अंतरराष्ट्रीय व्यापार, तेल बाजार और विदेशी मुद्रा भंडार में अमेरिकी डॉलर का दबदबा क्यों है? जानिए अमेरिकी डॉलर के वैश्विक ताकत बनने की पूरी कहानी।
नई दिल्ली: अगर आप विदेश यात्रा की योजना बना रहे हों, शेयर बाजार में निवेश करते हों या फिर सिर्फ यह जानना चाहते हों कि रुपया मजबूत हुआ है या कमजोर, तो एक चीज लगभग हर जगह समान होती है, American Dollar
समाचारों में अक्सर यह खबर आती है कि “रुपया डॉलर के मुकाबले गिर गया”, “तेल की कीमतें डॉलर में तय होती हैं”, “देशों के विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर रखा जाता है” और “अंतरराष्ट्रीय व्यापार का बड़ा हिस्सा भी डॉलर में होता है”।
ऐसे में एक सवाल अक्सर उठता है कि आखिर दुनिया की सैकड़ों मुद्राओं के बीच American Dollar को इतनी खास अहमियत कैसे मिली? क्यों दुनिया की लगभग हर मुद्रा की तुलना डॉलर से की जाती है? और क्या डॉलर हमेशा से इतना शक्तिशाली था?
दिलचस्प बात यह है कि American Dollar की यह ताकत किसी एक फैसले का नतीजा नहीं है। इसके पीछे युद्ध, आर्थिक संकट, वैश्विक समझौते, राजनीतिक नेतृत्व और कई ऐतिहासिक घटनाओं की लंबी कहानी छिपी है। इस कहानी में ब्रिटिश साम्राज्य, विश्व युद्ध, स्वर्ण भंडार, अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं और कुछ ऐसे नाम शामिल हैं जिन्होंने आधुनिक वैश्विक वित्तीय व्यवस्था की नींव रखी।
एक समय दुनिया पर राज करता था ब्रिटिश पाउंड
आज डॉलर दुनिया की प्रमुख रिजर्व करेंसी है, लेकिन 20वीं सदी की शुरुआत तक यह स्थान ब्रिटिश पाउंड (British Pound) के पास था।
19वीं और 20वीं सदी के शुरुआती दशकों में ब्रिटेन दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक और औपनिवेशिक शक्ति था। उसके साम्राज्य में एशिया, अफ्रीका, यूरोप और अमेरिका के कई हिस्से शामिल थे। अंतरराष्ट्रीय व्यापार का बड़ा हिस्सा लंदन के जरिए संचालित होता था और अधिकांश वैश्विक लेन-देन पाउंड में किए जाते थे।
उस समय दुनिया की कई सरकारें और केंद्रीय बैंक अपने विदेशी मुद्रा भंडार में पाउंड रखते थे। सरल शब्दों में कहें तो उस दौर का “डॉलर” वास्तव में “पाउंड” ही था।
लेकिन फिर दुनिया ने दो ऐसे युद्ध देखे जिन्होंने वैश्विक आर्थिक संतुलन पूरी तरह बदल दिया।
प्रथम विश्व युद्ध ने की बदलाव की शुरुआत
1914 में प्रथम विश्व युद्ध शुरू हुआ। युद्ध के दौरान ब्रिटेन और यूरोप की अन्य शक्तियों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा। दूसरी ओर अमेरिका युद्ध के शुरुआती वर्षों में अपेक्षाकृत सुरक्षित रहा और उसने मित्र देशों को हथियार, खाद्यान्न और अन्य सामग्री की आपूर्ति करके अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत कर ली।
युद्ध खत्म होने तक अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा ऋणदाता देश बन चुका था। जिन देशों को पहले ब्रिटेन वित्तीय सहायता देता था, वे अब अमेरिका से कर्ज लेने लगे थे। यहीं से डॉलर का महत्व बढ़ना शुरू हुआ।
आंकड़ों के मुताबिक प्रथम विश्व युद्ध के दौरान और उसके बाद अमेरिका ने कुल 10 अरब डॉलर से अधिक का ऋण अपने मित्र देशों को दिया था। आपको जानकर हैरानी होगी कि अमेरिका से सबसे अधिक कर्ज तब के आर्थिक शक्ति माने जाने वाले यूनाइटेड किंगडम ने ही लिया था।
इसके अलावा फ्रांस, इटली, रूस और बेल्जियम समेत लगभग 20 देशों ने अमेरिका से युद्ध ऋण लिया था।
दूसरा विश्व युद्ध और अमेरिका का आर्थिक उदय
हालांकि प्रथम विश्व युद्ध के बाद भी पाउंड पूरी तरह कमजोर नहीं हुआ था, लेकिन असली बदलाव द्वितीय विश्व युद्ध के बाद आया। 1939 से 1945 के बीच चले दूसरे विश्व युद्ध ने यूरोप की अर्थव्यवस्थाओं को बुरी तरह प्रभावित किया। ब्रिटेन, फ्रांस और अन्य प्रमुख देश आर्थिक रूप से कमजोर हो गए।
इसके विपरीत, अमेरिका युद्ध के बाद दुनिया की सबसे मजबूत औद्योगिक और आर्थिक शक्ति बनकर उभरा। उस समय दुनिया के लगभग दो-तिहाई स्वर्ण भंडार (Gold Reserves) अमेरिका के पास थे।
यही वह दौर था जब दुनिया की नई आर्थिक व्यवस्था तैयार करने की जरूरत महसूस हुई।
1944 का ऐतिहासिक Bretton Woods सम्मेलन
जुलाई 1944 में अमेरिका के न्यू हैम्पशायर राज्य के छोटे से शहर ब्रेटन वुड्स (Bretton Woods) में 44 देशों के प्रतिनिधि एकत्र हुए। इस सम्मेलन का उद्देश्य युद्ध के बाद वैश्विक वित्तीय व्यवस्था को स्थिर बनाना था।
यहीं पर आधुनिक अंतरराष्ट्रीय आर्थिक ढांचे की नींव रखी गई। इसी सम्मेलन से बाद में दो महत्वपूर्ण संस्थाएं International Monetary Fund (IMF) World Bank अस्तित्व में आये।
Bretton Woods सम्मेलन में अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व प्रमुख अर्थशास्त्री हैरी डेक्सटर व्हाइट (Harry Dexter White) कर रहे थे, जबकि ब्रिटेन की ओर से प्रसिद्ध अर्थशास्त्री जॉन मेनार्ड कीन्स (John Maynard Keynes) शामिल थे।
दोनों के बीच वैश्विक वित्तीय व्यवस्था को लेकर अलग-अलग विचार थे, लेकिन अंततः जो प्रणाली बनी उसमें अमेरिकी प्रभाव अधिक रहा।
कैसे बना डॉलर World Reserve Currency?
ब्रेटन वुड्स समझौते के तहत एक नई व्यवस्था बनाई गई। इस व्यवस्था में American Dollar को सोने से जोड़ा गया और एक औंस सोने की कीमत 35 डॉलर तय की गई। साथ ही अन्य देशों की मुद्राओं को भी डॉलर से जोड़ा गया।
इसका मतलब यह था कि दुनिया की अधिकांश मुद्राओं का मूल्य सीधे या परोक्ष रूप से डॉलर के जरिए तय होने लगा। अमेरिका ने वादा किया था कि विदेशी सरकारें अपने डॉलर को तय दर पर सोने में बदल सकती हैं, इसलिए दुनिया को डॉलर पर भरोसा हुआ।
यहीं से डॉलर वैश्विक रिजर्व करेंसी के रूप में स्थापित होने लगा।
Reserve Currency आखिर होती क्या है?
Reserve Currency वह मुद्रा होती है जिसे केंद्रीय बैंक और सरकारें अपने विदेशी मुद्रा भंडार में रखती हैं।
इसका उपयोग कई उद्देश्यों के लिए किया जाता है:
- अंतरराष्ट्रीय व्यापार
- विदेशी कर्ज का भुगतान
- मुद्रा बाजार में स्थिरता बनाए रखना
- आर्थिक संकट के समय सुरक्षा कवच के रूप में
आज दुनिया के अधिकांश केंद्रीय बैंकों के विदेशी मुद्रा भंडार में सबसे बड़ा हिस्सा डॉलर का है।
1971 में टूटा सोने से रिश्ता
American Dollar की कहानी का अगला बड़ा मोड़ 1971 में आया। अमेरिका पर वियतनाम युद्ध और घरेलू खर्चों का दबाव बढ़ रहा था। दुनिया के कई देश अपने डॉलर के बदले सोना मांगने लगे।
ऐसी स्थिति में अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन (Richard Nixon) ने 15 अगस्त 1971 को एक ऐतिहासिक फैसला लिया। उन्होंने डॉलर को सोने में बदलने की व्यवस्था समाप्त कर दी। इस कदम को बाद में “Nixon Shock” भी कहा गया।
सैद्धांतिक रूप से देखा जाए तो इसके बाद डॉलर का सोने से संबंध खत्म हो गया था। लेकिन इसके बावजूद दुनिया ने डॉलर को नहीं छोड़ा।
सोने का सहारा खत्म होने के बाद भी कैसे बचा डॉलर
यह सवाल बेहद महत्वपूर्ण है। क्योंकि अब, जब डॉलर सोने से नहीं जुड़ा था, तब भी दुनिया ने उस पर भरोसा क्यों बनाए रखा?
इसके पीछे भी कुछ अहम कारण थे:
अमेरिका की आर्थिक ताकत – अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बना रहा।
मजबूत वित्तीय बाजार – अमेरिकी बॉन्ड मार्केट और वित्तीय संस्थानों को दुनिया में सबसे सुरक्षित माना जाता है।
राजनीतिक स्थिरता – कई देशों की तुलना में अमेरिका को अपेक्षाकृत स्थिर लोकतांत्रिक व्यवस्था वाला देश माना गया।
वैश्विक व्यापार – अधिकांश अंतरराष्ट्रीय कंपनियां डॉलर में कारोबार करती रहीं।
इन कारणों से डॉलर की केंद्रीय भूमिका बनी रही।
तेल व्यापार ने भी बढ़ाई ताकत
1970 के दशक में American Dollar की शक्ति को एक और बड़ा सहारा मिला। अमेरिका और प्रमुख तेल उत्पादक देशों, विशेष रूप से सऊदी अरब, के बीच ऐसे समझौते बने जिनके तहत अंतरराष्ट्रीय तेल व्यापार मुख्य रूप से डॉलर में होने लगा।
धीरे-धीरे लगभग पूरा वैश्विक तेल बाजार डॉलर आधारित हो गया। इसका अर्थ यह था कि यदि किसी देश को तेल खरीदना है, तो उसे डॉलर की आवश्यकता होगी।
यहीं से “पेट्रोडॉलर” (Petrodollar) शब्द लोकप्रिय हुआ।
आज हर मुद्रा की तुलना डॉलर से क्यों होती है।
जब किसी मुद्रा का मूल्य बताया जाता है तो अक्सर उसे डॉलर के मुकाबले मापा जाता है।
इसके पीछे कई कारण हैं:
वैश्विक स्वीकार्यता – डॉलर लगभग हर देश में स्वीकार्य और आसानी से विनिमेय है।
व्यापारिक उपयोग – दुनिया के बड़े हिस्से का व्यापार डॉलर में होता है।
विदेशी मुद्रा भंडार – अधिकांश केंद्रीय बैंक डॉलर रखते हैं।
वित्तीय बाजार – अंतरराष्ट्रीय निवेश और कर्ज का बड़ा हिस्सा डॉलर आधारित है।
इसलिए डॉलर एक तरह से वैश्विक संदर्भ बिंदु (Benchmark Currency) बन गया है।
क्या डॉलर की बादशाहत को चुनौती मिल रही है?
हाल के वर्षों में चीन की मुद्रा युआन, यूरो और कुछ अन्य मुद्राओं को डॉलर के विकल्प के रूप में देखा जाने लगा है। साथ ही BRICS देशों ने भी स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने की बात की है। इसके अलावा रूस और चीन ने कई लेन-देन डॉलर के बजाय अपनी मुद्राओं में करने शुरू किए हैं।
फिर भी विशेषज्ञ मानते हैं कि निकट भविष्य में डॉलर की स्थिति को पूरी तरह चुनौती देना आसान नहीं होगा। क्योंकि डॉलर की ताकत केवल अमेरिकी अर्थव्यवस्था से नहीं, बल्कि दशकों में बने वैश्विक विश्वास, वित्तीय ढांचे और संस्थागत नेटवर्क से आती है।
आज भी क्यों सबसे आगे है डॉलर?
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के आंकड़ों के अनुसार, दुनिया के विदेशी मुद्रा भंडार का सबसे बड़ा हिस्सा अब भी American Dollar में रखा जाता है। वैश्विक व्यापार, अंतरराष्ट्रीय कर्ज, विदेशी निवेश और कमोडिटी बाजारों में डॉलर की भूमिका आज भी सबसे मजबूत है।
यानी लगभग 80 साल पहले Bretton Woods में रखी गई नींव आज भी वैश्विक वित्तीय व्यवस्था को प्रभावित कर रही है।
ये भी पढ़ें :- CLARITY Act: क्रिप्टो उद्योग के लिए नियामकीय स्पष्टता का नया अध्याय
