जामिया मिल्लिया इस्लामिया में 2006 से छात्रसंघ चुनाव नहीं हुए हैं। अब प्रशासन ने छात्रसंघ के संविधान को मंजूरी दे दी है। जानिए तीन सप्ताह के आंदोलन, भूख हड़ताल और चुनाव बहाली की नई समय-सीमा से जुड़ी अहम बातें।
नई दिल्ली: दिल्ली की जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी में छात्रसंघ चुनाव बहाल करने की मांग को लेकर करीब तीन सप्ताह से चल रहा आंदोलन एक महत्वपूर्ण पड़ाव पर पहुंच गया है। छात्रों के लगातार विरोध, भूख हड़ताल और प्रशासन के साथ कई दौर की बातचीत के बाद विश्वविद्यालय ने छात्रसंघ के संविधान को मंजूरी दे दी है। इसे लागू करने के लिए 15 मई 2027 तक की समय-सीमा तय की गई है।
प्रशासन के मुताबिक, अगले शैक्षणिक सत्र की शुरुआत के छह सप्ताह के भीतर चुनाव कराए जाएंगे। इस घटनाक्रम को जामिया में करीब दो दशक से बाधित छात्रसंघ चुनाव की बहाली की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है।
मिली चुनाव की मंजूरी
गुरूवार, 29 अक्टूबर को सामने आए घटनाक्रम के अनुसार, जामिया प्रशासन ने छात्रसंघ के संविधान को मंजूरी देने और इसे लागू करने के लिए अगले साल 15 मई की समय-सीमा निर्धारित की है। इसके साथ ही अगले शैक्षणिक सत्र की शुरुआत के छह सप्ताह के भीतर छात्रसंघ चुनाव कराने की बात कही गई है।
प्रशासन की ओर से आंदोलन के दौरान जारी किए गए निलंबन और कारण बताओ नोटिस वापस लेने का फैसला भी रिपोर्ट किया गया है। यह कदम प्रदर्शनकारी छात्रों की प्रमुख मांगों में शामिल था।
इससे पहले, 26 अक्टूबर को जारी आदेश में विश्वविद्यालय ने कहा था कि छात्रसंघ चुनाव उसके संविधान को मंजूरी मिलने के 15 दिन बाद कराए जाएंगे।
12 अक्टूबर से शुरू हुई भूख हड़ताल
जामिया में छात्रसंघ बहाल करने की मांग को लेकर पांच छात्रों ने 12 अक्टूबर 2026 को अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की थी। उनका प्रमुख उद्देश्य विश्वविद्यालय में निर्वाचित छात्रसंघ की बहाली और चुनाव की निश्चित समय-सीमा तय कराना था। आने वाले दिनों में इस आंदोलन को अन्य छात्रों और छात्र संगठनों का समर्थन मिलने लगा।
प्रदर्शन के दौरान छात्रों ने विश्वविद्यालय परिसर में धरना दिया और प्रशासन से बातचीत के जरिए मांगों का समाधान करने की अपील की। आंदोलन आगे बढ़ने के साथ तनाव भी बढ़ा।
17 अक्टूबर को प्रशासन ने भूख हड़ताल में शामिल तीन छात्रों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की। इनमें कानून की पढ़ाई कर रहे छात्र एबिन बेसिल को एक साल के लिए विश्वविद्यालय से निष्कासित करने का आदेश दिया गया, जबकि जासिम खान और रेहान हैदर को निलंबित किया गया। तीनों पर एक साल के लिए परिसर में प्रवेश पर रोक लगाए जाने की भी खबर आई।
विश्वविद्यालय की ओर से जारी आदेशों में प्रदर्शन के दौरान कथित अनधिकृत धरने, कर्मचारियों के काम में बाधा और सीसीटीवी कैमरे की स्थापना से जुड़ी घटनाओं का उल्लेख किया गया था। वहीं, छात्र संगठनों ने सुरक्षा कर्मचारियों के व्यवहार पर सवाल उठाए। इस तरह विवाद छात्रसंघ चुनाव की मांग से आगे बढ़कर छात्रों के खिलाफ की गई कार्रवाई और प्रदर्शन के दौरान सुरक्षा व्यवस्था तक पहुंच गया।
प्रशासन ने पहले क्या प्रस्ताव दिया था?
आंदोलन के दौरान विश्वविद्यालय प्रशासन और प्रदर्शनकारी छात्रों के बीच कई दौर की बातचीत हुई। प्रशासन का कहना था कि छात्रसंघ चुनाव कराने से पहले उसके लिए औपचारिक संविधान तैयार करना आवश्यक है। इसमें चुनाव की प्रक्रिया, छात्रसंघ के अधिकार, पदाधिकारियों की जिम्मेदारियां और संगठन के संचालन से जुड़े नियम निर्धारित किए जाने थे।
21 अक्टूबर को विश्वविद्यालय ने छात्रसंघ का संविधान तैयार करने के लिए पांच सदस्यीय समिति गठित की थी। इसकी अध्यक्षता सामाजिक विज्ञान संकाय के डीन प्रोफेसर जुबैर मीनाई को सौंपी गई। समिति को संबंधित पक्षों से विचार-विमर्श करके संविधान का मसौदा तैयार करना था। उस समय प्रशासन ने 20 दिसंबर तक मसौदा प्रस्तुत करने का लक्ष्य रखा था।
हालांकि, छात्रों ने इस प्रक्रिया पर सवाल उठाए। उनकी आपत्ति थी कि संविधान तैयार करने के लिए समय-सीमा तो बताई गई, लेकिन इसे मंजूरी देने और चुनाव की घोषणा करने की तारीख स्पष्ट नहीं थी। उनका तर्क था कि अगर संविधान की मंजूरी की प्रक्रिया अनिश्चित बनी रही, तो चुनाव कराने का वादा भी अनिश्चितकाल तक टल सकता है।
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क्या थीं छात्रों की प्रमुख मांगें?
जामिया के प्रदर्शनकारी छात्र केवल चुनाव कराने की घोषणा नहीं चाहते थे, बल्कि वे चाहते थे कि विश्वविद्यालय लिखित रूप में पूरी प्रक्रिया का स्पष्ट कार्यक्रम दे। उनकी प्रमुख मांगों में छात्रसंघ की बहाली, संविधान तैयार करने और मंजूरी देने की समय-सीमा, चुनाव की तारीख स्पष्ट करना और आंदोलन में शामिल छात्रों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई वापस लेना शामिल था।
छात्रों ने सुरक्षा कर्मचारियों के व्यवहार की जांच की मांग भी उठाई। कुछ प्रदर्शनकारियों ने विश्वविद्यालय के मुख्य सुरक्षा सलाहकार और अन्य अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठाए। उनका कहना था कि विरोध के दौरान हुई घटनाओं की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
छात्रों की एक अन्य आपत्ति यह भी थी कि विश्वविद्यालय के आदेश में कुछ प्रदर्शनकारियों से कथित आपत्तिजनक बयान या सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर सार्वजनिक माफी देने की शर्त का उल्लेख किया गया था। छात्रों के एक वर्ग ने इस शर्त पर असहमति जताई और कहा कि उनकी सभी मांगों पर स्पष्ट सहमति के बिना आंदोलन समाप्त नहीं किया जा सकता।
इसलिए प्रशासन की ओर से चुनाव कराने का आश्वासन मिलने के बावजूद विवाद तुरंत समाप्त नहीं हुआ। छात्रों के लिए यह सुनिश्चित करना भी महत्वपूर्ण था कि जिन लोगों पर कार्रवाई की गई है, उनके मामले स्पष्ट रूप से सुलझाए जाएं और भविष्य में छात्र प्रतिनिधित्व के लिए स्थायी व्यवस्था बने।
पढ़ाई पर भी पड़ा आंदोलन का असर
जामिया में विरोध प्रदर्शन का असर विश्वविद्यालय की नियमित शैक्षणिक गतिविधियों पर भी पड़ा। परिसर में तनाव बढ़ने के बाद विश्वविद्यालय ने कक्षाएं ऑनलाइन करने का निर्णय लिया। 27 अक्टूबर को जारी आदेश के अनुसार, ऑनलाइन कक्षाएं 8 नवंबर तक जारी रखने और दूसरे मध्यावधि सेमेस्टर की परीक्षाएं भी ऑनलाइन कराने की व्यवस्था की गई थी।
इसके बाद 29 अक्टूबर को प्रकाशित रिपोर्ट में बताया गया कि विश्वविद्यालय ने ऑनलाइन पढ़ाई की अवधि 24 नवंबर तक बढ़ा दी है। रिपोर्ट के अनुसार, विषम सेमेस्टर की कक्षाएं ऑनलाइन जारी रखने, 25 से 30 नवंबर के बीच प्रैक्टिकल और प्रोजेक्ट से जुड़ी गतिविधियां ऑनलाइन कराने तथा 1 से 24 दिसंबर तक सैद्धांतिक परीक्षाएं ऑनलाइन आयोजित करने की योजना बनाई गई। इसके बाद 25 दिसंबर से 12 जनवरी तक शीतकालीन अवकाश और 13 जनवरी 2027 से सम सेमेस्टर की कक्षाएं शुरू करने का कार्यक्रम बताया गया।
इस फैसले को लेकर छात्रों ने चिंता जताई। उनका कहना था कि प्रयोगशाला, वास्तुकला और अन्य व्यावहारिक विषयों की पढ़ाई को पूरी तरह ऑनलाइन संचालित करना कठिन हो सकता है। वहीं, विश्वविद्यालय प्रशासन ने परिसर की स्थिति को शैक्षणिक गतिविधियों के अनुकूल नहीं बताते हुए ऑनलाइन व्यवस्था जारी रखने का फैसला किया।
29 अक्टूबर को जामिया का 106वां स्थापना दिवस भी था। विरोध के चलते विश्वविद्यालय ने आधिकारिक समारोह और 29 अक्टूबर से 1 नवंबर तक प्रस्तावित तालीमी मेले को रद्द कर दिया था। इस दिन भी सौ से अधिक छात्र परिसर में प्रदर्शन करते नजर आए।
जामिया में 2006 से क्यों नहीं हुए छात्रसंघ चुनाव?
विश्वविद्यालय की स्थापना 29 अक्टूबर 1920 को अलीगढ़ में हुई थी। बाद में इसे दिल्ली स्थानांतरित किया गया और 1988 में केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा मिला।
उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, जामिया में पहला छात्रसंघ चुनाव 1981 में हुआ था। हालांकि, 1997 में परिसर में अशांति के चलते चुनावी प्रक्रिया रोक दी गई। वर्ष 2005 में चुनाव दोबारा कराए गए, लेकिन इसके अगले ही साल यानी 2006 में छात्रसंघ भंग कर दिया गया। उस समय विश्वविद्यालय प्रशासन ने परिसर में हिंसा और छात्रों तथा शिक्षकों के बीच टकराव जैसी घटनाओं को लेकर चिंता जताई थी।
इसके बाद विश्वविद्यालय में पारंपरिक छात्रसंघ चुनावों की जगह विभागीय और विषय-आधारित छात्र संगठनों के माध्यम से विद्यार्थियों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने पर जोर दिया गया। प्रशासन का मानना रहा कि ये संगठन छात्रों की समस्याओं को संबंधित विभागों और अधिकारियों तक पहुंचाने में मदद कर सकते हैं।
हालांकि, प्रदर्शनकारी छात्रों का तर्क है कि विभागीय संगठन पूरे विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते। उनके अनुसार, निर्वाचित छात्रसंघ के जरिए छात्रावास, पुस्तकालय, कक्षाओं और अन्य सुविधाओं से जुड़े मुद्दों को सामूहिक रूप से उठाया जा सकता है।
करीब दो दशक के इस अंतराल के बाद चुनाव बहाली की उम्मीद जगी है। प्रशासन ने छात्रसंघ के संविधान को मंजूरी देने और लागू करने के लिए 15 मई 2027 की समय-सीमा तय की है। इसके बाद चुनाव कराने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। अब इसकी सफलता प्रशासन की समयबद्ध कार्रवाई और चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर निर्भर करेगी।
