Sunday, 02 August 2026
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4 साल में AC कोच से गायब हुए 1.27 करोड़ बेडरोल आइटम, ठेकेदारों को  ₹104 करोड़ का नुकसान!

भारतीय रेलवे के AC कोचों से 4 साल में 1.27 करोड़ बेडशीट, कंबल और तौलिए गायब हुए। RTI रिपोर्ट में सामने आया ₹104 करोड़ के नुकसान का पूरा मामला।

नई दिल्ली: Indian Railways को देश की लाइफलाइन कहा जाता है। रोजाना करोड़ों की संख्या में यात्री ट्रेनों में सफर करते हैं और लंबी दूरी की यात्राओं में एसी कोचों में यात्रियों को चादर, कंबल, तकिया, तौलिया और बेडरोल जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं।

लेकिन अब सूचना के अधिकार (RTI) के तहत सामने आए आंकड़ों ने रेलवे प्रशासन के सामने एक गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है। पिछले चार वर्षों में एसी कोचों से इतनी बड़ी संख्या में लिनेन (Linen) और बेडरोल सामग्री गायब हुई है कि उसकी कीमत 100 करोड़ रुपये से भी अधिक पहुंच गई है।

RTI से मिली जानकारी के अनुसार, वित्त वर्ष 2021-22 से 2024-25 के बीच भारतीय रेलवे के एसी डिब्बों से कुल 1.27 करोड़ से अधिक बेडरोल आइटम चोरी या गायब हुए। इनकी अनुमानित कीमत 104 करोड़ रुपये से अधिक आंकी गई है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस नुकसान का अधिकांश आर्थिक बोझ रेलवे के निजी लिनेन सेवा प्रदाताओं (Contractors) को उठाना पड़ा।

यह मामला केवल चोरी का नहीं, बल्कि सार्वजनिक संपत्ति के संरक्षण, यात्रियों की जिम्मेदारी और रेलवे की निगरानी व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।

क्या है पूरा मामला?

यह जानकारी सूचना के अधिकार (RTI) के जरिए प्राप्त की गई, जिसमें भारतीय रेलवे के एसी कोचों में उपलब्ध कराए जाने वाले लिनेन की चोरी का विस्तृत रिकॉर्ड मांगा गया था। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 1 अप्रैल 2021 से 31 मार्च 2025 तक देशभर में AC Trains से लाखों नहीं बल्कि करोड़ों की संख्या में लिनेन आइटम गायब हुए।

इनमें बेडशीट, तकिए के कवर, कंबल, तकिए, तौलिए और अन्य बेडरोल सामग्री शामिल हैं। कुल मिलाकर 1.27 करोड़ (लगभग 12.7 मिलियन) आइटम चोरी या गायब होने की पुष्टि हुई है।

इन वस्तुओं का कुल अनुमानित मूल्य करीब 104 करोड़ रुपये बताया गया है।

इन सामानों की हुई चोरी

RTI के आंकड़ों के अनुसार सबसे अधिक चोरी बेडशीट और तकिए के कवर की हुई। इसके अलावा बड़ी संख्या में कंबल, तकिए और फेस टॉवल भी गायब हुए।

रेलवे के रिकॉर्ड के अनुसार चोरी या गायब होने वाले प्रमुख सामानों में शामिल हैं—

  • बेडशीट
  • कंबल
  • तकिया
  • तकिए के कवर
  • फेस टॉवल
  • अन्य बेडरोल सामग्री

इन वस्तुओं की संख्या करोड़ों में पहुंच चुकी है, जिससे रेलवे की लॉजिस्टिक्स व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ा है।

सबसे ज्यादा नुकसान किसे हुआ?

इस मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इन सामानों का सीधा आर्थिक नुकसान पूरी तरह भारतीय रेलवे को नहीं उठाना पड़ा।

रेलवे ने पिछले कुछ वर्षों में लिनेन सेवाओं का बड़ा हिस्सा निजी एजेंसियों और ठेकेदारों (Contractors) को आउटसोर्स कर रखा है। ये एजेंसियां ट्रेनों में साफ-सुथरे बेडरोल उपलब्ध कराने, उन्हें इकट्ठा करने, धोने और दोबारा इस्तेमाल के लिए तैयार करने का काम करती हैं।

अनुबंध (Contract) की शर्तों के अनुसार यदि लिनेन चोरी हो जाता है या वापस नहीं मिलता, तो अधिकांश मामलों में उसकी लागत संबंधित ठेकेदारों को वहन करनी पड़ती है।

यही कारण है कि RTI में सामने आए 104 करोड़ रुपये के नुकसान का बड़ा हिस्सा इन्हीं निजी सेवा प्रदाताओं पर पड़ा।

रेलवे में कैसे काम करता है बेडरोल सिस्टम?

Indian Railway की लंबी दूरी की एसी ट्रेनों में यात्रियों को यात्रा के दौरान बेडरोल किट उपलब्ध कराई जाती है।

आमतौर पर इस किट में –

  • दो बेडशीट
  • एक कंबल
  • एक तकिया
  • एक तकिए का कवर
  • एक फेस टॉवल शामिल होते हैं।

यात्रा समाप्त होने पर यात्रियों से यह सामान वापस लिया जाता है। इसके बाद इन्हें रेलवे के अधिकृत लॉन्ड्री केंद्रों में भेजा जाता है, जहां धुलाई और सैनिटाइजेशन के बाद इन्हें दोबारा उपयोग में लाया जाता है।

लेकिन जब यात्री इन वस्तुओं को अपने साथ ले जाते हैं या वे अन्य कारणों से वापस नहीं मिलतीं, तो पूरी आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित होती है।

कैसे हुई इतनी बड़ी चोरी?

कई मामलों में यात्री जानबूझकर तौलिए, चादर या कंबल अपने बैग में रखकर उतर जाते हैं। वहीं कुछ मामलों में ट्रेन परिचालन के दौरान सामान गायब हो जाता है।

रेलवे अधिकारियों का कहना है कि प्रतिदिन लाखों यात्रियों की आवाजाही और हजारों ट्रेनों के संचालन के कारण प्रत्येक बेडरोल की अलग-अलग निगरानी करना बेहद कठिन होता है।

इसके अलावा कई बार ट्रेन में चढ़ने और उतरने की भीड़, लंबी दूरी की यात्राएं और सीमित स्टाफ भी इस समस्या को बढ़ा देते हैं।

क्या कोविड के बाद बढ़ी यह समस्या?

कोविड-19 महामारी के दौरान कुछ समय के लिए रेलवे ने संक्रमण के खतरे को देखते हुए एसी कोचों में बेडरोल उपलब्ध कराना बंद कर दिया था। बाद में जब सेवाएं सामान्य हुईं, तब दोबारा लिनेन वितरण शुरू किया गया।

रेलवे अधिकारियों का मानना है कि महामारी के बाद यात्रियों की संख्या तेजी से बढ़ी, जिससे लिनेन प्रबंधन और उसकी निगरानी पहले की तुलना में अधिक चुनौतीपूर्ण हो गई।

हालांकि RTI में यह स्पष्ट नहीं कहा गया कि चोरी की घटनाएं कोविड के कारण बढ़ीं, लेकिन उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि 2021-22 से लगातार बड़ी संख्या में सामान गायब होता रहा।

यात्रियों पर असर

लिनेन चोरी का असर केवल आर्थिक नुकसान तक सीमित नहीं रहता। जब बड़ी संख्या में बेडरोल उपलब्ध नहीं रहते, तो कई ट्रेनों में यात्रियों को समय पर साफ बेडशीट या कंबल उपलब्ध कराने में कठिनाई आती है।

कई बार अतिरिक्त खरीद करनी पड़ती है, जिससे परिचालन लागत बढ़ती है। साथ ही निजी ठेकेदारों पर पड़ने वाला आर्थिक दबाव भविष्य में सेवा की गुणवत्ता को भी प्रभावित कर सकता है।

रेलवे के सामने क्यों बनी हुई है चुनौती?

भारतीय रेलवे दुनिया के सबसे बड़े रेल नेटवर्क में शामिल है। रोजाना लाखों यात्री हजारों ट्रेनों में सफर करते हैं। इतनी बड़ी व्यवस्था में प्रत्येक बेडरोल की निगरानी करना बेहद कठिन काम है।

रेलवे कई वर्षों से लिनेन प्रबंधन को बेहतर बनाने की कोशिश कर रहा है। कुछ ट्रेनों में बारकोड आधारित ट्रैकिंग, डिजिटल रिकॉर्ड और निजी एजेंसियों के माध्यम से वितरण एवं संग्रह जैसी व्यवस्थाएं लागू की गई हैं, लेकिन चोरी की घटनाओं में अपेक्षित कमी नहीं आई है।

विशेषज्ञों का मानना है कि समस्या केवल निगरानी की नहीं, बल्कि यात्रियों की सार्वजनिक संपत्ति के प्रति जिम्मेदारी की भी है। जब तक लोग रेलवे की संपत्ति को अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेंगे, तब तक ऐसी घटनाओं पर पूरी तरह रोक लगाना मुश्किल होगा।

क्या है समाधान?

रेलवे विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या से निपटने के लिए केवल सख्त नियम पर्याप्त नहीं होंगे। इसके लिए तकनीकी और सामाजिक दोनों स्तरों पर प्रयास करने होंगे।

एक सुझाव यह है कि प्रत्येक बेडरोल किट को QR Code या RFID (Radio Frequency Identification) टैग से जोड़ा जाए ताकि उसका रिकॉर्ड डिजिटल रूप से रखा जा सके। साथ ही  कोच अटेंडेंट द्वारा वितरण और वापसी की Online Entry भी अनिवार्य की जा सकती है।

कुछ विशेषज्ञ यात्रियों से रिफंडेबल सिक्योरिटी डिपॉजिट (Refundable Security Deposit) लेने का सुझाव भी देते हैं, जो बेडरोल लौटाने पर वापस कर दिया जाए। हालांकि इतनी बड़ी संख्या में यात्रियों के कारण इस व्यवस्था को लागू करना आसान नहीं माना जाता।

नैतिक जिम्मेदारी और बेहतर निगरानी से बदलेंगे हालात

रेलवे से बेडशीट, कंबल या तौलिए की चोरी केवल कुछ वस्तुओं के गायब होने का मामला नहीं है। यह सार्वजनिक संपत्ति के प्रति हमारी जिम्मेदारी और नागरिक व्यवहार पर भी सवाल खड़ा करता है।

हर चोरी हुआ कंबल या बेडशीट अंततः किसी दूसरे यात्री की सुविधा को प्रभावित करता है। इसके साथ ही नई सामग्री खरीदने पर अतिरिक्त खर्च होता है, जिसका असर रेलवे के परिचालन बजट पर पड़ता है।

आरटीआई से सामने आए 1.27 करोड़ लिनेन आइटम और 104 करोड़ रुपये से अधिक के नुकसान के आंकड़े इस बात का संकेत हैं कि समस्या अब छोटी नहीं रह गई है।

यदि यात्रियों में जागरूकता बढ़े, निगरानी व्यवस्था मजबूत हो और तकनीक का बेहतर उपयोग किया जाए, तो इस तरह के नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है। आखिरकार, रेलवे केवल सरकार की नहीं, बल्कि देश के हर नागरिक की साझा संपत्ति है।

ये भी पढ़ें :- विश्व जनसंख्या दिवस 2026: 8.3 अरब की दुनिया में सबसे बड़ा सवाल आबादी नहीं, बेहतर भविष्य है

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MD Faijan

MD Faijan

लेखक

मोहम्मद फैजान न्यूज़ ऑफ द डे में पत्रकार हैं, जहाँ वे खेल, मनोरंजन, राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मामलों को कवर करते हैं। इससे पहले वे यूट्यूब चैनल स्पोर्ट्स यारी में सोशल मीडिया एग्जीक्यूटिव के रूप में कार्य कर चुके हैं, जहाँ उन्होंने डिजिटल कंटेंट मैनेजमेंट और ऑडियंस एंगेजमेंट का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त किया। भारत के छत्तीसगढ़ राज्य के कोरिया जिले से संबंध रखने वाले फैजान आधुनिक मीडिया कार्यप्रणालियों की अच्छी समझ रखते हैं और कहानी कहने के विभिन्न रूपों में गहरी रुचि रखते हैं।

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