रतिशत से अधिक मरीजों को दर्द में राहत और चलने-फिरने में सुधार महसूस हुआ है। हालांकि, वे यह भी स्पष्ट करते हैं कि यह हर मरीज के लिए उपयुक्त नहीं है।

“जहाँ घुटना बहुत अधिक खराब हो चुका हो, वहाँ सर्जरी ही एकमात्र विकल्प रह जाती है। लेकिन जो मरीज शुरुआती या मध्यम अवस्था में हैं, उनके लिए यह उपचार सर्जरी को टाल सकता है। अधिकांश लोगों को दो से तीन महीने के भीतर स्पष्ट सुधार महसूस होने लगता है,” वे बताते हैं।

बढ़ती समस्या और नया दृष्टिकोण

भारत में 60 वर्ष की आयु के बाद घुटनों का दर्द तेजी से बढ़ रहा है। इसके पीछे निष्क्रिय जीवनशैली, बढ़ता वजन और उम्र से जुड़ी समस्याएँ प्रमुख कारण हैं। डॉक्टरों के अनुसार, यह समस्या अब युवाओं में भी दिखाई देने लगी है।

डॉ. अग्रवाल कहते हैं कि जहाँ जरूरत हो, वे आज भी सर्जरी करते हैं, लेकिन अब यह उनका पहला नहीं, बल्कि अंतिम विकल्प है।

“उम्र को रोका नहीं जा सकता, लेकिन उसका असर घुटनों पर कम किया जा सकता है। जितना जल्दी इलाज शुरू किया जाए, अपने प्राकृतिक घुटनों को बचाने की संभावना उतनी ही अधिक होती है।”

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BN

Bureau NOTD

लेखक

NOTD News के लिए नियमित रूप से समाचार लिखते हैं।

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