ट्रेनों में मोबाइल से होने वाले शोर को लेकर रेलवे बोर्ड ने 2012 में भी हिदायत दी थी। अब दक्षिण रेलवे ने फिर निर्देश जारी किए हैं। जानिए जन विश्वास संशोधन कानून 2026, मोबाइल स्पीकर और यात्रियों की सुविधा से जुड़ी अहम बातें।
चेन्नई: ट्रेन में सफर के दौरान मोबाइल पर रील्स देखना, गाने सुनना या वीडियो चलाना आम बात है। लेकिन अगर कोई यात्री अपने मोबाइल का स्पीकर तेज आवाज में चलाकर आसपास बैठे लोगों की यात्रा में खलल डालता है, तो उसे कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है। दक्षिण रेलवे ने ट्रेनों और रेलवे स्टेशनों पर इस तरह के शोर को रोकने के लिए अपने मंडलों को विशेष निर्देश दिए हैं। यात्रियों को सार्वजनिक उद्घोषणा प्रणाली और नोटिस के जरिए नियमों के प्रति जागरूक करने को कहा गया है।
रेलवे अधिनियम की धारा 145 के प्रावधानों के अनुसार, यात्रियों को परेशान करने या ट्रेन में उपद्रव करने पर दोषी व्यक्ति पर 1,000 रुपये तक का आर्थिक दंड लगाया जा सकता है। यदि अधिकृत रेलवे कर्मचारी के रोकने के निर्देश के बावजूद कोई व्यक्ति उपद्रव जारी रखता है, तो उस पर 5,000 रुपये तक का जुर्माना, छह महीने तक की साधारण कैद या दोनों का प्रावधान लागू हो सकता है।
हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि मोबाइल पर रील देखने या गाना सुनने भर से अपने-आप जुर्माना लगेगा। कार्रवाई का आधार ऐसा व्यवहार है, जिसे नियमों के तहत उपद्रव माना जाए।
दक्षिण रेलवे ने क्यों जारी किए नए निर्देश?
दक्षिण रेलवे के मुख्यालय की वाणिज्य शाखा ने 6 अक्टूबर को अपने मंडलों को पत्र जारी किया था। इसमें कहा गया कि ट्रेनों और रेलवे स्टेशनों पर कुछ यात्री मोबाइल फोन के स्पीकर से तेज आवाज में संगीत और अन्य ऑडियो चलाते हैं। इससे आसपास बैठे लोगों को असुविधा होती है और उनकी यात्रा का आराम प्रभावित होता है।
रेलवे के मुताबिक, मोबाइल इंटरनेट और वीडियो स्ट्रीमिंग की बढ़ती उपलब्धता के कारण सार्वजनिक जगहों पर स्पीकर के जरिए वीडियो और अन्य सामग्री चलाने की प्रवृत्ति बढ़ी है। ऐसे में यात्रियों को परेशानी से बचाने के लिए जागरूकता के साथ नियमों को लागू करना जरूरी है।
दक्षिण रेलवे ने अपने संबंधित मंडलों को क्षेत्रीय भाषाओं, हिंदी और अंग्रेजी में घोषणाएं करने और नोटिस लगाने के निर्देश दिए। इन संदेशों में यात्रियों से मोबाइल पर संगीत या वीडियो सुनने के लिए ईयरफोन इस्तेमाल करने और तेज आवाज में बातचीत से बचने की अपील की जानी है। मंडलों को कार्रवाई के संबंध में रिपोर्ट 20 अक्टूबर तक सौंपने के लिए भी कहा गया था।
बार-बार शोर मचाने पर जेल तक की नौबत
इस खबर का एक अहम पहलू उन यात्रियों से जुड़ा है, जो रेलवे कर्मचारी के निर्देश के बाद भी दूसरों को परेशान करना बंद नहीं करते। संशोधित धारा 145(2) के मुताबिक, यदि किसी व्यक्ति को कानूनी अधिकार रखने वाले रेलवे कर्मचारी ने उपद्रव रोकने या दोबारा न करने का निर्देश दिया हो और वह फिर भी ऐसा करता रहे, तो उसके खिलाफ ज्यादा कड़ी कार्रवाई हो सकती है।
ऐसी स्थिति में छह महीने तक की साधारण कैद, 5,000 रुपये तक का जुर्माना या दोनों सजाएं दी जा सकती हैं। यह कार्रवाई दोहराए जा रहे उपद्रव और वैध निर्देश की अवहेलना से जुड़ी है। इसलिए यह कहना भ्रामक होगा कि मोबाइल पर तेज आवाज में रील चलाते ही हर मामले में छह महीने की जेल हो जाएगी।
कानूनी प्रावधान में सजा की अधिकतम सीमा बताई गई है। वास्तविक कार्रवाई मामले के तथ्यों, लागू कानून और सक्षम प्राधिकारी की प्रक्रिया पर निर्भर करेगी। यात्रियों को यह समझना चाहिए कि किसी कर्मचारी की वैध चेतावनी को नजरअंदाज करके शोर जारी रखना स्थिति को गंभीर बना सकता है।
रेलवे की अपील का मुख्य उद्देश्य यात्रियों के बीच विवाद बढ़ाना नहीं, बल्कि यात्रा के दौरान शांति बनाए रखना है। यदि कोई व्यक्ति दूसरों की शिकायत के बाद भी अपने व्यवहार में बदलाव नहीं करता, तो नियमों के तहत कार्रवाई की संभावना बढ़ जाती है।
क्या सिर्फ रील्स देखने वालों पर लागू होगा नियम?
दक्षिण रेलवे के निर्देश का दायरा केवल सोशल मीडिया रील्स देखने तक सीमित नहीं है। इसमें मोबाइल फोन के स्पीकर पर तेज आवाज में गाने, वीडियो और अन्य ऑडियो सामग्री चलाने के साथ-साथ ऐसी ऊंची आवाज में बातचीत करना भी शामिल है, जिससे सहयात्रियों को परेशानी हो। रेलवे ने स्पष्ट किया है कि सार्वजनिक स्थानों और ट्रेन के डिब्बों में यात्रियों की सुविधा बनाए रखना इस पहल का मुख्य उद्देश्य है।
उदाहरण के लिए, यदि कोई यात्री ट्रेन में मोबाइल के स्पीकर पर तेज आवाज में गाने बजाता है, लगातार वीडियो देखता है या फोन पर जोर-जोर से बात करता है और इससे आसपास बैठे यात्रियों की शांति भंग होती है, तो उसके व्यवहार को रेलवे अधिनियम की धारा 145 के तहत उपद्रव माना जा सकता है। ऐसे मामलों में परिस्थितियों और कानूनी प्रावधानों के अनुसार कार्रवाई हो सकती है।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि मोबाइल पर रील देखने या फोन पर बात करने वाले हर यात्री पर अपने-आप जुर्माना लग जाएगा। कार्रवाई का आधार ऐसा व्यवहार होगा, जिससे दूसरों को परेशानी हो या जो नियमों के तहत उपद्रव की श्रेणी में आए।
रेलवे बोर्ड ने 2012 में भी दी थी हिदायत
ट्रेनों में मोबाइल फोन के इस्तेमाल से होने वाली परेशानी को रेलवे ने पहली बार नहीं उठाया है। दक्षिण रेलवे के अक्टूबर 2026 के पत्र में रेलवे बोर्ड के 23 जुलाई 2012 के पुराने निर्देश का भी उल्लेख है। उस समय रेलवे बोर्ड को यात्रियों की ओर से शिकायतें मिली थीं कि कुछ लोग डिब्बों में तेज आवाज में फोन पर बात करते हैं, लंबी बातचीत करते हैं या आपत्तिजनक रिंगटोन बजाते हैं।
रेलवे बोर्ड ने विशेष रूप से बंद डिब्बों और वातानुकूलित कोचों में इस व्यवहार से होने वाली असुविधा की ओर ध्यान दिलाया था। यात्रियों को मोबाइल फोन साइलेंट या वाइब्रेशन मोड पर रखने, रिंगटोन धीमी रखने, फोन पर ऊंची आवाज में बात न करने और बातचीत को यथासंभव छोटा रखने के लिए जागरूक करने की बात कही गई थी।
पुराने निर्देश में सार्वजनिक उद्घोषणा प्रणाली और कोचों में स्टिकर के जरिए संदेश पहुंचाने का सुझाव भी शामिल था।
इससे पता चलता है कि ट्रेन में शांति बनाए रखने का मुद्दा नया नहीं है। बदलाव यह है कि मोबाइल इंटरनेट और शॉर्ट वीडियो प्लेटफॉर्म के प्रसार के साथ अब यात्रियों को स्पीकर पर चलने वाली डिजिटल सामग्री से भी परेशानी हो सकती है।
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जन विश्वास कानून 2026 से क्या बदला?
दक्षिण रेलवे के पत्र में जन विश्वास (संशोधन प्रावधान) अधिनियम, 2026 का हवाला दिया गया है। इस कानून को 7 अप्रैल 2026 को राष्ट्रपति की मंजूरी मिली थी और इसे 8 अप्रैल को राजपत्र में प्रकाशित किया गया। इसमें कई केंद्रीय कानूनों के प्रावधानों में संशोधन किए गए, जिनमें रेलवे अधिनियम भी शामिल है।
रेलवे अधिनियम की संशोधित धारा 145(2) में उपद्रव के मामले में 1,000 रुपये के जुर्माने और चेतावनी के बाद भी उपद्रव जारी रहने पर छह महीने तक की साधारण कैद, 5,000 रुपये तक के जुर्माने या दोनों का प्रावधान है। इसी कानूनी बदलाव के आधार पर दक्षिण रेलवे ने अपने निर्देश में कार्रवाई का उल्लेख किया है।
ट्रेन में सफर करते समय यात्रियों के लिए निर्देश
रेलवे की अपील का पालन करना मुश्किल नहीं है। कुछ सामान्य आदतों से सहयात्रियों की परेशानी कम की जा सकती है।
- ईयरफोन या हेडफोन इस्तेमाल करें: गाने, वीडियो, फिल्में या रील्स सुनते समय आवाज अपने तक सीमित रखें।
- फोन साइलेंट रखें: रिंगटोन धीमी रखें या फोन को साइलेंट/वाइब्रेशन मोड पर रखें, खासकर रात में।
- धीमी आवाज में बात करें: फोन पर बातचीत करते समय आसपास बैठे यात्रियों का ध्यान रखें। लंबी बातचीत के लिए आवाज ऊंची करने से बचें।
- चेतावनी को नजरअंदाज न करें: यदि अधिकृत रेलवे कर्मचारी शोर बंद करने के लिए कहे, तो निर्देश का पालन करें।
- दूसरों की शिकायत का सम्मान करें: अगर सहयात्री आवाज कम करने का अनुरोध करे, तो विवाद करने के बजाय आवाज घटा दें या ईयरफोन लगा लें।
- समस्या बनी रहे तो रेलवे को सूचित करें: किसी यात्री के लगातार परेशान करने पर कोच में मौजूद रेलवे कर्मचारी से सहायता मांगी जा सकती है। शिकायत करते समय ट्रेन और कोच की सही जानकारी देना उपयोगी होगा।
इन उपायों का उद्देश्य यात्रियों के निजी अधिकारों को सीमित करना नहीं, बल्कि साझा जगह में सभी के आराम का ध्यान रखना है। ट्रेन में सफर करते समय एक व्यक्ति की सुविधा के कारण दूसरे यात्रियों की नींद, बातचीत या आराम प्रभावित नहीं होना चाहिए।
यात्री कहां कर सकते हैं शिकायत?
अगर कोई सहयात्री बार-बार तेज आवाज में संगीत या वीडियो चलाकर परेशानी पैदा कर रहा है, तो यात्री पहले विनम्रता से आवाज कम करने का अनुरोध कर सकते हैं, बशर्ते ऐसा करना सुरक्षित और सहज लगे। स्थिति न सुधरे तो ट्रेन में मौजूद टीटीई या अन्य अधिकृत रेलवे कर्मचारी को जानकारी दी जा सकती है।
रेलवे की शिकायत व्यवस्था के लिए यात्री RailMadad प्लेटफॉर्म का भी इस्तेमाल कर सकते हैं। शिकायत में ट्रेन नंबर, कोच, सीट या बर्थ की जानकारी और परेशानी का संक्षिप्त विवरण देना मददगार हो सकता है। यदि मामला गंभीर हो या किसी तरह का विवाद बढ़ रहा हो, तो स्वयं टकराव करने के बजाय रेलवे कर्मचारियों की मदद लेना बेहतर है।
शिकायत दर्ज करने का अर्थ यह नहीं कि दूसरे यात्री को अपने-आप दोषी घोषित कर दिया जाएगा। संबंधित अधिकारी उपलब्ध जानकारी और परिस्थितियों के आधार पर उचित कदम उठा सकते हैं। यात्रियों को शिकायत में सही जानकारी देनी चाहिए और किसी व्यक्ति पर बिना आधार के आरोप लगाने से बचना चाहिए।
