Wednesday, 17 June 2026
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17 जून 1885: जब फ्रांस ने अमेरिका को दिया था आज़ादी का सबसे बड़ा प्रतीक, जानिए Statue of Liberty की पूरी कहानी

दुनिया में कई यादगार तोहफे दिए गए हैं, लेकिन फ्रांस ने अमेरिका को जो उपहार दिया, वह इतिहास बन गया। 17 जून 1885 को न्यूयॉर्क पहुंची यह भेंट आज Statue of Liberty कहलाती है।

वाशिंगटन, डीसी/ पेरिस: जन्मदिन पर घड़ी, शादी में गहने, किसी खास मौके पर कार या घर… दुनिया में लोग एक-दूसरे को कई तरह के तोहफे देते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सुना है कि एक देश दूसरे देश को 93 मीटर ऊंची विशाल प्रतिमा उपहार में दे दे? ऐसा ही एक अनोखा और ऐतिहासिक तोहफा फ्रांस ने अमेरिका को आज से 141 साल पहले दिया था।

इतिहास के पन्नों में 17 जून 1885 की तारीख एक खास घटना के लिए याद की जाती है। इसी दिन फ्रांस से आया एक विशाल उपहार न्यूयॉर्क हार्बर पहुंचा था। यह कोई साधारण उपहार नहीं था, बल्कि वह स्मारक था जिसे आज पूरी दुनिया आज़ादी, लोकतंत्र और उम्मीद का प्रतीक स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी (Statue of Liberty) के नाम से जानती है।

अमेरिका में Statue of Liberty का महत्तव

आज जब भी अमेरिका की पहचान की बात होती है तो White House, Hollywood और Times Square के साथ जिस स्मारक का नाम सबसे पहले लिया जाता है, वह Statue of Liberty ही है।

लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि यह प्रतिमा अमेरिका ने नहीं बनाई थी। इसे फ्रांस ने अमेरिका को मित्रता और साझा लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रतीक के रूप में भेंट किया था। 17 जून 1885 को यह प्रतिमा 350 अलग-अलग हिस्सों और 214 लकड़ी के बक्सों में अटलांटिक महासागर पार करके न्यूयॉर्क पहुंची थी।

आजादी की 100वीं सालगिरह पर अमेरिका को तोहफा

स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी की कहानी 1865 में शुरू होती है। उस समय अमेरिकी गृहयुद्ध (Civil War) समाप्त हुआ था और अमेरिका में दास प्रथा को खत्म करने की दिशा में बड़ा बदलाव आया था।

फ्रांस के प्रसिद्ध राजनीतिक चिंतक और कानूनविद एदोआर्द दे लाबूले (Édouard de Laboulaye) अमेरिका के लोकतांत्रिक मूल्यों और राष्ट्रपति Abraham Lincoln के प्रशंसक थे। उनका मानना था कि अमेरिका ने लोकतंत्र और स्वतंत्रता की जिस भावना को मजबूत किया है, उसे दुनिया के सामने सम्मानित किया जाना चाहिए।

साथ ही वे चाहते थे कि फ्रांस में भी लोकतांत्रिक विचारों को बढ़ावा मिले। इसी सोच से अमेरिका को एक भव्य स्मारक भेंट करने का विचार सामने आया। लाबूले ने सुझाव दिया कि अमेरिका की स्वतंत्रता की 100वीं वर्षगांठ के सम्मान में एक विशाल प्रतिमा बनाई जाए, जिसे फ्रांस और अमेरिका मिलकर तैयार करें।

किसने बनाई Statue of Liberty?

इस महत्वाकांक्षी परियोजना की जिम्मेदारी फ्रांसीसी मूर्तिकार Frédéric Auguste Bartholdi को सौंपी गई। बार्थोल्डी ने एक ऐसी महिला आकृति की कल्पना की जो हाथ में मशाल लिए दुनिया को स्वतंत्रता का संदेश दे रही हो।

उन्होंने इस प्रतिमा का आधिकारिक नाम  “Liberty Enlightening the World” यानी “दुनिया को प्रकाश देने वाली स्वतंत्रता” रखा।

प्रतिमा के डिजाइन में रोमन स्वतंत्रता देवी “लिबर्टास” से भी प्रेरणा ली गई। बाद में बार्थोल्डी ने कहा था कि प्रतिमा के चेहरे की प्रेरणा उनकी मां से भी जुड़ी थी।

Gustave Eiffel का भी अहम योगदान

Statue of Liberty केवल एक कलात्मक परियोजना नहीं थी, बल्कि इंजीनियरिंग का भी एक अद्भुत नमूना थी।

इसके आंतरिक ढांचे को डिजाइन करने का काम प्रसिद्ध इंजीनियर Gustave Eiffel ने किया, जिन्हें बाद में एफिल टॉवर (Eiffel Tower) बनाने के लिए दुनिया भर में पहचान मिली।

एफिल ने ऐसा लोहे का ढांचा तैयार किया जो तेज हवाओं और मौसम के प्रभाव को झेल सके। यही कारण है कि 140 साल से अधिक समय बाद भी यह प्रतिमा मजबूती से खड़ी है।

फ्रांस और अमेरिका के बीच तब के रिश्ते

18वीं सदी में अमेरिका जब ब्रिटेन से स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रहा था, तब फ्रांस ने अमेरिकी क्रांतिकारियों का साथ दिया था। फ्रांस ने सैनिक, हथियार और आर्थिक सहायता देकर अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

इसी ऐतिहासिक साझेदारी के कारण दोनों देशों के बीच गहरे संबंध बने। स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी को भी इसी मित्रता और साझा लोकतांत्रिक मूल्यों का प्रतीक माना गया। प्रतिमा अमेरिका की स्वतंत्रता के 100 वर्ष पूरे होने के सम्मान में दी गई थी।

अखबार के मदद से जुटाया गया चंदा

इतनी विशाल प्रतिमा बनाना आसान नहीं था। इसके लिए भारी धनराशि की जरूरत थी। दोनों देशों के बीच हुए समझौते में यह तय हुआ कि प्रतिमा बनाने का खर्च फ्रांस उठाएगा। वहीं प्रतिमा के लिए मंच (Pedestal) का निर्माण अमेरिका करेगा।

फ्रांस में चंदा अभियान चलाए गए, लॉटरी निकाली गई और सार्वजनिक योगदान जुटाया गया। दूसरी ओर अमेरिका में भी अखबारों और सामाजिक संगठनों ने धन जुटाने में मदद की।

उस समय प्रसिद्ध समाचार पत्र प्रकाशक जोसेफ पुलित्जर (Joseph Pulitzer) ने अपने अखबार के माध्यम से जनता से चंदा जुटाने का अभियान चलाया, जिसके बाद हजारों लोगों ने छोटी-छोटी राशि देकर इस परियोजना को पूरा करने में मदद की।

जब 350 टुकड़ों में अमेरिका पहुंची प्रतिमा

1884 तक प्रतिमा का निर्माण पूरा हो चुका था। लेकिन अब सबसे बड़ी चुनौती थी इसे फ्रांस से अमेरिका पहुंचाने की। क्योंकि प्रतिमा का आकार बेहद विशाल था, इसलिए इसे पूरी तरह खोलकर अलग-अलग हिस्सों में बांटा गया। कुल 350 हिस्सों को 214 लकड़ी के बक्सों में पैक किया गया। इसके बाद इन्हें फ्रांसीसी जहाज इसेंरे (Isère) के जरिए अटलांटिक महासागर के पार भेजा गया।

करीब एक महीने की समुद्री यात्रा के बाद 17 जून 1885 को जहाज न्यूयॉर्क हार्बर पहुंचा।

न्यूयॉर्क में हुआ भव्य स्वागत

जब Isère जहाज न्यूयॉर्क पहुंचा तो वहां उत्सव जैसा माहौल था। हजारों लोग बंदरगाह पर जमा हुए थे। सैकड़ों नावें जहाज के स्वागत के लिए समुद्र में उतरीं।

उस समय न्यूयॉर्क के लोगों ने इसे केवल एक प्रतिमा नहीं, बल्कि स्वतंत्रता और मित्रता के प्रतीक के रूप में देखा। प्रतिमा के पहुंचने की खबर अखबारों की सुर्खियां बनी और पूरे अमेरिका में उत्साह फैल गया।

पहुंचने के बाद भी नहीं खड़ी हो सकी प्रतिमा

दिलचस्प बात यह है कि प्रतिमा के अमेरिका पहुंचने के बाद भी इसे तुरंत स्थापित नहीं किया जा सका। कारण था कि जिस मंच (Pedestal) पर इसे खड़ा किया जाना था, उसका निर्माण अभी पूरा नहीं हुआ था।

इसलिए प्रतिमा के हिस्सों को न्यूयॉर्क के बेडलो आइलैंड (आज का लिबर्टी आइलैंड) पर रखा गया। मंच तैयार होने के बाद 1886 में इसे दोबारा जोड़ा गया।

कब हुआ उद्घाटन?

करीब एक साल तक असेंबली और निर्माण कार्य चलने के बाद 28 अक्टूबर 1886 को प्रतिमा का आधिकारिक उद्घाटन किया गया। उद्घाटन समारोह की अध्यक्षता अमेरिकी राष्ट्रपति Grover Cleveland ने की थी। यहीं से स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी अमेरिका की सबसे बड़ी पहचान बन गई।

प्रतिमा में छिपे हैं कई प्रतीक

स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी का हर हिस्सा एक संदेश देता है।

मशाल (Torch)प्रतिमा के दाहिने हाथ में मशाल है, जो स्वतंत्रता और ज्ञान के प्रकाश का प्रतीक है।

टैबलेट (Tablet)बाएं हाथ में एक टैबलेट है, जिस पर अमेरिकी स्वतंत्रता की तारीख 4 जुलाई 1776 रोमन अंकों में लिखी गई है।

मुकुट (Crown)सिर पर बने सात नुकीले किरणों वाले मुकुट को सात महाद्वीपों और सात महासागरों का प्रतीक माना जाता है।

टूटी हुई जंजीर – प्रतिमा के पैरों के पास टूटी हुई जंजीरें बनी हैं, जो दासता और उत्पीड़न से मुक्ति का संदेश देती हैं।

क्या प्रतिमा का रंग हमेशा से हरा था?

आज Statue of Liberty हरे रंग की दिखाई देती है, लेकिन जब इसे बनाया गया था तब इसका रंग तांबे (कॉपर) जैसा भूरा था।

वर्षों तक हवा और नमी के संपर्क में रहने के कारण तांबे की सतह पर रासायनिक परत बन गई, जिसे पैटिनेशन (Patination) कहा जाता है। इसी वजह से इसका रंग धीरे-धीरे हरा हो गया।

प्रवासियों के लिए उम्मीद की किरण

1892 में पास स्थित Ellis Island अमेरिका का प्रमुख इमिग्रेशन केंद्र बना। अगले कई दशकों तक लाखों प्रवासी जहाजों से न्यूयॉर्क पहुंचे और अमेरिका में प्रवेश करने से पहले सबसे पहले Statue of Liberty को देखा।  उनके लिए यह प्रतिमा नए जीवन, नए अवसर और बेहतर भविष्य की उम्मीद का प्रतीक बन गई।

आज Statue of Liberty केवल अमेरिका का स्मारक नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में स्वतंत्रता, लोकतंत्र और मानव अधिकारों का प्रतीक मानी जाती है। हर साल लाखों पर्यटक इसे देखने आते हैं।

17 जून 1885 को न्यूयॉर्क पहुंची यह प्रतिमा सिर्फ फ्रांस का एक उपहार नहीं थी। यह दो देशों की दोस्ती, साझा मूल्यों और उस विश्वास का प्रतीक थी कि स्वतंत्रता और लोकतंत्र की रोशनी सीमाओं से कहीं बड़ी होती है।

लगभग डेढ़ सदी बाद भी स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी उसी मशाल को ऊंचा उठाए खड़ी है, मानो दुनिया को याद दिला रही हो कि आज़ादी का महत्व कभी कम नहीं होता।

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MD Faijan

लेखक

मोहम्मद फैजान न्यूज़ ऑफ द डे में पत्रकार हैं, जहाँ वे खेल, मनोरंजन, राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मामलों को कवर करते हैं। इससे पहले वे यूट्यूब चैनल स्पोर्ट्स यारी में सोशल मीडिया एग्जीक्यूटिव के रूप में कार्य कर चुके हैं, जहाँ उन्होंने डिजिटल कंटेंट मैनेजमेंट और ऑडियंस एंगेजमेंट का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त किया। भारत के छत्तीसगढ़ राज्य के कोरिया जिले से संबंध रखने वाले फैजान आधुनिक मीडिया कार्यप्रणालियों की अच्छी समझ रखते हैं और कहानी कहने के विभिन्न रूपों में गहरी रुचि रखते हैं।

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