Wednesday, 07 October 2026
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एएमआर पर मीडिया कार्यशाला: ‘मूक महामारी’ से लड़ने में मीडिया की अहम भूमिका

नई दिल्ली , 7 अगस्त, 2025:

आज नई दिल्ली के प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में “एएमआर: मूक महामारी – मीडिया तोड़े यह खामोशी” शीर्षक से एक राष्ट्रीय स्तर की मीडिया कार्यशाला आयोजित हुई। रीएक्ट एशिया पैसिफिक द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में पत्रकारों, स्वास्थ्य विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया ताकि रोगाणुरोधी प्रतिरोध (एएमआर) के बढ़ते खतरे के बारे में जागरूकता फैलाई जाए और इसकी बेहतर रिपोर्टिंग को बढ़ावा दिया जाए।

एएमआर आज की सबसे गंभीर स्वास्थ्य चुनौतियों में से एक है। 2021 में, विश्व स्तर पर लगभग 47 लाख मौतें बैक्टीरियल एएमआर से जुड़ी थीं, जिनमें 11 लाख से अधिक मौतें सीधे इसके कारण हुईं। अनुमान है कि 2025 से 2050 के बीच एएमआर के कारण 3.9 करोड़ लोगों की जान जा सकती है—यानी हर मिनट तीन लोगों की मौत।

इस कार्यशाला का मकसद पत्रकारों को वैज्ञानिक जानकारी, विभिन्न क्षेत्रों की समझ और वन हेल्थ दृष्टिकोण—जो मानव, पशु और पर्यावरणीय स्वास्थ्य को जोड़ता है—के साथ एएमआर पर प्रभावी ढंग से लिखने के लिए उपकरण और ज्ञान देना था।

कार्यशाला की शुरुआत डॉ. एस.एस. लाल, निदेशक, रीएक्ट एशिया पैसिफिक, के संबोधन से हुई, जिन्होंने एएमआर की गंभीरता और इसे लेकर जागरूकता फैलाने में मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका पर जोर दिया।

इसके बाद एक भावनात्मक सत्र में व्यक्तिगत अनुभव साझा किए गए, जिसका संचालन डॉ. नरेंद्र सैनी, अध्यक्ष, एएमआर स्टैंडिंग कमेटी, इंडियन मेडिकल एसोसिएशन, ने किया। भक्ति चौहान (एएमआर टास्कफोर्स) और पूजा मिश्रा (एचआईवी कार्यकर्ता) ने अपनी कहानियों के माध्यम से एएमआर के इंसानी नुकसान को उजागर किया, खासकर कमजोर समुदायों पर इसके प्रभाव को। डॉ. सैनी ने “संक्रमण रोकें, एएमआर से लड़ें” का नारा दोहराया और पत्रकारों से तुरंत और एकजुट होकर कदम उठाने का आह्वान किया।

वन हेल्थ पर चर्चा के लिए आयोजित पैनल, जिसकी अध्यक्षता डॉ. सम प्रसाद (एएचएफ इंडियाकेयर्स) ने की, में डॉ. संगीता शर्मा (दिल्ली सोसाइटी फॉर प्रमोशन ऑफ रैशनल यूज ऑफ ड्रग्स), डॉ. चंचल भट्टाचार्य (हेफर इंटरनेशनल), राजेश्वरी सिन्हा (सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट), और सतीश सिन्हा (टॉक्सिक्स लिंक) जैसे विशेषज्ञ शामिल थे। इस पैनल ने एएमआर से निपटने में मानव, पशु और पर्यावरणीय स्वास्थ्य के आपसी जुड़ाव पर प्रकाश डाला।

स्वास्थ्य प्रणालियों को मजबूत करने पर केंद्रित एक सत्र में डॉ. सरबजीत सिंह चड्ढा (FIND) और डॉ. टिकेश बिसेन (PATH) ने निदान और संक्रमण रोकथाम व नियंत्रण (IPC) की एएमआर को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका पर जोर दिया।

डॉ. सलमान खान (रीएक्ट अफ्रीका) ने पत्रकारों को विज्ञान आधारित रिपोर्टिंग के लिए विश्वसनीय स्रोतों की पहचान करने में मदद की। शोभा शुक्ला (ग्लोबल एएमआर मीडिया एलायंस) ने भारत में एएमआर की रिपोर्टिंग से जुड़े रुझानों और चुनौतियों पर अपने विचार साझा किए।

कार्यशाला का एक खास क्षण था एएमआर मीडिया एलायंस के भारत चैप्टर का शुभारंभ, जिसे बॉबी रमाकांत ने शुरू किया। उन्होंने समापन में समूह चर्चा का भी नेतृत्व किया। कार्यशाला का समापन इस संदेश के साथ हुआ कि एएमआर संकट के समाधान को बढ़ावा देने में मीडिया को अग्रणी भूमिका निभानी होगी।

प्रमुख संदेश:

  • एंटीबायोटिक्स जीवन बचाते हैं, लेकिन इन्हें सही तरीके से इस्तेमाल करना जरूरी है। गलत या अत्यधिक उपयोग से दवा-प्रतिरोधी संक्रमण हो सकते हैं, जिनका इलाज मुश्किल और महंगा होता है।
  • हर बीमारी में एंटीबायोटिक्स की जरूरत नहीं होती। सर्दी, फ्लू और कई तरह के बुखार वायरस के कारण होते हैं, जिन पर एंटीबायोटिक्स काम नहीं करते।
  • एंटीबायोटिक्स हमेशा डॉक्टर के बताए अनुसार लें। बीच में न छोड़ें, खुराक न छोड़ें और खुद से दवा न लें।
  • जरूरत हो तो जांच करवाएँ। टेस्ट से पता चलता है कि एंटीबायोटिक्स की जरूरत है या नहीं और कौन सी दवा असरदार होगी।
  • स्वच्छता से बचाव संभव है। हाथ धोना, साफ पानी, स्वच्छता और टीकाकरण जैसे कदम एंटीबायोटिक्स की जरूरत कम करते हैं।
  • एएमआर सबको प्रभावित करता है। प्रतिरोधी संक्रमण न केवल अस्पतालों में, बल्कि समुदाय, भोजन, पशुओं और पर्यावरण के जरिए भी फैल सकते हैं।
  • सवाल पूछने का हक है। अपने डॉक्टर से पूछें: “क्या यह एंटीबायोटिक वाकई जरूरी है?”
  • एंटीबायोटिक्स हमारा साझा संसाधन हैं। इन्हें आज बचाने से यह सुनिश्चित होता है कि ये भविष्य में भी कारगर रहें।
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BN

Bureau NOTD

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NOTD News के लिए नियमित रूप से समाचार लिखते हैं।

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