Wednesday, 30 September 2026
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NICE Road Row: एच.डी. कुमारस्वामी ने डी.के. शिवकुमार पर लगाए ₹3 लाख करोड़ की कथित अनियमितता के आरोप, जानिए पूरा मामला

BMIC परियोजना को लेकर कर्नाटक हाई कोर्ट ने स्वतंत्र विशेषज्ञों से आकलन और खातों के फॉरेंसिक ऑडिट की आवश्यकता का उल्लेख किया। जानिए अदालत की टिप्पणियों में जमीन, टोल और समझौते से जुड़े कौन से मुद्दे थे।

बेंगलुरु: कर्नाटक की राजनीति में बेंगलुरु-मैसूर इंफ्रास्ट्रक्चर कॉरिडोर (BMIC), जिसे आमतौर पर NICE Road Project के नाम से जाना जाता है, एक बार फिर बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया है। केंद्रीय मंत्री और जनता दल (सेक्युलर) नेता एच.डी. कुमारस्वामी ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार पर इस परियोजना से जुड़ी गंभीर अनियमितताओं के आरोप लगाए हैं।

कुमारस्वामी ने परियोजना में कथित नुकसान और अनियमितताओं का आंकड़ा करीब ₹3 लाख करोड़ बताया है और शिवकुमार से NICE के प्रबंध निदेशक अशोक खेनी के खिलाफ कार्रवाई करने या पद छोड़ने की मांग की है।

विवाद इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जुलाई 2026 में कर्नाटक हाई कोर्ट ने BMIC परियोजना से जुड़ी भूमि अधिग्रहण याचिकाओं पर फैसला देते हुए परियोजना के क्रियान्वयन और जमीन के इस्तेमाल को लेकर गंभीर टिप्पणियां की थीं तथा स्वतंत्र आकलन और फॉरेंसिक ऑडिट की जरूरत की बात कही थी।

कुमारस्वामी ने क्या आरोप लगाए?

29 सितंबर को बेंगलुरु में पत्रकारों से बातचीत के दौरान कुमारस्वामी ने BMIC/NICE परियोजना से जुड़े दस्तावेज सार्वजनिक किए। उनका आरोप है कि परियोजना के मूल Framework Agreement (FWA) में बाद के वर्षों में बड़े बदलाव किए गए और जमीन की जरूरत तथा परियोजना के अलग-अलग हिस्सों के लिए आवंटन में बदलाव हुआ।

कुमारस्वामी के अनुसार, परियोजना की शुरुआती योजना में सड़क निर्माण और टाउनशिप के लिए जमीन का अलग-अलग प्रावधान था। उनका आरोप है कि 2004 में, जब डी.के. शिवकुमार कर्नाटक के शहरी विकास मंत्री और BMICP Planning Authority के अध्यक्ष थे, परियोजना की रूपरेखा में बदलाव किए गए। उनका दावा है कि यह बदलाव कैबिनेट की मंजूरी के बिना हुआ।

कुमारस्वामी ने दावा किया कि मूल व्यवस्था में सड़क संबंधी हिस्से के लिए करीब 6,999 एकड़ जमीन और पांच प्रस्तावित टाउनशिप के लिए 13,194 एकड़ का प्रावधान था। उनके मुताबिक बाद की योजना में सड़क परियोजना के लिए जमीन बढ़ाकर करीब 9,469 एकड़ कर दी गई और टाउनशिप के हिस्से में कमी आई।

जमीन के इस्तेमाल पर भी उठाए सवाल

कुमारस्वामी ने आरोप लगाया कि BMIC के लिए अधिसूचित या अधिग्रहित जमीन के कुछ हिस्सों का बाद में निजी कंपनियों, डेवलपर्स और संयुक्त उपक्रमों के जरिए इस्तेमाल या विकास किया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि परियोजना से जुड़े कुछ जमीन सौदों में शिवकुमार के परिवार से जुड़े लोगों के हित भी सामने आते हैं।

कुमारस्वामी ने विशेष रूप से शिवकुमार के भाई और पूर्व सांसद डी.के. सुरेश से जुड़े एक संयुक्त उपक्रम का मुद्दा उठाया। उन्होंने दावा किया कि होसाकेरेहल्ली की करीब 22 एकड़ जमीन से जुड़े एक समझौते में सुरेश और सोभा डेवलपर्स का नाम आया है तथा इससे करीब 400 फ्लैट मिलने का दावा किया गया। कुमारस्वामी ने इन संपत्तियों का अनुमानित मूल्य करीब ₹2,000 करोड़ बताया। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि संबंधित दस्तावेजों और सक्षम जांच एजेंसियों द्वारा होना बाकी है।

क्या है NICE Road Project?

NICE Road का आधिकारिक संदर्भ Bengaluru-Mysuru Infrastructure Corridor Project (BMICP) से है। इसका उद्देश्य बेंगलुरु और मैसूर के बीच तेज कनेक्टिविटी विकसित करना और बेंगलुरु के ट्रैफिक दबाव को कम करने के साथ-साथ आसपास के क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देना था। परियोजना में एक्सप्रेसवे, पेरीफेरल रोड, लिंक रोड और टाउनशिप विकास की योजना शामिल थी।

कर्नाटक हाई कोर्ट के जुलाई 2026 के फैसले के अनुसार, परियोजना के लिए 1997 के Framework Agreement में कुल 20,193 एकड़ जमीन की योजना थी। इसमें 6,999 एकड़ सड़क से जुड़े हिस्सों और 13,194 एकड़ पांच प्रस्तावित टाउनशिप के लिए रखी गई थी।

इस परियोजना के लिए जमीन अधिग्रहण लंबे समय से विवाद का विषय रहा है। कई जमीन मालिकों और किसानों ने अदालतों का रुख किया और भूमि अधिग्रहण तथा मुआवजे को लेकर सवाल उठाए।

1995 से शुरू हुआ था विवादित प्रोजेक्ट

कुमारस्वामी ने परियोजना का इतिहास बताते हुए कहा कि इसकी शुरुआती अवधारणा 1990 के दशक में सामने आई थी। 1995 में एच.डी. देवगौड़ा के मुख्यमंत्री रहते परियोजना से संबंधित शुरुआती समझौता हुआ था। बाद में 1997 में सरकार और NICE के बीच फ़्रेमवर्क समझौता हुआ।

कुमारस्वामी ने जोर देकर कहा कि शुरुआती योजना और बाद की NICE परियोजना में अंतर था। उनके मुताबिक बाद में परियोजना की जमीन, सड़क का अलाइनमेंट और टाउनशिप से जुड़े प्रावधान बदले गए। यही बदलाव वर्तमान राजनीतिक विवाद का केंद्र है।  

2002 के Tripartite Agreement पर भी सवाल

कुमारस्वामी ने 2002 के Tripartite Agreement का भी उल्लेख किया, जिसमें NICE, National Highways Authority of India यानी NHAI और कर्नाटक सरकार शामिल थे। उनका आरोप है कि इस समझौते के जरिए परियोजना से संबंधित जमीन के इस्तेमाल और उसके बिक्री या हस्तांतरण से जुड़े प्रावधानों में बदलाव की गुंजाइश बनी।

हालांकि, परियोजना से जुड़े समझौतों की कानूनी व्याख्या एक जटिल मामला है और अलग-अलग पक्ष इन दस्तावेजों को अलग तरीके से पेश कर रहे हैं।

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हाई कोर्ट ने क्या कहा था?

इस पूरे विवाद में जुलाई 2026 का कर्नाटक हाई कोर्ट का फैसला महत्वपूर्ण है। अदालत ने भूमि अधिग्रहण से जुड़े मामलों में NICE और कर्नाटक इंडस्ट्रियल एरिया डेवलपमेंट बोर्ड (KIADB) की अपीलें खारिज करते हुए पहले के फैसले को बरकरार रखा।

अदालत ने कहा कि 1997 का फ़्रेमवर्क समझौता परियोजना के दायरे और जमीन के इस्तेमाल का महत्वपूर्ण आधार था और परियोजना के किसी हिस्से में बदलाव के लिए राज्य सरकार की पूर्व अनुमति जरूरी थी। अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि बाद के Outline Development Plan में सड़क संबंधी हिस्से के लिए जमीन का आवंटन बढ़ा था।

अदालत के अनुसार, 2004 के Outline Development Plan में सड़क से जुड़े हिस्से के लिए जमीन करीब 9,471 एकड़ तक बढ़ी, जबकि टाउनशिप के लिए आवंटन में करीब 2,472 एकड़ की कमी हुई। अदालत ने इस पुनर्वितरण और अतिरिक्त भूमि अधिग्रहण की संतोषजनक व्याख्या नहीं मिलने का उल्लेख किया।

फॉरेंसिक ऑडिट की बात आई सामने

हाई कोर्ट ने परियोजना के क्रियान्वयन को लेकर बेहद गंभीर टिप्पणियां कीं और स्वतंत्र विशेषज्ञों की टीम से आकलन तथा परियोजना के खातों का फॉरेंसिक ऑडिट कराने की आवश्यकता बताई। अदालत ने परियोजना के जमीन इस्तेमाल, टोल संग्रह और फ़्रेमवर्क समझौते से जुड़े अनुपालन पर भी सवाल उठाए।

अदालत ने यह भी कहा कि राज्य सरकार को परियोजना की समीक्षा या उसे रद्द करने पर विचार क्यों नहीं करना चाहिए, क्योंकि उसके अनुसार परियोजना अपने मूल उद्देश्यों – पांच टाउनशिप और करीब 111 किलोमीटर एक्सप्रेसवे को पूरा करने में विफल रही थी।

किसानों और मुआवजे का मुद्दा

BMIC परियोजना से जुड़ा एक अहम मुद्दा किसानों की जमीन के अधिग्रहण और उसके बदले मिलने वाले मुआवजे से संबंधित है। परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया लंबे समय से विवादों में रही है। कर्नाटक हाई कोर्ट ने जुलाई 2026 के अपने फैसले में ऐसे मामलों का उल्लेख किया, जिनमें भूमि अधिग्रहण की अधिसूचनाएं जारी होने के कई साल बाद भी प्रक्रिया पूरी नहीं हुई थी। इस देरी के कारण कई जमीन मालिकों को अपनी कृषि भूमि के इस्तेमाल में बाधाओं के साथ-साथ आजीविका से जुड़े नुकसान का सामना करना पड़ा।

भूमि अधिग्रहण की लंबी प्रक्रिया ने किसानों के लिए मुआवजे और वैकल्पिक भूमि से जुड़े सवाल भी खड़े किए हैं। कई मामलों में किसानों की जमीन परियोजना के लिए चिन्हित होने के बावजूद अंतिम अधिग्रहण और मुआवजे की प्रक्रिया लंबे समय तक लंबित रही। इससे जमीन के उपयोग और भविष्य की आजीविका को लेकर अनिश्चितता बनी रही।

इसी पृष्ठभूमि में सितंबर 2026 में कर्नाटक कैबिनेट ने BMIC से प्रभावित 1,453 किसानों से जुड़े मुद्दे के समाधान के लिए कदम उठाया। कैबिनेट ने NICE को इन किसानों को साइट आवंटित करने की प्रक्रिया पूरी करने के लिए दो महीने की समयसीमा दी। राज्य सरकार के अनुसार, यह फैसला परियोजना से प्रभावित किसानों की लंबे समय से चली आ रही समस्याओं को दूर करने की दिशा में किया गया प्रयास है।

डी.के. शिवकुमार की प्रतिक्रिया

कुमारस्वामी के आरोपों पर शिवकुमार ने कहा कि उनकी और उनके परिवार की संपत्ति वैध कारोबार और निवेश से बनी है। उन्होंने अपनी संपत्ति को लेकर उठाए गए सवालों को खारिज करते हुए कहा कि उनकी संपत्तियां घोषित हैं और यदि किसी को संदेह है तो संबंधित दस्तावेज आयकर विभाग को दिए जा सकते हैं।

शिवकुमार ने अपने परिवार से जुड़े NICE क्षेत्र के जमीन मामलों को लेकर भी कुमारस्वामी से सवाल किए। उन्होंने कुमारस्वामी के परिवार की परियोजना क्षेत्र में मौजूद संपत्तियों और अतीत में जमीन खरीदने के प्रयासों का मुद्दा उठाया।

शिवकुमार ने यह भी कहा कि वह कारोबार करने और निवेश करने के अपने अधिकार का इस्तेमाल करते हैं तथा किसी रिश्वत या ऐसे घोटाले में पकड़े जाने के आरोप को खारिज किया।

टोल वसूली भी बना राजनीतिक मुद्दा

NICE रोड पर टोल वसूली भी लंबे समय से विवाद में है। अगस्त 2026 में कुमारस्वामी ने कर्नाटक सरकार से NICE रोड का नियंत्रण अपने हाथ में लेने और टोल वसूली रोकने की मांग की थी। उन्होंने हाई कोर्ट की टिप्पणियों का हवाला देते हुए कहा था कि परियोजना में समझौते की शर्तों का पालन नहीं हुआ।

सितंबर में उन्होंने जनता से NICE रोड पर टोल नहीं देने की अपील भी की। हालांकि टोल भुगतान को लेकर कोई भी कदम कानूनी और प्रशासनिक प्रावधानों के दायरे में ही देखा जाना चाहिए।

फिलहाल ₹3 लाख करोड़ का कथित घोटाला एक राजनीतिक आरोप है, स्थापित न्यायिक निष्कर्ष नहीं। NICE रोड का विवाद हालांकि वास्तविक कानूनी और प्रशासनिक मामलों से जुड़ा हुआ है और आने वाले समय में इसके भूमि, समझौते और वित्तीय पहलुओं की जांच इस पूरे प्रकरण की दिशा तय कर सकती है।

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MD Faijan

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लेखक

मोहम्मद फैजान न्यूज़ ऑफ द डे में पत्रकार हैं, जहाँ वे खेल, मनोरंजन, राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मामलों को कवर करते हैं। इससे पहले वे यूट्यूब चैनल स्पोर्ट्स यारी में सोशल मीडिया एग्जीक्यूटिव के रूप में कार्य कर चुके हैं, जहाँ उन्होंने डिजिटल कंटेंट मैनेजमेंट और ऑडियंस एंगेजमेंट का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त किया। भारत के छत्तीसगढ़ राज्य के कोरिया जिले से संबंध रखने वाले फैजान आधुनिक मीडिया कार्यप्रणालियों की अच्छी समझ रखते हैं और कहानी कहने के विभिन्न रूपों में गहरी रुचि रखते हैं।

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