फ्रांस के वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष मिशन से पहले 14 बिल्लियों को प्रशिक्षण और परीक्षण के लिए चुना था। इनमें से फेलिसेट को उड़ान का मौका मिला। जानें सेंट्रीफ्यूज, इलेक्ट्रोड और कठिन प्रशिक्षण से जुड़ी इस ऐतिहासिक तैयारी की कहानी।
पेरिस: अंतरिक्ष की दुनिया में जब भी किसी ऐतिहासिक यात्रा का जिक्र होता है, तो आमतौर पर नील आर्मस्ट्रांग, यूरी गागरिन या अंतरिक्ष में भेजे गए पहले जीवों में शामिल कुत्ते लाइका का नाम याद आता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इंसानों और कुत्तों के बाद एक बिल्ली ने भी अंतरिक्ष की यात्रा कर इतिहास रचा था?
फेलिसेट (Félicette) नाम की इस बिल्ली ने 18 अक्टूबर 1963 को अंतरिक्ष की यात्रा कर इतिहास में अपना नाम दर्ज कराया। वह अंतरिक्ष में पहुंचने वाली दुनिया की पहली बिल्ली थी। फ्रांस के अंतरिक्ष कार्यक्रम के तहत किए गए इस प्रयोग ने अंतरिक्ष में जीवों पर पड़ने वाले प्रभावों को समझने की कोशिश में एक नया अध्याय जोड़ा। पेरिस की सड़कों पर रहने वाली एक आवारा बिल्ली से अंतरिक्ष की यात्रा करने वाली अग्रणी जीव तक का उसका सफर जितना अनोखा था, उतना ही भावुक भी।
आज, 18 अक्टूबर 2026 को, फेलिसेट की ऐतिहासिक अंतरिक्ष यात्रा के 63 साल पूरे हो रहे हैं। यह अवसर अंतरिक्ष विज्ञान के उस दौर को याद करने का भी है, जब इंसानों को अंतरिक्ष में भेजने से पहले वैज्ञानिक जानवरों पर प्रयोग करके वहां की परिस्थितियों को समझने का प्रयास कर रहे थे।
जब फेलिसेट ने रचा अंतरिक्ष इतिहास?
18 अक्टूबर 1963 को फ्रांस के वैज्ञानिकों ने फेलिसेट को एक वेरोनिक (Véronique) रॉकेट के जरिए अंतरिक्ष की ओर रवाना किया। यह मिशन अल्जीरिया के सहारा क्षेत्र में स्थित एक प्रक्षेपण केंद्र से संचालित किया गया था, जहां फ्रांस अपने रॉकेट और अंतरिक्ष संबंधी प्रयोगों का परीक्षण कर रहा था।
उस समय अंतरिक्ष विज्ञान तेजी से विकसित हो रहा था और वैज्ञानिक यह जानने की कोशिश कर रहे थे कि पृथ्वी के वायुमंडल से बाहर जाने पर जीवों के शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है। फेलिसेट की यात्रा इसी शोध का हिस्सा थी।
गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स के अनुसार, यह रॉकेट लगभग 154 किलोमीटर की ऊंचाई तक पहुंचा। इस उड़ान में फेलिसेट ने करीब पांच मिनट तक भारहीनता जैसी परिस्थितियों का अनुभव किया। यह एक उपकक्षीय उड़ान थी, यानी उसका अंतरिक्ष यान पृथ्वी की कक्षा में स्थापित नहीं हुआ, बल्कि ऊंचाई तक पहुंचने के बाद वापस पृथ्वी पर लौट आया। इस तरह फेलिसेट अंतरिक्ष तक पहुंचने वाली पहली बिल्ली बनी और आज भी इस उपलब्धि के लिए जानी जाती है।
पेरिस की सड़कों से अंतरिक्ष तक का सफर
फेलिसेट मूल रूप से पेरिस की एक आवारा बिल्ली थी। उसे फ्रांस के वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष यात्रा से जुड़े एक शोध कार्यक्रम के लिए चुना था। 1960 के दशक की शुरुआत में फ्रांस भी अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में अपनी क्षमता स्थापित करना चाहता था। अमेरिका और सोवियत संघ पहले ही अंतरिक्ष में जीवों को भेजने के प्रयोग कर चुके थे। फ्रांस ने भी इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए अलग तरह का प्रयोग करने का निर्णय लिया और कुत्तों या बंदरों के बजाय बिल्लियों को अध्ययन के लिए चुना।
फेलिसेट को शुरुआत में उसके नाम से नहीं, बल्कि C341 कोड से पहचाना जाता था। वैज्ञानिकों ने प्रशिक्षण और परीक्षण के दौरान बिल्लियों को नाम देने से परहेज किया, ताकि उनके साथ भावनात्मक लगाव कम हो और शोध के उद्देश्य पर ध्यान केंद्रित रखा जा सके।
उड़ान सफल होने के बाद मीडिया ने उसे प्रसिद्ध कार्टून बिल्ली ‘फेलिक्स’ के नाम पर फेलिक्स कहना शुरू कर दिया। बाद में पता चला कि अंतरिक्ष यात्रा करने वाली बिल्ली मादा थी, इसलिए उसके नाम को बदलकर ‘फेलिसेट’ कर दिया गया।
14 बिल्लियों को किया गया था तैयार
फेलिसेट का चयन अचानक नहीं हुआ था। इस मिशन से पहले फ्रांस के एयरोनॉटिकल मेडिसिन अनुसंधान केंद्र CERMA (Centre d’Enseignement et de Recherches de Médecine Aéronautique) ने 14 बिल्लियों को प्रशिक्षण और परीक्षण के लिए चुना था।
इस प्रयोग के जरिए वैज्ञानिक यह जानना चाहते थे कि रॉकेट की तेज रफ्तार, तीव्र गुरुत्वीय दबाव, कम जगह और भारहीनता जैसी असामान्य स्थितियों का बिल्ली के शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है।
प्रशिक्षण के दौरान बिल्लियों को छोटे और सीमित स्थानों में रहने की आदत डलवाई गई। उन्हें ऐसी परिस्थितियों से परिचित कराया गया, जो रॉकेट यात्रा के दौरान सामने आ सकती थीं। इसके अलावा, उच्च गुरुत्वीय बल का अनुकरण करने के लिए उन्हें सेंट्रीफ्यूज जैसी मशीनों में भी रखा गया। इस तरह वैज्ञानिकों ने यह जानने की कोशिश की कि तेज गति से ऊपर जाने और फिर पृथ्वी पर लौटने के दौरान शरीर पर पड़ने वाले दबाव को जीव किस प्रकार सहन कर सकता है।
इन बिल्लियों के मस्तिष्क की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए इलेक्ट्रोड का इस्तेमाल किया गया। फेलिसेट को इन्हीं परीक्षणों के आधार पर अंतरिक्ष यात्रा के लिए चुना गया। इस प्रक्रिया से यह भी स्पष्ट होता है कि शुरुआती अंतरिक्ष कार्यक्रमों में वैज्ञानिक केवल रॉकेट तकनीक पर काम नहीं कर रहे थे, बल्कि जीवित प्राणियों पर अंतरिक्ष की परिस्थितियों के संभावित प्रभावों को भी समझना चाहते थे।
रॉकेट के भीतर क्या हुआ?
18 अक्टूबर 1963 की सुबह फेलिसेट को विशेष कैप्सूल में बैठाकर वेरोनिक रॉकेट से रवाना किया गया। यह यात्रा कुछ ही मिनटों की थी, लेकिन वैज्ञानिकों के लिए इसमें कई अहम सवालों के जवाब छिपे थे। रॉकेट के तेजी से ऊपर जाने के दौरान फेलिसेट के शरीर पर सामान्य गुरुत्वाकर्षण से कई गुना अधिक बल पड़ा।
गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स के अनुसार, उड़ान के दौरान उसने लगभग ‘9.5 G’ तक का त्वरण अनुभव किया। इसका अर्थ है कि उसके शरीर पर पृथ्वी के सामान्य गुरुत्वीय बल से कई गुना अधिक दबाव पड़ा।
रॉकेट ने लगभग 154 किलोमीटर की ऊंचाई हासिल की और फेलिसेट ने करीब पांच मिनट तक भारहीनता का अनुभव किया। इसके बाद कैप्सूल पृथ्वी की ओर लौटने लगा। वापसी के लिए पैराशूट प्रणाली का उपयोग किया गया, जिससे कैप्सूल को सुरक्षित नीचे लाने में मदद मिली। लगभग 13 मिनट के मिशन के बाद फेलिसेट को सुरक्षित बरामद कर लिया गया।
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फेलिसेट को अंतरिक्ष में भेजने की वजह
फेलिसेट का मिशन केवल एक अनोखा रिकॉर्ड बनाने के लिए नहीं था। उस समय दुनिया की प्रमुख अंतरिक्ष शक्तियां यह समझने में जुटी थीं कि अंतरिक्ष में जाने पर जीवित शरीर पर क्या असर पड़ता है। पृथ्वी पर जीवन गुरुत्वाकर्षण, वायुमंडलीय दबाव और सामान्य तापमान जैसी परिस्थितियों के अनुकूल विकसित हुआ है। अंतरिक्ष यात्रा के दौरान इन परिस्थितियों में बदलाव आता है, इसलिए वैज्ञानिकों को यह जानना जरूरी था कि शरीर ऐसी स्थिति में कैसे प्रतिक्रिया करता है।
1960 के दशक में अंतरिक्ष यान की तकनीक आज की तुलना में काफी शुरुआती अवस्था में थी। मानव अंतरिक्ष यात्रियों को भेजने से पहले वैज्ञानिकों ने विभिन्न जीवों पर प्रयोग किए। इन अध्ययनों से शारीरिक प्रतिक्रियाओं, तंत्रिका तंत्र की गतिविधियों और अंतरिक्ष यात्रा के दौरान पैदा होने वाले तनाव को समझने की कोशिश की गई। फेलिसेट के मस्तिष्क से जुड़े संकेतों को रिकॉर्ड करना इसी शोध का हिस्सा था।
फ्रांस के लिए यह मिशन अंतरिक्ष विज्ञान में अपनी उपस्थिति मजबूत करने का भी एक तरीका था।
अंतरिक्ष से लौटने के बाद फेलिसेट के साथ क्या हुआ?
फेलिसेट अंतरिक्ष यात्रा से सुरक्षित लौट आई थी, लेकिन उसकी कहानी यहीं समाप्त नहीं हुई। मिशन के बाद वैज्ञानिकों ने उसके शरीर पर यात्रा के प्रभावों का अध्ययन जारी रखा। लगभग दो महीने बाद उसे इच्छामृत्यु दी गई, ताकि वैज्ञानिक उसके मस्तिष्क और शरीर की जांच कर सकें। उस समय शोधकर्ताओं का उद्देश्य यह समझना था कि अंतरिक्ष यात्रा और उससे जुड़े दबावों का उसके तंत्रिका तंत्र पर क्या असर पड़ा था।
हालांकि, बाद में प्रकाशित विवरणों के अनुसार, इस परीक्षण से ऐसा कोई महत्वपूर्ण वैज्ञानिक निष्कर्ष नहीं निकला, जो फेलिसेट की जान लेने को सार्थक ठहरा सके। इस तथ्य ने उसके मिशन के नैतिक पक्ष पर सवाल खड़े किए। अंतरिक्ष विज्ञान के इतिहास में कई जानवर ऐसे प्रयोगों का हिस्सा बने, जिनमें उनकी सुरक्षा और जीवन को लेकर आज की तरह विकसित मानक मौजूद नहीं थे।
फेलिसेट का सुरक्षित लौटना एक वैज्ञानिक उपलब्धि थी, लेकिन उसकी मृत्यु यह याद दिलाती है कि शुरुआती अंतरिक्ष कार्यक्रमों में शोध के लिए जानवरों को भारी कीमत चुकानी पड़ी। इसीलिए आज उसकी कहानी केवल तकनीकी इतिहास का हिस्सा नहीं है, बल्कि विज्ञान में पशु कल्याण और नैतिक जिम्मेदारी पर विचार करने का अवसर भी देती है।
2020 में स्थापित हुई फेलिसेट की कांस्य प्रतिमा
फेलिसेट को सम्मान देने के लिए फ्रांस के स्ट्रासबर्ग में स्थित इंटरनेशनल स्पेस यूनिवर्सिटी में उसकी कांस्य प्रतिमा स्थापित की गई। प्रतिमा का अनावरण दिसंबर 2019 में हुआ और 2020 में यह स्मारक व्यापक रूप से चर्चा में आया।
प्रतिमा में फेलिसेट को पृथ्वी के आकार के आधार पर बने स्मारक पर बैठकर ऊपर आकाश की ओर देखते हुए दर्शाया गया है। इसका उद्देश्य अंतरिक्ष विज्ञान के इतिहास में उसकी भूमिका को स्थायी रूप से याद रखना था।
इस स्मारक के निर्माण के पीछे एक जनसहयोग अभियान था, जिसे ब्रिटेन के मैथ्यू सर्ज गाइ ने शुरू किया था। उनका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि अंतरिक्ष में जाने वाली पहली बिल्ली की कहानी भुला न दी जाए। अभियान को एक हजार से अधिक समर्थकों का योगदान मिला और आवश्यक धनराशि जुटाई गई। इसके बाद प्रतिमा तैयार कर विश्वविद्यालय परिसर में स्थापित की गई।
आज 63 साल बाद भी फेलिसेट की यात्रा हमें याद दिलाती है कि अंतरिक्ष विज्ञान का इतिहास केवल रॉकेटों, उपग्रहों और अंतरिक्ष यात्रियों की उपलब्धियों से नहीं बना। इसमें उन जीवों की भी भूमिका रही है, जिन्हें वैज्ञानिक प्रयोगों के लिए चुना गया। उनकी कहानी को याद रखना विज्ञान की प्रगति के साथ उसकी जिम्मेदारियों को समझने का भी हिस्सा है।
