रेपो रेट बढ़ाने के साथ RBI ने मौद्रिक नीति का रुख भी बदलकर कैलिब्रेटेड टाइटनिंग कर दिया है। यह बदलाव महंगाई और वैश्विक जोखिमों को लेकर केंद्रीय बैंक की बढ़ी चिंता का संकेत माना जा रहा है।
मुंबई: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बढ़ती महंगाई और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच बड़ा फैसला लेते हुए रेपो रेट में 25 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी की है। RBI की मौद्रिक नीति समिति (MPC) ने बुधवार, 7 अक्टूबर को रेपो रेट को 5.25% से बढ़ाकर 5.50% कर दिया। फरवरी 2023 के बाद यह पहली बार है जब केंद्रीय बैंक ने रेपो रेट में बढ़ोतरी की है। छह सदस्यीय MPC ने Repo Rate बढ़ाने के प्रस्ताव को सर्वसम्मति से मंजूरी दी।
Repo Rate बढ़ाने के साथ RBI ने अपनी मौद्रिक नीति का रुख भी बदल दिया है। अगस्त में RBI का रुख ‘न्यूट्रल’ था, लेकिन अब उसने नीति को ‘कैलिब्रेटेड टाइटनिंग’ की दिशा में मोड़ दिया है। इससे संकेत मिलता है कि केंद्रीय बैंक महंगाई के संभावित दबावों पर ज्यादा सतर्क हो गया है और फिलहाल ब्याज दरों में कटौती की गुंजाइश सीमित नजर आ रही है।
करीब साढ़े तीन साल बाद बढ़ी रेपो रेट
RBI ने आखिरी बार फरवरी 2023 में रेपो रेट बढ़ाई थी। उस समय दर 25 बेसिस प्वाइंट बढ़ाकर 6.50% की गई थी। इसके बाद लंबे समय तक दरों को स्थिर रखा गया और 2025 में RBI ने कुल 125 बेसिस प्वाइंट की कटौती करते हुए रेपो रेट को 6.50% से घटाकर 5.25% कर दिया था। अक्टूबर 2026 की बढ़ोतरी इस आसान मौद्रिक नीति के दौर में बदलाव का संकेत है।
अगस्त 2026 की पिछली MPC बैठक में RBI ने रेपो रेट को 5.25% पर बरकरार रखा था और अपना रुख न्यूट्रल रखा था। उस समय केंद्रीय बैंक ने कहा था कि महंगाई और आर्थिक विकास की स्थिति को लेकर और स्पष्टता की जरूरत है। लेकिन इसके बाद महंगाई के आंकड़ों और वैश्विक परिस्थितियों ने तस्वीर बदल दी।
महंगाई ने बढ़ाई RBI की चिंता
Repo Rate बढ़ाने के पीछे सबसे बड़ा कारण महंगाई का दबाव है। अगस्त 2026 में खुदरा महंगाई दर यानी CPI बढ़कर 4.82% हो गई, जो RBI के 4% के मध्यम अवधि के लक्ष्य से लगातार तीसरे महीने ऊपर रही। जुलाई में यह 4.45% थी। खाद्य और ईंधन की कीमतों के साथ-साथ व्यापक कीमतों में बढ़ोतरी ने केंद्रीय बैंक की चिंता बढ़ाई है।
RBI के सामने मुख्य चुनौती यह है कि महंगाई फिलहाल उसके निर्धारित 2-6% के दायरे में है, लेकिन कीमतों में लगातार बढ़ोतरी से आने वाले समय में महंगाई को लेकर लोगों की उम्मीदों पर असर पड़ सकता है। RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने भी संकेत दिया कि महंगाई का परिदृश्य पहले की तुलना में कम अनुकूल हो गया है।
केंद्रीय बैंक ने FY27 के लिए CPI महंगाई का अनुमान 5.0% से बढ़ाकर 5.2% कर दिया है। वहीं कोर महंगाई का अनुमान भी 4.3% से बढ़ाकर 4.4% किया गया है।
पश्चिम एशिया का संकट और महंगा कच्चा तेल
RBI के फैसले में वैश्विक घटनाक्रम की भी बड़ी भूमिका है। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर चला गया है। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
महंगा कच्चा तेल सिर्फ पेट्रोल-डीजल की कीमतों तक सीमित असर नहीं डालता। इससे परिवहन, लॉजिस्टिक्स, उत्पादन और कई अन्य वस्तुओं की लागत बढ़ सकती है।
इसके अलावा वैश्विक बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी और अमेरिकी डॉलर की मजबूती भी उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए चुनौती बनी हुई है। रुपये पर दबाव बढ़ने की स्थिति में आयातित महंगाई का जोखिम और बढ़ सकता है।
एल नीनो भी चिंता का कारण
महंगाई के मोर्चे पर मौसम से जुड़े जोखिम भी RBI के आकलन में महत्वपूर्ण हैं। एल नीनो और बारिश के असमान वितरण से कृषि उत्पादन तथा खाद्य कीमतों पर असर पड़ने की आशंका बनी हुई है। अगस्त में भी RBI ने खाद्य और ईंधन कीमतों से जुड़े जोखिमों का उल्लेख किया था।
अगर खराब मौसम के कारण सब्जियों, अनाज और अन्य खाद्य उत्पादों की कीमतें बढ़ती हैं तो इसका सीधा असर खुदरा महंगाई पर पड़ सकता है। ऐसे में RBI को ब्याज दरों के जरिए महंगाई की दूसरी लहर को नियंत्रित करने की कोशिश करनी पड़ती है।
GDP ग्रोथ का अनुमान
दिलचस्प बात यह है कि RBI ने एक तरफ महंगाई का अनुमान बढ़ाया है, लेकिन दूसरी तरफ आर्थिक विकास को लेकर अपना आकलन बेहतर किया है। केंद्रीय बैंक ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए वास्तविक GDP ग्रोथ का अनुमान 6.7% से बढ़ाकर 7.1% कर दिया है।
यह बदलाव बताता है कि RBI को फिलहाल भारतीय अर्थव्यवस्था में मांग और गतिविधियों की मजबूती पर भरोसा है। 2026-27 की पहली तिमाही में GDP ग्रोथ 7.8% रही, जो केंद्रीय बैंक के पहले अनुमान से बेहतर थी। मजबूत घरेलू मांग, मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर की गतिविधियों ने विकास को सहारा दिया है।
RBI ने FY27 की दूसरी तिमाही की ग्रोथ का अनुमान 6.4% से बढ़ाकर 7.2% और तीसरी तिमाही का अनुमान 6.5% से बढ़ाकर 6.9% किया है। चौथी तिमाही का अनुमान 6.8% पर बरकरार रखा गया है।
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होम लोन और दूसरी EMI पर क्या असर?
रेपो रेट में बढ़ोतरी का असर सबसे पहले लोन लेने वाले ग्राहकों पर पड़ सकता है। यदि बैंक ब्याज दरों में इजाफा करते हैं, तो फ्लोटिंग ब्याज दर वाले होम, कार और पर्सनल लोन की मासिक EMI बढ़ने की संभावना रहती है।
हालांकि, यह जरूरी नहीं है कि RBI की 25 बेसिस प्वाइंट की पूरी बढ़ोतरी हर ग्राहक की EMI में तुरंत और उसी अनुपात में दिखाई दे। बैंक अपनी फंडिंग लागत, लोन की प्रकृति और आंतरिक ब्याज दर व्यवस्था के आधार पर फैसला करते हैं।
नए कर्ज लेने वालों के लिए भी ब्याज दरें पहले की तुलना में ज्यादा हो सकती हैं। वहीं जिन लोगों ने फ्लोटिंग ब्याज दर पर पहले से कर्ज ले रखा है, उन्हें भी आने वाले समय में ऊंची EMI या लंबी लोन अवधि का सामना करना पड़ सकता है।
FD और बचत पर मिल सकता है फायदा
जहां बढ़ती ब्याज दरें कर्ज लेने वालों के लिए चिंता का कारण होती हैं, वहीं बचतकर्ताओं और फिक्स्ड डिपॉजिट यानी FD करने वालों के लिए स्थिति कुछ बेहतर हो सकती है।
अगर बैंक RBI के फैसले के बाद जमा दरों में बढ़ोतरी करते हैं तो नई FD पर पहले से अधिक ब्याज मिल सकता है। हालांकि, बैंक किस सीमा तक और कितनी जल्दी FD दरों में बदलाव करते हैं, यह उनके फंड की जरूरत और बाजार की परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
इसलिए रेपो रेट बढ़ने का असर केवल कर्ज महंगा होने तक सीमित नहीं है। इसका असर बैंकिंग सिस्टम में जमा और उधारी दोनों की कीमत पर पड़ता है।
फिलहाल रेट कट की संभावना नहीं
RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने नीति के बाद यह स्पष्ट संकेत दिया कि निकट भविष्य में ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। उनके अनुसार, आगे की कार्रवाई महंगाई और आर्थिक परिस्थितियों पर निर्भर करेगी और अगला कदम बढ़ोतरी या ठहराव में से कोई हो सकता है।
इस बयान का बाजार पर भी असर पड़ा है। इससे संकेत मिलता है कि RBI फिलहाल महंगाई के खिलाफ अपनी नीति को प्राथमिकता देगा और जब तक कीमतों में स्थिरता के स्पष्ट संकेत नहीं मिलते, तब तक जल्द राहत देने से बच सकता है।
शेयर बाजार पर दिखा असर
RBI के फैसले का असर शेयर बाजार पर भी दिखाई दिया। बुधवार के शुरुआती कारोबार में सेंसेक्स करीब 529 अंक तक फिसला, जबकि निफ्टी में करीब 191 अंकों की गिरावट दर्ज की गई। बैंकिंग और ब्याज दरों से सीधे प्रभावित होने वाले क्षेत्रों के शेयरों पर भी दबाव रहा।
ब्याज दरों में बढ़ोतरी से कंपनियों के लिए कर्ज लेना महंगा हो सकता है। इसका असर खास तौर पर रियल एस्टेट, ऑटो और कंज्यूमर सेक्टर की मांग और निवेश पर पड़ सकता है। वहीं, ऊंची दरों से महंगाई को नियंत्रित करने में मदद मिलती है तो लंबी अवधि में यह अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक साबित हो सकता है। हालांकि, बाजार की प्रतिक्रिया आगे महंगाई, आर्थिक वृद्धि और RBI के अगले फैसलों पर भी निर्भर करेगी।
रुपये पर भी नजर
मौद्रिक नीति के फैसले के बीच विदेशी मुद्रा बाजार की गतिविधियां भी महत्वपूर्ण रहेंगी। डॉलर की मजबूती, कच्चे तेल की ऊंची कीमतें और विदेशी निवेश में उतार-चढ़ाव रुपये पर दबाव बढ़ा सकते हैं। ऐसे माहौल में RBI के रुख का असर मुद्रा बाजार पर भी देखने को मिल सकता है।
बुधवार को RBI के मौद्रिक नीति फैसले से पहले रुपया करीब 96.36 रुपये प्रति डॉलर के स्तर पर कारोबार कर रहा था। बाजार की नजर अब केंद्रीय बैंक के अगले संकेतों पर रहेगी। निवेशक यह देखेंगे कि ब्याज दरों और तरलता को लेकर RBI का रुख रुपये की स्थिरता और विदेशी पूंजी के प्रवाह को किस तरह प्रभावित करता है।
अगर डॉलर मजबूत रहता है और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी बनी रहती है, तो आयात लागत बढ़ने से रुपये पर अतिरिक्त दबाव आ सकता है। वहीं, विदेशी निवेश में सुधार और RBI के स्थिर रुख से रुपये को कुछ सहारा मिल सकता है।

